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आम चुनावों में शाही झलक

राजशाही का उन्मूलन वर्षों पहले हो चुका है, लेकिन राजघराने से संबंधित होने की शक्तिअब भी आम चुनावों में दिखाई दे रही है। भूतपूर्व महाराजा और राजा सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने के लिए अब भी अपनी शाही विरासत को आधार बना रहे हैं। शाही वैभवविहीन पूर्व राजघराने के ये वंशज चुनावों के दौरान आम लोगों के साथ घुलने-मिलने में शर्माते नहीं हैं।

संबंधित राज्यों के शाही घरानों की शक्ति, उपाधि और उनका शाही चिह्न संविधान के अनुच्छेद 363-ए के तहत पहले ही समाप्त किए जा चुके हैं। संवैधानिक और आधिकारिक रूप से उनके चिह्नों को खत्म किए जाने के बावजूद, उनका राजशाही प्रभाव भारतीय राजनीति में दिखना आज भी जारी है। कई राजनीतिक दलों द्वारा राजपरिवार के वंशजों को राजनैतिक सरपरस्ती दी गई, जिसका फायदा उन पार्टियों को भी मिला। स्वतंत्रता के बाद के शुरूआती दशकों में दिखने वाला सामंत-विरोधी रूख कांग्रेस ने खो दिया है। आज पूर्व राजघरानों के वंशज पार्टी में खुद को काफी सहज महसूस कर रहे हैं।

भारत के भूतपूर्व राजपरिवारों के ज्यादातर वंशज अब भी अपनी शाही उपाधि से संबोधित किया जाना पसंद करते हैं। पूर्व शाही परिवार के ज्यादातर प्रमुखों को पत्राचार में अपनी शाही उपाधियों के प्रयोग करने में अब भी झिझक नहीं होती। उनकी कुछ अनुष्ठानिक भूमिकाएं भी हैं, जो परंपरा के नाम पर आज भी जारी हैं। भगवान जगन्नाथ के प्रथम शिष्य के रूप में पुरी के महाराजा, ‘चेरा-पोहरा’ की परंपरा को निभाते हैं, जिसमें महाराजा सोने की झाड़ू से रथ की सफाई करते हैं, उसके बाद रथयात्रा की शुरूआत होती है।

सभी शाही विशेषाधिकार छिन जाने के बावजूद, पूर्व राजघरानों के वंशज चुनावों के दौरान एक मजबूत शक्ति के रूप में उभर कर सामने आते हैं। अपने गौरवशाही अतीत को पकड़े, उनमें से ज्यादातर अपने महलों में यह सोच कर रहते हैं कि इससे उनकी शक्ति और अतीत वापस मिल जाएगा। भले ही राजशाही का भारत से उन्मूलन हो गया हो, लेकिन उनके वंशज राजनीतिक रास्ते के जरिए अपने क्षेत्र पर अब भी शासन कर रहे हैं।

देश के लगभग हर राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में पूर्व राजघरानों की उपस्थिति है। जम्मू-कश्मीर के डोगरा राजघराने के डॉ. कर्ण सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। हिमाचल प्रदेश के राजघरानों के पांच परिवार इस चुनाव मैदान में हैं। इनमें रामपुर बुशहर परिवार के पूर्व शासक वीरभद्र सिंह की पत्नी श्रीमती प्रतिभा सिंह, चंबा राजपरिवार की आशा कुमारी, कुल्लु राजपरिवार के महेश्वर सिंह और ज्योति सेन प्रमुख हैं।

पंजाब के पटियाला राजघराने का राजनीति में एक लंबा इतिहास रहा है। निरलेप कौर के साथ, संगुर सीट से चुनाव जीतकर 1967 में राजमाता मोहिंदर कौर पुनर्गठित पंजाब से लोकसभा में जाने वाली पहली महिला सांसद थीं। पटियाला राजघराने के दूसरे सदस्य कैप्टन अमरिंदर सिंह 1980 में सांसद बने। 19 साल के लंबे अंतराल के बाद अमरिंदर सिंह की पत्नी परणित कौर 1999 में संसद पहुंचीं और वर्तमान में भी सांसद हैं। इस बार दो दिग्गजों – अमरिंदर सिंह और अरूण जेटली के बीच टक्कर है।

