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मोदी को राष्ट्र समर्थन क्यों दे?

इससे किसी का भी मतभेद नहीं होगा कि वर्तमान चुनावी दौड़ में यूपीए हार गया है। आजाद भारत के इतिहास में यह सबसे भ्रष्ट और हेकड़ सरकार है। यदि यूपीए को तीसरी बार 2014 में सत्ता मिल भी जाती है, (जिसकी संभावना शून्य के बराबर है) तो वह देश के लिए कितना बड़ा अमंगल होगा और भगवान जानता है कि उसके बाद देश का क्या होगा! देश का नेतृत्व कौन करेगा: एक अनिच्छुक वंशवादी, जिसके अभी दूध के दांत भी नहीं टूटे हैं, एक असफल अर्थशास्त्री, या चतुराई से पीछे से कठपुतली चलानेवाली?

वर्तमान में देश की हालत पूरी तरह से दिग्भ्रमित और हर क्षेत्र में गिरते ग्राफ जैसी है। लगातार बढ़ती मुद्रास्फीति, खुले आम हो रहा भ्रष्टाचार, आर्थिक मंदी, रूपए की गिरती हालत, कानून और व्यवस्था की खराब होती स्थिति, सीमा पर बिगड़ते हालात, नक्सलवाद, लकवाग्रस्त शासन, संवैधानिक संस्थाओं का अपमान, ढहती हुई न्यायिक प्रणाली, फालिजग्रस्त नीतियां, बेहुदा और खतरनाक स्तर तक पहुंचा अल्पसंख्यकों और अन्य वर्गों का ‘लॉलीपॉप-तुष्टिकरण’, केन्द्र और राज्यों की मुगलयुगीन राजवंशीय राजनीति, नौकरशाही…….कहीं तक भी इस सूची को पहुंचाया जा सकता है। यूपीए के अगले पांच साल भारत को पाकिस्तान, हैती, कोंगो और सोमालिया जैसे असफल राष्ट्रों की सूची में खड़ा कर सकते हैं।

ये चुनाव भारतीयों को उससे मुक्ति दिलाने का एक आखरी मौका दे रहे हैं। भारत की जनता वोट देकर एक भ्रष्ट और अक्षम शासन को बाहर कर एक प्रभावशाली सरकार को सत्ता सौंप सकती है। केवल तीन विकल्प हैं – यूपीए, एनडीए और भटकता तीसरा मोर्चा।

यूपीए के बारे में ऊपर के पैराग्राफ में काफी कुछ कहा जा चुका है। अब तीसरे मोर्चा के विकल्प के बारे में।

तीसरा या संघीय मोर्चा ममता बैनर्जी, मुलायम सिंह, चतुर नीतिश कुमार, असन्तुष्ट नवीन पटनायक, ग्रैंड महारानी जयललिता, और झक्की मायावती से मिलकर बनेगा। इन में से कोई भी अपने राज्यों के आगे नहीं देख सकता, इसलिए किसी के पास भी राष्ट्रीय विचारधारा नहीं है। उन्होंने अब तक कभी भी ऐसा शासन नहीं दिया है, जैसा कि देश को जरूरत है। मुलायम सिंह और जयललिता की निगाहें प्रधानमंत्री की कुर्सी से चिपकी हैं। नीतिश कुमार की दृष्टि दो जगहों पर द्विनाभित हैं, जिससे वह केवल मुस्लिम और अन्य पिछड़ा वर्ग ही देख सकते हैं। नवीन पटनायक विद्वान और विवेकी होने से उनके पास विजन हो सकती है, लेकिन अब तक वह उसे किसी को इस लायक नहीं समझते कि उसके साथ साझा कर सकें। मायावती अपनी और हाथियों की मूर्तियों के आगे नहीं देख पातीं और ममता बैनर्जी को ‘कलर ब्लाइंडनेस’ है, जिसकी वजह से उन्हें केवल लाल रंग ही दिखता है।

