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कांग्रेस और उसकी अंतर्निहित ताकत

कांग्रेस में वापसी करने की विशेष क्षमता है। इसलिए कांग्रेस के स्वाभाविक सुप्रीमो राहुल गांधी को भारत का प्रधानमंत्री बनने की संभावना से कोई भी व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता। साल 2014 भले ही उनके लिए अनुकूल न हो, लेकिन आने वाले वर्षों, खासकर 2019 में शायद ऐसा न हो।

दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) के अलावा, मुझे हर जगह यही सुनने को मिल रहा है कि इन आम चुनावों की 16 मई को होने वाली मतगणना में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार, भाजपा नीत एनडीए गठबंधन से बहुत पीछे रहते हुए, दूसरा स्थान प्राप्त करेगी। दरअसल, आईआईसी के अधिसंख्य मेरे मित्रों को पूर्ण विश्वास है कि ‘धर्मनिरपेक्ष दलों’ के सहयोग से यूपीए तीसरी बार भी सरकार बनाने में कामयाब होगी। उनके लिए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी राक्षस हैं। विभिन्न आंकड़ों के आधार पर उनका तर्क है कि मोदी के नसीब में वाराणसी से बुरी तरह हार लिखी है, अमृतसर से राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरूण जेटली अपनी जमानत बचाने में असमर्थ होंगे, लखनऊ से भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह थोड़े अंतर से हारेंगे और भाजपा 150 सीटों के आसपास सिमट जाएगी। विभिन्न पेशेवर एजेंसियों द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों की प्रामाणिकता पर वे लोग यह कहते हुए शंका जाहिर करते हैं कि इस चुनाव में मोदी के लाभ मिलने की बात उन कॉरपोरेट घरानों द्वारा प्रायोजित की जा रही है, जो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का समर्थन करते हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। आईआईसी का आधिकारिक प्रतिष्ठान मोदी को लेकर इतना संवेदनशील है कि उसने अपने परिसर में मोदी समर्थक किसी भी आयोजन करने की अनुमति न देने का फैसला किया हुआ है। हाल ही में आईआईसी में एक लेखक की मोदी के सकारात्मक उपलब्धियों पर प्रकाश डालने वाली एक किताब के विमोचन कार्यक्रम को अचानक इस दलील के तहत रद्द कर दिया गया कि यह पुस्तक संस्था और उसके लोकाचार को स्वीकार्य नहीं है।

भारत के चतुर राजनेताओं में से एक, केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के एक कथन के आधार पर मैं आगे बढ़ रहा हूं। उन्होंने कहा था कि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा 16वीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पीछे छोड़ती हुई सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। यहां तक कि केन्द्रीय वित्तमंत्री पी. चिदंबरम् ने भी कहा था कि आगामी चुनावों में कांग्रेस की स्थिति ठीक नहीं है। जैसा कि मैं ज्योतिष में बिल्कुल विश्वास नहीं करता, कोई भी व्यक्तिसौ फीसदी आश्वस्त नहीं हो सकता कि कांग्रेस हारेगी। लेकिन, पार्टी में बढ़ती आम सहमति बताती है कि इस बार कांग्रेस विपक्ष में बैठने जा रही है। यदि 16 मई को ऐसा होता है, तो इसमें कांग्रेस को निराश होने की जरूरत नहीं है।

एक आशंकित नुकसान के बावजूद, जैसा कि हमारी पत्रिका की आवरण कथा से प्रदर्शित होता है, कांग्रेस एक प्रमुख और राजनैतिक शक्ति बनी रहेगी। दूसरा, जो सबसे महत्वपूर्ण है, कांग्रेस न सिर्फ दुर्जेय हो सकती है, बल्कि संसद में एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाकर भारतीय लोकतंत्र को सजीव कर सकती है।

राजनीति शास्त्र का कोई भी विद्यार्थी यह जानता है कि किसी भी लोकतंत्र के संतुलित कार्य करने के लिए एक सशक्त और स्वस्थ्य विपक्ष की भूमिका आवश्यक है। सरकार की नीतियों और कार्य-प्रणाली पर तीखी नजर रखने वाले एक सतर्क विपक्ष की अनुपस्थिति में सत्तारूढ़ दल या तो आत्मसंतुष्ट और ढीला हो जाएगा या फिर मनमाना या निरंकुश। दूसरे शब्दों में कहें तो एक मजबूत विपक्ष की मौजूदगी तानाशाही की राह का रोड़ा होता है। सरकार द्वारा की गई गलती को हमेशा बेनकाब करने को तैयार और उसकी चूक सामने लाने के लिए हमेशा तत्पर, एक सर्तक विपक्ष यह सुनिश्चित करता है कि सत्तारूढ़ दल अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति लपरवाही न बरत पाए। इस संदर्भ में बेंजामिन डिजरायली ने कहा है कि ‘बिना मजबूत विपक्ष के कोई भी सरकार लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकती।’

इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध अमेरिकी राजनीतिज्ञ विज्ञानी रॉबर्ट डल का यहां उल्लेख करना प्रांसगिक है। उनके अनुसार, विपक्ष के मुख्यत: चार कार्य हैं – वैकल्पिक सरकार के गठन का अवसर, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर जनता की राय को प्रभावित करना, ताकि सत्तारूढ़ दल देश के मूलभूत हितों के प्रति उदासीन न हो, मतदाताओं को किए गए वादों को पूरा करने में विफलता को उजागर करना और बाहरी आक्रमण, आंतरिक सशस्त्र विद्रोह एवं जातीय हिंसा जैसी स्थितियों में देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए सरकार को पूरा सहयोग और समर्थन देना। मेरा मानना है कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत में कांग्रेस के अलावा कोई अन्य दल इस भूमिका को बेहतर ढंग से नहीं निभा सकता।

इस संदर्भ में दो बिंदु विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पहला, एक प्रभावी विपक्ष जिम्मेदारी निभाते हुए विकल्प का सुझाव देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह महत्वपूर्ण है कि एक विपक्षी दल, सिर्फ विपक्ष के नाम पर विरोध नहीं करता। उसकी आलोचना व्यावहारिक और जिम्मेदारीपूर्ण होती हैं। दूसरा, विपक्ष का काम सरकार के कार्यों में बाधा डालना नहीं है, उसका उद्देश्य आलोचना करना होता है। देश में सबसे लंबे समय तक सत्तारूढ़ दल होने के नाते अन्य दलों की अपेक्षा कांग्रेस इसे बेहतर तरीके से समझ सकती है।

इस पृष्ठभूमि में यह समझा जा सकता है कि ब्रिटेन में विपक्ष राजशाही का वफादार क्यों होता है। ब्रिटेन में विपक्ष का नेता सरकार के कार्यों पर नजर रखते हुए एक न सिर्फ सार्वजनिक प्रहरी की भूमिका निभाता है, बल्कि वैकल्पिक सरकार के मुखिया के लिए एक प्रधानमंत्री को प्रस्तुत कर वह मतदाताओं को चुनाव के लिए तैयार रखता है। यही कारण है कि ब्रिटीश विपक्ष का नेता हमेशा एक ‘सैडो कैबिनेट’ बनाए रखता है। हमारे यहां ‘सैडो कैबिनेट’ की प्रणाली नहीं है, लेकिन एक रचनात्मक विपक्ष के सिद्धातों का सार भारत में भी उतना ही सच है, जितना कि ब्रिटेन में।

संयुक्त राज्य अमेरिका में परिस्थितियां कुछ अलग हैं। अमेरिका में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच कई विपक्ष हैं, लेकिन उनका यह विरोध ब्रिटेन और भारत से बिल्कुल अलग है। कई बार दोनों दलों के कांग्रेसी, राष्ट्रपति के प्रस्तावों के खिलाफ एक साथ वोट देते हैं और उसके कार्यों का विरोध करते हैं, जबकि राष्ट्रपति उन्हीं में से एक दल से संबंध रखता है। यहां विपक्ष की भूमिका उन दो बड़े दलों द्वारा संयुक्त रूप से निभाई जाती है, जो कांग्रेस में सहयोग और प्रतियोगी की भूमिका निभाते हैं। हम भारत में उस परिस्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकते, जब कांग्रेस का सदस्य अपनी सरकार के खिलाफ खुलेआम मतदान करे या भाजपा का कोई सदस्य मनमोहन सिंह की नीतियों के समर्थन में वोट दे। वैसे ही यह अकल्पनीय है कि भाजपा के कुछ सांसद अपनी भावी सरकार की नीतियों के खिलाफ जाएंगे और कांग्रेस के सांसद भावी मोदी सरकार के नीतियों का समर्थन करेंगे।

