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भारी उथल-पुथल ले डूबेगी कांग्रेस को

साढ़े तेरह साल का किशोर राज्य छत्तीसगढ़ अपना तीसरा लोकसभा चुनाव देख रहा है। इन चुनावों में इस नक्सल प्रभावित राज्य में कुछ ज्यादा ही उथल-पुथल हो रही है। भाजपा से कांग्रेस और कांग्रेस से भाजपा में नेताओं के आवागमन ने उनकी असलियत जनता के सामने ला दी है। पूर्व मुख्य मंत्री अजीत जोगी को कांग्रेस ने महासमुन्द लोकसभा क्षेत्र से प्रत्याशी बनाया है। जोगी के मैदान में उतरते ही कांग्रेस की अंतर्कलह सामने आ गई है। कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है। वे भाजपा के पाले में जा खड़े हुए हैं। इस वजह से भाजपा का मनोबल बढ़ गया है। अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करूणा शुक्ला के कांग्रेस में शामिल होने के बाद उसे जो झटका लगा था, जोगी विरोधी कांग्रेसियों ने उससे उबार दिया है। छत्तीसगढ़ में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में ही है। सभी 11 लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा और कांग्रेस में सीधी टक्कर है। हालांकि स्थानीय दल – सतनाम सेना और गोंडवांना गणतंत्र पार्टी के अलावा बसपा के प्रत्याशी भी मैदान में हैं। लेकिन ये सभी खुद जीत के लिए नहीं, बल्कि कहीं किसी को हरवाने, तो कहीं किसी को जितवाने के लिए मैदान में उतरे हैं।

छत्तीसगढ़ में सन् 2000 में पहली सरकार कांग्रेस की बनी थी। अजीत जोगी इस राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे। जितने विवाद उनके साथ जुड़े, शायद ही किसी राजनेेता के साथ जुड़े हों। 2003 के विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद कांग्रेस इस राज्य में जीत को तरस गई है। चार महीने पहले हुए विधानसभा चुनावों में उसकी लगातार तीसरी बार हार हुई है। लोकसभा में तो उसकी हालत और भी ज्यादा खराब रही है। 2009 के चुनाव में सिर्फ कोरबा सीट पर कांग्रेस के डॉ. चरण दास महन्त ने जीत हासिल की थी। उन्होंने तब भाजपा के टिकट पर लड़ी करूणा शुक्ला को हराया था।

अगर विधानसभा चुनावों के परिणाम देखें तो कांग्रेस पांच लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा से आगे रही है। लेकिन लोकसभा में यह अंतर कायम रहेगा, इसमें सन्देह है। दरअसल नेतृत्व के असमंजस के कारण कांग्रेस की हालत काफी पतली है। कांग्रेसी नेताओं द्वारा अपनी ही पार्टी के नेताओं को हराने की साजिश ने कोढ़ में खाज का काम किया है। रायपुर लोकसभा क्षेत्र के लिए कांग्रेस प्रत्याशी चुनने में जो नाटक हुआ, उससे पार्टी की काफी फजीहत हुई है। पहले छाया वर्मा और फिर सत्यनारायण शर्मा को प्रत्याशी बनाया गया। लेकिन फिर ‘शर्मा’ की जगह ‘वर्मा’ को प्रत्याशी बना दिया गया। अंतिम क्षणों में फिर सत्यनारायण शर्मा को ही प्रत्याशी बनाया गया। पुराने कांग्रेसी नेता सत्यनारायण शर्मा भाजपा के 8 बार के सांसद रमेश बैस को चुनौती दे रहे हैं। लगातार खींचतान और असमंजस के चलते कांग्रेसी बहुत ही हतोत्साहित हैं। इसका असर साफ दिख रहा है। कई प्रमुख नेता भाजपा में शामिल भी हुए हैं।

