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दिल्ली ने तोड़ा रिकॉर्ड

शाबाश दिल्ली! कर दिया कमाल! 16वीं लोकसभा के तीसरे चरण में दिल्ली ने अन्य 10 राज्यों और तीन केन्द्र शासित राज्यों के साथ 10 अप्रैल को ऐसा मतदान किया कि पिछले लोकसभा चुनावों में हुए मतदान की तुलना में 12 प्रतिशत अधिक रहा। वह दीगर बात है कि केवल चार महीने पहले दिसम्बर 2013 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों के मतदान का रिकॉर्ड देश की राजधानी के मतदाता इस बार नहीं तोड़ सके। दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटों पर कुल 64.77 प्रतिशत वोट पड़े। जबकि पिछली बार 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में 51.81 प्रतिशत वोट पड़े थे। एनसीआर में हालांकि गुडग़ांव ने 70 प्रतिशत वोटिंग कर दिल्ली को पीछे छोड़ दिया, लेकिन दिल्ली के साथ हुई वोटिंग में गौत्तमबुद्ध नगर (62.36 प्रतिशत) और गाजियाबाद (60 प्रतिशत) पीछे ही रहे। लोकसभा चुनावों में दिल्ली में वोटिंग का औसत प्रतिशत 50 फीसदी के आसपास रहता है।

उत्तर प्रदेश के दंगाग्रस्त इलाकों-मुजफ्फरनगर (67.78 प्रतिशत) और शामली (70.85 प्रतिशत) के मतदाताओं ने जम कर मतदान के अपने अधिकार का प्रयोग किया। छत्तीसगढ़ के नक्सलवादग्रस्त इलाके बस्तर में वोटिंग का आंकड़ा इस बार सबसे कम (51.4 प्रतिशत) रहा, लेकिन फिर भी यह पिछले चुनावों के मुकाबले (47.33 प्रतिशत) अधिक था। हरियाणा में पिछले लोकसभा चुनावों में 68 प्रतिशत और उससे पूर्व 2004 में 65.72 प्रतिशत था, लेकिन इस बार हरियाणावासियों का उत्साह ऐसा था कि मतदाताओं ने वोटिंग के उत्तोरत्तर बढ़ते इस क्रम को जारी रखते हुए 73 प्रतिशत के रिकॉर्ड पर पहुंचा दिया।

दिल्ली सहित 11 राज्यों और तीन केन्द्र शासित राज्यों की 91 सीटों पर मतदाताओं का उत्साह दो बातें स्पष्ट करता है। पहली बात देश के मतदाता में लगातार जागरूकता आती जा रही है और वह वोटिंग के अपने इस अधिकार को गंभीरता से लेने लगा है। मतदाता का जो मूड पहले हुआ करता था – ‘मेरे एक वोट से क्या होगा?’ अब बदल कर ‘मेरे ही वोट से बनेगी, बिगड़ेगी सरकार!’ वाला हो गया है। वोटर के इसी मूड ने मतदान के दिन को लोकतंत्र के महापर्व में बदल डाला है। वोटर अब छुट्टी के मूड में अपने घर के ड्राईंगरूम में बैठ कर राजनीतिक सिस्टम या सरकार को कोसने की बजाय मतदान केन्द्र तक पहुंच कर वोटिंग मशीन पर बटन दबाने में गर्व महसूस करने लगा है। दूसरी ओर अधिक वोटिंग का अर्थ वर्तमान सरकार के लिए खतरे की घंटी बताया जा रहा है। इसी से कांग्रेस में बेचैनी बढ़ती जा रही है।

बेटे के भविष्य के लिए राजनीति में जबरन हाशिए से बाहर खड़ी कर दी गई गांधी परिवार की होनहार सदस्य प्रियंका गांधी ने नई दिल्ली में वोट डालने के बाद पूछे जाने पर बेशक मीडिया को इस बात से इंकार कर दिया हो कि चुनावों में मोदी की कोई लहर नहीं है, लेकिन उत्साहित वोटर के अधिक संख्या में मतदान केन्द्र तक पहुंचने ने वर्तमान सरकार के लिए खतरे की घंटी तो बजा ही रखी है। खतरे की उसी घंटी की टन-टनाटन-टन की आवाज से ही कांग्रेस में बेचैनी बढ़ती जा रही है। कांग्रेस के न चाहते हुए भी मोदी केन्द्रित बने इन चुनावों में ‘नमो मंत्र’ ने ही पूरा एजेंडा सेट किया है। ऐसे में कैसे हो सकता है कि मोदी को कोई नजरअंदाज कर डाले। तीसरे चरण में पड़े वोटों का प्रतिशत इसका गवाह है।

