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भाजपा का घोषणा-पत्र शक्तिशाली देश बनाने का संकल्प

भाजपा ने आन्तरिक और बाह्य सुरक्षा पुख्ता करने की बात कहीं है। इन दोनों क्षेत्रों में कोई रियायत नहीं दी जाएगी। इन दोनों मोर्चों पर सोनिया गांधी जानबूझकर या अयोग्यता के कारण असफल रही हैं। देश के भीतर पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और चीन समर्थित माओवाद और सीमान्त पर चीनी एवं पाकिस्तानी सेना की निरन्तर घुसपैठ इसके प्रमाण हैं।

राम नवमी से एक दिन पहले सात अप्रैल को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपना चुनाव घोषणा-पत्र जारी कर दिया और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का अपना संकल्प दोहरा दिया। लेकिन भाजपा का कहना है कि वह संवैधानिक तरीके से मंदिर निर्माण के लिए प्रयास करेगी। ध्यान रहे पिछले कुछ अर्से से देश के विभिन्न वर्गों से मांग आ रही है कि राम मंदिर के निर्माण के लिए भी सभी को विश्वास में लेकर संसद उसी प्रकार पहल करे, जिस प्रकार सरदार पटेल के प्रयासों से संसद ने शताब्दियों पहले अफगानिस्तान के महमूद गजनवी द्वारा खंडहर में तब्दील किए सोमनाथ मंदिर के निर्माण के लिए पहल की थी। लेकिन सोनिया माईनो गांधी की पार्टी का कहना है कि भाजपा के इस घोषणा पत्र पर तुरन्त प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए, क्योंकि इसमें ‘राम’ और ‘मंदिर’ का जिक्रकिया गया है। सोनिया के इन लोगों के अनुसार ‘राम’ और ‘मंदिर’ की बात करना घोर साम्प्रदायिकता है। ध्यान रहे सोनिया गांधी की पार्टी की सरकार ने उच्चतम न्यायालय में बाकायदा हलफनामा दाखिल किया था कि ‘राम’ नाम का कोई व्यक्तिनहीं था। यह सब काल्पनिक गप्पें हैं। सोनिया गांधी ने एक बार फिर भारत में रामनवमी के दिन ही ‘राम’ और ‘उनके मंदिर’ पर आपत्ति दर्ज की है, इससे पार्टी की भारत को लेकर लम्बी सांस्कृतिक नीति के संकेत मिलते हैं। शायद भाजपा को सोनिया गांधी और उनकी पार्टी के इस छिपे एजेंडा का पूर्वाभास था ही, इसलिए उसने अपने चुनाव घोषणा-पत्र के प्रारम्भ में ही भारत की सांस्कृतिक पहचान को लेकर एक लम्बा वक्तव्य दिया है।

इसके अनुसार – ‘भाजपा मानती है कि कोई भी राष्ट्र अपने आपको, अपने इतिहास को, अपनी जड़ों को और अपनी सफलताओं को जाने बिना अपनी घरेलू या विदेश नीतियों का निर्माण नहीं कर सकता। बेहद गतिशील और वैश्वीकृत जगत में किसी भी राष्ट्र के लिए अपनी उन जड़ों को जानना जरूरी है, जो उसके लोगों को सहारा देती हैं।’ नए भारत के निर्माण के लिए और युगानुकूल परिस्थितियों के अनुसार देश को विश्व राजनीति में प्रासंगिक बनाने के लिए कार्य करते समय भाजपा का यह सूत्र मंत्र है, जिसे घोषणा-पत्र के शुरू में ही स्पष्ट कर दिया गया है। भाजपा जड़ता की पक्षधर नहीं है और न ही केवल भूतकाल को लादे प्रतिगामी राहों की ओर लालसा भरी नजरों से देखने तक में ही सिमटी हुई है। यह प्रस्तावना स्पष्ट करती है कि भविष्य की योजना बनाते समय भी वह अपने देश की मूल पहचान को समाप्त करने की विरोधी है। दरअसल सोनिया गांधी के लोगों और साम्यवादी टोलों के साथ भाजपा का यही विरोध है।

