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पाकिस्तान के भविष्य को बदलने की जरूरत

पाकिस्तान के भविष्य को बदलने की जरूरत

पाकिस्तान ने पिछले छ: दशकों से खुद को हिंसक और अस्थिर छोड़ दिया है। समीर टाटा के मुताबिक खुद में सुधार लाने के लिए इस्लामाबाद को तीन काम पूरे करने होंगे। पहला, पड़ोसी देशों के साथ अपने रिश्ते सुधारे। दूसरे, अपनी सेना को आधुनिक बनाने पर जोर। तीसरा, उसे आर्थिक उन्नति और राजनीतिक सुधारों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

पाकिस्तान एक विफल राज्य बनने की कगार पर है। पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथी और अलगाववादी गुटों के द्वारा हिंसात्मक घटनाओं को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसके चलते पूरे देश की चूलें हिलती रहती हैं। इस भूभाग की उत्पत्ति दो खूनी विभाजन के बाद हुई है। 1947 में अंग्रेजों  द्वारा देश को विभाजित कर पाकिस्तान बनाया गया और 1971 के सिविल वार में पाकिस्तान से अलग होकर एक नया देश बांग्लादेश बन गया। पहले दशक के संसदीय लोकतंत्र को अगर छोड़ दिया जाए तो 1958 तक पाकिस्तान में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से सैन्य शासन ही रहा है। पाकिस्तानी सेना ने दो विषम क्षमताओं को तैयार किया, जिसमें इस्लामिक समूह और परमाणु हथियार शास्त्रागार शामिल हैं। इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि परमाणु हाथियारों का इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथ में जाने से पाकिस्तान संयुक्त राज्य की आलोचना का भागीदार बना है। इन कट्टरपंथियों की वजह से पाकिस्तान पिछले छ: दशकों से असंख्य समस्याओं से जूझ रहा है। पाकिस्तान आर्थिक अस्वस्थता की जकडऩ से खुद को बाहर नहीं निकाल पा रहा है। आने वाले कुछ दशकों में ऐसी राजनीति को अपनाने की जरूरत पड़ेगी, जो तीन खास तथ्यों पर सहायक सिद्ध हो। पहला, जो इस्लामाबाद के संबंधों को अपने पड़ोसियों और सहयोगियों के साथ सुधारने में सहायक हो। दूसरा, पाकिस्तानी सैन्य बल का आधुनिकीकरण और पुनर्संतुलन किया जाए और तीसरा, घरेलू राजनीति का पुनर्गठन कर आर्थिक उन्नति और जनसत्ता के हस्तांतरण को प्रोत्साहन दे सके ।

इस्लामाबाद के साथ संबंधों को मधुर बनाने की आवश्यकता
इस्लामाबाद और बीजिंग के पिछले 50 सालों के घनिष्ठ संबंध भारत के विरोध में ज्यादा सक्रि य रहे हैं। अब पाकिस्तान के पास एक मौका है कि वह चीन के साथ बातचीत के जरिए अपने संबंधों में परिवर्तन लाए। चीन को ऊर्जा सुरक्षा दे और बदले में सैन्य और आर्थिक सुरक्षा चीन से ले। भारत के विरोध के लिए बीजिंग को पाकिस्तान की  आवश्यकता शायद न हो, लेकिन चीन की ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए पाकिस्तान अपरिहार्य है। अपने भौगोलिक और परमाणु हथियारों के आधार पर पाकिस्तान अकेला ऐसा देश है जो चीन को हथियारों की शक्ति प्रदान कर सकता है। इससे संयुक्त राष्ट्र और रूस के नियत्रंण से बाहर होकर इरान से भूमिगत गैस और तेल के पाईपलाईन का जाल पाकिस्तान होते हुए चीन के झींगयान प्रांत तक पहुंचेगा, जोकि चीन को बेमिसाल ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करेगा। पाकिस्तान अपनी भू-रणनीतिक स्थति के प्रभाव से और चीन के साथ बातचीत करके एक दीर्घकालिक राजनीति हिस्सेदारी को दो महत्वपूर्ण आयाम तक पहुंचा सकता है। पहला चीन को पाकिस्तान की पारंपरिक सैन्य क्षमता को आधुनिक करने का उत्तरदायित्व लेना चाहिए, जिसमें द्रोण, सैटेलाईट मिसाइल, साइबर युद्ध क्षमताओं को शामिल किया जाना चाहिए। ऊर्जा गलियारों की सुरक्षा की गारंटी के लिए पाकिस्तानी सेना को इस्लामिक कट्टरपंथी और अलगाववादी समूह, जो कि देश के उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र को चला रहे हैं, उन्हें निष्क्रिय करना चाहिए। दूसरा, चीन को एक महात्वकांक्षी बुनियादी ढांचे के विकास कार्यक्रम पर हस्ताक्षर करना चाहिए, जो कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति की उन्नति में सहयोगी साबित हो। इस तरह के कार्यक्रम सिंचाई, यातायात, संचार और साफ-सफाई के क्षेत्रों को प्रोत्साहित करेंगे।