राजनीतिक पंडितों का अब तक का विश्लेषण बताता है कि 10 अप्रैल को हुए मतदान में केरल को यदि अपवाद माना जाए तो ‘मोदी चुंबक’ ने वोटर को आकर्षित किया है। देश का मूड भांपने के लिए यदि देश की राजधानी दिल्ली पर नजर डालें तो दिसंबर 2013 में राजधानी की सरकार बदलने के लिए दिल्लीवासियों में जो बेचैनी और बेकरारी के साथ जो नाराजगी थी दिखी, वह 10 अप्रैल को भी बरकरार दिखाई दी। अब तक दिल्ली में आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनावों में सर्वाधिक 71.31 प्रतिशत वोट पड़े थे और कांग्रेस दिल्ली की सातों सीटों पर हार गई थी।

चुनावी माहौल मोदी के पक्ष में दिखाई दे रहा है। चुनाव परिणाम तो 16 मई को आएंगे, लेकिन दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. हर्ष वर्धन और पार्टी के अन्य आला नेता मतदान के बाद से ही मोदी की जीत को लेकर पूर्णत: आश्वस्त दिख रहे हैं। विधानसभा चुनावों के मतदान की तुलना लोकसभा चुनावों से करने के लिए सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि विधानसभा चुनावों में केजरीवाल फैक्टर के कारण कुछ अधिक वोटिंग हुई, लेकिन अधिक वोटिंग का अर्थ मतदाता का कांग्रेस सरकार के खिलाफ गुस्सा और उसे नेस्तनाबूद करने की बेकरारी थी। इस बार भी पिछले लोकसभा चुनावों से अधिक वोटिंग हुई है और वोटर इस भ्रष्ट और कुशासन थोपने वाली यूपीए सरकार को सत्ता से बाहर करना चाहता है। दिसम्बर 2013 में अधिक वोटिंग हुई, शीला दीक्षित सरकार बाहर हो गई। पिछले लोकसभा चुनावों में कम वोटिंग (51.83 प्रतिशत) हुई, यूपीए सरकार को दूसरा कार्यकाल मिला। दिल्ली में 64-65 प्रतिशत वोटिंग का अर्थ मौजूदा सरकार के खिलाफ दिल्ली के मतदाताओं का गुस्सा होता है। इसका एक और उदाहरण 1980 में हुए लोकसभा चुनाव थे जिसमें जनता पार्टी को सत्ता से बाहर करने के लिए दिल्ली ने भारी मतदान किया था। इस बार पिछले मतदान से अधिक वोटिंग होने का अर्थ कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के खिलाफ गुस्सा है।

दिल्ली में कुल 56 लाख 57 हजार 648 महिला वोटरों सहित कुल 1 करोड़ 27 लाख 6 हजार 372 मतदाताओं को वोट डालने का अधिकार था। उनके लिए 11,763 मतदान केन्द्र बनाए गए थे, जिनमें से 90 पोलिंग बूथों को अतिसंवेदनशील आंका गया था। कुल 3 लाख 37 हजार 282 वोटरों को पहली बार वोट डालने का मौका मिला था। राजधानी की कुल सात सीटों पर 150 उम्मीदवार खड़े हैं, जिनमें से 13 महिला प्रत्याशी हैं। सबसे अधिक 29 उम्मीदवार नई दिल्ली सीट पर और 25 उम्मीदवार चांदनी चौक सीट पर खड़े हैं। सबसे कम 14 उम्मीदवार उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में हैं। राजधानी की पॉश कॉलोनी के मतदाता ने बड़ी संख्या में वोट डाले, उसका अर्थ ‘मोदी लहर’ के साथ जोड़ा जा रहा है, जबकि दिसम्बर में पॉश कॉलोनी के मतदाताओं का रूख केजरीवाल की ओर था। इस बार झुग्गी बस्तियों और पुनर्वास कॉलोनियों से केजरीवाल की पार्टी को वोट मिला लगता है। जामा मस्जिद के शाही इमाम की कांग्रेस के पक्ष में वोट डालने की मुसलमान मतदाताओं को अपील के बावजूद मुस्लिम वोट एकजुट नहीं हुआ। इसके विपरीत मुस्लिम वोट कांग्रेस और केजरीवाल की पार्टी में बंट गया लगता है। चांदनी चौक, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलना तय है।

 श्रीकान्त शर्मा

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