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नरेन्द्र मोदी होने का सच

नरेन्द्र मोदी का सच आज भारत का सच बन गया है। वे भारतीय जनमानस की राष्ट्रीय भावना के साथ एकाकार हो गए हैं। आन्ध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश या ओडीशा के विधानसभा चुनावों में जो लोग दूसरे राजनैतिक दलों के लिये कार्य कर रहे थे, वे भी अब लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी का समर्थक होनी की बात कर रहे हैं। इस चुनाव में मोदी फैक्टर ने राजनीति में एक नए धरातल की रचना की है। इस धरातल पर विभिन्न राजनैतिक दलों से निरपेक्ष होकर साधारण मतदाता मोदी के पक्ष में खड़ा नजर आता है।

पिछले दिनों सोनिया माईनो गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी ने अपने चुनाव प्रचार में दो अलग-अलग स्थानों पर दो अलग बातें कहीं। ऊपर से दोनों बयान एक दूसरे से असंबंधित लगते हैं, लेकिन भीतर से आपस में दोनों बहुत गहराई से जुड़े हैं। नरेन्द्र मोदी को लेकर पूरे भारत में जो लहर चल रही है, उसे लेकर सोनिया गांधी परिवार और उनकी पार्टी की असली चिंताओं को भी यह उजागर करती है। असम में सोनिया गांधी ने कहा कि सरकार चलाना और भारत का शासन चलाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। उनका संकेत था कि नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी को भारत का शासन चला लेने की अपनी इच्छा को त्याग देना चाहिए, क्योंकि यह उन के बस और योग्यता से बाहर की बात है। इससे कुछ दिन पहले हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में एक जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि नरेन्द्र मोदी के साथ सोनिया गांधी की पार्टी की लड़ाई व्यक्तियों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह विचारधारा को लेकर लड़ी जा रही लड़ाई है। राहुल गांधी ने जो कुछ भी कहा, वह बिल्कुल ठीक कहा है। आगामी लोकसभा के लिए जो लड़ाई लड़ी जा रही है, वह दो विभिन्न वैचारिक धरातलों पर खड़ी सेनाओं की लड़ाई है। इसमें एक धरातल तो भारतीय जनता पार्टी और उसके नेतृत्व में लामबंध हुई राष्ट्रवादी शक्तियों का है और दूसरा धरातल सोनिया गांधी और उनके शिविर में एकत्रित सेनानायकों का है।

सोनिया गांधी के शिविर का वैचारिक धरातल क्या है? इसका संकेत उन्होंने असम में अपने उस बयान में दिया है, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है।

सोनिया गान्धी ने जो कुछ कहा है, वह भारत के लोगों के बारे में पुरानी यूरोपीय धारणा को इंगित करता है। जब इस देश पर कब्जा करने के लिए पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज अपनी चालें चल रहे थे, तो जिस एक बात पर वे सहमत थे, वह यही थी कि भारतीय अपना शासन स्वयं चलाने के योग्य नहीं हैं। अन्तत: अंग्रेजों ने इस देश पर कब्जा कर लिया तो उन्होंने पाठ्यपुस्तकों में ही यह पढ़ाना शुरु कर दिया कि भारत का शासन चलाना बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए योग्यता चाहिए। वह योग्यता भारत के लोगों में नहीं है। दरअसल यह वैचारिक आधार कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड में तैयार हुआ था, जिसने प्रत्यक्ष तो ब्रिटिश साम्राज्यवादी चेतना को चिंत्रित किया था और परोक्ष रुप से इस ब्रिटिश साम्राज्यवादी चेतना में कहीं न कहीं सम्पूर्ण यूरोपीय साम्राज्यवादी चेतना भी प्रतिध्वनित होती थी। उस समय भी इस यूरोपीय वैचारिक धरातल को स्वीकारने वाले कुछ भारतीय उठ खड़े हुए थे, जिन्हें ब्रिटिश शासन तो रायबहादुर और रायसाहिब कहता था, लेकिन आम भारतीय ‘टोडी बच्चा’ कह कर हिकारत की नजर से देखता था। सोनिया गांधी के बयान से भी उसी यूरोपीय वैचारिक चेतना प्रतिबिम्बित होती दिखाई दे रही है। वे प्रकारान्तर से इस देश के लोगों से कह रही हैं कि ‘इस देश का शासन चलाना बच्चों का खेल नहीं है’ तो प्रत्युत्तर में उनसे पूछा जा सकता है कि फिर क्या यह इटली और वेटिकन वालों का है? इतालवी परिवार में ऐसी कौन-सी योग्यता है, जो वह भारत की गद्दी पर अपना दावा ठोंक रहा है? सोनिया गांधी ने एक और बात भी कही कि ‘यदि नरेन्द्र मोदी के कारण भाजपा का शासन आ गया, तो देश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। भारतीयों को ब्लैकमेल करने का यह भी पुराना यूरोपीय टोटका है। अंग्रेज शासक सदा ही यह कहते रहते थे कि यदि वे भारत छोड़ कर चले गए, तो देश टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। अंग्रेजों के साथ उन दिनों उनके रायबहादुर और रायसाहिब भी यही गीत गाया करते थे। आज भी सोनिया गांधी की पार्टी में उनका झंडा उठाए प्रमुख लोग यही चिल्ला रहे हैं। ब्रिटिश सरकार ने उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे लोगों को सबक सिखाने के लिए और अपने शासन को देर तक बनाए रखने के लिए मुस्लिम लीग की स्थापना करवा दी थी, जो स्वतंत्रता सेनानियों को धमकाते थे और गुंडई करते थे। आज सोनिया गांधी की पार्टी ने भी अपने भीतर ऐसे लोगों की व्यवस्था कर ली है, जो वैचारिक आधार पर राष्ट्रीय हितों की बात करने वालों की बोटी-बोटी करने की धमकियां देते हैं। मुस्लिम लीग भी इसी प्रकार के ‘डायरैक्ट एक्शन’ की धमकियां ही नहीं देती थी, बल्कि उसे अमल में भी लाती थी।

