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इंतजार की घड़ी शुरू!

मोदी ने पूरे चुनावों को खुद पर केन्द्रित रखा है। अब उनके सामने गेंद है और जीत के लिए मर्यादित होकर तन्मयता से तगड़ा शॉट लगाने की जरूरत है। जरा सी भी चूक उनके सपनों पर पानी फेर सकती है।

शारजाह में 1986 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए क्रिकेट मैच के अन्तिम क्षणों की यादें आज भी खेल प्रेमियों को रोमांच से भर देती हैं। मैच के उन अन्तिम क्षणों में जावेद मियांदाद क्रीज पर थे। चेतन शर्मा के हाथों में गेंद थी। एक गेंद और चार रनों ने भारत और पाकिस्तान की टीमों के भाग्य का फैसला करना था। मैच की आखिरी गेंद पर पाकिस्तान को जीतने के लिए चार रनों की जरूरत थी। चेतन शर्मा गेंद फेंकने के लिए आगे बढ़े। खेल प्रेमियों की सांस गले में अटकी थी। गेंद चेतन शर्मा के हाथों से छूटने से लेकर जावेद मियांदाद के बल्ले पर पहुंचने तक खेल प्रेमियों के लिए मानों युग बीत गए। उसके बाद जावेद मियांदाद का जो बल्ला घूमा, उसने गेंद सीधे दर्शक दीर्घा में पहुंचा दी।

आजादी के बाद सबसे अधिक चरणों में हुए 16 वीं लोकसभा के चुनावों का आखिरी चरण अब भी बाकी है, लेकिन देश ने अभी से 16 मई में बाकी बचे दिनों की गिनती शुरू कर दी है। पूरे देश में हो रही नमो-नमो की गूंज में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 16 मई को होने वाली वोटों की गिनती को मोदी के विजय दिवस के लिए केवल औपचारिकता मान रही है, लेकिन कांग्रेस अब भी मोदी को 7 रेसकोर्स पहुंचने से रोकने के लिए दांव-पेंच की तलाश कर रही है। हाल ही में हुए एक अध्ययन ने चुनावों से पूर्व मित्रों के साथ स्पष्ट बहुमत मिलने की संभावना बता कर पहले से ही पूर्ण विश्वास से भरी भाजपा की उम्मीदों को पंख लगा दिए हैं।

भाजपा की इन उम्मीदों का ठोस आधार मोदी के पक्ष में देश का राजनैतिक वातावरण दिखाई देना है। भाजपा के नेता तो इसे मोदी की जबर्दस्त आंधी बताते हुए देश को मोदीमय बन जाने की संज्ञा दे रहे हैं। दूसरी ओर पिछले दो दशकों से यूपीए को लेकर सत्ता में बैठी कांग्रेस जबर्दस्त सत्ता-विरोधी प्रभाव के वायरस से पीडि़त होकर अपना मनोबल खो चुकी है। पूरे राजनीतिक परिदृश्य से यह तो स्पष्ट है कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा अन्य सभी राजनीतिक दलों से आगे है।

यहीं रूक कर दिल्ली का उदाहरण सामने रखें, तो 16 मई के बाद के परिदृश्य पर गौर किया जा सकता है। हाल ही में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा कांग्रेस और ‘आप’ से आगे रही। भाजपा सबसे आगे रहने के बावजूद अब तक दिल्ली की कुर्सी पर नहीं बैठ सकी है। 16 मई के बाद इस प्रकार के परिदृश्य की आशंका से तब तक इंकार नहीं किया जा सकता, जब तक भाजपा खुद स्पष्ट बहुमत प्राप्त न कर ले।

हालांकि भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हुए नरेन्द्र मोदी ने खुद ही पार्टी के लिए ही 300 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया हुआ है, लेकिन फिर भी 2004 के चुनाव परिणाम याद किए जाने अप्रासंगिक नहीं होंगे, जब कांग्रेस को सत्ता में पहुंचने पर खुद को ही आश्चर्य हुआ था। तब भाजपा पूरे उत्साह के साथ छह महीने पहले ही चुनाव मैदान में उतर गई थी। शाईनिंग इंडिया का स्लोगन चुनाव परिणाम आने तक भाजपा के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी को 7 रेसकोर्स रोड पहुंचाने की उम्मीदें जगाए हुए था। लेकिन परिणाम आए तो कांग्रेस से भाजपा मात्र सात सीटें ही कम थीं। कांग्रेस को कुल 145 और भाजपा को कुल 138 सीटें मिलीं थीं।

इस का अर्थ यह बिल्कुल नहीं लगाना चाहिए कि इस बार भी मैं भाजपा को कांग्रेस की तुलना में कम सीटें दे रहा हूं। यह तो 16 मई को ही पता लगेगा कि किस को कितनी सीटें मिलती हैं, लेकिन इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं है कि देश का माहौल मोदी को इस दौड़ में अब तक सबसे आगे दिखा रहा है।

लेकिन राजनीतिक पंडित अन्य सवाल खड़े कर रहे हैं। सवाल यह है कि भाजपा की इस पूरी कवायद और मोदी की खून-पसीने की मेहनत के बाद यदि 272 का जादुई आंकड़ा छूने को लेकर यदि एनडीए की सीटें कम रहती हैं तो राजनीतिक परिदृश्य क्या बनेगा?