पिछले वर्ष की तरह, राजस्थान में इस बार भी पूर्व राजघरानों के कई उम्मीदवार मैदान में हैं। ये सभी चारों उम्मीदवार वर्तमान सांसद भी हैं। इनमें तीन कांग्रेस से हैं, जबकि एक भाजपा से। जोधपुर से पूर्व महाराजा हनुवंत सिंह की पुत्री और पूर्व केन्द्रीय मंत्री चंद्रेश कुमारी कटोच कांग्रेस की उम्मीदवार हैं। वह भाजपा के राजपूत उम्मीदवार गजेन्द्र सिंह शेखावत के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं। कांग्रेस के दूसरे उम्मीदवार और पूर्व मंत्री जितेन्द्र सिंह अलवर से चुनाव लड़ रहे हैं। इस बार कोटा राजघराने के वंशज इजराज सिंह कोटा से उम्मीदवार हैं। मेयो कॉलेज के पूर्व छात्र इजराज सिंह ने अपनी उच्च शिक्षा अमेरिका से प्राप्त की है और वह कोटा राजघराने की संपत्ति की देख-रेख करते हैं। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र और धौलपुर राजघराने के सदस्य दुष्यंत सिंह भी इसी सूची में शामिल हैं। वह झालावार-बारन संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं।

गुजरात के पूर्व राजघरानों के शासक और राजकुमारों ने पहले ही अपना समर्थन नरेन्द्र मोदी को दे दिया है। दो वर्ष पहले हुए एक सम्मान समारोह में गुजरात के 16 राजघरानों के राजकुमार और उनके प्रतिनिधियों ने मोदी को परंपरा का निर्वाह करने के लिए तलवार और पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया था।

राजशाही भले ही अतीत की बात हो गई हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में इस चुनाव में उसकी झलक साफ दिख रही है। पूर्व शाही परिवारों के नवाब से लेकर शहजादियां तक राजनीति के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए अपनी पूरी शक्ति का इस्तेमाल कर रही हैं। पूर्व नवाब घराने के वंशज सैयद मोहम्मद शरीफ अली खान बहादुर उर्फ कजीम अली खान रामपुर से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। पूर्व नवाब जुल्फीकार अली खान की बेवा बेगम नूर बानो रामपुर से सटे मुरादाबाद से कांग्रेस की प्रत्याशी हैं। प्रतापगढ़ के कालाकंकर राजघराने की राजकुमारी रत्ना सिंह इस बार फिर कांग्रेस की तरफ से मैदान में हैं। रत्ना सिंह अपने पिता पूर्व महाराजा दिनेश सिंह की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। महाराजा दिनेश सिंह इस सीट से 1967, 1971, 1984 और 1989 में लोकसभा के लिए चुने गए थे। इसी सीट से राजकुमारी रत्ना सिंह 1996, 1999 और 2009 से सांसद चुनी जा चुकी हैं। कुशीनगर की सीट आर.पी.एन. सिंह के नाम से पहचाने जाने वाले कुंवर रतनजीत प्रताप नारायण सिंह के खाते में है, जिनके पूर्वज मजझौली स्टेट में सेवारत थे। वर्तमान सांसद और गृह राज्यमंत्री आर.पी.एन. सिंह ने अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत कांग्रेस पार्टी से की थी।

मध्य प्रदेश में पूर्व राजघरानों के बिना वहां का राजनीतिक इतिहास अधूरा है। ग्वालियर राजघराने का सिंधिया परिवार पीढिय़ों से राजनीति में अपनी धमक बरकरार रखे हुए है। इस घराने के सदस्य राष्ट्रीय पार्टियों, क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय के रूप में जीतते आए हैं। एक अन्य संसदीय क्षेत्र, जहां पूर्व राजघराने के सदस्य का ही गढ़ है, वह है राघोगढ़। राघोगढ़ के पूर्व राजपरिवार से कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह और उनके छोटे भाई लक्ष्मण सिंह आते हैं। दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवद्र्धन सिंह भी कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं।

छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चंपा जिले के बिरहा गांव में पूर्व महारानी शकुंतला सिंह का महल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, लेकिन उस क्षेत्र में उनका काफी सम्मान है। शकुंतला सिंह भाजपा के टिकट पर पामगढ़ से दो बार विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं, लेकिन दोनों बार उनकी पराजय हुई। पिछले चुनाव में सात आदिवासी राजपरिवार के सदस्य चुनाव लड़ चुके हैं। सरगुजा, बस्तर सहित कई जिलों के दर्जनों आदिवासी राजपरिवार के सदस्य प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं। अंग्रेज इस क्षेत्र का संचालन रायपुर और बिलासपुर से करते थे, लेकिन अन्य क्षेत्रों पर कई आदिवासी राजपरिवारों का नियंत्रण था।

लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव के दौर से गुजर रहे ओडिशा की राजनीति में राजपरिवारों के 16 सदस्य हैं। सत्तारूढ़ बीजू जनता दल से पूर्व राजपरिवार के 11 सदस्य मैदान में हैं, जबकि भाजपा से 4 सदस्य हैं। बालांगीर राजघराने का राजनीतिज्ञ अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए विरोधी पार्टी के खेमे में शामिल हो गया।

बीजू जनता दल से लडऩे वाले 11 राजपरिवार के सदस्यों में से 3 लोकसभा के लिए अपना भाग्य अजमा रहे हैं, जबकि बाकी के 8 विधानसभा के लिए प्रयास कर रहे हैं। भाजपा के टिकट पर राजपरिवार का एक सदस्य लोकसभा के लिए और बाकी के 3 विधानसभा सीटों पर अपनी किस्मत अजमा रहे हैं। दूसरी तरफ, 7 बार के सांसद और पूर्व मंत्री रहे ढेंकानाल राजपरिवार के सदस्य कामख्या प्रसाद सिंह देव को इस बार कांग्रेस ने टिकट देने से मना कर दिया।

ओडिशा का राजनीतिक इतिहास बताता है कि शाही परिवारों के सभी सदस्य विधानसभा में एकजुट रहे हैं। बालांगीर और कालाहांडी राजपरिवार के सदस्य राज्य की राजनीति में भारी रसूख रखते थे और उन्होंने गणतंत्र परिषद् नाम की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी का नेतृत्व भी किया था। गणतंत्र परिषद् के पीछे 1967-71 में राज्य के मुख्यमंत्री रहे पटनागढ़ (अब बालांगीर) के पूर्व महाराजा राजेन्द्र नारायण सिंह देव और कालाहांडी के पूर्व महाराजा प्रताप केशरी देव का हाथ था। गणतंत्र परिषद् 50 के दशक और 60 के दशक के पूर्वाद्र्ध में कांग्रेस की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी पार्टी थी।

भाजपा के दिग्गज कनकवद्र्धन सिंह बालांगीर शाही परिवार के वंशज हैं। शांत और उच्च शिक्षित कनकवद्र्धन सिंह समय के अनुसार खुद को बदलते हुए तेजतर्रार राजकुमार से एक लोकप्रिय नेता बन गए। अपने लड़े हुए सभी चारों चुनावों में जीतने वाले कनकवद्र्धन सिंह पटनागढ़ का 1995 से प्रतिनिधित्व करते हुए, विभिन्न सरकारों में मंत्री रहे। वह वर्तमान में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हैं। कनकवद्र्धन सिंह देव अपने छोटे भाई की पत्नी और बीजू जनता दल की प्रत्याशी प्रकृति देवी सिंह देव के खिलाफ मैदान में हैं। पिछले चुनावों में कनकवद्र्धन सिंह ने प्रकृति सिंह को हराया था। उनकी पत्नी संगीता सिंह देव बालांगीर संसदीय क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं। संगीता सिंह देव का मुकाबला अपने देवर और बीजू जनता दल से वर्तमान सांसद कलिकेश सिंह देव से है। कलिकेश के पिता और राज्यसभा सांसद ए.यू. सिंह देव भी विधानसभा के लिए चुनाव मैदान में हैं।