सोनिया गांधी के नेतृत्व में इकट्ठे हुए लोग भारत पर शासन करने के लिए वही तर्क दे रहे हैं, जो कभी ब्रिटिश सरकार के लोग भारत पर शासन करने के लिए देते थे। उस समय भी मुस्लिम लीग की विचारधारा को मानने वाले लोग ब्रिटिश सरकार के साथ थे और इस लड़ाई में भी वे या तो सोनिया गांधी के जमावड़े का हिस्सा बन गए हैं, या फिर परोक्ष रुप से उस के लिए मददगार हो रहे हैं। राहुल गांधी जिस वैचारिक लड़ाई की बात कर रहे हैं, उस लड़ाई में उनके साथ उनके संगी-साथी भी वैचारिक प्रतिष्ठान का हिस्सा हैं, जिस का जिक्र ऊपर किया गया है और जिस का संकेत सोनिया गांधी ने स्वयं दिया है।

इस वैचारिक लड़ाई में दूसरा खेमा नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में संबद्ध हो चुका है। नरेन्द्र मोदी की लड़ाई इस मुल्क को यूरोपीय मानसिक वाली दासता से मुक्त करवाने की है, जिसका पाश सोनिया के नेतृत्व में दिन-प्रतिदिन कसता जा रहा है। वैसे इस मानसिक पाश से भारत के लोगों को बांधने का इतिहास तो पंडित नेहरू से ही शुरू हो गया था, जिन्होंने स्वयं ही घोषणा कर दी थी कि वे यूरोपीय सभ्यता और नीतियों के विरोधी नहीं हैं, केवल यूरोपीय शासकों के विरोधी हैं। नेहरूने तो विदेशी मुगल शासकों को भी स्वदेशी ही मानने की नीति अपनाई थी। नेहरू से लेकर अब तक यही नीति भारत सरकार की आधिकारिक नीति रही। सोनिया गांधी के शासनकाल में इन यूरोपीय सांस्कृतिक नीतियों को इस देश में लागू करने का प्रयास ही नहीं हुआ, बल्कि सत्ता की बागडोर ही एक प्रकार से फिर इंतकाल की मूल के रूप में सोनिया गांधी के हाथ आ गई। दस साल के लम्बे अरसे के बाद एक बार फिर देश के लोगों ने इस सांस्कृतिक दासता और दीनता से मुक्तिपाने के लिए नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अंगड़ाई ली है। देश के लोग ऐसी नीतियां चाहते हैं, जिस से भारत विश्व का अग्रणी देश बने, न कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में यूरोप और अमेरिका का पिछलग्गू। पिछले दस साल में गहरे षड्यन्त्र के तहत सरकार ने लोगों का यह आत्मविश्वास तोडऩे का प्रयास किया था कि भारत विश्व में अग्रणी बन सकता है।


फुंका फुंका सा क्यों है ये केजरी कारतूस


नरेंद्र मोदी से टक्कर लेने बनारस पहुंचे आम आदमी पार्टी (आप) के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल की यह तस्वीर देख कर किसी को सहज ही यकीन नहीं होगा कि यह वही आदमी है जिसने राजनीति की चूलें हिला कर रख दी हैं। चित्र में कुछ समर्थक एक नाव से उन्हें नहाने के लिए पानी में उतार रहे हैं। केजरीवाल ऐसे सहमे-सिकुड़े दिख रहे हैं जैसे किनारे पर ही डूब जाएंगे।

