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कर्नाटक में चुनावों से पहले ही तीनों बड़ी पार्टियों – भाजपा, कांग्रेस और जे.डी. (एस) के मूड में जमीन-आसमान का फर्क साफ दिखाई दे रहा है। भाजपा जहां आत्मविश्वास और जोश से लबरेज है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस सजग आशावादी पार्टी नजर आ रही है। जे.डी. (एस) इन दोनों पार्टियों के बीच ना-उम्मीदी के सागर में भी उम्मीद के सहारे तलाश करती दिख रही है।

भाजपा का आत्मविश्वास और जोश वाकई आश्चर्यचकित करने वाला है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पार्टी से सन् 2009 की तरह लोकसभा चुनावों में 19 सीटें जीत पाने की उम्मीद कम ही है। भाजपा के आत्मविश्वास और जोश का कारण उसकी लोक सभा चुनावों में 14 से 16 सीटें जीत पाने की संभावना को माना जा रहा है। कम से कम भाजपा की 4 से 6 सीटें जीतने के उसके सबसे खराब प्रदर्शन से तो यह संख्या अच्छी ही है।

भाजपा की 14 से 16 सीटें जीतने की संभावना के पीछे दो कारण माने जा रहे हैं। पहला, भूतपूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदयुरप्पा की वापसी और दूसरा देशभर में फैली मोदी लहर। हालंकि, राज्य के भाजपाई नेता लोकसभा चुनावों में करीब 20 से 22 सीटें जीतने का दावा पेश कर रहे हैं। यह संख्या किसी भी हालात में व किसी भी मापदंड पर बहुत अधिक और लगभग नामुमकिन है।

कांग्रेस के लिए सजग आशावादी पार्टी होने का कारण उसका केंद्र में जनता का प्रतिरोध झेलने वाली पार्टी होना है। ऐसा उनके प्रदर्शन के कारण या मुख्यमंत्री सिद्धरमैय्या के कारण नहीं है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने अपने दस महीनों के कार्यकाल के दौरान राज्य में घोटाला-मुक्त प्रशासन दिया है। इसके साथ ही उन्होंने राज्य में जिस सरकार की झलक प्रस्तुत की है, वैसी सरकार भाजपा के समय में देखने को नहीं मिली थी।

भाजपा की बात करें तो कर्नाटक में तीन मुख्यमंत्रियों के दौरान पार्टी के प्रदर्शन और उपलब्धियों को पार्टी की अंतर्कलह और आपसी मतभेदों के कारण ग्रहण लग चुका है। येदयुरप्पा के द्वारा कही गई बात में काफी सच्चाई नजर आती है। उन्होंने कहा था – ‘हम अपने र्दुव्यवहार और अभद्र आचरण के कारण हारे। हालांकि, हमारा प्रदर्शन कई मोर्चों पर सराहनीय था, लेकिन हम अपनी साख व विश्वसनीयता को बचाने में विफल रहे हैं।’

कर्नाटक में एक बात जो कांग्रेस को फायदा पहुंचा सकती है, वह है मुख्यमंत्री सिद्धरमैय्या का एक रूपये में एक किलो चावल देने का फैसला। इसने लोगों का काफी ध्यान आकर्षित किया है। भाजपा के नेता भी इस बात पर सर्वसम्मति बनाते हुए कहते हैं – ‘एक रूपये में एक किलो चावल देने के फैसले से हमें भारी नुकसान हुआ है। हालंाकि, लोगों में अब भी मोदी के प्रति विश्वास कायम है। हम लोगों को यह समझाने में लगे हुए हैं कि आज मोदी देश की मांग हैं। एक रूपये में एक किलो चावल वाली योजना चुनावों के पश्चात समाप्त हो जाएगी। इस बात पर लोगों को विश्वास दिलाने में कुछ समय जरूर लगेगा।’

