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भाग्य और कर्म

जब मैंने अपने प्रात: स्मरणीय समाधिस्थ गुरूजी को यह कहते सुना कि उनके हाथों में लकीरें ही नहीं हैं, तब मैं अचम्भे में पड़ गया। अगर इन लकीरों के होने या न होने से हमारे जीवन में कोई फर्क ही नहीं है, तो फिर सब लोगों की भीड़ किस बात को लेकर पागल हो रही है। लकीरों में भाग्य को ढूंढते हुए ज्योतिषी समझा रहे हैं कि यदि यह लकीर आपकी इस लकीर से आगे चली जाए, तो आपके पास इतना बड़ा साम्राज्य होगा कि आपसे संभाले नहीं संभलेगा। क्या भाग्य कर्म से बड़ा है? नहीं। ये बातें उन तथाकथित ज्योतिषियों द्वारा फैलाई गई हैं, जिनकी दुकान अंधविश्वास पर ही चलती है। अगर वे समझाना शुरू कर दें कि कर्म ही भाग्य की जननी है, तो आप उस ज्योतिषी के पास बिलकुल नहीं जाएंगे।

जीवन कर्म है, और कर्म ही जीवन है। भगवान कृष्ण ने गीता में ‘निरंतर कर्मशील’ रहने की बात ही तो कही है। प्रभु ने अपनी वाणी में साफ कहा है : ‘सिर्फ और सिर्फ कर्म करने का अधिकार है तुझे, बाकी और किसी चीज का अधिकारी है ही नहीं तू। ऐसा मत सोच कि तू करेगा तभी होगा। इस धर्मयुद्ध में तू अपना कर्म कर। वह विधि के विधान के अनुरूप होना ही निश्चित है, बस माध्यम तू है, तो हे अर्जुन-

तू मार इन्हें। ये मर चुके,

सफर जहां से कर चुके।’

दो ज्योतिषी रोज एक ही बस में अलग-अलग जगह से चढ़ते थे। एक ज्योतिषी दूसरे को चार आने देकर कहता- ‘बता मेरा धंधा कैसा रहेगा। वह जवाब देता- ‘बढिय़ा।’ इसी तरह दूसरा ज्योतिषी भी करता। दोनों एक दूसरे को चार आने देते। किसी ने कुछ लिया नहीं, दिया नहीं, हिसाब बराबर। जिसे खुद का भविष्य नहीं पता, वह दूसरों का भाग्य क्या बताएगा। भाग्य में जीने वाले कोल्हू के बैल की तरह, पशुवत जीते हैं। एक ही चीज दोहराते हैं बार-बार। कोई नयापन नहीं। कोई अविष्कार नहीं। सिर्फ जो व्यवस्था के अंदर फिट कर दिया गया है, उसी को दोहराते हैं। क्या परमात्मा ने हमारे अंदर बीज नहीं डाले हैं… होने की संभावनाएं नहीं दी हैं। वनस्पति शास्त्री कहते हैं- ‘एक बीज में वह ताकत है कि पूरी पृथ्वी को हरा-भरा कर दे। हमारे अंदर जो ‘होने’ का बीज है, वह समाधि को पाने का बीज है। क्या वह समस्त मानव जाति को प्रकाशित करने की शक्ति नहीं रखता? रखता है वह शक्ति। ओशो रजनीश परमात्मा पर, समाधि पर, आठ हजार घंटे बोले हैं। उन्होंने बताया है- ‘जीवन कैसे जीएं।’ ओशो ने जीवन को जीया, समाधि को पाया और उसे भरपूर बांटा भी। बुद्ध 40 सालों तक निरंतर कर्म साधना के लिए लोगों को जगाते रहे, सिर्फ इस आस पर कि यदि इनमें से एक भी वास्तविक राह पर चलते हुए समाधि को पा गया, तो मेरी साधना सफल होगी। भाग्य को मानने वाला निरंतर अकर्मण्यता में जीता है। जबकि जीवन का सिद्धांत ‘कर्म’ है। कर्मवीर लकीर का फकीर नहीं बनता।

तन काम में और मन ध्यान में,

तो पल भर न गुजरेगी अस्यान में।’

बहुत से लोग मानते है कि हमारे प्रारब्ध में जो लिखा है, वही जीवन में घटित हो रहा है, उसे कोई बदल नहीं सकता। समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को न मिला है और न मिलेगा। आलस्य और अज्ञान को त्यागकर, बड़ी सोच, कड़ी मेहनत, पक्के इरादे से कर्मशील रहकर, प्रभु को भी आसानी से पाया जा सकता है।

ललित अग्रवाल

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