कमर भर पानी में उतरने से डरने वाले केजरीवाल ने जब मात्र 49 दिन के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो उनपर जिम्मेवारी से डर कर भागने की तोहमत लगी। उनसे एक नए पारदर्शी शासन की उम्मीद लगाए उनके मध्यवर्ग समर्थकों का उनसे पूरी तरह से मोहभंग हो गया। मोदी की नकल करते हुए अब वे कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री का पद छोडऩे के लिए जिगरा चाहिए। सच बात यह है कि सस्ती बिजली एवं मुफ्त पानी सहित वादों की जो भरमार उन्होंने विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान की थी उन्हें पूरा करना उनके बूते की बात नहीं थी। उनकी सरकार रहती तो अपेक्षाओं की सुनामी उनकी विश्वसनीयता को अब तक डूबो चुकी होती। शासन करना कितना कठिन होगा यह दिल्ली सचिवालय के सामने पहले जनता दरबार से ही पता चला गया था। समस्याओं के साथ आई लोगों की भीड़ से डर कर केजरीवाल शब्दश: भाग खड़े हुए थे।

सरकार छोड़ कर भागने के लिए नरेंद्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर की एक रैली में उन्हें अभी एके-49 नाम दिया है। इस नाम के बहाने मोदी ने आतंकवादियों को खुश करने वाले केजरीवाल की पार्टी के रुख की तरफ भी इशारा किया। एक नाम तो खुद भी केजरीवाल ने अपने आपको दिया था। वह था- अनार्किस्ट (अराजक)। गणतंत्र दिवस के ठीक पहले राजपथ के पास मुख्यमंत्री के रूप में धरने पर बैठे केजरीवाल ने अपने को अराजक कहने के साथ साथ यह धमकी भी दे डाली कि वे अपने दस्तों के साथ गणतंत्र दिवस के परेड में अराजकता फैला देंगे। अब तक के उनके कारनामों से केजरीवाल ने यही साबित भी किया है कि हंगामा खड़ा करना उनका मूल सामथ्र्य है, सूरत चाहे बदले न बदले।

बिना सबूत के किसी पर भी कोई भी आरोप लगा देने की अपनी फितरत की वजह से उन्हें भाग खड़े होने वाले तोपची की संज्ञा मिली। केजरीवाल के हिटलर के प्रचार मंत्री गोयेबल्स की पदवी भी मिली। गोयवल्स झूठ को इतनी बार बोलते थे कि लोगों को वह सच लगने लगता था। बात बात पर अपनी बात से पलटने की वजह से केजरीवाल यू टर्न के पर्याय भी बने। झाड़ू लेकर भ्रष्टाचार को साफ करने निकले केजरीवाल ने बाद में अपने करतबों से और कई उपाधियां पाईं।

