ब्रेकिंग न्यूज़ 

गोधरा के जरिए भारतीय राजनीति में पाकिस्तानी घुसपैठ

गोधरा ट्रेन नरसंहार के तुरंत बाद जिहादियों का नेटवर्क पूरे भारत में फैल गया। जिहादियों की भर्ती के लिए यहां की जमीन काफी उपजाऊ बन गई, जो बाद में इंडियन मुजाहिद्दीन के रूप में सामने आया।इसने 26/11 सहित बिना किसी आतंकवादी हमले को शामिल किए ‘पांचवें स्तंभकार’ और सहानुभूति रखने वालों के रूप में एक बड़ा नेटवर्क खड़ा किया।

गोधरा रेलवे स्टेशन पर 27 फरवरी 2002 को रेल की बोगियों में यात्रियों को जिंदा जलाने और उसके बाद हुए दंगे की विभीषिका का विश्लेषण अब तक सिर्फ सांप्रदायिक और राजनीतिक नजरिए से किया गया है। इसमें सभी जांच एजेंसियों और आयोगों को ‘तत्काल कारणों’ तक ही सीमित कर दिया गया। इस नरसंहार के लिए जिम्मेदार बाहरी साजिश को नजरअंदाज करना सुरक्षा विश्लेषकों की भारी गलती थी। इसकी समीक्षा में मौजूदा भू-राजनैतिक वातावरण को शायद ही कोई कारक माना गया। इस देश का सुरक्षा-विमर्श अब भी अपने आप को छद्म युद्ध के दायरे के लिए सुग्रहीकृत नहीं बना पाया है। पाकिस्तान परमाणु क्षमता के आत्म-विश्वास में इस युद्ध को जारी रखे हुए है। गोधरा कांड, सीमा पर जारी ‘ऑपरेशन पराक्रम’ से ध्यान हटाने और भारतीय प्रतिक्रिया को विभाजित कर 13दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर पाकिस्तानी हमले के लिए दंडित करने की क्षमता को बेअसर करने का पूर्व नियोजित हथकंडे के सिवाय और कुछ नहीं था। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. और जिहादियों– दोनों का तत्कालिक और दूरगामी एजेंडा है, जो काफी हद तक सामने आ चुका है।

वर्तमान भू-राजनैतिक वातावरण

भारतीय संसद पर हमले के बाद जारी ऑपरेशन पराक्रम, जिसके तहत पाकिस्तान के खिलाफ दंडात्मक हल निकालने के लिए भारत-पाक सीमा पर लगभग 5 लाख सेना की तैनाती के दौरान ही गोधरा नरसंहार को अंजाम दिया गया। इस बात पर प्रकाश डाला जा सकता है कि ये घटनाएं 9/11 के बाद अमेरिकी रोष के कारण 7 अक्टूबर 2011 को अफगानिस्तान में हुए ‘ऑपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम’ की भू-राजनैतिक छाया थी। यह आश्चर्यजनक है कि पाकिस्तान का अपराधग्रस्त सैन्य खुफिया तंत्र, जिसने 9/11 में भूमिका के लिए अमेरिका को कृतज्ञ किया था, और रिचर्ड अर्मिटेज की ‘हम बमबारी कर पाषाण युग में ले जाएंगे’ धमकी, ने संसद पर हमले की साजिश रचकर भारत के साथ दूसरा मोर्चा खोलने का एक तर्कसंगत प्रयास किया था। ऑपरेशन ‘पराक्रम’ की मजबूत तैयारी और दंडात्मक कार्रवाई के कारण पाकिस्तान पूर्वी और पश्चिमी मोर्चे पर घिर गया। इस उपजी भू- राजनैतिक स्थिति में अमेरिका और पाकिस्तान, दोनों की अनिवार्यता और मजबूरियां अलग थीं। अमेरिका का फायदा इसमें था कि ऑपरेशन ‘एनड्यूरिंग फ्रीडम’ की सफलता के लिए पाकिस्तान का ध्यान भारतीय मोर्चे से हटे और पाकिस्तान के यह जरूरी था कि अफगानिस्तान पर किए जाने वाले अमेरिकी हमले से अपनी जनता का ध्यान हटाए।

इस भू-राजनीतिक पटकथा में अमेरिका और पाकिस्तान की मिलीभगत की पुष्टि कई बार हो चुकी है। अमेरिका ने उन जिहादियों के प्रति दूसरा रूख अपनाया, जिन्होंने भारतीय संसद पर हमला किया। इससे प्रतीत होता है कि अमेरिका ने इस क्षेत्र के भू-राजनैतिक विमर्श को नया आवरण देने के लिए लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे जिहादी संगठनों को रणनीति के तौर पर इस्तेमाल करते हुए पुरस्कृत भी किया। हाफिज सईद जैसे लोगों से निपटने में अमेरिका ने अपनी ओछी रणनीति का परिचय दिया था, जो भारतीय संदर्भ में ओसामा बिन लादेन से ज्यादा खतरनाक था।

