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शैक्षिक सुधार और सामाजिक सदभाव

नरेन्द्र मोदी ने जो साहसपूर्ण निर्णय तथा नवाचार गुजरात में सफलतापूर्वक किए, वे सफल रहे हैं। सारे देश के लोग गुजरात जाते हैं, वे सोमनाथ, द्वारका का दर्शन करते हैं, लोगों से मिलते हैं, गीर के शेर को देखते हैं। वे सब आकर गुजरात की प्रशंसा करते हैं। राष्ट्र के सामने बहुत सारी समस्याएं हैं, लेकिन शिक्षा तथा सद्भाव स्थापित करना बाकी सभी समस्याओं के समाधान के लिए ठोस आधार प्रदान करता है।

2014 का चुनाव सम्भवत: पहला ऐसा अवसर है जब आनेवाली सरकार से अपेक्षाओं का अम्बार अप्रत्यशित ढंग से बढ़ा है और बढ़ता ही जा रहा है। आरोप-प्रत्यारोप किसी न किसी ढंग से हर चुनाव में उभरते हैं परन्तु पहले कभी भी इनका स्तर इतना नीचे नहीं गया जितना इस बार गया है। किसी एक व्यक्ति से उसके विरोधी कभी भी इतने आशंकित, भयाक्रान्त और दिशाहीन पहले कभी नहीं हुए जितना नरेंद्र मोदी से हुए हैं। यह भी अपने आप में एक अप्रत्याशित घाटना है कि नरेंद्र मोदी के विरोधी ही उनके समर्थन में आए जन सामान्य का संख्याबल लगातार बढ़़ा रहे हैं। दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद, मनीष तिवारी जैसे राजनेताओं के शब्द या अपशब्द और उनके चेहरे पर आने वाली हताशा मिश्रित भाव लोगों को नरेंद्र मोदी की तरफ मोड़ते हंै। मुझे सर्वाधिक आश्चर्य तब होता है जब यह प्रचार किया जाता है कि गुजरात में कोई विकास नहीं हुआ है, वह तो बहुत पीछे है। यह भी कहा जाता है कि गुजरात में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण इत्यादि के आंकड़े वहां का पिछड़ापन दिखाते हैं- कहने वाले यह कभी नही बताते हैं कि अन्य राज्यों में जहां उनके अनुसार सेक्यूलर सरकार है- क्या कुछ उपलब्धियां गिनाने लायक है। उत्तर प्रदेश के आजम खान जैसे नेता खुले आम घोषित करते हैं कि गुजरात में पन्थिक सदभाव तथा 2002 के बाद सांप्रादायिक दंगे न होना ‘भय के वातावरण’ का परिणाम है। वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य में यह वो लोग हैं जो देखकर न देखने का बहाना करते है, सच सुनकर न सुनने का स्वांग भरते हैं। यह अलग तथ्य है कि मोदी की लहर इनके दलों में झंझावात और मन मस्तिष्क में तूफान पैदा कर रही है।


सुपरपॉवर बना सकते हैं मोदी


नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के सबसे अधिक लोकप्रिय और सकारात्मक सोच के काबिल उम्मीदवार हैं। भारत की जनता को उनके बहुत उम्मीदें हैं। देश का प्रधानमंत्री बनने की चाह में जो भी नेता नरेन्द्र मोदी के सामने खड़े हैं, उनमें से कोई भी नेता उनके सामने नहीं ठहरता। फिर चाहे देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने की बात हो या फिर ईमानदारी की बात, नरेन्द्र मोदी सभी मापदंडों के आधार पर सभी नेताओं से आगे हैं। आजकल जो भाई-भतीजावाद चल रहा है, मोदी उससे कोसों दूर हैं। उनके विरोधी उन्हें कुछ भी कहते रहें, लेकिन उन पर भ्रष्टाचार के इल्जाम सहित अन्य कोई भी आरोप नहीं लगा पाया है। नरेन्द्र मोदी को राज्य में सुशासन देने का बहुत तजुर्बा है। उन्होंने गुजरात की बागडोर संभाल कर उसे देश के सभी राज्यों की तुलना में सबसे आगे कर दिया है। यही उम्मीद देश हित में हर भारतीय उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत को विश्व में सबसे आगे ले जाकर एक सुपर पॉवर बनाने की करता है। किसी भी देश की तरक्की के लिए धन की आवश्यकता होती है। धन मजदूरों या किसानों से एकत्र नहीं किया जा सकता। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री पद की चाह रखने वाला कोई भी नेता या राजनीतिक दल यह बताने के लिए तैयार नहीं कि देश की तरक्की के लिए आवश्यक धन वह लाएगा कहां से। कोई भी देश के खजाने में धन की आमद के लिए टेक्स लगाने की जरूरत होती है। यह धन उद्योगपति ही मुहैया करा सकता है। नरेन्द्र मोदी भारत को सुपरपॉवर बनाने का विजन रखते हैं। वह प्रधानमंत्री बन कर इस देश की अर्थव्यवस्था मजबूत करेंगे। विश्व में भारत का गौरव बढ़ाएंगे। भारत का प्रधानमंत्री ऐसा होना चाहिए जो हर भारतवासी को रोजगार दे सके, मकान दे सके, हर भारतवासी सम्मान से जीवन यापन कर सके। किसी भी देश में कोई भारतवासी जाए तो उसे भारतीय होने के गौरव का अहसास हो सके। यह गौरव केवल नरेन्द्र मोदी ही दिलवा सकते हैं। यह जानकारी कम ही लोगों को होगी कि जहां अन्य राज्यों में सब्सिडी के लालच में उद्योग लगाए जाते हैं, लेकिन गुजरात में सब्सिडी देने की बजाय उससे टैक्स भी अधिक लिए जाते हैं, लेकिन फिर भी उद्योगपतियों की पहली पसन्द गुजरात है। वह इसलिए कि वहां उद्योग लगाने के लिए सपोर्ट मिलती है, उद्योगपति को परेशान नहीं किया जाता।

