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क्या है कांग्रेस का भविष्य?

कांग्रेस के भविष्य पर चर्चा देश के वर्तमान मूड के कारण है; कमोबेश धारणा यह है कि निष्क्रिय शासन और लकवाग्रस्त नीतियों से नाराज वोटर कांग्रेस को हराना चाहते हैं। किन्तु मुख्य विपक्षी दल भाजपा भी आसानी से सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। खंडित शासन को देखते हुए लगता नहीं है कि निर्णायक जनादेश किसी एक पार्टी के पक्ष में होगा। 2009 के चुनावों में कांग्रेस को 27 प्रतिशत और भाजपा को 19 प्रतिशत वोट मिले थे।

कांग्रेस यदि चुनाव हारती है तो क्या 2014 के चुनावों के बाद उसका अस्तित्व बचेगा? आशावादी ही विश्वास कर सकते हैं कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता में पार्टी ने अपना समय पूरा कर लिया है और वह विस्मृति में डूब जाएगी। जैसे कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में संकेत किया है कि आम तौर पर लोगों का विश्वास है कि कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे बुरा समय आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव थे। भाजपा के वृद्ध पुरूष आगे कहते हैं कि अगले लोकसभा चुनावों के ऐसे परिणाम आएंगे, जो कांग्रेस के लिए 1952 से इतिहास के सबसे खराब सिद्ध हों।

इसमें कोई शक नहीं कि पार्टी में उत्साह भंग होकर पहले से ही निराशा आ चुकी है। राहुल गांधी दीर्घकालिक राजनीति की बात कर रहे हैं, कुछ कांग्रेसी नेता पहले से ही हरीभरी चरागाह की तलाश करने लगे हैं और जिस प्रकार से वे अन्य दलों में शामिल हो रहे हैं उससे लगता है कि वे दीर्घकालिक राजनीति के लिए तैयार नहीं हैं।

आन्तरिक सूत्रों के मुताबिक यह आश्चर्यजनक है कि कांग्रेस भी अन्दर से विपक्ष में बैठने का मन बना चुकी है। वे जानते हैं कि कांग्रेस के लिए तीसरी बार जीतना लगभग असंभव है। वास्तव में 2009 में भी कांग्रेस को पहले से बेहतर, 200 से अधिक सीटें प्राप्त करने पर आश्चर्य था। कांग्रेस में आशावादी कहते हैं कि चुनाव हारना उस तरह से बुरा नहीं है और यह छिपा हुआ आशीर्वाद हो सकता है, क्योंकि युवा राहुल गांधी कांग्रेस का पूरी तरह से जीर्णोद्धार कर सकेंगे। उनका कहना है कि कांग्रेस तो पहले ही समाप्त हो सकती थी, लेकिन हर नाकामयाबी के बाद यह वापस आगे बढ़ी है। इंदिरा गांधी ने आपातकाल के बाद 1977 में सत्ता खो दी थी, लेकिन 1980 में जोरदार ढंग से वह फिर वापस आईं। 1991 में, राजीव गांधी की हत्या ने पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस की अल्पमत सरकार बनवाई। 1998 में जब कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भाजपा और अन्य दूसरे दलों में चले गए, तब सोनिया गांधी ने पार्टी संभाली और उसके बाद पार्टी का विघटन कम हो गया। 1999 में सोनिया गांधी ने पहली बार चुनाव लड़ा और वह विपक्ष की पहली नेता बनी। संयोग से 2004 से पूर्व ‘इंडिया शाइनिंग’ के बड़े-बड़े विज्ञापनों के आधार पर आम भविष्यवाणी की गई थी कि भाजपा सत्ता में वापसी करेगी और कांग्रेस अपनी चौथी शिकस्त की ओर बढ़ रही है और अन्तत: उसका विघटन हो जाएगा। फिर भी वह चुनाव जीत गई और वामदलों के समर्थन से उसने यूपीए-1 सरकार का गठन किया और वह लगातार दूसरी बार 2009 में फिर जीती। इसलिए आशावादी संतुष्ट हैं कि पार्टी के विलुप्त होने की भविष्यवाणी करना और 127 वर्ष पुरानी पार्टी के विस्मृति में चले जाने के सवाल का जवाब देना इतना आसान नहीं है।