बीजू जनता दल ने नयागढ़ राजपरिवार के सदस्य हेमेंद्र सिंह को कंधमाल से और अरका केशरी देव को कालाहांडी से चुनाव मैदान में उतारा है। अरका सिंह देव कालाहांडी राजपरिवार की सदस्या हैं। 7 विधानसभा क्षेत्रों में फैले कालाहांडी संसदीय क्षेत्र में उनका मुकाबला कांग्रेस सांसद भक्त चरण दास से है। अरका सिंह के चाचा राजा उदित प्रताप देव और उनकी पत्नी पद्म मंजरी देवी, पिछले महीने इस उम्मीद के साथ भाजपा में शामिल हुए कि उन्हें टिकट मिल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

रामपुर से 450 किलोमीटर दूर बमरा राजपरिवार के नितेश गंगा देव रहते हैं। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने के दो दिन बाद ही नितेश गंगा देव टिकट हासिल करने में कामयाब रहे। नितेश गंगा देव अपने पिता प्रदीप गंगा देव की विरासत को ही आगे बढ़ा रहे हैं, जो 1990 और 1995 में दो बार विधायक रहे हैं। नितेश स्वयं 2004 में चुने गए, लेकिन खराब प्रदर्शन के कारण 2009 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। अब देखना यह है कि जनता उन्हें माफ करती है या नहीं।

कालाहांडी राजपरिवार के अनिल सिंह देव को जूनागढ़ से भाजपा ने अपना प्रत्याशी बनाया है। यहां तक कि ओडिशा जनमोर्चा ने भी अपने अकेले प्रत्याशी के रूप में खरियर राजघराने के सदस्य देव सिंह देव को खरियर विधानसभा सीट के लिए नामांकित किया है। इस चुनावी मैदान के 9 राजपरिवार के सदस्य, वर्तमान में विधानसभा के सदस्य हैं। उषा देवी और प्रताप केशरी देव, दोनों ही बीजू जनता दल सरकार में मंत्री हैं। ए. यू. सिंह देव, प्रवीण कुमार भंज देव और विजय रंजन सिंह बरहिया पूर्व मंत्री हैं। कीलिकोट की पूर्व महारानी वी. सुज्ञान कुमारी देव विधानसभा के लिए 10वीं बार प्रयासरत हैं।

त्रिपुरा में, त्रिपुरा राजघराने के प्रमुख और 800 साल पुराने माणिक्य वंश के अकेला वारिस महाराजा प्रद्युत विक्रम माणिक्य देव बर्मन को बोस्टन के प्रख्यात हार्वर्ड कैनेडी में, उत्तर-पूर्व में भारत के तथाकथित कठोर कानून लागू करने के विषय पर बोलने के लिए बुलाया गया था और उन्होंने इस कानून के बारे आलोचनात्मक रूप से बोला। प्रद्युत विक्रम ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के सदस्य और दिल्ली में उत्तर-पूर्व छात्र समिति के सलाहकार हैं। इसलिए ज्यादातर समय वह राजधानी में ही रहते हैं। कांग्रेस ने 2008 में उन्हें न सिर्फ विधानसभा सीट का प्रस्ताव दिया था, बल्कि अगले साल के लोकसभा चुनावों में लडऩे का भी प्रस्ताव दिया, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया।

बिहार में पूर्व राजघरानों के वंशज और जमींदार, स्वतंत्रता के पूर्व से ही राजनीति में बहुत सक्रिय रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद डुमरांव के महाराजा कमल सिंह बक्सर से 1952 में और 1957 में लोकसभा के लिए चुने गए। रामगढ़ की रानी ललिता राज्यलक्ष्मी 1977 में बरही से विधानसभा के लिए चुनी गईं थीं। उसके बाद वह हजारीबाग, धनबाद और औरंगाबाद से 4 बार लोकसभा के लिए चुनी गईं। गिधौर के महाराजा प्रताप सिंह बांका लोकसभा सीट से 1989 और 1991 में जनता दल के टिकट पर सांसद बने।

विडंबना यह है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद, अपने वंशानुगत क्रम को तोडऩे में नाकामयाब रहा है, जो उसके राजनीतिक और प्रशासनिक जड़ों में आज भी बसा हुआ है।

अनिल धीर

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