मुख्यमंत्री सिद्धरमैय्या के लिए यह चुनाव काफी महत्वपूर्ण है। कांग्रेस खेमे में अभी से इस बात पर चर्चा हो रही है कि अगर सिद्धरमैय्या यह चुनाव हार जाते हैं या पार्टी का प्रदर्शन खराब होता है, तो मुख्यमंत्री पद की दावेदारी से उनका पत्ता कट सकता है। लेकिन, मुख्यमंत्री सिद्धरमैय्या पहले भी कई बार कह चुके हैं व उदय इंडिया के साथ बातचीत में फिर इस बात पर उन्होंने मुहर लगाई – ‘लोकसभा के चुनाव परिणाम से कर्नाटक कांग्रेस में बदलाव की स्थिति उत्पन्न नहीं होगी। लोकसभा के चुनाव परिणाम केवल मेरी सरकार के प्रदर्शन पर ही निर्भर नहीं हैं।’ समय की कमी के बावजूद वह एक बात जरूर बोले – ‘हम इन चुनावों में 20 से 22 सीटें अवश्य जीतेंगे। इसमें कोई परेशानी नहीं होगी। कर्नाटक में मोदी लहर की अनुपस्थिति जगजाहिर है।’

अत: ऐसा कहते हुए – ‘लोकसभा के चुनाव परिणाम केवल मेरी सरकार के प्रदर्शन पर ही निर्भर नहीं हैं’, मुख्यमंत्री सिद्धरमैय्या ने बड़ी चतुराई से कांग्रेस हाईकमान को अर्श से फर्श पर ला खड़ा किया है। वहीं जे.डी.(एस) ना-उम्मीदी में भी उम्मीद कर रही है कि उसे कम से कम छह से आठ सीटें मिलेंगी और भाजपा या कांग्रेस 272 का जादूई आंकड़ा पाने में यदि विफल रहती हैं, तो तीसरे मोर्चे की सरकार के गठन में वह अहम रोल अदा कर सकती है। जे.डी.(एस) जिन निर्वाचन क्षेत्रों में जीत का डंका बजाने के सपने देख रही है, वे हैं- हासन, चिक्काबल्लापुर, तुमकुर, कोलर चित्रादुर्गा, मंडया और मैसूर।

सब कुछ जानने व समझने के बाद यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जे.डी.(एस) तीन सीटें जीत सकती है। हासन से दो सीटें – एच.डी. देवेगौड़ा और चिक्काबल्लापुर से एक सीट उनके बेटे एच.डी. कुमारस्वामी जीत सकते हैं। हालांकि, हासन से कांग्रेस के उम्मीदवार ए. मंजू का मानना है – ‘देवगौड़ा के लिए इस बार जीतना आसान नहीं होगा। लोगों ने उनके टसुए बहा कर राजनीति करने के खेल को पहचान लिया है। वह हमेशा से भावुक होकर लोगों की भावनाओं से खेलते हुए कहते रहे हैं – यह उनका आखिरी चुनाव है। ऐसा उन्होंने सन् 1989 के चुनावों के समय भी कहा था। ऐसी नौटंकी इस बार नहीं चलेगी।’

तो, क्या ए.मंजू इस बार बड़े नेता के तौर पर उभरेंगे? मंजू पूरे आत्मविश्वास से कहते हैं – ‘हां बिल्कुल। देवगौड़ा कर्नाटक की राजनीति में एक बहुत बड़े नेता हैं और उनके खिलाफ चुनाव लडऩा अपने आप में गौरव की बात है। इसका अपना एक मजा भी है। मैं अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूं।’ वह छात्र संघ के नेता रह चुके हैं और उन्हें वोक्कालिगा समुदाय के भविष्य के नेता के तौर पर भी देखा जाता रहा है। वह हासन के अरकालगुड के रहने वाले हैं। फिलहाल वह अरकालगुड से कांग्रेस के विधायक हैं।

