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मोदी लहर पर सवार है भाजपा

अन्य राज्यों की तरह मध्य प्रदेश में भी चुनावी सरगर्मी इस वक्त चरम पर हैं। पहले चरण का प्रचार पूरा होते-होते साफ हो गया है कि नरेन्द्र मोदी पूरे देश की तरह मध्यप्रदेश में भी एक मुद्दा है। हालांकि नरेन्द्र मोदी ने जो अभियान अकेले शुरू किया था, उसमें पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और बाद में भाजपा के पितृपुरूष पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी शामिल कर लिया गया है।

अब तक के हालात से पूरी तरह साफ है कि कांग्रेस अब तक अपना घर ठीक नहीं कर पाई है। भिंड से लोकसभा प्रत्याशी घोषित किए गए भगीरथ प्रसाद के पार्टी छोडऩे की जो शुरूआत हुई थी वह अब भी लगातार जारी है। अब तक कांग्रेस के तीन विधायक और दो पूर्व मंत्री भाजपा में शामिल हो चुके हैं। सतना की मैहयर विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते नारायण त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता ली। सतना जिले में ब्राह्मणों के नेता माने-जाने वाले नारायण त्रिपाठी 2003 के विधानसभा चुनाव मे समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुने गए थे। 2008 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

त्रिपाठी के भाजपा में शामिल होने का सीधा असर सतना से कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहे पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह पर पड़ेगा। ब्राह्मण ठाकुर राजनीति का बड़ा अड्डा माने-जाने वाले सतना लोकसभा क्षेत्र में त्रिपाठी भाजपा के लिए ‘शुभ’ साबित हो सकते हैं। भाजपा नेताओं की मानें तो कम से कम पांच बड़े कांग्रेसी नेता भाजपा में आने को तैयार बैठे हैं। यह अलग बात है कि कांग्रेसी नेता इन दावों को महज एक गप्प मान रहे हैं। इतना साफ है कि नेताओं द्वारा पार्टी छोडऩे की घटनाओं ने कांग्रेस केकार्यकर्ताओं का मनोबल गिराया है।

पिछले दिनों दिल्ली में हुए दो घटनाक्रमों ने भी मध्यप्रदेश के जनमानस पर असर डाला है। बाबरी मसजिद को लेकर दिखाए गए एक स्टिंग ऑपरेशन और दिल्ली के शाही इमाम द्वारा कांग्रेस के पक्ष में मतदान की अपील ने यहां उल्टा असर डाला है। इनका लाभ कांग्रेस को मिलेगा, यह कह पाना तो मुश्किल है। लेकिन इनका विपरीत असर साफ दिख रहा है। अल्पसंख्यक मतदाताओं के बारे में भले ही यह राय हो कि वह अपने धर्मगुरूओं के निर्देशों का पालन करते हुए मतदान करते हैं। लेकिन पहली बार बहुसंख्यक मतदाता एक सोच पर केन्द्रित होता दिख रहा है। यह आम राय बन रही है कि अल्पसंख्यकों का चुनाव के समय इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता दिख रहा है।

पिछले दिनों हुईं नरेन्द्र मोदी की चुनावी सभाओं ने माहौल काफी बदल डाला है। हालांकि राहुल गांधी और सोनिया गांधी दोनों ही पहले दौर के लिए चुनाव प्रचार कर गए हैं। लेकिन यह प्रभावी होता नहीं दिख रहा है। अब स्थिति यह है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के नेता बिखरे हुए हैं या यूं कहें कि अपने-अपने इलाकों तक सीमित होकर रह गए हैं। वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री अपने चुनाव क्षेत्र छिंदवाड़ा तक ही सीमित होकर रह गए हैं। हालांकि उनका नाम पार्टी के स्टार प्रचारकों में शामिल है। लेकिन वे 10 अपै्रल को अपने क्षेत्र में मतदान के बाद ही दूसरे क्षेत्रों में प्रचार के लिए जा पाएंगे।