कांग्रेस के भविष्य पर चर्चा देश के वर्तमान मूड के कारण है। कमोबेश धारणा यह है कि निष्क्रिय शासन और लकवाग्रस्त नीतियों से नाराज वोटर कांग्रेस को हराना चाहते हैं। किन्तु मुख्य विपक्षी दल भाजपा भी आसानी से सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। खंडित शासन को देखते हुए लगता नहीं कि निर्णायक जनादेश किसी एक पार्टी के पक्ष में होगा। 2009 के चुनावों में कांग्रेस को 27 प्रतिशत और भाजपा को 19 प्रतिशत वोट मिले थे। अन्तर केवल आठ प्रतिशत वोटों का था और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा इस अन्तर को पूरा करने वाली है।

दोनों गठबंधन – कांग्रेस नीत यूपीए और भाजपा नीत एनडीए सिकुड़ गए हैं और वे किसी गणित के पक्ष में भी नहीं हैं। यूपीए ने यूपीए-2 के दौरान दो मूल्यवान घटक – डीएमके और तृणमूल कांग्रेस खो दिए हैं और यूपीए-1 के कार्यकाल की समाप्ति के क्षणों में उससे वामदल छूट गए। एनडीए ने पिछले वर्ष भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को नामांकित करते हुए अपने सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी जेडी (यू) को खो दिया। दीर्घकालिक मित्रों – शिव सेना और अकाली दल के अतिरिक्त अब उसके साथ केवल छोटे सहयोगी दल रह गए हैं।

यदि मान लिया जाए कि एन.डी.ए. को 200 सीटें मिलने की चुनाव विश्लेषकों की भविष्यवाणी सही हो जाएगी, तो भी नए-पुराने मित्रों से एन.डी.ए. को 72 सीटों की दरकार होगी। मोदी की कट्टरवादी हिन्दुत्व की छवि से लगता है कि एन.डी.ए. को मुस्लिम मतदाताओं की नाराजगी के भय से नए मित्र मिलने मुश्किल होंगे। लेकिन चुनाव बाद के परिदृश्य में खेल भिन्न होगा, क्योंकि अधिसंख्य दल अपने पत्ते छाती से चिपकाए हुए हैं और उनमें से अधिसंख्य अवसरवादी राजनीति में विश्वास करते हैं। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि भाजपा यदि 200 से अधिक सीटें प्राप्त कर लेती है तो मोदी सरकार बनाने में सफल हो जाएं।

कांग्रेस भी आर.जे.डी. को छोड़ कर नए सहयोगी तलाश नहीं कर सकी है। यहां तक कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी पार्टी अकेली है। इतना ही नहीं, सोनिया गांधी का गिरता स्वास्थ्य और राहुल गांधी की मतदाताओं से असंबद्धता इन चुनावों में कांग्रेस की संभावनाओं को क्षीण कर रही है।

दूसरी तरफ क्षेत्रीय दलों का लगातार उदय दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए खतरा साबित हो रहा है। इस बात की भविष्यवाणी की जा रही है कि जयललिता (एआईएडीएमके), ममता बैनर्जी (तृणमूल कांग्रेस), नवीन पटनायक (ओडिशा) और मायावती (बसपा) जैसे प्रत्येक क्षेत्रीय नेता आगामी चुनावों में 20 से 30 सीटें प्राप्त कर लेगा। यदि कांग्रेस और भाजपा मिल कर आधी सीटें प्राप्त नहीं करते हैं तो ये क्षेत्रीय नेता मिल कर एक मोर्चा बना सकते हैं और सत्ता के लिए दांव लगा सकते हैं।

सोनिया गांधी द्वारा अपना स्थान राहुल गांधी के लिए खाली करने से पार्टी अब इस बात पर ध्यान केन्द्रित कर रही है कि वह किस प्रकार तीन अंकों वाले सम्मानजनक आंकड़े तक पहुंचे। कांग्रेस 2014 चुनावों में अपना बेहतरीन प्रयास कर सकती है, लेकिन उसने योजना-बी भी तैयार रखी है। इस योजना के तहत वह क्षेत्रीय क्षत्रपों से बनने वाले तीसरे मोर्चे का बाहर से समर्थन कर सकती है। अपने में निहित अन्तर्विरोधों के कारण यह सरकार एक-दो सालों से अधिक नहीं चल सकती, लेकिन कांग्रेस हर कीमत पर मोदी को सत्ता में आने से रोकना चाहेगी।

