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वाराणसी में विचारों की जंग

इसे भाग्य कहें या सोची-समझी रणनीति कि नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी को अपनी संसदीय चुनाव के लिए चुना। कारण महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण वह प्रतीक है जो वह सीट प्रतिबिम्बित करता है। मार्क ट्वेन ने अपने भारत भ्रमण के नोट्स में लिखा था कि वाराणसी इतिहास से भी पुराना है। उनके यात्रावृत्त वर्णन के लिहाज से अद्वितीय है। श्री विद्या शंकर नायपॉल की1960 में लिखी ‘द वुंडेड सिविलाइजेशन’ मार्क ट्वेन के बाद आती है। रोम को एक शाश्वत शहर कहा जाता है। वह शहर समय से परे है। उसी तरह बनारस भी है।

गंगा किनारे बने घाट ही बनारस को विशिष्ट बनाते है। साल के 365 दिनों की तरह ही बनारस में 365 घाट हैं। हर घाट के अलग-अलग महत्व हैं, जो हर धार्मिक व्यक्ति को पूरे साल करना होता है। भारतीय और विदेशी पर्यटकों के बीच बनारस का दशस्वमेध घाट बहुत प्रसिद्ध है।

इन घाटों पर एक रस्म निभाई जाती है, जो मृत व्यक्ति के इस धरती से रवानगी का द्योतक होता है। प्रचलित रिवाज के साथ बोले जाने वाले मन्त्र काफी दार्शनिक होते हैं। मृत व्यक्तियों के अवशेष गंगा मे बहायी जाती है। यहां आकर सभी मृत व्यक्तियों के पाप धुल जाते हैं ताकि वो पुनर्जन्म ले सके। इन घाटों पर मृत फिर से जन्म लेते हैं।

वाराणसी उस चुनावी संघर्ष का स्थान है, जो भारत की दशा और दिशा को तय करेगा। ‘भारत पर कौन करेगा राज : निरंकुश इंदिरा गांधी और उनके बच्चे या भारत के लोगों द्वारा चुनी गई सरकार’ के मुद्दे वाला 1977 के चुनाव के बाद यह सबसे महत्वपूर्ण चुनाव है।

2014 के चुनाव में जो मुद्दा दांव पर है वह है – 1989-90 के राम जन्मभूमि आंदोलन से उपजे हिन्दु राष्ट्रवाद का खात्मा हुआ है या नहीं और उसके स्थान पर विचारों के प्रादुर्भाव हुआ है या नहीं, जिससे हिन्दुत्व की अवधारणा को इस आधुनिक युग में नए सिरे से पेश किया जा सके। इसका मतलब है एक ऐसा राष्ट्रवाद जिसमें हिन्दू सभ्यता की विविधताएं, भारत में समाहित विशाल विभिन्नताएं और आधुनिकता का समावेश हो।

इस नए राष्ट्रवाद को नरेन्द्र मोदी ने नए सिरे से पेश किया है। उनका गुजरात आर्थिक विकास, सुशासन और सामाजिक सौहार्द्र का उत्कृष्ट नमूना है। गोधरा आज से 13 साल पहले 2002 में हुआ था, तब से लेकर आज तक राज्य में धार्मिक शांति है। इसकी तुलना मुलायम सिंह यादव के उत्तर प्रदेश या कांग्रेस शाषित महराष्ट्र से कीजिए।

बनारस के घाटों पर एक अलग भारत की अवधारणा सुनने को मिल रही है। भारत, जैसा कि इस अवधारणा के प्रतिपादक कहते हैं, में जनतांत्रिक भागीदारी होनी चहिए और उन्हें लोगों के प्रति उत्तरदायी होना होगा। इस अवधारणा के प्रवक्ता अरविन्द केजरीवाल, एक बेहतरीन वक्ता, संचालक और खण्डनात्मक लेखक हैं। उन्होंने गंगा में डुबकी न सिर्फ आस्था की वजह से, बल्कि चुनावों को देखते हुए लगाई।

उनका लोकवाद जनता को तुरन्त पसन्द आता है। वाराणसी की जनता ने मुलायम और अखिलेश यादव के राज मे सिर्फ दुख ही झेला है। उनके कुशासन में भ्रष्टाचार, अपराध और हिंसा का राज रहा है। लखनऊ के बाद उत्तर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहर वाराणसी है। वाराणसी में वो सब कुछ भी है जो एक शहर में नहीं होना चाहिए। वहां की सड़कों में गड्ढे, गलियों में रौशनी का अभाव, हर जगह कूड़ों का ढेर है। शोर इतना कि कान के पर्दे फट जाएं।

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अस्मिता की राजनीति करती है, जिसे लोगों ने नकार दिया है। अस्मिता की राजनीति पुरानी बात हो गई है। वाराणसी के मतदाताओं का ध्यान आर्थिक विकास, सुशासन जैसे राष्ट्रीय मुद्दों की ओर राजनीतिज्ञों की जवाबदेही पर है। इन मुद्दों पर नरेंद्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल ही अहमियत रखते हैं।

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार लोगों की नजर में इसलिए नहीं हैं, क्योंकि उनकी राजनीति उस युग की है जो अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। मेरा मतलब है मंडल-मंदिर वाला युग अब खत्म हो चुका है। वाराणसी में जो हम देख रहे हैं वह एक ऐसी राजनीति है जिसमें आर्थिक विकास और उस तक पहुंचने की बात हो रही है।

कांग्रेस इस तरह की राजनीति करने की कोशिश करती है, लेकिन वह हमेशा असफल रहती है। उसका चुनावी नारा धर्मनिरपेक्षता है और जब सोनिया गांधी और उनकी बेटा-बेटी इसका इस्तेमाल करते हंै तो वह एक पुराने ग्रामोफोन की तरह बजने जैसा लगता है। कांग्रेस ने मोदी को राक्षस बताया पर लोगों ने उसे नकार दिया। उसने केजरीवाल को आवेगी और अपरिपक्व राजनीतिज्ञ बताया तो लोगों ने उल्टे पूछा लिया कि आप कितनी परिपक्व हैं मैडम सोनिया?