दूसरे केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने क्षेत्र गुना शिवपुरी में फंसे हुए हैं। हालांकि बीच-बीच में वह अपने समर्थकों और प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी जा रहे हैं। लेकिन उनका ज्यादा समय गुना शिवपुरी में ही बीत रहा है। दिग्विजय सिंह, सुरेश पचौरी और सत्यव्रत चतुर्वेदी भी अब तक पूरी तरह सक्रिय नहीं हैं।

उधर भाजपा नेता पूरी ताकत से मैदान में हैं। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह एक दिन में 6-6 सभाएं कर रहे हंै। वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज और राजनाथ सिंह भी चुनावी सभाएं कर गए हैं। पहले ऐसा लग रहा था कि 2009 के लोकसभा चुनाव में 12 लोकसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस अपना पुराना रिकॉर्ड बनाए रखने में कामयाब हो जाएगी। दरअसल भाजपा ने जिस तरह से टिकट बांटे, उससे आंतरिक असंतोष पनपा था। लेकिन कांग्रेस की हालत और भी बुरी हो गई है। प्रदेश में कोई एक ऐसा नेता नहीं है, जिसकी छवि सर्वमान्य नेता की हो और वह सबको साथ लेकर चल सके।

पहले जहां यह लग रहा था कि कांग्रेस दो अंकों का अपना 2009 का आंकड़ा बरकरार रखेगी, लेकिन अब ऐसा लग नहीं रहा है। सिर्फ दो– छिंदवाड़ा और गुना-शिवपुरी ऐसी सीटें हैं, जहां कांग्रेस की जीत पर शंका नहीं है। अन्य सभी इलाकों में कांग्रेस प्रत्याशी अपने ही मकड़ जाल में उलझे हुए हैं। पहले चरण के नौ लोकसभा क्षेत्रों में सिर्फ 3 में कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों में कड़ी टक्कर हो रही है। अन्य इलाकों में मुकाबला तो भाजपा और कांग्रेस में ही है, लेकिन दोनों के बीच अन्तर बहुत ज्यादा है। हालांकि उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे हुए इलाकों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी पूरी ताकत लगा रही है। रीवा और मुरैना में भाजपा को बसपा से कड़ी टक्कर मिल रही है। लेकिन फिर भी ये दोनों दल मध्य प्रदेश में उत्तर प्रदेश जैसी स्थिति बनाने में सफल होते नहीं दिख रहे हैं। मायावती और मुलायम सिंह– दोनों ही मध्यप्रदेश में प्रचार कर गए हैं। पर उनका प्रचार सार्थक होगा, इसमें संदेह बरकरार है। तुलनात्मक रूप से देखें तो बसपा का पलड़ा सपा से भारी है।

1991 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने लोकसभा में अपना खाता मध्यप्रदेश के रीवा लोकसभा क्षेत्र से ही खोला था। तब भीमसिंह पटेल बसपा के पहले सांसद बने थे। 1998 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने अपना शानदार प्रदर्शन किया था। तब उसने सतना और रीवा– दोनों लोकसभा सीटें जीती थीं। सबसे अहम बात तो यह थी कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को बसपा प्रत्याशी सुखलाल कुशवाह ने मात दी थी। उस हार के बाद अर्जुन सिंह फिर लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाए थे। लेकिन अभी बसपा के पक्ष में उस तरह का माहौल नहीं है। यह जरूर लग रहा है कि बसपा सतना से कांग्रेस प्रत्याशी अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह पर भारी पड़ सकती है।

फिलहाल जो हालात हैं, उससे इतना साफ है कि नवम्बर 2013 में विधानसभा की 230 सीटों में से 165 सीटें जीतने वाली भाजपा लोकसभा में भी अपनी बढ़त बरकरार रखेगी। आंकड़ों के हिसाब से विधानसभा चुनावों में 23 लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा को बढ़त मिली थी। लेकिन कांग्रेस विधायकों के भाजपा में शामिल होने और कांग्रेसी नेताओं के मतभेद लगातार बढ़ते जाने से ऐसा लग रहा है कि भाजपा 2004 का 25 का अपना आंकड़ा आसानी से हासिल कर लेगी।

                अरूण रघुनाथ

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