दरअसल इस दस्तावेज को चुनाव घोषणा-पत्र न कह कर इसे इक्कीसवीं शताब्दी के लिए भाजपा का संकल्प पत्र कहना ज्यादा सही होगा। इसमें नए भारत के निर्माण के लिए भाजपा ने अपनी कार्य-योजना को तो स्पष्ट किया ही है, साथ ही अपने मूलाधार के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को भी दोहराया है। भाजपा का यह घोषणा-पत्र मोटे तौर पर विकास को समर्पित ऐसे ताकतवर भारत की कल्पना करता है, जिसे कोई देश न तो धमका सके और न कोई बाध्य कर सके। ऐसा भारत जो दूसरे देशों से आंख से आंख मिला कर बात कर सके। लेकिन इसका अर्थ अमेरिका की तरह दादागिरी नहीं है। घोषणा-पत्र में स्पष्ट किया गया है कि भारत पड़ोसियों समेत सभी देशों के साथ शान्ति से रहना चाहता है।

घोषणा पत्र में मुद्रास्फीति को रोकने, मंहगाई कम करने, भ्रष्टाचार रोकने, काले धन के प्रसार को समाप्त करने, नगरों का वैज्ञानिक तरीके से विकास करने, रेल नेटवर्क में तेज गति से चलने वाली गाडिय़ां चलाने, प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त बनाने और उसमें पारदर्शिता लाने, शहरों में भी गरीब तबके के लोगों के कल्याण के हित की योजनाएं बनाने, कराधान में सुधार करने, मेडिकल सुविधाएं बढ़ाने, हर राज्य में बढिय़ा स्तर के मेडिकल संस्थान स्थापित करने की बात कही गई है। सोनिया गांधी के लोग घोषणा-पत्र के इन्हीं अंशों को लेकर सबसे ज्यादा छटपटा रहे हैं और बच्चों की तरह कूद-कूद कर बता रहे हैं कि उन्होंने अपने चुनाव घोषणा-पत्र में यह सब बातें पहले ही लिख दीं हैं। उनका कहना है कि भाजपा ने उनके घोषणा-पत्र की नकल की है। अपने घोषणा पत्र को लेकर वे उसके पन्ने तक दिखा रहे हैं। लेकिन सोनिया गांधी और उनके लोगों का सबसे बड़ा संकट उनकी प्रतिबद्धता और विश्वसनीयता का है। ऐसी बातें यदि सोनिया गांधी के लोग दिखा रहे हैं, तो यह नया नहीं है। पिछले दस सालों से वे भारत की सत्ता पर कब्जा किए बैठे हैं। लेकिन उन्होंने किया कुछ नहीं। वे केवल शब्दजाल ही बुनते रहे। पिछले दस साल का शासन इसका प्रमाण है। यही कारण है कि सोनिया गांधी की पार्टी और उनके चुनाव घोषणा-पत्र की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिह्न लग गया है। प्रश्न उनकी नीयत का है। सोनिया गांधी की पार्टी यदि भ्रष्टाचार को समाप्त करने और प्रशासन में पारदर्शिता लाने की बातें अपने चुनाव घोषणा-पत्र में करेगी और व्यवहार में उनकी सरकार क्वात्रोची को बचाने के लिए पूरा जोर लगा देगी तो उन पर कौन विश्वास करेगा? भाजपा का घोषणा-पत्र पिछली सरकारों से निराश हो चुके लोगों में नया विश्वास ही नहीं जगाता, बल्कि भविष्य के प्रति आशा भी जगाता है। इस विश्वास के पीछे नरेन्द्र मोदी द्वारा पिछले दस साल में गुजरात में किया गया विकास है, उनकी तप और साधना है। मोदी ने इस घोषणा-पत्र में देशवासियों से प्रतिज्ञा की है – ‘मैं सर्वाधिक परिश्रम करूंगा। मैं बदनीयत से कोई काम नहीं करूंगा और मैं अपने व्यक्तिगत हितों और स्वार्थ को ध्यान में रख कर कोई काम नहीं करूंगा। शायद देश के इतिहास में 1947 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि अमीर गरीब के बीच की खाई जिस तेजी से बढ़ रही है, उससे दौड़ में पिछड़ रहे लोगों में निराशा आना स्वाभाविक ही है। नरेन्द्र मोदी के कृतित्व ने देश के लोगों को नई आशा ही नहीं बंधाई, बल्कि यह विश्वास भी दिलाया है कि इस दौड़ में वे उस आम आदमी के साथ खड़े हैं, जो वंचितों की श्रेणी में आता जा रहा है। देश का विकास हो, लेकिन उसका फल कुछ घरानों में न सिमट कर, आम आदमी तक पहुंचे, भाजपा का घोषणा-पत्र इसी ओर इंगित करता है।