आईए, उन कारणों पर गौर करते हैं कि कांग्रेस के हारने का संदेह क्यों हो रहा है। पहला तो एंटी-इनकम्बेंसी यानी सत्ता विरोधी माहौल है। दूसरे कार्यकाल में किन्हीं प्रकार की अधिक उपलब्धियों के बगैर यूपीए तीसरा कार्यकाल चाहती है। इसलिए यदि कांग्रेस जीत जाती है, तो यह उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। कोई चमत्कार हो जाए, तो अलग बात है, नही तो कांग्रेस के लिए तिकड़ी जमाना लगभग असंभव लगता है।

दूसरे, भ्रष्टाचार आज चुनावों का मुख्य मुद्दा बन गया है। आम आदमी पार्टी और अन्ना हजारे के नेतृत्व में चले भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन ने मतदाताओं में भ्रष्टाचार-मुक्त सरकार के लिए जागरूकता पैदा कर दी है। यूपीए-2 ने घोटालों की श्रृंखला देखी, जो घोटाले हुए तो यूपीए-1 के कार्यकाल में, लेकिन यूपीए-2 के दौरान सामने आए।

इसके लिए पार्टी के पास केवल लोकपाल बिल पारित करने के लिए अपनी पीठ थपथपाने के अतिरिक्त कोई जवाब नहीं है। कांग्रेस इस के लिए भी आक्रामक है कि उसे भ्रष्टाचार विरोधी छह बिल नहीं लाने दिए गए, जो कि 15वीं लोकसभा की समाप्ति के वक्त लाए जा रहे थे।

तीसरी, और सबसे महत्वपूर्ण बात अर्थव्यवस्था की है, जो ठीक नहीं चल रही है। लोग बढ़ती कीमतों और आसमान छूती महंगाई से परेशान हो चुके हैं। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश भी घट गया है। विकास दर गिर कर 4.5 प्रतिशत पर आ गई है। मनरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसी कल्याणकारी योजनाएं अच्छे कदम थे, लेकिन उन्हें ठीक से क्रियान्वित नहीं किया गया। वे भी केन्द्र की वित्तीय चिन्ताओं को बढ़ाने वाली हैं। किसानों की आत्महत्याएं भी अलग चिन्ता का विषय है। निकट भविष्य में हालात सुधरते दिखाई नहीं दे रहे हैं। खराब अर्थव्यवस्था ने पहले भी सरकारों को गिराया है। न तो कांग्रेस और न ही अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के पास लोगों की चिन्ताएं हल करने के जवाब हैं।

चौथे, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल जैसे नए खिलाडिय़ों का उदय होना है। वे दोनों स्पष्ट खुल कर बोलने वाले हैं और कांग्रेस की खराब मार्केटिंग रणनीति के सामने वे खुद को और अपनी पार्टियों को प्रभावशाली ढंग से पेश कर सकते हैं। राहुल गांधी यूपीए-2 की उपलब्धियों का प्रचार करने में मोदी या केजरीवाल में से किसी के भी मुकाबले में नहीं हैं। ये नेता आक्रामक हैं, जबकि कांग्रेस रक्षात्मक है।

पांचवा, नेतृत्व का सवाल है। यदि कांग्रेस जीत जाती है, तो प्रधानमंत्री कौन बनेगा? 2004 में मतदाताओं ने सोनिया गांधी के लिए वोट दिया था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह मनमोहन सिंह को नियुक्त कर दिया। 2009 में मनमोहन सिंह को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था और उसे मध्यम वर्ग का समर्थन मिला था। इस बार पार्टी ने प्रधानमंत्री पद का कोई उम्मीदवार घोषित नहीं किया है, लेकिन फिर भी यह स्पष्ट है कि जीतने पर किसी और को नहीं, बल्कि राहुल गांधी को ही जैकपॉट मिलना है। यद्यपि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने में कोई रूचि नहीं दिखाई है, न ही पिछले दस सालों में मंत्री बनने में ही कोई इच्छा जताई है। नेतृत्व का यह खालीपन एक बड़ी समस्या बनता दिखाई दे रहा है।