अमेरिकी गुप्तचर डेविड हेडली की लश्कर-ए-तैयबा में सुनियोजित घुसपैठ और 26/11 की घटना में उसकी मुख्य भूमिका कई सवाल खड़े करती है। उसके बाद अमेरिकी अधिकारियों द्वारा हेडली के लिए बढ़ाए गए संरक्षण और पूछताछ करने वाले भारतीय दल की उस तक सीमित पहुंच, अमेरिकी अधिकारियों की मिलीभगत की परिचायक है।

भारत और पाकिस्तान, दोनों का भारत-पाक सीमा को सक्रिय करने की बेताब मंशा और एजेंडा था। अमेरिकी अधिकारियों ने इसके लिए एक कुशल और ठोस राजनयिक प्रयास किया, ताकि ऑपरेशन पराक्रम के तहत सीमा पर भारत अपने सैनिकों की ज्यादा तैनाती कर किसी दंडात्मक कार्रवाई के तहत ऑपरेशन ‘एनड्यूरिंग फ्रीडम’ को खतरे में न डाल दे।

इस बात को दोहराया जा सकता है कि ऑपरेशन पराक्रम के दौरान भारत ने अपने क्षेत्र को हासिल करने के लिए 3.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च किए और अपने लगभग एक हजार सैनिकों को खोया। तो, संसद हमले के बाद किसने, किसको सजा दी? भारत को गहरे वित्तीय संकट में धकेलने के लिए पाकिस्तान को लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के सिर्फ आधे दर्जन जिहादियों को खुला छोडऩा पड़ा। छद्म यद्ध की यही प्रकृति है। यह उसी भू-राजनीति का नतीजा था कि पाकिस्तान के सैन्य खुफिया तंत्र ने गोधरा ट्रेन नरसंहार को अंजाम दिया।

आई.एस.आई. और जिहादियों का एजेंडा

गोधरा ट्रेन नरसंहार के पीछे पाकिस्तान के सैन्य खुफिया तंत्र के अधिकारियों और जिहादियों का एक सटीक एजेंडा था। इसके पीछे बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा फैला कर पूरे भारत को दहलाने की योजना थी। तुरंत मिलने वाले जिस रणनीतिक फायदे की गणना पाकिस्तान ने की थी, वह था कि हालिया घटना के परिणामस्वरूप आंतरिक सुरक्षा को कायम करने के लिए भारतीय अधिकारियों, संसाधनों और क्षमता का बंटना, जिससे सीमा पर भारतीय सैनिकों का दबाव कम होगा। इस विध्वंसकारी इरादे के तहत ‘पांचवां स्तंभ’ स्थापित करना था, जिससे तैनाती और रसद आपूर्ति को बाधित किया जा सके।  लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तान आधारित आतंकवादी संगठनों की मुख्य प्रेरणा सांप्रदायिक हिंसा के जरिए भारत में अपना नेटवर्क स्थापित करना था।

क्या आई.एस.आई. को सफलता मिली?

हां, गोधरा ट्रेन नरसंहार के तुरंत बाद जिहादियों का नेटवर्क पूरे भारत में फैल गया। जिहादियों की भर्ती के लिए यहां की जमीन काफी उपजाऊ बन गई, जो बाद में इंडियन मुजाहिद्दीन के रूप में सामने आया। इसने 26/11 सहित बिना किसी आतंकवादी हमले को शामिल किए ‘पांचवें स्तंभकार’ और सहानुभूति रखने वालों के रूप में एक बड़ा नेटवर्क खड़ा किया। यह गोधरा का परिणाम ही था कि आतंकवादियों के लक्ष्य करने का तरीका और दर्शन पूरी तरह बदल गया और अब इसमें भारत के धार्मिक स्थल, बाजार, न्यायालय, यातायात और सुरक्षा बलों के कैंप शामिल हो गए। भारत के पश्चिमी भाग तक सीमित जिहादी आतंक पूरब में जौनपुर, रफीगंज से लेकर दक्षिण में कुरनूल तक और बाद में दिल्ली, वाराणसी, अयोध्या, हैदराबाद, रामपुर, बंगलुरू, लखनऊ, जयपुर, मुंबई, पुणे, गुवाहाटी, बोधगया और पटना तक फैलता चला गया। 2002 से आज तक मुंबई 8 बार आतंकवादी घटनाओं की शिकार हो चुकी है, जिसमें सबसे भयानक 26/11 की घटना थी। दिल्ली, पुणे, हैदराबाद – इनमें प्रत्येक शहर को तीन से ज्यादा बार निशाना बनाया गया है। जिहादी समूहों का अखिल भारतीय नेटवर्क 2012 में उस वक्तपूरे शबाब पर दिखा, जब जिहादी हिंसा पूरब में कोकराझार से होते हुए पश्चिम में मुंबई पहुंच गई और बाद में पुणे, हैदराबाद और बंगलुरू तक उसका असर दिखा, जिसके कारण उत्तर-पूर्व के छात्रों का पलायन शुरू हो गया। जिहादियों का संपूर्ण एशिया नेटवर्क उस वक्त दिखा, जब म्यांमार में हिंसा के परिणामस्वरूप बिहार के बोधगया के महाबोधि मंदिर में धमाका किया गया।