जम्मू-कश्मीर के बारे में भाजपा ने यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया है। नरेन्द्र मोदी की सरकार आने पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख – तीनों क्षेत्रों का समान विकास हो, इसकी व्यवस्था की जाएगी। इस प्रदेश में आम लोगों का यही आरोप है कि सरकारें जम्मू व लद्दाख के साथ विकास के मामले में सौतेला रवैया अख्तियार करती हैं। राज्य के कुछ हिस्सों से, जो अब तक भी पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है, विस्थापित लोगों की समस्याओं का निराकरण किया जाएगा। कश्मीर घाटी से निकाल दिए गए हिन्दुओं को पुन: बसाने की व्यवस्था की जाएगी। प्रदेश में आम आदमी मानता है कि अनुच्छेद 370 के कारण, राज्य के अल्पसंख्यकों, पहाडिय़ों, गूर्जरों, बक्करवालों, लद्दाखियों, बल्तियों, शियाओं, अहमदियों, जनजातियों, महिलाओं, अनुसूचित जातियों से बहुत अधिक भेदभाव हो रहा है और इस अनुच्छेद की आड़ में इनको मानवीय अधिकारों से भी महरुम रखा जा रहा है। भाजपा ने इस अनुच्छेद को समाप्त करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। सोनिया गांधी के लोग और उनकी सहयोगी मरहूम शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की पारिवारिक पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस की नजर में जम्मू-कश्मीर के आम आदमी के कल्याण की बात करना ही घोर साम्प्रदायिकता है।

भाजपा ने आन्तरिक और बाह्य सुरक्षा पुख्ता करने की बात कहीं है। इन दोनों क्षेत्रों में कोई रियायत नहीं दी जाएगी। इन दोनों मोर्चों पर सोनिया गांधी जानबूझकर या अयोग्यता के कारण असफल रही हैं। देश के भीतर पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और चीन समर्थित माओवाद और सीमान्त पर चीनी एवं पाकिस्तानी सेना की निरन्तर घुसपैठ इसके प्रमाण हैं। चीन के खतरे को देखते हुए पूर्वोत्तर भारत में आधारभूत संरचना को मजबूत किया जाना चाहिए था, लेकिन सरकार ने उसके पिछड़ेपन को तो छुआ नहीं, अलबत्ता अलगाववादियों को खुलकर खेलने का मौका अवश्य दे दिया। इसी को देखते हुए भाजपा ने कहा है कि सत्ता में आने पर वह सिक्किम और अरूणाचल प्रदेश में आधारभूत संरचना को मजबूत करेगी। हिमालयी क्षेत्रों के विकास के लिए अलग से नीति बनाई जाएगी। हिमालयी क्षेत्रों और सीमान्त प्रान्तों के लिए भाजपा की इस नीति के कारण सोनिया के आदमी तो तिलमिला ही रहे हैं, चीन भी बौखला गया लगता है। घोषणा-पत्र जारी होने के तुरन्त बाद चीन ने अरूणाचल पर अपना दावा जताया। लेकिन समाचार आ रहे हैं कि इसी मुद्दे के कारण अरूणाचल में जगह-जगह भाजपा के घोषणा-पत्र का स्वागत किया गया है।