सऊदी अरब के लिए पाकिस्तान अपरिहार्य है, क्योंकि अमेरिकी सुरक्षा की अनुपस्थिति में यही उसका विकल्प है। साफ तौर पर ये प्रतीत होता है कि यह अस्पष्ट सौदा पाकिस्तान और सऊदी के बीच अंतर्निहित है। पाकिस्तान सरकार के न्यूक्लियर प्रोग्राम में आर्थिक मदद और पाकिस्तानी सरकार की बजट में आंशिक मदद के बदले सऊदी अरब पाकिस्तान के परमाणु हथियारों तक अपनी पहुंच आसानी से बना सकता है। अगर पाकिस्तान को अमेरिका और अपने घरेलू इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों से परमाणु हथियार को बचाना है तो उसे रियाद के साथ दीर्घकालिक समझौता करना होगा, ताकि सऊदी अरब कट्टरपंथी समूहों को खत्म करने का खर्च उठा सके। ऐसा अनुबंध अमेरिका को सुनिश्चित करेगा कि पाकिस्तान के परमाणु अस्त्र का इन चरमपंथियों के हाथों में जाने का खतरा सबसे कम है।

पाकिस्तान को ये स्वीकार करना होगा कि उसने इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों को शरण और समर्थन दिया है, जिसकी वजह से उसने संयुक्त राज्य अमेरिका का भरोसा खो दिया और उसके संप्रभुता के समझौते को भी। संयुक्त राज्य अमेरिका ने पाकिस्तान पर अंतकवादी ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए आक्रमण किया और उसे धर दबोचा। साथ ही इस्लामिक कट्टरपंथियों के समूह को खत्म करने के लिए पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर ड्रोन के हमलों की आवृति को बढ़ा दिया (अफगानिस्तान सीमा समेत)। ये घटनाएं इस बात को दर्शाती हैं कि इस्लामाबाद आफगानिस्तान में संयुक्त राज्य की उपस्थिति को बिना किसी विरोध के स्वीकार कर ले (संभवत: मध्य पूर्व)। हाल ही में पाकिस्तान के तालिबानी समूह ने ईरान और सीरिया को समर्थन देने का फैसला किया है। इससे तो साफ लगता है कि अमेरिका पाकिस्तान में सीधे हस्तक्षेप करेगा। अमेरिका का पाकिस्तान को परमाणु शस्त्रविहीन करने का खतरा और भी बढ़ जाता है।

