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बदनाम हुए, तो भी नाम तो होगा!

ऐसा महसूस होता है कि कुछ नेताओं को लगने लगा है जैसे 16 मई के आगे कोई दुनिया नहीं होगी। न आपसी रिश्ते रहेंगे, न नेता आपस में मिलेंगे-जुलेंगे। बताइए तो सही, कोई दलितों के घर के दौरे को हनीमून बता रहा है, तो कोई किसी को राक्षस बता रहा है। कोई किसी को पाकिस्तान भेजने की बात कह रहा है, तो कोई किसी को देश तोडऩे वाला करार दे रहा है? किस-किस तरह के बयान दिए जा रहे हैं? कुछ बयानों की बानगी देखिए।

बाबा रामदेव ने 25 अप्रैल को लखनऊ में कहा – ”वह (राहुल गांधी) दलितों के घर पिकनिक और हनीमून मनाने जाते हैं।’’ राजदीप सरदेसाई के साथ गूगल हैंगआउट में आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी को ‘राक्षस और गुंडा’ तक कह डाला। कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने अपने विज्ञापन में भाजपाई नेताओं को देश को तोडऩे वाला और ‘भारतीयता और हिंदुस्तानियत’ के खिलाफ बता दिया। बिहार में नवादा लोकसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी गिरिराज सिंह ने यहां तक कह दिया कि ‘जो लोग नरेंद्र मोदी को रोकना चाहते हैं… आने वाले दिनों में इन लोगों के लिए जगह हिंदुस्तान में नहीं … पाकिस्तान में होगी।’ समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने बसपा नेता मायावती की वैवाहिक स्थिति पर अजीब-सी टिप्पणी कर डाली – ‘मैं उसे कुमारी कहूं, श्रीमती कहंू या बहन कहूं?’

इन बयानों को चुनाव की गर्मी में दिए बयान कह कर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इनमें कई बयान किसी छोटे-मोटे नेता ने नहीं, बल्कि जिम्मेदार नेताओं ने दिए हैं। ये लोग कई हार-जीत और चुनाव झेल चुके हैं। तो फिर ऐसा क्या हो रहा है कि ऐसे बयान आ रहे हैं?

इसका एक कारण तो ये माना जा सकता है कि कई मायनों में इस बार के चुनाव अनूठे हैं। एक तो अब तक जहां भी मतदान हुआ है, यदि कुछ स्थानों को छोड़ दिया जाए, तो वहां वोटों का प्रतिशत पिछले चुनावों के मुकाबले काफी ज्यादा रहा है। इससे जो आज सत्ता मैं हैं, वे विचलित हो गए हैं और लगता है कि अपनी पार्टी की साख बचाने के लिए उन्होंने सारी मर्यादाओं और सीमाओं को लांघ दिया है।

इस चुनाव में दो नए घटक हैं। एक तो ‘आम आदमी पार्टी’ और दूसरा ‘नरेंद्र मोदी का घमासान और आक्रामक प्रचार’। ‘आम आदमी पार्टी’ जहां ताश के खेल के एक ‘ब्लाईंड कार्ड’ की तरह है, वहीं नरेंद्र मोदी की राजनीतिक आक्रामकता विरोधियों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। ‘आम आदमी पार्टी’ की मुश्किल यह है कि वह मीडिया पर बहुत निर्भर है और जब मीडिया में उनकी कवरेज कम होती है तो उनका नेतृत्व बौखला जाता है। उस बौखालहट में उनके यहां से ऐसे बयान आते हैं कि जिनका उद्देश्य उन्हें फिर मीडिया में लाना होता है। उनकी फितरत यह हो गई है कि ‘बदनाम हुए, तो भी क्या नाम न होगा!’ अरविंद केजरीवाल के बयान को उसी संदर्भ में समझा जा सकता है।

सोनिया गांधी का विज्ञापन आधे से ज्यादा चुनाव बीतने के बाद आया। इससे दो बातें साफ दिखती हैं। एक कि उन्होंने स्वीकार कर लिया कि ‘राहुल का असर नहीं हो रहा है’ और दूसरा यह कि ‘मुसलमान और तथाकथित सेकुलर वोटों को कांग्रेस से खिसकने से बचाने के लिए मोदी का डर दिखाना जरूरी है।’ उधर मुलायम सिंह यादव को भी शायद लगता है कि मायावती की पार्टी मुसलमान वोट ना ले जाए। सो उन्होंने भी कमर से नीचे वार किया है।

भाजपा में गिरिराज सिंह के बयान को आप छोटे नेता का बयान कहकर नजरअंदाज कर भी जाएं, पर बाबा रामदेव का बयान पूरी तरह से अशोभनीय और असंवेदनशील था। ऐसा कहकर उन्होंने राहुल और दलितों का नहीं बल्कि स्वयं अपना ही कद गिराया है। साधुओं से तो कम से कम कोई ऐसी अपेक्षा नहीं करता।

हालांकि फारूख अब्दुल्ला अपने विवादस्पद बयानों के लिए ही जाने जाते हैं, मगर उनका यह कहना कि ‘जो मोदी के लिए वोट कर रहे हैं, उन्हें समुंदर में फेंक दिया जाना चाहिए’, कुछ ज्यादा ही हो गया। यह मोदी का नहीं, देश के मतदाताओं का अपमान है। सारे गुजरातियों का अपमान है, जो मोदी को तीसरी बार मुख्यमंत्री बना चुके हैं। जो भी हो, इस बार अनेक वरिष्ठ और कद्दावर नेताओं ने अपने कद की गरिमा के विपरीत लक्ष्मण रेखा लांघी है। यह सही है कि चुनाव आयोग ने इस बार सख्ती अपनाई है, मगर फिर भी नेताओं को तो सोचना चाहिए कि हार हो या जीत 16 मई के भी आगे एक दुनिया है।

उमेश उपाध्याय

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