                धनंजय कुमार


नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में जो काम करके दिखाया है, उससे देश के लोगों में एक बार फिर यह आत्मविश्वास जागने लगा है कि यदि सुदृढ़ नेतृत्व मिले और भारत सांस्कृतिक दृष्टि से अपनी जड़ों से जुड़े, तो वह एक बार फिर विश्व की राजनीति में नीति-निर्धारक की हैसियत पा सकता है। नरेन्द्र मोदी के कृतित्व ने लोगों में उनके प्रति आस्था जगाई है। यूरोपीय लॉबी के लिए नरेन्द्र मोदी इसीलिए सबसे बड़ा खतरा बन कर उभरे हैं। अब जब यह लड़ाई अपने अन्तिम पड़ाव पर पहुंच गई है, और उसके परिणामों के कयास भी लगने शुरूहो गए हैं तो सोनिया गांधी और उनको आगे करके अपनी गोटियां खेल रही, देशी-विदेशी ताकतें अपना सब कुछ झोंक रही हैं। सोनिया गांधी का असम में दिया गया बयान इस कैम्प की इसी हड़बड़ाहट को इंगित करता है। इस कैम्प के पास सबसे बड़ा एक ही हथियार था कि नरेन्द्र मोदी के कारण देश की दूसरी कोई भी पार्टी भाजपा का समर्थन नहीं करेगी। लेकिन दूसरी पार्टियों की बात तो दूर, सोनिया के अपने कैम्प में से ही भाग कर मोदी की सेना में आ मिलने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। जद(यू), बसपा और सपा इत्यादि के शिविर से भाग कर मोदी के शिविर में आने वालों में मानों प्रतियोगिता ही चल पड़ी है। नए लोगों की बढ़ती संख्या देख कर जहां सोनिया गांधी के शिविर में घबराहट और सन्नाटा है, वहीं भाजपा के भीतर से ही कुछ प्रश्न उठने लगे हैं। प्रश्न पूछना भारतीय संस्कृति की गौरवमयी परम्परा है। यह परम्परा इतनी उदार है कि महाभारत के युद्ध में जब दोनों सेनाएं युद्ध के लिए सन्नद्ध हो गईं थीं, धनुष की प्रत्यंचाएं तन गईं, तो अर्जुन ने श्रीकृष्ण से बीच रणभूमि में प्रश्न पूछने शुरू कर दिए कि आत्मा कहां से आती है और कहां जाती है? उस समय तो अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण थे। उन्होंने अर्जुन की जिज्ञासा का समाधान कर उसे युद्ध के लिए पुन: प्रेरित कर दिया, लेकिन इस बार नरेन्द्र मोदी का सारथी कोई ‘कृष्ण’ नहीं, बल्कि देश की सारी जनता है। लेकिन इस सारथी के पास किसी के भी अप्रासंगिक प्रश्नों का उत्तर देने का समय नहीं है। मोदी का निशाना भी मछली की आंख पर लगा हुआ है। ऐसे समय में ध्यान को भटकना घातक हो सकता है। मोदी उन प्रश्नों का उत्तर स्वयं दे रहे हैं, जो इस देश की अस्मिता और उसके भविष्य से जुड़े हुए हैं। लोकसभा की इस लड़ाई में देश के भविष्य का निर्णय होने वाला है। मोदी स्वयं अरुणाचल प्रदेश जाकर भारत की चीन-नीति की परोक्ष घोषणा कर आए हैं। जम्मू-कश्मीर में उन्होंने पाकिस्तान और उसके परोक्ष समर्थकों को चेतावनी दे दी है। भाजपा के भीतर इस बार लड़ाई इस बात की नहीं होनी चाहिए कि टिकट किस को दिया जा रहा है और किस को नहीं दिया जा रहा। बहस इस बात पर होनी चाहिए कि राष्ट्रीय हितों को पलीता लगाने वाली फौज के डैन को किस प्रकार समाप्त करना है। यह साधारण चुनाव नहीं है। यह एक प्रकार से स्वतंत्रता का दूसरा युद्ध है। मोदी इस समय जन-भावनाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि सोनिया गांधी और उन का खेमा अपने संकीर्ण हितों एवं देशी-विदेशी दबाव समूहों के हितों की लड़ाई लड़ रहा है, जिसका लाभ या तो अमेरिका उठाएगा, या क्वात्रोची के वंशज या फिर रायबहादुरों और रायसाहिबों की फौज, जो इस वक्त सोनिया के आसपास घूम रही है।

नरेन्द्र मोदी का सच आज भारत का सच बन गया है। वे भारतीय जनमानस की राष्ट्रीय भावना के साथ एकाकार हो गए हैं। आन्ध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश या ओडीशा के विधानसभा चुनावों में जो लोग दूसरे राजनैतिक दलों के लिए कार्य कर रहे थे, वे भी अब लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी का समर्थक होने की बात कर रहे हैं। इस चुनाव में मोदी फैक्टर ने राजनीति में एक नए धरातल की रचना की है। इस धरातल पर विभिन्न राजनैतिक दलों से निरपेक्ष होकर साधारण मतदाता मोदी के पक्ष में खड़ा नजर आता है। लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि इस धरातल पर जो मोदी खड़ा दिखाई देता है, वह मोदी कोई व्यक्ति न होकर एक सांस्कृतिक राष्ट्रीय विचारधारा का प्रतीक है। वह इस सांस्कृतिक भारत का मानवीकरण कहा जा सकता है। इस सांस्कृतिक भारत से ही सोनिया गांधी और उसके सिपाहसलारों को डर लगता है। क्योंकि सांस्कृतिक भारत का सच ही मोदी का सच है। अपनी सांस्कृतिक ऊर्जा से अनुप्राणित होकर ही भारत आर्थिक क्षेत्र में भी लम्बी छलांग लगा सकता है। लेकिन इसी से भयभीत होकर यूरोप एक बार फिर दिल्ली में आकर चिल्ला रहा है कि भारत का शासन चलाना बच्चों का खेल नहीं। मोदी के नेतृत्व में भारत को यूरोप की इसी गाली का उत्तर देना है।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

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