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मोदी, मोदीत्व और महाभारत

कुल मिला कर अब तक की चुनावी तस्वीर बोलती है कि नई दिल्ली के सिंहासन पर शान से बैठने के लिए लोकसभा में जिस जादुई 272 के आंकड़े की जरूरत है, वह किसी एक दल या एक समूह अथवा गठबंधन विशेष को मिलता दिखाई नहीं देता।

नई दिल्ली के सिंहासन पर कब्जा करने के लिए राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों के एक दूसरे पर हमले जारी हैं। किसी का अपना खेमा पसन्द नहीं आता तो वह चहलकदमी करता हुआ दूसरे के खेमे में चला जाता है और वहां उठापटक मचते ही घायल हो कर गिरता पड़ता उस खेमे से ऐसे बाहर हो जाता है कि उसके लिए कोई राह नहीं बचती। देश में चारों ओर हड़कंप मचा है। चुनावी उत्तेजना के तापमान का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि एक-दूसरे पर आरोपों और प्रत्यारोपों के बाण फेंकते फेंकते टुकड़ों में काटने की धमकी देने पर उतरने लगे हैं। जबर्दस्त राजनीतिक उठापटक के बाद भी देश का चुनावी परिदृष्य ऐसा है कि प्रथम चरण के मतदान सिर पर होने के बावजूद यह बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं है कि एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के साथ 7 रेसकोर्स रोड की दौड़ में अन्य दलों के कौन से उम्मीदवार शामिल हैं।

देश के विभिन्न हिस्सों की बात करें तो उत्तर भारत में लोकसभा की कुल 162 सीटें हैं। इनमें से भाजपा पिछली बार 18प्रतिशत वोट शेयर के साथ 34 सीटें लेकर आई थी जो उसके 1999 के प्रदर्शन से तो 24 सीटें कम थीं लेकिन 2004 की तुलना में उसका वोट प्रतिशत (20.9 प्रतिशत) तो कम हुआ था लेकिन उसे 11 सीटें अधिक मिली थीं। दक्षिण भारत की 132 सीटों में से सर्वाधिक 62 सीटें लेने में कांग्रेस सबसे आगे रही थी और उसका वोट प्रतिशत भी 32.5 प्रतिशत रहा था। कांग्रेस का ग्राफ पिछले तीन चुनावों में दक्षिण भारत में लगातार बढ़ा है जबकि भाजपा की स्थिति पिछले तीन चुनावों में कमोबेश वही रही है और उसने 12 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 2009 में 20 सीटें जीती थीं। मध्यभारत-राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, चंडीगढ़, हरियाणा, दिल्ली की कुल 83 सीटों में से पिछली बार 2009 में कांग्रेस ने 43.7 प्रतिशत वोट लेकर सबसे अधिक 50 सीटें जीतीं और भाजपा को पिछले चुनावों से गिरते ग्राफ से उन चुनावों में 30सीटें मिली थीं। उसे 36.5 प्रतिशत वोट मिले थे। जबकि 2004 में जब भाजपा ने सत्ता से हाथ धोए थे तो उसे 43.2 प्रतिशत वोट और 58 सीटें मध्यभारत में मिली थीं। पूर्वी भारत के 10 राज्यों की कुल 88 सीटों में से भी कांग्रेस को सर्वाधिक 25 सीटें 1999 में मिली थीं जबकि भाजपा को पांच सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था।

पिछले चुनावों में स्थिति बेशक कुछ भी रही हो, लेकिन इस बार जब चुनावों की आहट सुनाई देनी शुरू हुई, तब से लेकर अब तक जितने भी चुनावी सर्वे हुए, चाहे जिस ने भी वे सर्वे किए या कराए, सबमें एक बात कॉमन थी। वह थी कि बेशक भाजपा या एनडीए सत्ता देने वाले 272 के जादुई आंकड़े को न छू पाए, लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा एकल राजनीतिक पार्टी के तौर पर और एनडीए एक गठबंधन के तौर पर सबसे आगे है। मोदी मौजूदा नेताओं में प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वाधिक पसंदीदा नेता हैं।

मोदी को पसन्द या नापसन्द तो किया जा सकता है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मोदी से केवल भाजपा का कार्यकर्ता या उनके समर्थक ही नहीं बल्कि देश का हर खासोआम कुछ विशेष उम्मीद रखने लगा है। मोदी को पसन्द किए जाने के ग्राफ की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के प्रशंसकों से की जाती है। इतना ही नहीं माना जाता है कि बड़े नेताओं को छोड़ दिया जाए तो पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का जो भरोसा जो इस मोदी में है, वह इंदिरा गांधी को भी नहीं मिला था। विकास के लिए किसी मॉडल विशेष की बात करने की बजाय अब तो देश की गिरती अर्थव्यवस्था से लेकर अन्तरराष्ट्रीय जगत में भारत के गौरव को बहाल करने तक की उम्मीदें भारत के लोग मोदी से बांधे हुए हैं।