छठा, गणित है, गठबंधन का गणित, जिसने 2004 और 2009 में यूपीए को सत्ता दिलाई थी। आज इसका अभाव पार्टी को बुरी तरह प्रभावित करेगा। यूपीए सिकुड़ चुकी है और उसके पास मुश्किल से चार या पांच सहयोगी हैं। यूपीए-2 ने दो प्रमुख सहयोगी दलों – डी.एम.के. और तृणमूल खोए हैं और दोनों की वापसी में कोई रूचि नहीं है। कांग्रेस छह बड़े राज्यों में एक साथ सक्रिय होने की कोशिश कर रही है। ये राज्य ही 2004 और 2009 में पार्टी को सत्ता में लाए थे। पार्टी में असन्तोष के कारण सत्ता में वापसी दुर्भाग्य से दूर दिखाई दे रहा है। कांग्रेस तीन चीजों पर निर्भर है। पहला, इन चुनावों में वह दलित दिखाई दे रही है, दूसरे उसे उम्मीद है कि 2009 की तरह मुसलमान उसे वोट करेंगे और तीसरे भाजपा की अंदरूनी समस्या में वह लाभ देख रही है, जहां भाजपा के सीनियर नेता टिकट वितरण के कारण मोदी से नाराज हैं।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने 2009 में 80 में से 22 सीटें जीती थीं। पार्टी को मुजफ्फरनगर दंगों के कारण हुए मतदाताओं के ध्रुवीकरण से बहुत नुकसान हुआ है। अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस की ओर जा सकते हैं, लेकिन इसके उलट वे भाजपा की ओर भी जा सकते हैं। बसपा भी मुस्लिम वोटों पर आंखें गड़ाए हुए है। बिहार में कांग्रेस की हालत बेहद खराब है। कांग्रेस को लोकजनशक्ति पार्टी – आर.जे.डी. संयोजन का लाभ मिल सकता था, लेकिन अब लोकजनशक्ति पार्टी ने एन.डी.ए. से हाथ मिला लिया है। इसलिए वहां गणित नहीं बैठता। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने 2009 में 33 सीटें जीती थीं। लेकिन अलग तेलंगाना राज्य के गठन के बाद अब वहां कांग्रेस पूरी तरह से उलझी हुई है। सीमांध्र में जगमोहन रेड्डी का बोलबाला है और तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) बड़े भाई की भूमिका में है। टी.आर.एस. अलग राज्य के गठन का सारा श्रेय खुद लेने का दावा कर रही है और उसने कांग्रेस के साथ विलय करने या गठजोड़ करने से इंकार कर दिया है। तमिलनाडु कांग्रेस के लिए उदासी भरी कहानी है। वहां 1967 के बाद से कांग्रेस कभी सत्ता में वापस नहीं आई और कभी एआईएडीएमके के साथ तो कभी डीएमके की कनिष्ठ सहयोगी के रूप में ही रही। अपने 15 प्रतिशत वोटों से कांग्रेस गठबंधन में अन्तर ला सकती है, किन्तु केवल उससे कुछ खास नहीं होगा। तृणमूल के अलग हो जाने के बाद से पश्चिम बंगाल भी उसी श्रेणी में आता है। ममता बैनर्जी ने कांग्रेस और सीपीआई-एम को कमजोर कर दिया। महाराष्ट्र में लोकसभा की कुल 48 सीटें हैं, लेकिन यदि कांग्रेस अपनी वर्तमान सीटें ही सुरक्षित रख ले, तो भी बड़ी बात है। गठबंधन की सहयोगी एनसीपी को कांग्रेस से बहुत शिकायतें हैं और दोनों पार्टियों में जमीनी स्तर पर काफी मतभेद है। यद्यपि राहुल अपने इंटरव्यू में दावा कर रहे हैं कि पार्टी इस बार 200 से अधिक सीटें जीतेगी, लेकिन अन्दरूनी सूत्रों के अनुसार, पार्टी अपनी हार स्वीकार कर चुकी है। इन सूत्रों का दावा है कि राहुल गांधी विपक्ष में बैठने को तैयार हैं और वह नेता प्रतिपक्ष बन कर विपक्ष में बैठेंगे, जैसे कि उनकी मां 1999 में और उनके पिता 1989 में बैठे थे। उनके सहयोगी दावा कर रहे हैं कि उन्हें जनता की साख मिलने की आशा है और वह अगले चुनावों के लिए अपनी उम्मीदवारी को मजबूत बना लेंगे। वास्तव में राहुल गांधी के 24 घंटे के वॉररूम में चुनावी रणनीति तैयार होती रहती है, लेकिन वे अगले चुनावों की ओर देख रहे हैं, वर्तमान चुनावों की ओर उनका अधिक ध्यान नहीं है। पार्टी ने मुख्य लोकसभा क्षेत्रों में कमोबेश वर्तमान सभी सांसदों को टिकट दिए हैं। कमजोर सीटों पर युवा उम्मीदवारों को उतारा है, जिससे वे कुछ चुनावी अनुभव प्राप्त कर सकें।