जब से सोनिया गांधी की पार्टी ने भारत की सत्ता संभाली है, तब से उसके तानाशाही रवैयेके कारण केन्द्र और राज्यों में तनाव बढ़ता जा रहा है। कई मामलों में तो यह चरम सीमा तक भी पहुंच जाता है। यह केवल व्यवहार के कारण है या फिर पार्टी की लम्बी दूरगामी नीति का हिस्सा है, इस पर तो फिलहाल कुछ भी कहना संभव नहीं है। लेकिन भाजपा ने इस तनाव को कम करने के लिए कहा है कि वह सरकार बनाने पर राज्यों के सहयोग से चलेगी। केन्द्र और राज्य, परस्पर पूरक होंगे, न कि प्रतिद्वंद्वी। भाजपा ने इसे एक भारत-श्रेष्ठ भारत कहा है।

भाजपा ने देश की परमाणु-नीति पर पुनर्विचार करने की बात भी कहीं है। ध्यान रहे, आज से सोलह साल पहले भी भाजपा सरकार ने ही परमाणु बम का निर्माण कर देश को परमाणु क्लब में शामिल करवाया था। सोलह साल बाद भाजपा फिर इसे देशहित में बदलना चाहती है, ताकि इन क्षेत्रों में कुछ गिने-चुने देशों की दादागिरी समाप्त हो। भारत की परमाणु-नीति भारत के हितों को देखते हुए तय होनी चाहिए, न कि अमेरिका के रुख के अनुसार भारत अपनी नीति तय करे। ‘भारत पहले परमाणु शस्त्र का प्रयोग नहीं करेगा’ – इस नीति पर पुनर्विचार होगा।

शिक्षा के क्षेत्र में मदरसों की ओर भी भाजपा के घोषणा-पत्र में विशेष ध्यान दिया गया है। मदरसों का आधुनिकीकरण किया जाएगा। उनमें युगानुकूल विषयों की पढ़ाई भी होगी। पिछले कुछ अरसे से सोनिया गांधी की सरकार का प्रयत्न रहा है कि मदरसों को शेष समाज से अलग-थलग रखा जाए। ताज्जुब तो यह कि यह मुसलमानों की सुरक्षा और सहायता के नाम पर किया जा रहा था। भाजपा का मानना है कि इस प्रकार की संकुचित मनोवृत्ति से डरी हुई फसल तैयार होती है। मदरसों के आधुनिकीकरण से सरकार द्वारा प्रयत्नपूर्वक दड़बों में बंद करके रखे गए समाज को प्रगति के समान अवसर उपलब्ध होंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने समान सिविल कोड की बात कही है। उच्चतम न्यायालय ने भी अपनी एक टिप्पणी में समान नागरिक संहिता अपनाने की बात कही है। लेकिन दुर्भाग्य से कांग्रेस इसे वोट बैंक से जोड़ती है और इसका साम्प्रदायिक आधार पर विरोध करती रही है। उसकी इस साम्प्रदायिक सोच से मुल्ला-मौलवी तो ख़ुश होतें हैं, लेकिन आम मुसलमान मध्यकालीन अरबी दासता में पिसता है। इसे दूर करने के लिए भाजपा ने समान सिविल कोड को अपने घोषणा-पत्र का हिस्सा बनाया है। गौ-संरक्षण का विशेष तौर पर उल्लेख किया गया है। उनकी हत्या रोकी जाएगी। कहने की जरूरत नहीं कि सोनिया गांधी की पार्टी इसे भी घोर साम्प्रदायिक मानती है।

भाजपा के इस घोषणा-पत्र को कुछ मीडियाकर्मियों ने मोदी का संकल्प भी कहा है। इस घोषणा-पत्र का मुख्य स्वर है कि भविष्य में भारत को एजेंडा निर्धारित करने वाला देश बनना है, न कि पिछलग्गू देश। फिर चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो, सांस्कृतिक क्षेत्र हो या फिर हथियारों के उत्पादन का क्षेत्र हो। सबसे बड़ी बात यह है कि देश के आम लोगों को यह विश्वास है कि यह काम केवल नरेन्द्र मोदी ही कर सकते हैं।

 डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

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