सुभाष त्यागी

                                                                अध्यक्ष, गोल्ड प्लस ग्रुप


भारतीय राजनीति में जाति, उपजाति, क्षेत्रयिता, साम्प्रदायिकता, तथा भेदभाव बढ़ाने वाले हर पक्ष का भंयकर दुरूपयोग जिन लोगों ने बिना हिचक या बिना किसी लाग लपेट के लगातार किया वे अपने को ‘सेक्यूलर’ कहते नही थकते हैं। इनके अनुसार जो भी प्राचिन भारत, भारतीय सभ्यता, भारत का ज्ञान सम्पदा का मानव विकास मे योगदान, भारतीय भाषाओं की ज्ञान गरिमा जैसे पक्षो का उल्लेख करता है, भारत माता के प्रति सम्मान प्रकट करता है, राष्ट्रीयता की आवश्यकता पर जोर देता है वह ‘साम्प्रदायिक’ है। यह वह लोग हैं जो मुलायम सिंह यादव, मायावती, नितीश कुमार को ‘घोर सेक्यूलर’ घोषित करते हैं और भूल जाते हैं कि इन्होंने जातीय आधार पर अपनी सारी राजनीति की है और समाज को सदा के लिए बांट दिया है। इस प्रकार की ओछी राजनीति के कराण उत्तर भारत के गांव गांव में सदियों से चला आ रहा सदभाव बिखर गया है। पंचायत तक के चुनाव में इसी कारण हिंसा का बोलबाल दिखाई देता है। इन्हें प्रेरणा कहां से मिली? उस कांग्रेस पार्टी से जो देश की सबसे पहले स्थापित हुई पार्टी है, जो स्वतंत्रता प्राप्ति का सारा श्रेय स्वयं को(या एक परिवार को) ही देना चाहती है। इसी दल ने स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रारंभिक वर्षों से ही ‘अल्पसंख्यक’ मुस्लिम समुदाय को अपनी तरफ एकजुट रखने के लिए साम्प्रदायिक समरसता में सेंध लगाना प्रारंभ किया। गांधी के सिद्धांतो, मूल्यों तथा सोच को पूरी तरह तिलांजलि देकर कांग्रेस ने ”कम्यूनल’’ और ”सेक्यूलर’’ की बहस जारी रखी, अनेक अन्य दलों को वही राह दिखाई। अभी भी 2014 में कोग्रेस तथा उसके सहयोगी यही चाहते हैं कि बहस साम्प्रदायिक बनी रहे, मुस्लिम समुदाय को मोदी के आने का भय दिखाकर अपनी ओर एकजुट कर लिया जाए और डुबती नैया फिर एकबार पार लग जाए। वे बार-बार गुजरात दंगो को याद करना तथा करवाना चाहते हैं मगर गोधरा पर पर्दा डालकर। वे 1984 की याद दिलाए जाने पर बिफर उठते है। वे भूल जाते हैं कि जब जब 2002 का गुजरात याद किया जाएगा 1984 अपने आप सामने आकर खड़ा हो जाएगा लोगों के सामने। जब जब 2002 के लिए नरेंद्र मोदी को अपराधी घोषित कर कठघरे में खड़ा करने का प्रयास होगा, लोगों को मोदी एक तरफ 1984 के राजीव गांधी तथा दूसरी तरफ 2013 के मुजफ्फरनगर के अखिलेश यादव खड़े दिखाई देंगे। 2014 के चुनाव में लोगों को यह दृश्य उस हर भाषण, वक्तव्य तथा प्रेस-वार्ता में दिखाई देता है जहां देश के जाने माने सेक्यूलर अपने चेहरे पर प्रयत्नपूर्वक लाए गए आक्रोश के साथ सांप्रदायिक ताकतों को समाप्त करने की शपथ लेते हैं। लोग यह भी देख रहे हैं कि दंगों और सांप्रदायिक ताकतों के ईर्द गिर्द मंडराने वाले नही चाहते हैं कि लोगों की मूलभूत दैनिक आवश्यक्ताओं पर कोई ठोस बहस हो। इस देश में पंथ निरपेक्षता हजारो साल से भारतीय संस्कृति का व्यवहारीक पक्ष रही है। उसमें दरार डालने का काम वामपंथियों तथा स्वघोषित सेक्यूलरिस्टों नें किया है। इस चुनाव में जनता के प्रति संवेदनशीलता का दृष्टिकोंण यदि वस्तुनिष्ठ ढंग से अपनाया जाता तो चर्चा शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक सदभाव को स्वीकार्य स्तर पर लाने को लेकर हो रही होती। चुनावी चर्चा अपनी धूरी से जान बूझकर हटा दी गई है। समाचार-पत्र भरे पड़े होते हैं स्तरहीन शब्दों में व्यक्तिगत आक्षेपों तथा उनके उत्तर-प्रत्युत्तर से। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लगातार यही सब बार-बार दिखा रहा है। लोग चाहेंगे कि उन्हें बताया जाय कि आज तक देश में लगभग आधे बच्चे कुपोषित क्यों हैं, करोंड़ों लोग भूखे क्यों सोते हैं, लाखों टन अनाज सड़ क्यों जाता है, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद उसे जरूरतमंद लोगों में वितरण क्यों नहीं किया जाता है? जो लोग 100 दिन में महंगाई खत्म करने की बात कहकर सत्ता में आए, वे इसका जवाब क्यों नहीं देते कि लगातार पांच साल तक महंगाई कैसे बढ़ती रही और वे सत्ता में रहकर भी किंकर्तव्यविमूढ़ कैसे बने रहे? दस वर्ष तक सत्ता में रही सरकार को बहस इस बात पर करने का साहस क्यों नहीं होता कि बिजली, पानी जैसी समस्याओं का उन्होंने कितना समाधान किया। वे क्यों निरीहता से इन समस्याओं को बढ़ते हुए देखते रहे। महंगाई, भ्रष्टाचार, अन्याय, हिंसा, सांप्रदायिकता, अविश्वास में असहाय होकर पिसते नागरिकों की सहायता किसने की? जन-प्रतिनिधियों की संपत्ति में पांच साल में जिस तेजी से वृद्धि होती रही, वैसे उनके चुनने वालों के साथ क्यों नहीं हुई?