इस्लामाबाद को वशिंगटन के साथ अपने विभिन्न इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों के साथ अपने रिश्तों को प्रदर्शित  कर देना चाहिए और उनकी योजनाओं का भी खुलासा कर देना चाहिए। बदले में संयुक्त राज्य को इस बात के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए कि वो पर्याप्त सैन्य सहायता निधि और कोष प्रदान करेगा (सऊदी के साथ)। अगर इस तरह का प्रयास सफल होता है तो पाकिस्तान को पारदर्शिता की जरूरत होगी, ताकि सयुंक्त राज्य को इस बात का भरोसा हो सके कि पाकिस्तान अपना सही पक्ष रख रहा है। इस्लामाबाद को ये स्वीकार करना होगा कि इस्लामिक कट्टरपंथी समूह से रिश्ता खत्म करना ही वह कीमत है, जो उसके आणविक अस्त्रों के भंडर और चुकी हुई संप्रभुता को बचाए रखने के लिए चुकानी है।

पाकिस्तान के पास भारत के साथ संबंध सुधारने का भी मौका है, अगर इस्लामाबाद  सभी इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों की हकीकत बताने को तैयार हो तो (संभावित चीन और सयुक्त राज्य से चिंतन करते  हुए)। भारत के हिस्से में आने वाले कश्मीर को उससे मुक्त कराने के लिए पाकिस्तान उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में असंख्य सैनिक समूहों के साथ बातचीत कर रहा है। इसलिए पाकिस्तान को पूर्वी सीमा पर भारत के साथ अपने रिश्तों को विराम देने की जरूरत है।

14-02-2015

अगर पाकिस्तान भारत के साथ अपने रिश्ते सामान्य करने का प्रस्ताव रखता है तो इस तरह के प्रस्ताव की दो प्रमुख विशेषताएं होंगी, जो कि वर्तमान में मौजूद भारत के कश्मीर को पाकिस्तान के हिस्से में पडऩे वाले कश्मीर से अलग करता है, उस जूर बॉर्डर को स्थाई माना जाएगा। वहां पर व्यापार करने की आपसी सहमति दोनों देशों के बीच में होनी चाहिए। एलओसी कश्मीर को 1948 से वास्तविक सीमा से बांट रही है और पाकिस्तान इस सच को बदल नहीं सकता। तभी से कश्मीर का ऊपरी हिस्सा पाकिस्तान के लिए भारतीय बाजार में प्रवेश का रास्ता उसी तरह बन गया है, जैसे कनाडा और मैक्सिको संयुक्त राज्य के बाजार में प्रवेश करता है। भारत की सुरक्षा में तैनात सैनिकों ने चीन के अद्र्धसैनिक बलों को अरूणाचल प्रदेश, जोकि उत्तर-पूर्व में स्थित है और लद्दाख, जोकि कश्मीर के उत्तर पश्चिम में मौजूद है, में घुसपैठ करने पर धमकाया था। 1962 के युद्ध में भारत चीन से हार गया था और दुबारा ऐसे मुकाबले में वह हार नहीं चाहता, इसलिए पाकिस्तान के साथ अमन के लिए भारत ने दिलचस्पी दिखाई और व्यापार को बढ़ाबा दिया, जोकि पाकिस्तान के लिए काफी फायदेमंद है।

पाकिस्तानी  सेना का आधुनिकीकरण
पाकिस्तान की सेना को 21वीं सदी की ओर बढऩे की जरूरत है, ताकि पाकिस्तान की रक्षा को सुनिश्चित किया जा सके और बाहरी आक्रमण और आंतरिक विद्रोह पर रोक लगाई जा सके। पाकिस्तानी सेना के आधुनीकिकरण के पांच प्रमुख तत्व होंगे – द्वितीय पंक्ति की परमाणु स्थापित करना, पारंपरिक सैन्य तकनीक का आधुनिकीकरण, घुसपैठ रोकने की क्षमता को बढ़ाना और पुनर्संतुलित किया जाना, सेना का विस्तार किया जाए और राज्य के साथ सेना के संबंधों को फिर से सुधारा जाना।

