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चुनाव आयोग या ‘सुपर सरकार’

हर साल देश के राज्यों में शराब के ठेकों के लाइसेंस दिए जाते हैं। राज्यों के आबकारी विभाग एक प्रक्रिया के तहत इन्हें जारी करते हैं। राज्यों का बहुत बड़ा राजस्व शराब की बिक्री से आता है। मगर इस साल यह मामला चुनाव आयोग के पास पहुंच गया। अब सोचिए, चुनाव आयोग यह तय करेगा कि दारू के ठेके दिए जाएं या नहीं। मगर हुआ, ऐसा ही। चुनाव आचार संहिता के कारण राज्यों ने चुनाव आयोग के पास यह मामला ठेल दिया और आयोग ने 31 मार्च को एक आदेश जारी कर के कहा – ‘राज्य सरकारें शराब के ठेकों की नीलामी कर सकती हैं।’ और तो और भारतीय रिजर्व बैंक नए बैंकों को लाइसेंस दे कि नहीं, यह मामला भी आयोग के पास गया और उसने तय किया कि आरबीआई ऐसा कर सकता है!

उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग ने बसपा की नेता मायावती द्वारा बनवाए गई हाथियों की मूर्तियों को ढकने के आदेश दिए थे, क्योंकि ‘हाथी’ बसपा का चुनाव चिह्न है। मगर अब किसी ने मुझ से पूछा की चुनाव आयोग प्रदेश भर की साइकिलों का क्या करेगा? क्योंकि ‘साइकिल’ समाजवादी पार्टी का चुनाव चिह्न है। चलो, साइकिल को तो उठाकर घर में बंद करने का आदेश दिए भी जा सकते हैं, मगर, अयोग ‘हाथ’ का क्या करेगा? ‘हाथ’ तो कांग्रेस का चुनाव चिह्न है। क्या सारे नागरिकों को दस्ताने दिए जाएंगे, ताकि वे चुनाव होने तक उन्हें पहन कर चलें। नहीं तो, इससे कांग्रेस को फायदा पहुंच सकता है!!! बात हंसी की लगती है, मगर इतनी हास्यास्पद भी नहीं, क्योंकि मौजूदा आम चुनाव में आयोग के कई फैसले उन दायरों से बाहर के हैं, जो आमतौर से उसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

भारतीय जनता पार्टी का चुनाव घोषणा पत्र कब जारी होगा और इसे मीडिया कवरेज मिले या न मिले, इस पर चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर खूब टीका-टिप्पण्णी हुई। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने तो इस पर ट्वीट कर के उन टीवी संपादकों पर सवाल भी उठाए, जिन्होंने घोषणा पत्र के कार्यक्रम को कवरेज दी थी। उधर, कुछ अफसरों के ट्रान्सफर को लेकर चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी में भी काफी तनातनी हुई। आखिरकार ममता मानीं और वहां चुनाव आयोग की चली। यहां तक तो ठीक, मगर कुछ उदाहरण अगर देखें जाएं, तो लगता है की आयोग के कामकाज के रवैये और कार्यक्षेत्र को लेकर बड़ा भ्रम है। इसे ठीक होना चाहिए।

सवाल है कि चुनाव आचार संहिता का उद्देश्य क्या है? इसका मकसद है कि सत्तारूढ़ दल कोई ऐसे फैसले न ले, जिसका फायदा उसे चुनावों में मिले। यानि, हर दल और हर प्रत्याशी के लिए चुनावी मैदान बराबरी का हो, और सत्तासीन पार्टी सरकारी पैसे और पद का उपयोग करके मतदाताओं को प्रभावित न कर सके। देश का संविधान और कानून, चुनाव आयोग को अधिकार देता है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए उपयुक्त कदम उठाए। लेकिन यह जरूर स्पष्ट होना चाहिए कि व्यवस्था ऐसी नहीं है कि आयोग एक ‘सुपर सरकार’ के तौर पर काम करेगा। ऐसा नहीं कि चुनाव के समय देश का कामकाज ही रुक जाए और हर मामला चुनाव आयोग के पास जाए। चुनाव का मतलब देश का रुकना नहीं हो सकता। अभी बिजली की कीमतों और गैस की कीमतों के बारे कुछ ऐसा ही हुआ। लेकिन क्या सारी गलती चुनाव आयोग की है? यह भी तो हुआ है कि सरकारी अफसरों ने चुनाव आयोग को ढाल बना लिया है और हर उस फैसले को जो वे लेना नहीं चाहते, आयोग के पास भेज देते हैं। एक उदाहरण काफी होगा।

रक्षा मंत्रालय को देश के जवानों के लिए 6400 मीट्रिक टन खाने का तेल खरीदना था। इसके लिए जनवरी में टेंडर भी हो चुके थे। अब, सिर्फ तेल सप्लाई होना था। अब सोचिए कि इस मामले का चुनाव आयोग से क्या लेना-देना। मगर, डर के मारे या फिर ‘कौन चक्कर में पड़े?’ वाली सोच के कारण रक्षा सचिव ने चुनाव आयोग से इसकी इजाजत मांगी। उसके बाद चुनाव आयोग ने चिट्ठी निकाली कि जो भी रोजमर्रा के नियमानुसार करने के काम हैं, उसके लिए आयोग के पास आने की जरूरत नहीं है। इसी प्रकार आयोग को चुनाव आचार संहिता को लेकर बनी अस्पष्टता और भ्रम की स्थिति को भी ठीक करने के लिए उपयुक्त कदम उठाने की जरूरत है।

उमेश उपाध्याय

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