लेकिन, पूर्व मुख्यमंत्री और जे.डी.(एस) नेता एच.डी. कुमारस्वामी कुछ और ही मानते हैं। उनकी मानें तो जे.डी. (एस) कम से कम आठ से दस सीटें जीतेगी और चुनावों में त्रिशंकु लोकसभा होगी, जहां सरकार के गठन में उनकी पार्टी की भूमिका अहम होगी। वह कहते हैं – ‘देश में कोई मोदी लहर नहीं है। यह सब मीडिया का बुना जाल है। सच्चाई तो कुछ और ही है। सभी अचंभित हो जाएंगे जब तीसरे मोर्चे के पास अवसर होगा कि कांग्रेस के साथ मिलकर देश में धर्मनिरपेक्ष सरकार का गठन कर सके। इस बार कांग्रेस सन् 1997 में की गई चूक (जब उन्होंने संयुक्त मोर्चे से अपना समर्थन केवल भाजपा के सरकार में आने के डर से वापस ले लिया था) को नहीं दोहराएगी।’ पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव दानिश अली का भी ऐसा ही मानना है। दानिश ने बंगलुरू में सिदलघट्टा जाने से पूर्व उदय इंडिया को अपनी राय जाहिर की। दानिश, पार्टी उम्मीदवार केशव (जो केंर्दीय मंत्री के.एच. मुनियप्पा के विरूद्ध कोलर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं) के प्रचार अभियान का हिस्सा बनने सिदलघट्टा जा रहे थे।

कुमारस्वामी की मानें तो आज भारत भ्रष्टाचार और शासन के पतन के साथ राजनैतिक दलों और चुनावों के व्यवसायीकरण व सांप्रदायिकता के दो बड़े खतरों से ग्रस्त है। कुमारस्वामी से जब पूछा गया कि जनता जे.डी.(एस) को वोट क्यों दे तो उन्होंने कहा – ‘जे.डी.(एस) अपने दम पर सरकार नहीं बना सकती। हम रूपरेखा के नजरिए से तो राष्ट्रीय पार्टी हैं, लेकिन विषय वस्तु के तौर पर हम एक क्षेत्रीय पार्टी हैं। लेकिन, लोगों को पता है कि कर्नाटक में जे.डी.(एस) ही एक मात्र ताकत है, जो भविष्य में कांग्रेस से लोहा ले सकती है। इसलिए लोग जे.डी.(एस) की मदद कर हमें एक ताकतवर गैर-कांग्रेसी व गैर-भाजपाई पार्टी बने रहने में सहयोग करेंगे।’ अविभाजित जनता दल का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन सन् 1996 में हुआ था, जब उसे मुख्यमंत्री देवगौड़ा के नेतृत्व में 16 सीटें हासिल हुईं थीं।

यहां देखने लायक स्थिति होनहार आम आदमी पार्टी (आप) की होगी। पार्टी ने 15 निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं। हालांकि, आप की हार तो निश्चित है, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि उन्हें कितने वोट मिलते हैं और यह किसके वोट पर ग्रहण लगाती है – भाजपा के या कांग्रेस के? शुरूआत में तो भाजपा शहरी क्षेत्रों में आप के प्रतिकूल प्रभाव से घबराई हुई थी, लेकिन, देश की राजधानी दिल्ली में ए.के.-49 के करतबों से भाजपा ने चैन की सांस ली है।

भाजपा महिला मोर्चा की राज्य महासचिव भारती मगडुम ने उदय इंडिया को बताया – ‘आप एक गुजरती घटना है, जो शुरू तो जोश-ओ-खरोश से हुई थी, लेकिन खत्म हुई किसी फुस्स बम की तरह। हम ‘आप’ से घबराए हुए नहीं हैं, हम केवल मतदान के पैटर्न पर नजर बनाए रखना चाहते हैं।’

तो क्या कर्नाटक में मतदान का झुकाव किसी एक पार्टी के पक्ष में होगा या भाजपा और कांग्रेस में सीटों का बंटवारा बराबरी का होगा, जहां कुछ सीटें जे.डी.(एस) को भी मिलेंगी। इस अबूझ पहेली का उत्तर तो समय के गर्भ में ही छुपा हुआ है।

बेंगलुरू से एस.ए. हेमंत कुमार

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