ब्रेकिंग न्यूज़ 

भाजपा २१ से २२ सीटें जीतेगी: येदियुरप्पा

‘पद हो या ना हो, मैं अपने तरीके से अधिकतर सीटों पर भाजपा को जिताने और नरेन्द्र मोदीजी को प्रधानमंत्री बनाने में योगदान करूंगा। यह नियति का इशारा है कि हम अपने एतिहासिक राष्ट्रीय कर्तव्यों की पूर्ति करें’ – पूर्व मुख्यमत्रीं बी.एस. येदियुरप्पा की उदय इंडिया के विशेष संवाददाता, एस.ए. हेमंत के साथ फोन पर हुई चर्चा के कुछ अंश।

येदियुरप्पा कर्नाटक के शिमोगा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं और उनके खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय एस. बंगरप्पा और प्रसिद्ध कन्नड़ नायक स्वर्गीय डॉ. राजकुमार की बहू गीता शिवराजकुमार हैं। चुनाव जीतने की कला में माहिर होने के बावजूद, येदियुरप्पा ने विनम्रतापूर्वक कहा – ”न मैं अपने विरोधियों को कभी कमजोर समझता हूं और न ही मैं उन्हें अवमानना के साथ देखता हूं। वे सभी मेरे सम्मान के पात्र हैं। मैं गत पांच दशकों से सार्वजनिक जीवन में हूं। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि दो चुनाव एक जैसे नहीं होते और हर चुनाव एक चुनौती की तरह होती है। वहां आत्मतुष्ट या अधिक आश्वस्त होने का कोई सवाल ही नहीं है। मैं सब कुछ अवसर के भरोसे नहीं छोड़ता।’’ उन्होंने जनता को सर्वोच्च मानते हुए कहा – ”अंतत: जनता ही मालिक है। वही निर्णय करेगी कि क्या करना चाहिए।’’

क्या भाजपा में वापसी से आप घुटन महसूस कर रहे हैं? अपने इस कदम से शायद आप खुश नहीं हैं?

नहीं, ऐसा नहीं है। मैं अपने घर में हूं। हां घर छोडऩे का दुख तो रहेगा, लेकिन अतीत को भूल जाना ही बेहतर होगा। भाजपा में वापसी का निर्णय मैंने सोच समझ कर लिया है। नियति यही चाहती थी कि मैं मोदीजी के लिए काम करूं, इसलिए फिर से मैं भाजपा से जुड़ गया। मैं इस बात से खुश हूं कि मैं अपने तरीके से योगदान दे रहा हूं। अपने खुद के निर्वाचन क्षेत्र शिमोगा के अलावा मैं लगभग 16 अन्य लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव प्रचार कर रहा हूं।

आपको कोई पद क्यों नहीं मिला?

क्या फर्क पड़ता है? पद हो या ना हो, मुझे लोगों और कार्यकर्ताओं द्वरा सकारात्मक उतर मिल रहे हैं। पद नहीं मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं आम लोगों, किसानों और दलितों के बीच का आदमी हूं और मेरे लिए इतना ही बहुत है।


मोदी-लहर के बावजूद, अनंत कुमार की कांटों भरी राह


वर्ष 1996 में साउथ बंगलुरू से शुरू किए गए अपने 18 साल के राजनैतिक सफर में शायद पहली भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ये मुश्किलें पार्टी के अंदरुनी और बाहरी, दोनों तरफ से आ रही हैं। अनंत कुमार के खिलाफ कांग्रेस की तरफ से आईटी क्षेत्र के महारथी नंदन निलकेणी खड़े हैं, जिन्हें कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने व्यक्तिगत रूप से चुना है। इस तरह हाईकमान ने कांग्रेस की राज्य ईकाई के साथ-साथ जिला ईकाई, ब्लॉक ईकाई, कॉपोरेटर्स सहित दक्षिणी बंगलुरू जिले के विधायकों और मंत्रियों को निलकेणी की जीत सुनिश्चित करने का सांकेतिक संदेश दिया है।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया – ”अनंत कुमार की अप्रत्याशित जीत कांग्रेस के हमारे विधायकों और कॉरपोटरों द्वारा विभिन्न कारणों से सुनिश्चित की जाती रही है। एक तरह से अनंत कुमार हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों से गुप्त समझौता करने में कामयाब रहते थे। बदले में वे उन्हें विभिन्न प्रकार से मदद करते थे। लेकिन हमारे वरिष्ठ नेताओं ने महसूस किया है कि अब बहुत हो चुका और अब इस ‘काल्पनिक नेता’ को उसकी जगह दिखाना जरूरी है। कांग्रेस के हमारे सभी कार्यकर्ता, कॉरपोरेटर्स और विधायक हाईकमान की नाराजगी से बचने के लिए निलकेणी के पक्ष में बहुत उत्साह से काम कर रहे हैं। यही कारण है कि अनंत कुमार की मुश्किलें बढ़ गईं हैं।’’

