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क्या मोदी हिन्दू राष्ट्र बना सकते है?

भारतीय लोकतन्त्र का महापर्व चल रहा है। 16वीं लोकसभा के लिए हो रहे ये आम चुनाव संविधान और भारत के सभी नागरिकों की बराबरी के दर्जे की प्रतिबद्धता हैं, चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के या कोई भी भाषा बोलने वाले क्यों न हों। लेकिन दक्षिण एशिया में एक अलग ही रूझान बढ़ता दिखाई दे रहा है, जहां ‘दूसरा व्यक्ति’ हत्यारी राजनीति का शिकार होता नजर आ रह है। दूर जाने की जरूरत नहीं, पड़ोस के बांग्लादेश और पाकिस्तान में, जहां अल्पसंख्यक समुदाय के लोग संगठित हत्याओं और बलात्कार की घटनाओं के शिकार हो रहे हैं।

भाजपा के घोषणा-पत्र में साफ तौर पर कहा गया है कि भारत, सताए गए हिन्दुओं का नैसर्गिक घर होगा और यहां शरण लेने पर उनका स्वागत होगा। मोदी ने उत्तर-पूर्व और बंगाल में दिए अपने भाषणों में स्पष्ट किया है कि भारत हिन्दू और मुस्लिम प्रवासियों में अन्तर को स्पष्ट करेगा। पार्टी के घोषणा-पत्र में हिन्दुत्व के समर्थक मुरली मनोहर जोशी की छाप दिखाई देती है। यह पहला मौका है जब किसी राजनैतिक पार्टी ने देश में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों की मौजूदगी स्वीकार की है।

मोदी ने वादा किया है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद बांग्लादेश से आने वाले हिन्दू प्रवासियों के ‘हिरासत’ शिविरों को जितना जल्दी हो सकेगा, समाप्त किया जाएगा। भारत की अन्य देशों में सताए गए हिन्दुओं के प्रति जिम्मेदारी है। मोदी ने यह भी कहा है कि सीमावर्ती राज्यों को इन प्रवासियों के कारण नुकसान नहीं उठाना पड़ेगा। भाजपा नीत सरकार उन्हें देश में बसाएगी, जैसे सरकार ने तिब्बती शरणार्थियों के साथ किया है। मोदी ने 4 मई को बांकुरा में हिन्दू और मुस्लिम बांग्लादेशी प्रवासियों के बीच अन्तर स्पष्ट किया था। उन्होंने कहा कि हिन्दू ‘भारत के सपूत हैं, भारत को प्रेम करते हैं, दुर्गाष्टमी मनाते हैं, और बांग्ला बोलते हैं, इसलिए उनके साथ वही व्यवहार होना चाहिए जैसा कि भारत के सपूतों के साथ होता है। जबकि मुस्लिम घुसपैठिए हैं, जो यहां ‘वोट बैंक राजनीति’ के तहत आए हैं और जिसकी वजह से भारतीयों के लिए नौकरियों पर संकट आया है।

बांग्लादेश से अवैध प्रवास भारत के कुछ राज्यों की जनसांख्यिकीय नक्शा बदलने के लिए एक सोची-समझी रणनीति है। इन प्रवासियों को आसानी से पहचाना जा सकता है और उनमें से अनेक को कानूनी रूप से वापस बांग्लादेश भी भेजा जा सकता है। प्राथमिक आवश्यकता भारत-बांग्लादेश सीमा से घुसपैठ में शून्यता लाना सुनिश्चित किया जाना है। यह लक्ष्य पूरी भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने से प्राप्त किया जा सकता है।

मोदी की यह सोच कि हर हिन्दू प्रवासी एक शरणार्थी है, जबकि हर मुस्लिम प्रवासी एक ‘घुसपैठिया’ है, ‘हिन्दू राष्ट्र’ के केन्द्रीय विचार की याद दिलाता है। मोदी जानते हैं कि वह एक संकट मोल ले रहे हैं और इसके लिए केवल चुनाव आयोग ही नहीं बल्कि अन्य राजनीतिक पार्टियां और मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग भी उनकी आलोचना करेगा। यह खतरा उन्हें लेना ही था, लेकिन वह अपने भाषण में उससे भी कहीं आगे चले गए। वैसे सीमा पार कर भारत आए पाकिस्तान और बांग्लादेश में सताए हुए हिन्दुओं की मदद करने का आसान तरीका है कि 1951 के शरणार्थी कन्वेंशन को स्वीकार कर लिया जाए। इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वालों को शरणार्थियों को उनके देश वापस भेजने की जरूरत नहीं है, जहां उन्हें सताए जाने का भय है। ऐसा करते हुए भारत इस्रायल की तरह निश्चित रूप से खुद को ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित कर सकता है।