केजरीवाल को वाराणसी के करीब 18 प्रतिशत मुसलमानों का विश्वास प्राप्त है। मेरी शहर के बुनकर समुदाय के साथ कई बैठकें हुईं और उनसे बातचीत से उनकी मानसिकता का पता चला। केजरीवाल पर उनका विश्वास, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों से उनकी उदासीनता और कांग्रेस के प्रति उनकी घृणा, सबका पता चला। कांग्रेस का राजवंश उनके लिए पुराने समय की बात हो चुकी है। इसके लिए उनके मन कोई जगह नहीं बची है।

बुनकरों के मन में मोदी की छवि उतनी स्पष्ट नहीं थी। बातचीत के दौरान उन लोगों ने इस बात पर जरुर जोर दिया कि मोदी गोधरा में मुसलमानों के कातिल हैं, लेकिन बाद में मोदी की गोधरा वाली छवि धीरे-धीरे कुछ और रूप ले लेती है। यह बुनकर अपने या ठेके पर लिए हुए पावर लूम्स पर काम करते हैं। इनके उत्पाद सूरत के बुनकरों द्वारा तैयार साड़ी और कपड़ों की तुलना मे काफी कम प्रतिस्पर्धी होते हैं। इसलिए वाराणसी के बुनकरों में मोदी से चिढऩे का एक यह भी कारण है। मोदी के सूरत शहर ने इन लोगों के व्यवसाय पर खतरा पैदा कर दिया है।

मैंने उनसे कहा कि सूरत के बुनकरों की तुलना में उनके आगे नहीं बढऩे के और भी कई कारण हैं। इन कारणों में सबसे बड़ी समस्या बिजली का अभाव है। सूरत के बुनकरों को 24 घंटे बिजली की सुविधा मिलती है, जबकि वाराणसी के बुनकरों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। जब मैंने उनसे कहा कि ना सिर्फ बुनकरों बल्कि पूरे गुजरात को 24 घंटे, सातों दिन बिजली मिलती है, तो मेरे मेजबानों के होश उड़ गए। उन्होंने कहा कि ‘क्या आप सच बोल रहे हैं या सिर्फ ऐसे गुजरात डेवलपमेंट की बकवास कहानियंा सुना रहे हैं।’ धैर्य से जब उन्हें बताया गया कि गुजरात का विकास वास्तविक है, तो वो मोदी की गोधरा वाली छवि से हट कर थोड़े दयालु हो जाते हैं। जब आप यह कहते हैं कि गोधरा 12 साल पहले हुआ था और तब से लेकर आज तक राज्य मे शांति है तो यह बुनकर इस बात को तो मानते हैं, लेकिन पलट कर पूछते हैं कि ऐसा फिर नहीं होगा? कुछ लोगों ने कहा कि हो सकता है मोदी उतने बुरे न हों लेकिन यह देखना होगा कि हमारे समुदाय के प्रति उनका क्या रवैया है।

असली मुकाबला तो मोदी और केजरीवाल के बीच ही है, जो कि साफ तौर पर मोदी के पक्ष मे दिखता है। अगर देखा जाये तो दोनों में कोई विशेष अन्तर नहीं है। दोनों ही साफ सुथरी, उत्तरदायी और दक्ष सरकार चाहते हैं। दोनों ईमानदार हैं और दोनों ही निर्णय निर्धारण प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी चाहते हैं। केजरीवाल का यह कहना है कि धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा दोनों को अलग करता है। क्या वास्तव में ऐसा है?

2014 के चुनावों ने भारतीय राजनीति को बदल दिया है। राम जन्मभूमि वाला हिन्दू राष्ट्रवाद खत्म हो चुका है। मोदी के विकास का मुद्दा राम जन्मभूमि के मुद्दे पर भारी पड़ गया है। मंदिर का मुद्दा भाजपा के मैनिफेस्टो के आखिरी पन्ने पर दिखता है। मैनिफेस्टों में उर्दू को बढ़ावा और वक्फ बोर्डों को और शक्ति देने की बात भी कही गई है।

केजरीवाल ने भी देश की राजनीति को बदला है। इसकी शुरुआत 2011 में अण्णा के आजाद मैदान और रामलीला मैदान से किए गए आंदोलन से हुई। उस आंदोलन ने ‘परिवार’ की जड़ें हिला दीं।

बदलाव की इस आंधी में परिवार और अस्मिता कीराजनीति करने वालों का नामों-निशान मिट जाएगा। क्या सुखद संयोग है कि गंगा के ये घाट इस बदलाव के साक्षी होंगे।

वाराणसी से भरत वारियावाला

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