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मध्यप्रदेश में अपनों से ही जूझ रहे हैं प्रमुख दलों के प्रत्याशी

2014 के लोकसभा चुनाव अलग हैं। इन चुनावों में न तो स्थानीय मुद्दे हैं और न ही स्थानीय नेता। सबसे बड़ा मुद्दा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी हैं। भाजपा नेतृत्व ने नरेन्द्र मोदी की मर्जी से ही सारे फैसले लिए हैं। न तो बुजुर्ग नेताओं को टिकट दिए हैं, और न हार की संभावना वाले वर्तमान सांसदों को दुबारा मैदान में उतारा है।

पहले चरण में 10 अपै्रल को प्रदेश में महाकौशल-विंध्य की 9 सीटों पर मतदान होना है। लिहाजा, यहां प्रचार अभियान भी जोर पकडऩे लगा है, लेकिन यहां की लगभग सभी सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों को भीतरघात का डर भी सता रहा है। कहीं पार्टी के पदाधिकारी खुलकर विरोध कर रहे हैं, तो कहीं छिपकर विरोध करने लगे हैं। ऐेसे नेता अपने ही प्रत्याशी की रणनीति पर पानी फेरने का काम कर रहे हैं।

सबसे ज्यादा अंतर्कलह होशंगाबाद-नरसिंहपुर में है। कांग्रेस के होशंगाबाद जिला उपाध्यक्ष पीयूष शर्मा को भाजपा प्रत्याशी राव उदयप्रताप सिंह ने अपनी एक सभा में माला पहनाकर भाजपा में शामिल कर लिया, लेकिन भाजपा जिला इकाई होशंगाबाद के अध्यक्ष और कार्यकारिणी को यह बात रास नहीं आई। उनके इस्तीफे की पेशकश और बढ़ते विरोध को देखकर अंतत: भाजपा प्रदेश नेतृत्व ने कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष का भाजपा में प्रवेश रोक दिया। वहीं राव उदयप्रताप सिंह को प्रत्याशी बनाए जाने से नरसिंहपुर जिले के कई वरिष्ठ भाजपा नेता नाखुश हैं। कांग्रेस का आलम भी यही है। पार्टी के कई नेता पड़ोसी संसदीय क्षेत्रों में चले गए हैं। होशंगाबाद कांग्रेस जिला उपाध्यक्ष वैसे ही अब न तो कांग्रेस के नेता रहे और न भाजपा के।

बालाघाट में भाजपा, कांग्रेस के उम्मीदवारों को आक्रामक प्रचार शुरू करने से पहले अपनों को साधने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है। कांग्रेस प्रत्याशी हिना कांबरे का वारासिवनी में पार्टी कार्यकर्ता सड़क पर उतरकर विरोध कर चुके हैं। भाजपा में भी पहले टिकट को लेकर रही ऊहापोह के बाद अब आपसी तालमेल बैठाने का काम किया जा रहा है। ‘आप’ प्रत्याशी को भी अपनों से ही डर है। दरअसल, शुरूआत से जो लोग आम आदमी पार्टी का झंडा लिए और टोपी पहने घूमते थे, टिकट वितरण के बाद पार्टी प्रत्याशी उत्तमकांत चौधरी का सड़क पर विरोध जताकर, उन्होंने खुद को अलग कर लिया है।

जबलपुर सीट पर भी दलों को भीतरघात का डर सता रहा है। पाटन से विधानसभा चुनाव हारने के बाद पूर्व मंत्री अजय विश्नोई यहां से टिकट मांग रहे थे। टिकट न मिलने से नाराज विश्नोई को चुनाव प्रबंधन का काम सौंपकर सतना भेज दिया गया है। माना जा रहा है कि भाजपा ने भीतरघात के डर से ऐसा किया है। वहीं कांग्रेस ने भी सभी दावेदारों को दरकिनार कर विवेक तन्खा को टिकट दी है। इससे पार्टी के कई पुराने दिग्गज नेता नाराज बताए जा रहे हैं। हालांकि तन्खा का विरोध खुलकर किसी ने नहीं किया है, लेकिन कई नेता प्रचार में दिखाई नहीं दे रहे हैं।

छिंदवाड़ा के महाकोशल क्षेत्र की सीट पर दोनों ही दलों में अब तक अंतर्कलह जैसी कोई बात सामने नहीं आई है। बताया जाता है कि दोनों ही दलों के नेता पहले से ही मानकर चल रहे थे कि टिकट किसको मिलेगी। भाजपा में जरूर एक-दो नेता चुनाव प्रचार में सक्रिय नहीं दिख रहे हैं, लेकिन पार्टी इससे इनकार करती है।

मंडला से पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनाव से टिकट मांग रहे पूर्व भाजपा विधायक शिवराज शाह चुनाव को लेकर उत्साहित नजर नहीं आ रहे हैं। वे भाजपा प्रत्याशी फग्गन सिंह कुलस्ते के प्रचार अभियान में भी दिखाई नहीं दे रहे हैं। ऐसी स्थिति कांग्रेस प्रत्याशी ओंकार मरकाम के साथ भी है। डिंडौरी जिले के पार्टी पदाधिकारी खुलकर उनका विरोध कर चुके हैं। उन्होंने प्रत्याशी पर कई आरोप लगाते हुए सोनिया गांधी तक को पत्र लिखा है।