मोदी केन्द्र में चुनावी आहट शुरू होने से पहले ही प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के लिए सक्रिय हो चुके थे। देश में लगातार घूम कर उन्होंने अपना विजन देशवासियों के समक्ष रखा। उन्होंने अपनी कार्यशैली देश के समक्ष रखी। अपनी दमदार छवि से उन्होंने समस्याओं के हल अपने तरीके से हल किए और उनमें वह सफल भी रहे। गोदरा कांड के बाद राज्य में हुए दंगों की प्रेतछाया से भी वह मुक्त हो चुके हैं।

मोदी की कार्यशैली और राजनीति हमेशा से आक्रामक रही है। वह बहुत ही नपेतुले ढंग से राजनीति की शतरंज पर चाल चलते हैं। चाहे संजय जोशी हों, या फिर केशुभाई पटेल, आक्रमकता के बाद उनके शब्दकोष से रहम का शब्द गायब हो जाता है। पूर्ण आत्मविश्वास के साथ अपने जीवन की स्क्रिप्ट में उन्होंने ‘किन्तु-परन्तु’ के शब्द शामिल ही नहीं किए हैं। अर्थव्यवस्था के लिए मोदी की नीति है कि उसे ईमानदारी और कुशलता से चलाया जाए लेकिन उसमें राज्य सत्ता का हाथ नहीं होना चाहिए। सरकार एक व्यापारी की तरह आर्थिक हानि-लाभ तोलने की बजाय व्यापारियों को बेहतर ढंग से उद्योग लगाने और उन्हें चलाने के लिए पूर्ण सुविधाएं जुटा कर दे।

संघ चुनावों में पर्दे के पीछे से ही अपना काम करता रहा है, लेकिन अपने जन्म से अब तक किसी भी चुनाव में पूरी तरह से खुल कर सामने नहीं आया है। इन चुनावों में तो लगता है उसने मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने की जिम्मेदारी खुद पर ले ली है। भाजपा के झगड़े निपटाने से लेकर, भाजपा की चुनावी नीति बनाने और उन्हें क्रियान्वित कराने तक में संघ सक्रिय दिखाई दे रहा है। इसी से संघ के कार्यकर्ता पूरी तरह से उत्साह में भरे हुए हैं। संघ को लगता है कि पहली बार उसकी मूल विचारधारा भविष्य में नई दिल्ली का मार्गदर्शन करेगी। लेकिन आज उसी संघ को मोदी की सफलता में दक्षिण भारत परेशानी का सबब लगता है, जहां मोदी का प्रभाव काम करता दिखाई नहीं देता।

कभी कभी सफलता के लिए श्रेय के अधिकारी पर फैसला करना मुश्किल हो जाता है। मोदी की सफलता में राजनाथ सिंह के संयम और सूझबूझ को भूलना शायद पार्टी अध्यक्ष के साथ अन्याय करना होगा। यह राजनाथ सिंह ही थे जो मोदी को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के मौके पर मोदी के समर्थन में चट्टान की तरह खड़े रहे थे। तत्कालीन अध्यक्ष नीतिन गडकरी के आर्थिक अनियमितताओं से घिरने पर राजनाथ सिंह ने बेहद कठिन समय में पार्टी का नेतृत्व संभाला था। राजनाथ सिंह यदि अब तक सूझबूझ से रणनीति पर नहीं चलते और प्रभावी ढंग से ठोस कदम नहीं उठाते तो विरोधी उस स्थिति का लाभ उठा सकते थे। वह दुबारा पार्टी के अध्यक्ष बने थे, लेकिन इस बार स्थितियां विकट थीं। मोदी को राजनाथ और जेटली जैसे ठोस साथियों की हमेशा जरूरत रहेगी।

कुल मिला कर अब तक की चुनावी तस्वीर बोलती है कि नई दिल्ली के सिंहासन पर शान से बैठने के लिए लोकसभा में जिस जादुई 272 के आंकड़े की जरूरत है, वह किसी एक दल या एक समूह अथवा गठबंधन विशेष को मिलता दिखाई नहीं देता। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा और एनडीए क्रमश: सबसे बड़ी पार्टी और सबसे बड़ा गठबंधन होगा। राजनीतिक पंडितों के अनुमान के अनुसार चुनावों के बाद लोकसभा की तस्वीर भी दिल्ली विधानसभा के परिदृष्य से अलग नहीं होगी। फर्क केवल इतना होगा कि चुनावों के बाद दिल्ली विधानसभा में तीन पार्टियां-भाजपा, आप और कांग्रेस थी और लोकसभा में तीन खेमे होंगे-एनडीए, यूपीए और गैर-भाजपाई व गैर-कांग्रेसी राजनीतिक दल। दिल्ली विधानसभा चुनावों में तो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के तौर पर उभरने के बावजूद भाजपा ने सरकार बनाने से परहेज किया था लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा यदि अकेली सबसे बड़ी पार्टी और सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरती है तो केन्द्र में सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मिलने वाले न्यौते पर मोदी की किस प्रकार की प्रक्रिया होती है और क्या किनारे खड़ी अवसरवादी पार्टियां मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए आगे आएंगी।

श्रीकान्त शर्मा

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