उधर केन्द्रीय राज्य मंत्री डाक्टर चरणदास महंत को कोरबा में अजीत जोगी खेमे की खुली बगावत का सामना करना पड़ रहा है। अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी कोरबा लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीट मरवाही से विधायक हैं। महंत का विरोध कर रहे अमित जोगी और उन्हीं के खेमे के विधायक रामदयाल उइके महंत के नामांकन के मौके पर भी मौजूद नहीं थे। कहा यह भी जा रहा है कि कोरबा से कम से कम तीन लोकसभा प्रत्याशी ऐसे हैं, जिन्हें जोगी परिवार का संरक्षण है। वे चरण दास महंत को हराने के लिए ही मैदान में उतारे गए हैं। चरण दास महंत हालात से पूरी तरह परिचित हैं। कांग्रेस संगठन की ओर से पूरी रिपोर्ट कांग्रेस हाईकमान को भेज दी गई है। लेकिन जोगी खेमे पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। महंत को घेरने के लिए जोगी समर्थकों ने पूरी ताकत लगाई हुई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल ने कांग्रेस के तीन प्रत्याशियों अजीत जोगी, सत्यनारायण शर्मा और करूणा शुक्ला को हराने का ऐलान किया है। नंदकुमार पटेल ने प्रेस कांफ्रेंस कर के इनको हराने की अपील अपने समाज से की है। छत्तीसगढ़ के दो अन्य लोकसभा क्षेत्रों में भी कांग्रेस को भितरघात का सामना करना पड़ रहा है।

दूसरी तरफ भाजपा परेशानी में तो है, लेकिन उसकी हालत इतनी खराब नहीं है। दुर्ग से वर्तमान संसद सरोज पांडेय को हराने की कोशिश कुछ भाजपाई कर रहे हैं। प्रदेश के एक बड़े नेता उन्हें संरक्षण दे रहे हैं। हालांकि सरोज का अच्छा-खासा प्रभाव है। लेकिन देखना यह होगा कि वह अपनी पार्टी के इन जयचंदों से कैसे निपटती हैं।

जहां तक मुद्दों का सवाल है – भाजपा स्थानीय विकास और मोदी लहर पर सवार है। मुख्यमंत्री रमण सिंह के विकास के दावों पर पूरा चुनाव अभियान चल रहा है। खुद नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी यहां वोट मांग गए हैं। नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों की दहशत कायम है। इसी वजह से अकेली बस्तर लोकसभा सीट पर पहले चरण में चुनाव कराया जा रहा है। हालांकि चुनाव आयोग निष्पक्ष और बिना भय के मतदान कराने की पूरी कोशिश कर रहा है। लेकिन नक्सल प्रभावित इलाकों में रह रहे आदिवासी किस रास्ते पर जाएंगे, यह सरलता से समझा जा सकता है। गैर आदिवासी लोकसभा क्षेत्रों में स्थानीय दल भाजपा और कांग्रेस – दोनों का समीकरण बिगाडऩे की कोशिश कर रहे हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और सतनाम सेना इन इलाकों में पूरी ताकत से वोट काटू भूमिका निभा रही है। राजनीतिक समीकरण देख कर ही इन दलों के प्रत्याशी उतारे गए हैं। इनसे ज्यादा नुक्सान कांग्रेस को ही होगा। बस्तर लोकसभा क्षेत्र से आम आदमी पार्टी प्रत्याशी सोनी सोरी ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया है। नक्सली होने के आरोप में जेल जा चुकी सोनी सोरी के समर्थन में स्वामी अग्निवेश जैसे लोग पहुंचे हैं। मजे की बात यह है कि जिन नक्सलियों की मदद के आरोप में सोनी दो साल जेल में रही हैं, वे ही अब उनका विरोध कर रहे हैं। सोनी की वजह से बस्तर पर सभी की निगाहें लगी हुई हैं।

फिलहाल छत्तीसगढ़ में जो चुनावी हालात हैं, उन्हें देखते हुए इतना कहा जा सकता है कि अगर डॉ. चरण दास महंत ‘जोगी दांव’ से बचने में कामयाब हुए, तो इस आदिवासी राज्य में कांग्रेस पिछले चुनावों की तुलना में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। वैसे खुद अजीत जोगी कम परेशानी में नहीं हैं। एक तो महासमुन्द का साहु समाज खुल कर उनके खिलाफ खड़ा हो गया है। दूसरी ओर जीरम घाटी में नक्सली हमले में मारे गए वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल की पुत्री को प्रत्याशी न बनाए जाने से भी एक वर्ग नाराज है। अब सारा दारोमदार कांग्रेसी नेताओं की आपसी लड़ाई पर हैं। अगर लड़ाई थम गई, तो कांग्रेस फायदे में होगी। यदि यह लड़ाई जारी रही, तो भाजपा का 11 सीटें जीतने का सपना पूरा हो सकता है।

भोपाल से अरूण रघुनाथ दीक्षित

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