जब उदय इंडिया ने सौ फिसदी साक्षर दक्षिण बंगलुरू के विशाल शहरी क्षेत्र के विभिन्न भाजपा पदाधिकारियों से बात की, तब कांग्रेस नेता की बातों की वास्तविकता और सच्चाई का पता चला। लेकिन, सबका मानना है कि इस बार भी जनता के बीच तीव्र और व्यापक मोदी-लहर के कारण अनंत कुमार चुनाव जीतने में सफल रहेंगे। आम तौर पर जनता का कहना है – ”इससे हम वाकिफ हैं कि भाजपा के मध्यम स्तर के बहुत-से पदाधिकारी अनंत कुमार से खुश नहीं हैं, लेकिन उनकी नाराजगी के बावजूद, मोदी की वजह से अनंत कुमार जीतने में सफल होंगे।’’ हालांकि वे आगे कहते हैं – ”इस समय जीतना मुश्किल होगा, लेकिन असंभव नहीं। अनंत कुमार के खिलाफ आम शिकायत यह है कि वे वैसे लोगों और कार्यकर्ताओं को अपने साथ रखें हुए हैं, जो महसूस कराते हैं कि वे राष्ट्रीय राजनीति में डूबे हुए हैं। उन्हें जमीन पर उतर आना चाहिए और आम लोगों तथा कार्यकर्ताओं से जुडऩा चाहिए।’’

अनंत एक गहरी राजनीतिक समझ वाले व्यक्ति हैं। अपने संसदीय क्षेत्र में कार्यकर्ताओं के साथ-साथ लोगों में पनप रहे असंतोष के प्रति अनंत कुमार को सचेत हो जाना चाहिए। यदि अनंत जीतते हैं तो इसका कारण मोदी होंगे। लेकिन अगर मोदी-लहर के बावजूद अनंत हार जाते हैं तो यह अनंत की अपनी करनी का फल होगा। यहां यह उल्लेख करना संदर्भ के बाहर होगा कि 1998 में यहां से प्रमोद महाजन चुनाव जीते थे और वाजपेयी सरकार में मंत्री बने थे, लेकिन 1999 के चुनाव में महाजन को भी हार का मुंह देखना पड़ा था। बाद में महाजन राज्यसभा से सांसद बनकर, मंत्री बने। तो क्या अनंत कुमार प्रमोद महाजन का अनुसरण करेंगे या एक बार फिर इस संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतेंगे, यह तो 16 मई की मतगणना से ही साफ होगा।


इस बार भाजपा को कितनी सीटें मिलने की संभावना है?

2009 में जब मैं मुख्यमंत्री था तब भाजपा को 19 सीटें मिली थी। राजनीति में व्यापक पैमाने पर क्षरण हो चुका है। मेरा उद्देश्य इन सभी 19 सीटों को बनाए रखने के साथ-साथ इसे आगे बढ़ते हुए हम 21-22 सीटें जीतेंगे। इसके लिए मैं अंत तक कोशिश करूंगा।

2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की करारी हार के साथ-साथ 111 विधानसभा सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई। किस आधार पर आप 21-22 सीटें जीतेंगे?

लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बारे में लोगों की अलग-अलग राय है। अब राष्ट्रीय मुद्दों की बात है। विधानसभा चुनावों में मुद्दे अलग थे। मैं एक उदाहरण देता हूं। 2004 में भाजपा ने नौ लोकसभा सीटें जीती थी और 79 विधानसभा सीटें जीत कर राज्य में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। अगर हम विधानसभा के साथ लोकसभा के चुनावी आंकड़ों का मिलान करें, तो यह पाएंगे कि लोकसभा की तुलना में विधानसभा में ज्यादा सीटें जीती गईं थीं। पर ऐेसा नहीं हुआ। विधानसभा चुनावों में भाजपा को वोट देने वाले लोग लोकसभा चुनावों की तुलना में ज्यादा थे। 1984-85 में श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद संपन्न चुनाव में लोगों ने कांग्रेस के 24 उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित कर दी। लेकिन मार्च 1985 में, ठीक छह महीने बाद आयोजित विधानसभा चुनाव में उन्हीं लोगों ने रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व वाली जनता पार्टी के पक्ष में वोट दिया और 136 सीटों की पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापस लाई। इसलिए मैं यह कहता हूं कि जनता काफी समझदार है। उसे पता है कि किसे वोट देना है और कब देना है।

श्रीराम सेना के प्रमुख प्रमोद मुतालिक के मामले में भाजपा ने एक बड़ी गलती की थी। बीदर और मांड्या में उम्मीदवारों के चयन को लेकर हिंसा के साथ गंभीर मतभेद भी हुए हैं। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

यह दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा होना नहीं चाहिए था। मेरा सबसे यही अनुरोध है कि सभी पुराने मतभेदों को भूलाकर देशहित में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने और मोदीजी को प्रधानमंत्री बनाने के बड़े लक्ष्य पर काम करें। यह राजनीति है और राजनीति में सबको संतुष्ट नहीं किया जा सकता। लेकिन हम असंतुष्टों की संख्या को कुछ हद तक कम जरूर कर सकते हैं। अंत में हम सभी को पार्टी के लिए काम करना है। हमारी पार्टी की संस्कृति में देश पहले आता है, उसके बाद पार्टी का   स्थान आता है। तीसरा एवं अंतिम स्थान स्वयं का होता है।

धनंजय कुमार, एम.डी. लक्ष्मीनारायण, बी.पी. हरीश जैसे समर्थकों ने आपका साथ छोड़ दिया। वजह क्या रही है?

वे जहां भी हैं मैं उन्हे शुभकामना देता हूं। उनकी दोस्ती मेरे लिए मूल्यवान है और अपने मुश्किल और खुशी के दिनों में उनके सहयोग और समर्थन के लिए मैं उनका आभरी हूं। जैसा कि मैने पहले कहा था कि कुछ बातों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। एक ही बार में सबको खुश करना मुश्किल है।

 

 трейдер mfxкак продвинуть сайт в гугле

Leave a Reply

Your email address will not be published.