गोधरा कांड के बाद, पाकिस्तान के सैन्य खुफिया अधिकारियों ने इन जिहादी आतंकी नेटवर्क को इसलिए बढ़ाया क्योंकि भारतीयों को आतंकित कर वह कश्मीर में भारत को बैकफुट पर आने को विवश कर सके और अफगानिस्तान में भारतीय सामरिक महत्व को नकारा बना सके। संसद पर हमले और ऑपरेशन ‘पराक्रम’ के दौरान भारतीय आक्रामकता की असफलता ने पाकिस्तान को यह विश्वास दिला दिया कि छद्म युद्ध के सहारे वह किसी भी स्तर तक पहुंच सकता है और परमाणु संपन्न होने के कारण भारत, पाकिस्तान पर कभी भी हमला नहीं कर सकता। पाकिस्तानी राजनयिक सरताज अहमद ने कहा था – ”1998 में परीक्षण के बाद अर्थव्यवस्था को लेकर परेशानी खड़ी हो गई थी, लेकिन उस वक्त सांत्वना मिली, जब 2001 में संसद पर हमले के बाद भारत सीमा पर अपने सैनिकों की तैनाती करने लगा और पाकिस्तान की परमाणु प्रतिक्रिया को देखते हुए बाद में उसने अपने सैनिकों को वापस बुला लिया……।’’

गोधरा क्यों?

भारत की ऐतिहासिक सांप्रदायिक संवेदनशीलता और नाजुक धार्मिक जनसांख्यिकीय संतुलन के कारण गोधरा का चयन पाकिस्तान के सैन्य खुफिया अधिकारियों द्वारा पूरे भारत में तबाही मचाने के लिए किया गया था। यह जगह तबलिगी जमात के दुर्जेय गढ़ के रूप में भी जानी जाती है। इसका सांप्रदायिक दंगों के जख्मों का इतिहास रहा है। यह जगह 1980 में सांप्रदायिक दंगों से दहल उठी थी और यहां लगभग 1 वर्ष तक कफ्र्यू लगाना पड़ा था।

इसके सिवाय, यहां की राजनीति को निश्चित रूप से प्रभावित करना था। उस दौरान ट्रेन पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश से गुजरती थी, जो कांग्रेस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा शासित था। अन्य पड़ोसी राज्य राजस्थान और महाराष्ट्र में भी कांग्रेस की ही सत्ता थी। उस वक्त राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख थे। योजनाकारों ने शायद अच्छी तरह जान लिया था कि सेना को सीमा पर तैनाती के लिए भेजने और पड़ोसी राज्यों में विरोधी मुख्यमंत्रियों की होने की वजह से, आवश्यक सुरक्षा बल न मिलने के कारण सांप्रदायिक हिंसा को नियंत्रित करने में गुजरात सरकार बुरी तरह नाकाम होगी। यह रिकॉर्ड में दर्ज है कि हिंसा पर नियंत्रण पाने के लिए गुजरात सरकार ने अपने पड़ोसी राज्यों की सरकारों से सुरक्षा बलों की मांग की थी, लेकिन उन सरकारों ने इस प्रस्ताव को नकार दिया था। यह आतंक के राजनीतिकरण का सबसे बुरा प्रतिबिंब था, जिसके तहत एक ही पार्टी द्वारा शासित महाराष्ट्र, राजस्थान और हरियाणा में तथाकथित ‘हिंदू आतंक’ की पूरी कहानी बुनी गई। ये वही राज्य हैं, जहां तथाकथित हिंदू आतंकवादियों को जाहिरा तौर पर गिरफ्तार किया गया और कमजोर या फिर बिना किसी चार्जशीट का उन पर मुकदमा चलाया गया।