राहुल मंडली द्वारा जिस प्रकार का व्यवहार किया जा रहा है, उससे पार्टी के पुराने नेता अप्रसन्न है। युवा गांधी ने पहले ही अपनी टीम चुन ली है। जब किसी पार्टी में पीढ़़ी परिवर्तन होता है, तो हमेशा ऐसा ही होता है। राहुल की इस टीम में शामिल कुछ नेताओं के नाम सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश, मधुसूदन मिस्त्री, मोहन गोपाल, कुमारी शैलजा, प्रिया दत्त, मिनाक्षी नटराजन, पृथ्वीराज चव्हाण और सी.पी. जोशी आदि प्रमुख हैं। उन्होंने मधुसूदन मिस्त्री, दिग्विजय सिंह और शैलजा को हाल ही में राज्यसभा का टिकट देकर उनके हित सुरक्षित कर दिए हैं और यह सुनिश्चित कर लिया है कि वे पराजित न हों।

पार्टी के पुनर्गठन में राहुल का अर्थपूर्ण अनुभव अब तक बेकार ही गया है। पिछले एक दशक में पार्टी के मजबूत ढांचे की बात करते हुए न तो मां और न ही बेटे ने पार्टी के निर्माण में विशेष किया है। बिहार जैसे कुछ राज्यों में पार्टी अकेले चुनाव लडऩा चाहती थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बिहार में 2010 में और उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनावों में पार्टी के बेहद खराब प्रदर्शन ने पार्टी के पुनर्गठन पर सवाल खड़े कर दिए थे। राहुल गांधी ने नए लोगों को शामिल कर, अपनी कार्यशैली में कॉरपोरेट पुट लाकर और युवा कांग्रेस और एनएसयुआई को क्रियाशील कर पार्टी में आमूलचूल बदलाव लाने की कोशिश की थी, लेकिन उससे वांछित परिणाम नहीं आ सके। अन्तिम प्रयोग उम्मीदवारों के चयन के लिए यूएस जैसे प्रायमरी में जाने की भी आलोचना हुई और उसे तमाशा बताया गया, क्योंकि दिग्गजों के खिलाफ कोई भी प्रायमरी नहीं लडऩा चाहता था।

राहुल का विश्वास एक पार्टी के शासन में था। इसलिए वह गठबंधन के निर्माण में ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाए। उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि एक खंडित राजनीति में, केवल गठबंधन ही सत्ता में आने का मार्ग है। इस बार गठबंधन की सहयोगी पार्टियां कांग्रेस नीत गठबंधन को नीचे जाता देख कर, उसमें शामिल होने के बारे में खुद ही नहीं सोच रहीं।

फिर भी, सभी कठिनाइयों के बावजूद कांग्रेस के बचने और लड़कर वापसी करने की संभावना है। यदि कांग्रेस को 100 से कम सीटें मिलीं, तो उसके लिए चुनौती अधिक गंभीर है। लेकिन उम्मीदवारों की व्यक्तिगत ताकत शायद कांग्रेस को तीन अंकों तक पंहुचाने में सहायक हो सके। क्योंकि टिकटों का बंटवारा मोटे तौर पर ठीकठाक ही हुआ है। अन्तिम चरण में श्रीमती गांधी ने हस्तक्षेप कर कुछ सीनियर नेताओं को चुनाव लडऩे के लिए तैयार किया, हालांकि वे चुनाव लडऩे से हिचकिचा रहे थे।

ये चुनाव गांधी परिवार के लिए अग्नि परीक्षा होंगे। विडंबना यह है कि इतनी पुरानी पार्टी एकता के लिए गांधी वंश पर निर्भर कर रही है। 1998 में सोनिया द्वारा पार्टी का नेतृत्व संभालने से पहले कांग्रेस पार्टी गुटों में बंटी हुई थी। यदि कोई यह उम्मीद करता है कि 2014 के चुनावों में बेहद खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस में विभाजन हो जाएगा, तो उसे निराशा ही होगी, क्योंकि ऐसा कोई विश्वसनीय नेता नहीं है, जो गांधी परिवार के सामने खड़ा हो सके।

कल्याणी शंकर

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