अल्पसंख्यकों, जातियों, जनजातियों, वर्गों और आप जो भी उसमें जोडऩा चाहें, उसने भारत को जटिल आरे में तब्दील कर दिया है। ‘बांटों और राज करो’ के बारे अंग्रेज हम से बहुत कुछ सीख सकते थे। आर.एस.एस, हिन्दुत्व और रामजन्मभूमि के ऐतिहासिक बैगेज के साथ हमारे पास भाजपा है और पार्टी को वोट करने से रोकने के काफी कारण हैं। लेकिन इस बार भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को जोड़ दिया है।

भारत ने अपने नेताओं को उनकी वक्तृत्व-कला कौशल के आधार पर चुना है। यह विश्व में अधिसंख्य देशों की सच्चाई है। नेहरू, शास्त्री, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। बेहतरीन वक्ताओं को जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है, चाहे उनमें प्रशासनिक कौशल हो या न हो। वही भारत में हो रहा है और मोदी भारत में आज सर्वश्रेष्ठ राजनीतक वक्ता हैं। तथ्यों की ओर ध्यान दें। वह चाहे दिल्ली के कॉलेज में बोले हों या किसी इंडस्ट्री की बैठक में अथवा किसी मीडिया सम्मेलन में, सारे श्रोताओं ने हमेशा मगन होकर पूरे ध्यान से मोदी को सुना है।

आज केवल मोदी ही ऐसे नेता हैं, जिनमें ऐसे सवाल उठाने का भी साहस है, जिन्हें अन्य राजनीतिक दल नजरअंदाज कर दिया करते हैं। इसके लिए लोगों ने उनकी ओर ध्यान देना शुरू किया। उन्हें धर्मनिरपेक्ष नहीं माना जाता क्योंकि वह हिन्दू होने में गर्व अनुभव करते हैं और संविधान में किए गए प्रावधानों और देश के कानूनों से उपलब्ध होने के अतिरिक्त वह किसी धार्मिक समूह (हिन्दुओं सहित, एक सच्चाई जिसे मुश्किल से कभी रिपोर्ट किया गया) को खैरात या छूट नहीं देते। उनका विश्वास है कि इससे देश का सामाजिक तानाबाना कमजोर होता है और विकास ही सब की बराबर समृद्धि की गारंटी है।

भारत के इतिहास में किसी दंगे के बाद किसी नेता ने इतनी छानबीन का सामना नहीं किया है जितना की मोदी को करना पड़ा और अपराधी घोषित होने की बात तो बहुत दूर की है, उन्हें तो अभी चार्जशीट भी नहीं किया गया है। इस सच्चाई के बाद कि 2002 के बाद से गुजरात में उनके शासन में कोई हिन्दू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ, भाजपा को पिछले साल विधानसभा चुनावों में 17 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले, पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं के गढ़ में आठ में से पांच सीटें जीतीं, असम, उ.प्र. और बिहार के मुसलमानों की तुलना में गुजरात में औसत मुसलमान आर्थिक रूप से बेहतर स्थिति में होने के बावजूद उन्हें साम्प्रदायिक कहा जाता है। व्यक्तिगत और जनप्रतिनिधि के तौर पर, दोनों प्रकार से उनकी ईमानदारी असंदिग्ध है। मोदी के पास भविष्य के लिए दृष्टि है और एक रोडमैप है। गुजरात में उन्होंने दिखा दिया है कि वह अपने विजन को क्रियान्वित कर सकते हैं।

भाजपा के एक नेता के पास हमें पांच साल का स्थायी शासन देने का बेहतरीन अवसर होता है। मोदी भाजपा में सबसे बड़े कद के नेता हैं। यह पूरी तरह से सरल है। उन्हें मौका दिया जाना चाहिए, क्योंकि देश को उनकी जरूरत है। यदि हम इस राजनीतिक मॉडल को अस्वीकार कर देंगे, तब मोदी या भाजपा के पास वापस राम मंदिर आन्दोलन किस्म की साम्प्रदायिक राजनीति करने के अलावा कोई चारा नहीं होगा और कांग्रेस को सड़ांध बढ़ाने के सभी अवसर मिलेंगे।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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