आतंकवाद के राजनीतिकरण का भयावह रूप तब सामने आया, जब कुख्यात आतंकवादी हाफिज सईद और उसके गैंग ने 26/11 की घटना को हिंदू आतंकवाद के रूप में चित्रित करने की कोशिश की। भारत के कुछ नेता अजमल कसाब के गिरफ्तार होने के बावजूद, हाफिज सईद द्वारा रचित इस पटकथा में बेशर्मी के साथ सहयोग करते नजर आए। वोट बैंक की राजनीति के लिए आतंकवाद को अलग नजरिया देने में आई.एस.आई., लश्कर-ए-तैयबा और हमारे राजनेताओं की मिलीभगत स्पष्ट हो गई। तब से भारत में अपना नया राजनीतिक संगठन तैयार करने के लिए पाकिस्तान ने वैचारिक दबाव और सामग्री उपलब्ध कराने में महारत हांसिल कर ली। बलूच पत्रकार आमना साहवानी, अफगान टाईम्स में ‘भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा के प्रति पाकिस्तान का रहस्यमयी प्रेम’ नाम के शीर्षक से अपने लेख में लिखती हैं –

”…पाकिस्तानी दैनिक ‘डॉन’ अपने मुख्य पृष्ठ पर लिखता है कि दिल्ली में ‘आप’ की जीत हुई, जबकि भाजपा उससे आगे थी। पाकिस्तान के विभिन्न शहरों में खुशियां मनाई जाने लगीं, खासकर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में…। ‘आप’ को चंदा देने के लिए पाकिस्तानियों द्वारा बड़े पैमाने पर ऑनलाईन चंदा अभियान चलाया गया। केजरी पाकिस्तान के राजनेताओं और मीडिया में नाम कमाने लगे। पाकिस्तानी नेतृत्व, नवाज शरीफ ने कहा कि भारत के साथ कश्मीर समस्या के समाधान में केजरी मददगार होंगे। अब भारतीय इससे जरूर आश्चर्यचकित होंगे कि पाकिस्तानी मीडिया, राजनेता और अन्य एजेंसियों को भ्रष्टाचार विरोध के तथाकथित योद्धा और भारत के एक छोटे से राज्य के असफल मुख्यमंत्री केजरी से कश्मीर का क्या लेना-देना। पाकिस्तान के पास भारत के वास्तविक भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा को लेकर इतना खुश होने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि इससे भारत को लाभ ही मिलेगा और वह सशक्तहोगा, जो पाकिस्तान निश्चित तौर पर कभी नहीं चाहेगा। पाकिस्तान एक सुरक्षित, प्रगतिशील, सुशासित और विकसित भारत कभी नहीं चाहता, लेकिन पाकिस्तान केजरी को प्यार करता है।  ’आप’ के कम से कम तीन विधायकों ने कश्मीर पर भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थित बयान दिया है। इसके मास्टर माइंड केजरी हैं। आई.एस.आई. भारत को विभाजित करने में वही भूमिका अदा करना चाहता है, जो सी.आई.ए. ने सोवियत संघ के लिए की थी।’’

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ‘आप’ ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में छह महीने के अंदर एक खास समुदाय के नागरिकों को न्यायिक निर्णयों के तहत विशेषाधिकार देने और सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम की समीक्षा करने का विभाजनकारी लक्ष्य रखा है।

निष्कर्ष

पाकिस्तान न सिर्फ अफगानिस्तान की राजनीति को प्रभावित करने के लिए प्रयासरत है, बल्कि भारतीय राजनीति में भी उसने अपना हिंसक और विध्वंसक जाल बिछाना शुरू कर दिया है। भारत और अफगानिस्तान, दोनों ही उसके छद्म युद्ध के एरिना में हैं। वह अपने छद्म युद्ध और जिहादी एजेंडे को लागू करने के लिए सत्ता पक्ष को अनुकूल बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इस प्रयास में एनजीओ और नेताओं को एक उद्योग कारूप दिया गया है, जो नियमित रूप से भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठानों को गालियां देते हैं और सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम की निंदा करते हैं। वे थोड़ा भी अवसर मिलने पर भारत का विभाजन करने के लिए आतंकवादियों और उसके प्रायोजकों को क्लीनचिट दे देते हैं, जिसकी शुरूआत अक्सर वे कश्मीर से करते हैं। एक राजनीतिक रैली के दौरान अक्टूबर 2013 में हुआ विस्फोट भारत में राजनीतिक बहस को बदलने के लिए था। पहली बार, किसी रैली में नेताओं के अलावा आम लोगों को निशाना बनाया गया। गोधरा के बाद पाकिस्तान का छद्म युद्ध भारत की राजनीति में बहुत तेजी से फैल गया है। तो क्या हम दूसरा अफगानिस्तान बनने के लिए तैयार हैं?

आर.एस.एन. सिंह

полиграф мастер Харьковотзывы

Leave a Reply

Your email address will not be published.