जैसी कि उम्मीद थी, तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने मोदी को ‘कागजी शेर’ (पेपर टाइगर) की संज्ञा देते हुए पहला गोला दागा कि पहले वह ‘रायल बंगाल टाइगर’ से मिलें। उन्होंने चुनौती दी कि 16 मई को यदि मोदी सत्ता में आते हैं, तो वह बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेज कर दिखाएं। यह आरोप लगाते हुए कि गुजरात के मुख्यमंत्री को इतिहास की जानकारी नहीं है, ममता ने कहा कि 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के राष्ट्रपति शेख मुजीब-उर-रहमान के बीच हुए एक समझौते के तहत बांग्लादेशी भारत आए हैं।

बांग्लादेशियों की समस्या पर मोदी को व्यावहारिक रास्ता अपनाना चाहिए। ‘हिन्दुओं को भारत आमन्त्रित करने’ और ‘गैर-हिन्दू घुसपैठियों को बाहर फेंकने’ जैसे बयान देते हुए मोदी बांग्लादेश के इस्लामिक कट्टरवादियों के हाथों में खेलते हैं। बेशक वह अच्छा चुनावी भाषण दे रहे हों, लेकिन सच्चाई यह है कि बांग्लादेश में रहने वाले हिन्दुओं के लिए यह उनके ताबूत में कील ठोंकने जैसा होता है। भारत को पहले विभाजन का शेष एजेंडा समाप्त करना चाहिए और जो हिन्दू भारत आना चाहें, उनका खुले दिल से स्वागत करना चाहिए। इसी प्रकार से इस्लाम समर्थक मुस्लिम जो इस्लामिक राज्य में रहना चाहें, उन्हें वहां जाने की इजाजत दे देनी चाहिए।

बंगाल और असम ने सीमा पार से हुई भारी घुसपैठ से भारी नुकसान उठाया है। लेकिन यह तथ्य है कि घुसपैठ 1971 के बाद शुरू नहीं हुई। उपमहाद्वीप की विभाजन रेखाएं, खासतौर पर पूर्व में, इतनी अव्यवहारिक हैं कि वे घरों और परिवारों को विभाजित करती हैं। गुजरात से भिन्न, वहां कोई ‘कच्छ का रण’ नहीं है, जो बांग्लादेश से दो बंगालों या असम को विभाजित करता हो। तटवर्ती सीमा छिद्रपूर्ण है। बाड़ लगाने का काम अधूरा पड़ा है। उग्र घुसपैठ जारी है।

केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के. रहमान खान ने असम में अल्पसंख्यक समुदाय पर हिंसा के लिए भाजपा और मोदी को जिम्मेदार ठहराया है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बांग्लादेशी प्रवासियों के बारे में मोदी की टिप्पणी और असम हिंसा के लिए मोदी को जिम्मेदार ठहराया है।

अमेरिका के पास अत्याधुनिक तकनीक और बेहतर संसाधन हैं, फिर भी वह अवैध प्रवास को नहीं रोक सका है, जो 2000 से 2012 के बीच 30 प्रतिशत बढ़ी है। हाल के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में 58 प्रतिशत घुसपैठ मेक्सिको से होती है। दोनों देशों के बीच 2,000 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो लंबाई और स्थलाकृतिक जटिलताओं की तुलना में भारत-बांग्लादेश की सीमा से बहुत छोटी है। लेकिन घुसपैठ फिर भी जारी है।

शेख हसीना ने हाल ही में म्यांमार में कहा था कि ग्लोबल वार्मिंग में एक डिग्री सेल्सियस बढ़ जाने से बांग्लादेश का पांचवां हिस्सा डूब जाएगा और तीन करोड़ लोग ‘क्लाइमेट माइग्रेंट’ हो जाएंगे। म्यांमार के पास क्योंकि कोई विकल्प नहीं है, इसलिए अधिकांश घुसपैठ भारत में होगी। हमें व्यावहारिक नीतियां लागू करनी होंगी, जिनमें प्रवासियों को ‘कार्य परमिट’ देना शामिल हो। उम्मीद है कि मोदी के बयान केवल हवा-हवाई भाषण बन कर न रह जाएं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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