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भाषा पर नियंत्रण रखो राहुल जी!

नेहरू वंश के वारिस राहुल गांधी से किसी को अभद्र भाषा की उम्मीद नहीं होती। लेकिन छत्तीसगढ़ के बडोल में मोदी पर शब्दों के वार करते हुए उन्होंने ऐसा ही किया। राजनीतिक विरोधी होने के कारण मोदी की कड़ी आलोचना करना उनका अधिकार है। लेकिन जिस भाषा का राहुल ने प्रयोग किया वैसे तो कोई अपने क्लर्क से भी बात नहीं करता। हां जरूर कुछ असभ्य लोग अपने घरों में काम करने वाले नौकरों से ऐसी भाषा में बात करते हों, लेकिन अब तो वो भी ऐसा खुले आम नहीं करते।

और तो और राहुल के पिता राजीव गांधी ने भी कभी अपने सबसे बड़े शत्रु वी.पी. सिंह के खिलाफ ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं किया, जैसा राहुल ने मोदी के खिलाफ किया। मोदी गुजरात से तीन बार मुख्यमंत्री चुने जा चुके हैं। राहुल ने मोदी का अपमान नहीं किया बल्कि जिन लोगों ने मोदी को तीन बार चुना है उनका अपमान किया है। राहुल के द्वारा प्रयोग की गई भाषा पर एक नजर डालते हैं- ‘मोदी पीएम बनना चाहता है। उसके लिए वो कुछ भी कर देगा। वो टुकड़े-टुकड़े कर देगा। एक को दूसरे से लड़ा देगा।’

राहुल को अपने चचेरे भाई वरूण गांधी से राजनीति की भाषा व शिष्टता सीखनी चाहिए। वरूण खुद अपने द्वारा दिए गए कुख्यात घृणास्पद भाषण के बाद काफी संभल कर बोलते हैं। फिलहाल वरूण अमेठी से दूर भी तो नहीं हैं। वे अमेठी से भाजपा के उम्मीदवार हैं लेकिन वे अपने पिता संजय गांधी के नाम पर वोट मांग रहे हैं। संजय खुद कभी अमेठी से ही सांसद थे।

आजम का कारगिल कार्ड

अखिलेश यादव के प्रभावशाली और बेअदब मंत्री आजम खान अपनी बदतमीजी और अटपटी थ्योरी देने के लिए जाने जाते हैं। लेकिन अब तो उन्होंने हद ही कर दी। कुछ दिनों पहले उन्होंने एक सभा में यह कह दिया की कारगिल को पाकिस्तानियों से आजाद कराने में सेना के मुस्लिम ऑफिसर्स और जवानों का हाथ था।

उन्होंने आरोप लगाया की मीडिया ने इस बात को छुपाया। ऐसे आरोप लगाने के पीछे उनका मकसद क्या था? उनकी ऐसी हरकतों के पीछे कोई न कोई मकसद होता ही है। वो जानते हैं कि अधिकतर रिटायर्ड आर्मी वाले भाजपा के साथ हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने ऐसी कोशिश की है। लेकिन भगवान का शुक्र है कि हमारी सेना अभी तक अराजनैतिक रही है और ऐसी नामाकूल कोशिश कभी सफल नहीं होगी इस देश में।

सोनिया का ‘इमाम कार्ड’ खतरे में।

सोनिया गांधी और इमाम बुखारी के बीच हुई गुप्त मीटिंग को कांग्रेस की जीती बाजी के तौर पर देखा जा रहा था। लेकिन जैसे ही उन्होंने मुसलमानों से कांग्रेस को वोट देने की अपील की वैसे ही देश के कोने-कोने से इमाम उनसे सवाल कर रहें हैं कि उन्हें मुसलमानों से अपील करने का अधिकार किसने दिया। यूपी के भड़के हुए एक इमाम ने कहा कि वे उस वक्त दिल्ली में ही थे और इसीलिए वे प्रमुख के तौर पर सोनिया से मिले। उन्हें कोई हक नहीं कि वे अपने आप को हमारे प्रमुख के तौर पर पेश हों या वे सारे मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने की बात करें। पुरानी दिल्ली के फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम डॉ. मुफ्ती मोहम्मद मोकर्रम अहमद ने भी बुखारी से अपनी असहमती जारी की। उन्होंने कहा कि मुसलमान केवल उसे वोट देगा जो इस देश में धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को वापिस लाएगा, फिर चाहे वो कोई पार्टी हो या कोई निर्दलीय उम्मीदवार।

केजरीवाल स्लैपगेट : सच्चाई या नौटंकी

लगता है केजरीवाल ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है। उस बेचारे को अब तक पांच थप्पड़ लग चुके हैं, वो भी आम आदमी के बीच में ही। इन दिनों जहां देखो यही चर्चा चल रही है कि ये थप्पड़ कांड सच में हो रहे हैं या करवाये जा रहे हैं। केजरीवाल को उनके अपनी ही पार्टी के लोगों ने मझदार में छोड़ दिया है। जिस तरह से लोग उन्हें छोड़ते जा रहे हैं उसकी वजह से उन्हें कुछ न कुछ मुद्दा तो चाहिए ही था। शायद इसी हिसाब से उनके रणनीतिकारों ने ये विचार दिया। जिस तरह से इस घटना का पटाक्षेप हुआ है उससे तो साजिश की बू आती है। पांचवा थप्पड़ खाने के बाद केजरीवाल राजघाट गए और ध्यान लगाने बैठ गए। जैसे ही उनके दिमाग की बत्ती जली वो पहुंच गए एक गुलाब लेकर पांचवा थप्पड़ मारने वाले के घर। बहुत क्रान्तिकारी …. बहुत क्रान्तिकारी।

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