एक अर्थ में भारतीय प्रणाली ब्रिटेन से अलग और अद्वितीय हैं। ब्रिटेन के विपरीत, जहां की राजनीति में दो दलों – लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी, का वर्चस्व है, हमारे यहां सैकड़ों पार्टियां हैं, जिसके कारण बढ़ती त्रिशंकु पार्लियामेंट की स्थिति देखने को मिल रही है। यह उल्लेखनीय है कि अब तक हुए सभी आमचुनावों में किसी भी सत्तारूढ़ दल को 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिले हैं। 50 प्रतिशत के नजदीक का आंकड़ा सिर्फ 8वीं लोकसभा चुनावों में देखने को मिला था, जब 1984 में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 49.6 प्रतिशत वोट मिले थे। जाहिर है कि उनकी मां की हत्या के कारण उपजी सहानुभूति की लहर में वह सत्ता पर काबिज होने में कामयाब हुए थे।

अन्यथा, आजादी के बाद से प्रचलित एक दलीय प्रणाली की प्रमुखता के तहत कांग्रेस सत्ता प्राप्त करती रही। इसमें भी वोट प्रतिशत में बड़ा अंतर दिखा, जब 1957 के आमचुनावों में 47.8 प्रतिशत और 1980 के आमचुनावों में 40.7 प्रतिशत मत कांग्रेस को मिले। भाजपा 1998 में 25.5 प्रतिशत और 1999 में 23.8 प्रतिशत वोट के साथ सत्ता में आई, जबकि कांग्रेस का वोट प्रतिशत 28.3 प्रतिशत था। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में कोई भी दल इस कड़वी सच्चाई को नजरअंदाज करते हुए इतना अभिमानी नहीं हो सकता कि भारत के सभी मतदाताओं द्वारा डाले गए वोटों के कारण उसे बहुमत की सरकार मिली है।

भारतीय चुनावों में दूसरी सबसे महत्वपूर्ण ध्यान देने वाली बात यह है कि 1989 में त्रिशंकु संसद तक तथ्य यह था कि सत्तारूढ़ दल को बहुमत प्राप्त होता था और सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के बीच वोटों का अंतर भी बहुत बड़ा होता था। हर चुनाव में कांग्रेस को 40 प्लस वोटों के प्रतिशत के खिलाफ सबसे बड़े विपक्षी दल – सोशलिस्ट पार्टी (विभिन्न नामों के तहत) को 1952 के आमचुनावों में 10.6 प्रतिशत और 1957 के आमचुनावों में 12.4 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। तत्कालीन संयुक्त वामदल को 1962 के आमचुनावों में 10 प्रतिशत, जनसंघ को 1967 के आमचुनावों में 9.4 प्रतिशत, कांग्रेस (ओ) को 1971 के आमचुनावों में 10.4 प्रतिशत, जनता दल को 1980 के आमचुनावों में 19 प्रतिशत और भाजपा को 1984 के आमचुनावों में 7.7 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। हकीकत यह है कि 1984 में संसद में कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी नई नवेली तेलुगुदेशम् पार्टी थी।

फिर भी, यह किसी करिश्मे से कम नहीं है कि इन चुनावों में वोट प्रतिशत के मामले में भाजपा को कांग्रेस की अपेक्षा बड़ी बढ़त हासिल होने वाली है। दोनों दलों के बीच सिंगल डिजिट का अंतर होगा। यह भी एक तथ्य है कि भाजपा की अपेक्षा कांग्रेस की उपस्थिति पूरे भारत में है और इसके वोट का प्रतिशत भाजपा की अपेक्षा ज्यादा होगा, फिर भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ सकता है, जैसा कि 1999 में हुआ। इस तरह कांग्रेस को सिर्फ एक विपक्षी दल नहीं कहा जा सकता। यह एक विशेष विपक्षी पार्टी होगी, जिसे भाजपा अपने जोखिम पर ही नजरअंदाज करेगी।

कांग्रेस में वापसी करने की विशेष क्षमता है। इसलिए कांग्रेस के स्वाभाविक सुप्रीमो राहुल गांधी को भारत का प्रधानमंत्री बनने की संभावना से कोई भी व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता। साल 2014 भले ही उनके लिए अनुकूल न हो, लेकिन आने वाले वर्षों, खासकर 2019 में शायद ऐसा न हो।

प्रकाश नंदा

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