शहडोल सीट पर भी दोनों ही दलों के प्रत्याशियों की रणनीति पर उनकी ही पार्टी के लोग पानी फेर रहे हैं। भाजपा में तो इस हद तक अंतर्कलह बढ़ गया है कि पार्टी के झंडे लगाने के लिए ठेकेदार की जरूरत पड़ रही है। बताया जाता है कि यहां लोकसभा चुनाव प्रभारी, उप प्रभारी और प्रत्याशी दलपत सिंह परस्ते तीन खेमों में बंट गए हैं। भारतीय जनता युवा मोर्चा भी प्रत्याशी व चुनाव व्यवस्था संभाल रहे पदाधिकारियों से खिन्न हैं। दूसरी ओर कांग्रेस में इस बार ऐसी अंतर्कलह है कि कुछ नेता अंदर ही अंदर भाजपा का प्रचार करने में लगे हैं। हालांकि कांग्रेस प्रत्याशी राजेश नंदिनी सिंह इस बार अपनी बेटी के साथ खुद डोर-टू-डोर प्रचार में जुटी हैं, लेकिन पार्टी के ही कुछ लोग उनकी रणनीति में अडंग़ा लगा रहे हैं।

सतना में भाजपा और कांग्रेस, दोनों में ही असंतोष नजर आ रहा है। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने अजय सिंह राहुल का विरोध करते हुए पार्टी से मुंह फेर लिया। प्रत्याशी की घोषणा के बाद युवक कांग्रेस शहर अध्यक्ष विजय तिवारी ने पार्टी छोड़ दी। वहीं पूर्व में सईद अहमद की दावेदारी प्रबल मानी जा रही थी, लेकिन अजय सिंह को टिकट मिलते ही इनकी भूमिका क्षेत्र में नजर नहीं आई, अब तक इन्हें अजय सिंह के समर्थन में क्षेत्र में प्रचार करते नहीं देखा गया। वहीं भाजपा के गणेश सिंह के प्रति रामपुर बाघेलान से भाजपा विधायक हर्ष प्रताप सिंह का विरोध जगजाहिर है। महापौर पुष्कर सिंह की भी भूमिका कुछ हद तक संदेहास्पद नजर आ रही है। पिछले दिनों क्षेत्र में आए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हर्ष प्रताप सिंह व पुष्कर सिंह को बुलाकर पार्टी के पक्ष में काम करने की हिदायत दी थी।

रीवा से भी कांग्रेस प्रत्याशी सुंदरलाल तिवारी और भाजपा प्रत्याशी जनार्दन मिश्रा के सामने पहली चुनौती अपनों से ही निपटने की है। कांग्रेस खेमे में अंतर्कलह सतह पर तो नहीं आया, लेकिन विंध्य के प्रमुख दो घरानों में से एक अमहिया घराने से प्रत्याशी होने को लेकर अंदर ही अंदर कार्यकर्ताओं में भी असंतोष की भावना है। लगातार दो लोकसभा चुनाव हारने के बाद तीसरी बार उन्हें टिकट मिला है, इसका भी गुस्सा कार्यकर्ताओं में है। कांग्रेस में सुंदरलाल को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद पूर्व कांग्रेसी नेता एवं रीवा महाराज पुष्पराज सिंह ने तो पार्टी ही छोड़ दी। भाजपा में अंतर्कलह इससे भी ज्यादा है। सेमरिया के पूर्व विधायक अभय मिश्रा नाराज चल ही रहे हैं। वहीं गुढ़ विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक नागेन्द्र सिंह हर हाल में उप चुनाव चाह रहे हैं। वहीं मौजूदा विधायक पर जातीय समीकरण को लेकर कांग्रेस के साथ जाने की अटकलें लगाई जा रही है। जातीय समीकरण भी दोनों दलों के नेताओं और पदाधिकारियों को विद्रोह करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

कुल मिला कर चुनावी तस्वीर बताती है कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही भीतरघात से जूझ रही हैं। सीधी और सिंगरौली जिले के भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रचार करने से कन्नी काट रहे हैं। टिकट न मिलने से निवर्तमान सांसद गोविन्द मिश्रा नाराज चल रहे हैं। उनके साथ टिकट के अन्य दावेदार रीति पाठक का प्रचार नहीं कर रहे हैं। बताया जाता है कि पार्टी के कुछ नेता तो अपने ही उम्मीदवार को हराने के लिए जाल बिछा रहे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी इन्द्रजीत कुमार को भी पार्टी में विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इन्द्रजीत को टिकट मिलने के बाद कांग्रेस के पूर्व मंत्री वंशमणि वर्मा के साथ कई नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं। अजय सिंह को यहां से टिकट न मिलने के कारण उनके समर्थक भी नाराज हैं।

भोपाल से अरूण रघुनाथ दीक्षित

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