अच्छे, सार्थक और सुनहरे भविष्य की परिकल्पना सभी परिवार करते हैं। उसके लिए चाहिए शिक्षा गुणवत्ता वाली शिक्षा और कौशल देने वाली उपयोगी शिक्षा। अगले प्रधानमंत्री से दलगत राजनीति से हटकर सबसे बड़ी अपेक्षाओं में प्राथमिकता से उभरेगी देश की शिक्षा-व्यवस्था में अमूलचूल परिवर्तन, सरकारी स्कूलों की साख को फिर से स्थापित करना।  सरकारें बदलीं, प्रधानमंत्री-मंत्री बदले, दल बदले लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता स्कूल से उच्चतम स्तर तक लगातार घटती ही रही, ठीक वैसे ही जैसे भ्रष्टाचार और राजनेताओं का जीवनस्तर और उनकी संपत्तियां बढ़ती रहीं हैं। समान स्कूल व्यवस्था जैसे नीतिगत प्रश्रों पर साहसपूर्ण एवं राष्ट्रहित तथा संविधान की अपेक्षाओं के अनुरूप निर्णय लेना कितना ही जटिल तथा कठिन क्यों न हो, समाधान निकालने की चुनौति स्वीकार करनी ही होगी। शिक्षा-व्यवस्था में लगातार बढ़ते निजी स्कूल, जो पब्लिक स्कूल कहे जा रहे हैं, अपनी मनमानी के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा के अधिकार के प्रावधानों में, जो 25 प्रतिशत स्थान प्रारंभिक स्तर पर वंचितों के लिए रखे गए हैं, उसके विरोध में यह निवेशक न्यायालयों में गए और पूरी ताकत के साथ गए। इन्होंने इस प्रावधान को व्यवहारिक रूप में किसी न किसी रूप में लागू न करने का हर संभव प्रयास किया। शिक्षा समाज को जोड़ती है, लोगों को बराबरी का हक और उसकी समझ देती है। लेकिन जब समाज शिक्षा व्यवस्था में विकृतियों को रोक नहीं पाता है, तब वही शिक्षा व्यवस्था समाज में वर्ग भेद का नया प्रकार पैदा कर देती है। यह हालात उच्च शिक्षा में भी उभर रहे हैं। निजी विश्वविद्यालय, मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय नियामक संस्थाओं से सांठ-गांठ कर विद्यार्थियों तथा उसके पालकों का आर्थिक शोषण करने में कोई कोर कसूर बाकी नहीं रखते हैं। नई सरकार को संस्थाओं की ही नहीं, उसके लिए बनी नियामक संस्थाओं की साख पुन: बनाने के लिए नई व्यवस्था करनी होगी। कौशल शिक्षा तथा व्यवसायिक शिक्षा के बड़े और विस्तृत फैलाव की आवश्यकता भी बड़ी चुनौती होगी। अध्यापकों के प्रशिक्षण संस्थान बड़ी संख्या में एक हास्यास्पद स्थिति में काम कर रहे हैं। सीबीएसई नें दो बार शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित की थी। पहली परीक्षा में 99 प्रतिशत शिक्षक असफल रहे और दूसरी परीक्षा में असफलता का प्रतिशत 98 था। क्या इस स्थिति में शिक्षा-व्यवस्था भारत की ज्ञान संपदा में अपेक्षित योगदान कर पाएगी?