यदि चुनाव सर्वेक्षणों को एक तरफ रख कर निष्पक्ष राजनैतिक पंडितों की सुनी जाए तो अनुमान के अनुसार सत्ता में पहुंचने के लिए भाजपा 200 से अधिक जितनी सीटें जीत सके उतना अच्छा है, लेकिन फिर भी उसे नई दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए 180 से 200 के बीच सीटें जरूरी हैं। भाजपा की वर्तमान मित्र पार्टियां उसे 30 सीटें दिलवा कर 272 के जादुई आंकड़े के निकट पहुंचा सकती हैं। उसके बाद कोई मुश्किल कम ही आएगी।

अपने लक्ष्य के लिए भाजपा के चुनाव प्रबंधक दक्षिण भारत की नहीं, बल्कि बिहार और उत्तर प्रदेश की बात कर रहे हैं। वे इन दोनों राज्यों की 120 सीटों में से कम से कम 75 सीटें अपने पक्ष में होने का दावा कर रहे हैं। यदि उत्तर प्रदेश के चुनाव परिदृश्य का विश्लेषण किया जाए तो कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के साथ चतुष्कोणीय मुकाबले में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित वोट इन चारों पार्टियों में बंटे लगते हैं। योगगुरू रामदेव की ‘हनीमून’ टिप्पणी ने भाजपा के निकट आ रहे दलितों को उससे दूर कर दिया। वैसे वोटों के धु्रवीकरण की बदौलत जाट और कुछ दलित वोटों से भाजपा अपनी उम्मीदें पूरी करने में सफल रहेगी। मुस्लिम वोट उस पार्टी को जा सकते हैं जो इलाके में भाजपा को हराने का दमखम दिखा रही है।

इन चुनावों में अनेक खास बातों में एक बात बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती को लेकर भी है, जो अप्रत्याशित रूप से पूरे चुनावों में शान्त जैसी दिखाई दे रही हैं। बीएसपी ने 2009 के चुनावों में 20 सीटें जीती थीं और 45 सीटों पर वह दूसरे नम्बर पर रही थीं। मायावती की अप्रत्याशित चुप्पी से उनके वोट बैंक का इन चुनावों के परिणामों पर होने वाला असर स्पष्ट नहीं हो पाया है।

दूसरी ओर बिहार में कांग्रेस के साथ लालू प्रसाद यादव की आरजेडी का गठबंधन मुस्लिम-यादव वोट खींचने में सफल बताया जा रहा है। जेडी (यू) ने सत्ता में होने के बावजूद अपनी जमीन खोई है, तो भाजपा उसका लाभ उठाने में सफल रही है।

कुल मिला कर स्थिति यह है कि भाजपा यदि अपने दम पर 200 सीटें लाने में सफल होती है, जिसकी उसे पूरी उम्मीद है, तो हालात वही होंगे जो स्क्रिप्ट में पहले से लिखे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकारें भी भाजपा की 180 सीटों पर चली थीं। लेकिन उस हालत में चुनावों के परिणाम आने के बाद भाजपा को नए साथियों की तलाश करनी होगी, जो वर्तमान परिदृश्य में आसान नहीं दिखती। वैसे तो राजनीति में कोई स्थायी दोस्त दुश्मन नहीं होते, फिर भी वाजपेयी सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले नवीन पटनायक, ममता बनर्जी और नीतिश कुमार के वर्तमान में भाजपा के साथ रिश्ते सबके सामने दिखाई दे रहे हैं, जो सीटें कम रहने पर मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।

मोदी ने पूरे चुनावों को खुद पर केन्द्रित रखा है। अब उनके सामने गेंद है और जीत के लिए मर्यादित होकर तन्मयता से तगड़ा शॉट लगाने की जरूरत है। जरा सी भी चूक उनके सपनों पर पानी फेर सकती है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि केवल सात सीटों से पिछड़ कर आडवाणी 2004 में 7 रेसकोर्स नहीं जा सके थे और भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता सौंप दी थी।

श्रीकान्त शर्मा

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