परमाणु हथियार पाकिस्तान में बाहरी आक्रमणों और अंतरिक धमकियों से निपटने के लिए कवच की तरह है। हालांकि यह भारत अपने लिए एक खतरा महसूस कर सकता है। शक्ति संतुलन को बढ़ाने के लिए पाकिस्तान को दूसरी रक्षा पंक्ति के विस्तार की जरूरत है, ताकि परमाणु हमले की स्थिति में प्रक्रियात्मक बचाव किया जा सके।  पाकिस्तान को अपने नौसेना को शक्ति संपन्न तथा परमाणु संवहन वाली पनडुब्बी क्षमता पढ़ाने की की जरूरत है। इस क्षमता को बढ़ाने में पाकिस्तान का पुराना मित्र चीन मददगार साबित हो सकता है, लेकिन निश्चित रूप से चीन इस बात का ख्याल रखेगा कि पाकिस्तान का अपने यहां के चरमपंथी समूहों पर मजबूत शिकंजा है। पारंपरिक सेना की क्षमताओं को आधुनिकीकरण करना और प्रद्यौगिकी संचालित प्रयास को बढ़ाने के लिए साइबर नेटवर्क, सैटेलाईट और ड्रोन की आवश्यकता होगी और इसके लिए शिक्षित, उच्च प्रशिक्षित और अनुशासित पेशेवर सेना होनी चाहिए।

मुस्लिम रूढि़वादियों और विद्रोही समूहों के संस्थागत ढांचे को खत्म करने के लिए एक बेहद गतिशील सेना की जरुरत होगी, जिसका मतलब सेना को अपने भारी हथियारों और स्थायी बचाव के भावनाओं में बदलाव लाना होगा। साथ ही इस तरह की जवाबी कार्यवाही के लिए यह जरुरी है कि पाकिस्तानी सेना की प्रमाणिकता को बढ़ाया जाये। इसके लिए पाकिस्तानी सेना में पंजाबी रंगरूटों और अफसरों के वर्चस्व को खत्म करना होगा ताकि पाकिस्तान के सभी हिस्सों की सेना में नुमाईंदगी बढ़ सके। सेना को यह भी मानना  होगा कि वह राज्य के प्रति जवाबदेह है न कि राज्य उसके प्रति।

एक नए राजनीतिक माहौल को तैयार करना
स्वाधीनता की पूर्व संध्या पर पाकिस्तान के जनक मुहम्मद अली जिन्ना ने कहा था,  ‘आप किसी भी धर्म, जाति के हों उससे राज्य का कोई लेना-देना नहीं है। हम इस विश्वास के साथ बढ़ रहे हैं कि हम सभी एक राज्य के निवासी हैं।’ जिन्ना की मृत्यु पाकिस्तान के संविधान के बनने से पहले ही हो गयी। उसके बाद बने संविधान ने कभी भी जिन्ना के सपनों को मूर्त रूप देने की कोशिश नहीं की।

अब समय आ गया है कि जिन्ना के सपनों को अमली जामा पहनाया जाए। राजनीतिक स्थायित्व के लिए जरुरी है, पाकिस्तान के विचार को समझना। इसके लिए अमेरिका का उदाहरण कारगर हो सकता है। लगभग एक दशक तक आर्टिकल्स ऑफ कॉन्फेडरेशन के चक्कर में पीसने के बाद अमेरिकियों ने फिर से संविधान बनाया, जो समय की काल-गति  सहता आया है। पाकिस्तान को एक नए लोकतान्त्रिक संविधान बनाने की जरुरत है, जिसमें राज्यों को ज्यादा शक्ति प्रदान हो ताकि केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन बना रहे, एक मजबूत और स्वतंत्र प्रशासन, विधायिका और न्यायिक व्यवस्था का निर्माण हो सके, साथ ही शक्तियों के दुरूपयोग रोकने की भी व्यवस्था इस संविधान में होनी चाहिए।

धर्म वैयक्तिक हो न कि राज्य नियंत्रित। ऐसा संविधान ही जिन्ना के सपनों को पूरा कर सकेगा। इन सबके ऊपर, सबसे जरुरी है पाकिस्तान का सफल होना। आणविक शस्त्रों से युक्त एक राज्य होने के नाते पाकिस्तान के पास असफल होने का विकल्प नहीं है।

(आईएसएन)

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