शिक्षा केवल बोर्ड या विश्वविद्यालय स्तर पर प्रमाणपत्र ही नहीं देती है, वह संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास भी करती है। युवाओं को सीखने के साथ सहयोग की भावना, मानवीय मूल्य, सामाजिक समरसता, पंथिक सद्भाव, भाईचारा तथा संविधानिक मूल्यों के पालन के लिए तैयार करती है। सेक्यूलरिज्म के नाम पर जो परिवर्तन स्कूली शिक्षा में किए गए हैं, वह बच्चों को भारत की, विशेषकर प्राचीन भारत की सशक्त ज्ञानार्जन परंपरा से दूर रखता है। वामपंथी विचारधारा के पोषण के लिए भारत के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता रहा है। हर देश अपने बच्चों को अपने इतिहास, अपनी भाषा, परंपरा तथा ऐतिहासिक धरोहरों से परिचित कराता है। ऐसा करने के पीछे अंग्रेजों का अपना लक्ष्य था। आजादी के बाद राजनीतिक कारणों से कांग्रेस ने शिक्षा-व्यवस्था वामपंथियों को सौंप दी। वे आज भी उसका राजनीतिक उपयोग कर रहे हैं। भारत एक पंथनिरपेक्ष (धर्मनिरपेक्ष नही) देश है। संविधान के आमुख में यह शब्द इंदिरा गांधी ने 1976 में डाला था। सन 2002 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि सभी धर्मों का मूल तत्व बच्चों को पढ़ाना सेक्यूलरिज्म को मजबूत करेगा। बच्चे समानताएं जाने और जहां-जहां अंतर हैं, उनका आदर करना सीखें। मई 2004 के बाद की सरकार ने इसे भूला दिया। सांप्रदायिकता को जीवित और जागृत रखने में अपना भला देखने वालों ने सामाजिक सद्भाव बढ़ाने तथा पंथिक सद्भाव को मजबूत करने की संस्तुतियों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। मूल्यों की शिक्षा जैसी सर्वस्वीकार्य संकल्पना को भी निरस्त कर दिया। यह दोनों संस्तुतियां सामाजिक सद्भाव तथा मानवीय मूल्यों को अंतरर्निहित कर चरित्र निर्माण का रास्ता प्रशस्त करती है। चरित्रवान युवा जब देश संभलेंगे तब भ्रष्टाचार स्वत: ही समाप्त हो जाएगा।

लोगों को लगता है कि नरेन्द्र मोदी ने जो साहसपूर्ण निर्णय तथा नवाचार गुजरात में सफलतापूर्वक किए, वे सफल रहे हैं। सारे देश के लोग गुजरात जाते हैं, वे सोमनाथ, द्वारका का दर्शन करते हैं, लोगों से मिलते हैं, गीर के शेर को देखते हैं। वे सब आकर गुजरात की प्रशंसा करते हैं। राष्ट्र के सामने बहुत सारी समस्याएं हैं, लेकिन शिक्षा तथा सद्भाव स्थापित करना बाकी सभी समस्याओं के समाधान के लिए ठोस आधार प्रदान करता है। इसी आशा और अपेक्षा से अपनी दलगत प्रतिबद्धताओं से ऊपर उठकर लोग बड़ी आशा से एक कर्मठ, ईमानदार तथा संवेदनशील प्रधानमंत्री के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

जगमोहन सिंह राजपूत

 

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