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हम ध्रुवीकरण चाहते हैं लेकिन विकास के लिए : नकवी

लोकसभा चुनाव से पहले भले ही भाजपा मोदी लहर का राग गा रही हो लेकिन पार्टी में हाल ही में कई ऐसी घटनाएं हुईं हैं कि खुद पार्टी ही घिरती नजर आयी है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण मामला बाहरी लोगों को लाकर उन्हें टिकट देने का है। आरोप है कि इस वजह से पार्टी ने अपने प्रतिबद्ध नेताओं को भी नजरअंदाज कर दिया। आखिर सच क्या है? चुनाव मैनेजमेंट की कमान संभालने वाले भाजपा उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी से उदय इंडिया के कार्यकारी संपादक श्रीकान्त शर्मा की बातचीत के प्रमुख अंश:

चुनाव टिकट बंटवारे के बाद पार्टी पर आरोप लग रहे हैं कि बाहरी लोगों के लिए अपनों को ही ताक पर रख दिया गया है? क्या पार्टी के पास अच्छे कैंडिडेट की कमी थी क्या?

ऐसा नहीं है कि पार्टी के पास अच्छे कैंडिडेट नहीं है। पार्टी के पास एक सेएक जमीनी और प्रभावी नेता व कार्यकर्ता हैं। लेकिन चुनाव जीतने के लिए लड़ा जाता है और उसके लिए बाकायदा रणनीति बनानी होती है। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि कई बार पार्टी हित में कड़वा घूंट भी पीना पड़ता है। वैसे आपको बता दूं कि अब तक जो टिकट बंटे हैं, उनमें से 80 से 90 फीसदी टिकट पार्टी के लोगों को ही दिए गए हैं। बाकी जो बाहरी लोगों को टिकट दिए गए हैं, वे भी ऐसे नहीं कि उनकी छवि खराब है या फिर आरोपी हैं। ये सभी लोग बेदाग छवि के हैं और अगर वे अब बीजेपी की विचारधारा को अपनाने के लिए तैयार हैं तो उन्हें स्वीकार करने में क्या दिक्कत है। अगर ऐसे लोगों को टिकट देकर पार्टी जीत हासिल कर सकती है तो इस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह पार्टी हित का मामला है।

लेकिन ऐसे ही मामले में प्रमोद मुतालिक और साबिर अली को लेकर पार्टी को किरकिरी झेलनी पड़ी?

देखिए, मैं किसी का नाम तो नहीं लूंगा लेकिन मुझे मालूम है कि हमारी पार्टी सोच विचारकर फैसला करती है और अगर उसे गलती का अहसास होता है तो वह अपने फैसले पर पुनर्विचार भी करती है। वह कांग्रेस की तरह अडिय़ल नहीं है और ऐसी भी नहीं है कि अपनी गलती को सही ठहराने के लिए किसी भी हद तक चली जाए। लोग बीजेपी के इस नजरिए की तारीफ भी करते हैं।

यूपी में तो अब बीजेपी ने टीवी स्टार रही स्मृति ईरानी को ही उतार दिया है, क्या वे राहल गांधी को टक्कर दे सकेंगी?

क्यों नहीं टक्कर देंगी? हम नहीं चाहते थे कि राहुल गांधी को उसी तरह से वाक ओवर दिया जाए, जैसा दूसरे दल कर रहे हैं। इसी वजह से पार्टी ने बेहद सोच विचारकर ही स्मृति ईरानी के रूप में मजबूत उम्मीदवार को अमेठी से उतारा है। ऐसा भी नहीं है कि स्मृति ईरानी राजनीति में नई हैं, वे बीते 10-11 साल से पार्टी के लिए काम कर रही हैं और अब तक कई पदों पर काम कर चुकी हैं। ऐसे में उन्हें राजनीति से बाहर का नहीं माना जाना चाहिए।

वाराणसी से नरेन्द्र मोदी को उतारकर क्या बीजेपी राज्य में वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है?

हम ध्रुवीकरण चाहते हैं लेकिन दूसरे दलों की तरह किसी जाति या वर्ग के लिए नहीं बल्कि हमारा ध्रुवीकरण शुद्ध रूप से विकास के लिए है और एक भारत श्रेष्ठ भारत के लिए है। इस वक्त मोदी के पक्ष में धर्म, जाति की सीमाएं टूट चुकी हैं और अब पूरा देश इस बात पर एकजुट है कि देश को मोदी से विकास पुरुष की जरूरत है, जो देश को सशक्त नेतृत्व दे सके। कांग्रेस के लिए यह जरूर निराशा वाला है, क्योंकि उसका धर्मनिरपेक्षता वाला मुद्दा पूरी तरह से टूट चुका है।

तो क्या अब मंदिर मुद्दा पीछे रह गया है?

मंदिर हमारे के लिए चुनावी मुद्दा नहीं है। हमारे लिए चुनाव का मुद्दा विकास है और उसी पर हम फोकस कर रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि हम मंदिर या फिर हमारी विचारधारा से मेल खाने वाले मुद्दों को भूल चुके हैं। वह हमारी प्रतिबद्धता है लेकिन उसे चुनाव से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

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