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पूर्व में डूबता आप का सूरज

विधानसभा चुनावो में मिली धमाकेदार जीत से ऐसा लगने लगा था कि ‘आप’ ने दिल्ली बाकि पार्टियों से हथिया ली है। लेकिन ईस्ट दिल्ली में हुई घटना से ऐसा लगता है कि ‘आप’ ने अपना करिश्मा और लोगों के बीच अपनी साख बिलकुल ही खो दी है। ‘आप’ के नेता अरविन्द केजरीवाल, जब चुनाव प्रचार के लिए पूर्वी दिल्ली के गांधीनगर गए तो उन्हें लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। उन्हें वहां लोगों ने न भाषण देने दिया, और न ही किसी ने उनसे मिलने में रुचि दिखाई। लोग उनके खिलाफ नारे लगाते रहे और जब कुछ लोग उनसे मिले भी तो उन्हें सिर्फ वादे करने पर लताड़ लगाई। ‘आप’ का अगर यह हाल अभी है तो पता नहीं भविष्य क्या होगा। अंधकार के अलावा कुछ दिखता नहीं।

भाजपा में अंदरूनी गड़बड़ जारी है?

कोई भी अफवाह अगर लगातार उड़ती रहे तो लोग उसे सच मान ही लेते हैं। ऐसा समझा जा रहा है कि भाजपा के कुछ नेता क पार्टी और नरेंद्र मोदी की कब्र खोदने में लगे हैं। अगर भाजपा आम चुनावों में 200 से कम सीट लाती है, तो भी इनके आंखों से आंसू का एक कतरा नहीं गिरेगा। 200 सीटों से कम में तो भाजपा सरकार बनाने की हालत में ही नहीं होगी। पार्टी की ऐसी हालत से इन नेताओं की सेहत पर कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। सत्ता के नजदीक रहने की वजह से उनकी सुविधाओं में तो कोई गिरावट नहीं आएगी। जहां तक नाम का सवाल है, भाजपा के नेताओ के घरों पर होने वाली पार्टी में शिरकत कीजिए, खुद पता चल जाएगा।

नितीश को ना, मोदी को हां

बिहार में बड़ा ही हास्यास्पद नज़ारा देखने को मिल रहा है। ऐसा लगता है नितीश कुमार अपने ही निर्वाचन क्षेत्र नवादा में भुला दिए गए हैं। हाल कीएक रैली में उन्हें काले झंडे दिखाए गए। उनके ऊपर जूते और पत्थर भी फेकें गए। जिस क्षेत्र से वह चुने गए और मुख्यमंत्री भी बने, वहां से उन्हें ऐसी आशा नहीं रही होगी। वहीं कुछ ही घंटे के बाद जब मोदी ने नवादा में ही एक रैली को सम्बोधित किया, तो नजारा ही कुछ और था। लोगों का हुजूम और मोदी-मोदी के गूंजते नारे बिहार में बहती मोदी बयार को प्रतिबिंबित कर रहे थे। नितीश को अपनी घटती लोकप्रियता के बारे में विचार करना पड़ेगा। अगर जनमत सर्वे की मानी जाए तो निकट भविष्य में नितीश को काफी समय मिलने वाला है।

राहुल की हिम्मत की दाद दीजिए

हर सेनापति किसी भी खराब स्थिति में अपने सिपाहियों की हौंसला-अफजाई तो करता ही है। राहुल गांधी का यह कहने पर कि कांग्रेस पार्टी 200 से ज्यादा सीट लाएगी, उन्हें हंसी का पात्र नहीं बनाना चाहिए। अगर चुनाव विश्लेषकों की मानी जाए तो राहुल सपनों की दुनिया में तैर रहे है। उन्हें अपना ज्ञान बघारने की जगह अपनी पार्टी से हो रहे निष्क्रमण को रोकने पर ध्यान देना चाहिए। यह दीगर बात है कि राहुल के ऐसे कथन के और भी उदहारण हैं। 1997 में जॉन मेजर पर जब हार का खतरा मंडरा रहा था, तो उन्होंने भी ऐसे ही अपनी जीत का दावा किया था, जो सही नहीं हो सका था। उसी तरह 1 अप्रैल 1962 को अमेरिका के नेशनल पब्लिक रेडियो ने यह घोषणा कर दी थी कि रिचर्ड निक्सन 1964 में फिर से चुनाव लड़ेंगे। रेडियो ने लोगों के गुस्से का पात्र बनने पर इसे मजाक घोषित कर दिया था। पर नेशनल पब्लिक रेडियो को तब चेहरा छिपाना पड़ा, जब निक्सन न सिर्फ चुनाव लड़े बल्कि जीते भी।

भाजपा के कर्णधारों की डूबती नैया

अमृतसर और विदिशा से आती खबरें, भाजपा के लिए अच्छी नहीं दिख रही हैं। अमृतसर के भाजपा प्रत्याशी अरुण जेटली के खिलाफ कांग्रेस ने अमरिंदर सिंह को उतारा है, जो पंजाब के मुख्यमंत्री और पटियाला राज्य के राजा रह चुके हैं। सिखों के सबसे पवित्र शहर अमृतसर में अमरिंदर सिंह ज्यादा असरदार साबित हो रहे हैं। सिखों के बीच उनकी अपील जेटली के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। जेटली वैसे चुनावी दांव-पेंच के उस्ताद हैं, तो उम्मीद की जा सकती है कि घमासान बढिय़ा होगा। दूसरी खबर जो मध्य प्रदेश से आ रही है, जहां मोदी की लहर के अलावा शिवराज सिंह चौहान ने भी अच्छा माहौल तैयार किया हुआ है। इन सबके बावजूद सुषमा स्वराज लक्ष्मण सिंह से एक हारी हुई बाजी लड़ रही हैं। विदिशा भाजपा की सुरक्षित सीट रही है। अटल बिहारी वाजपेयी वहां से जीत चुके हैं। इसका कारण सुषमा का वहां नहीं जाना और विपक्ष के उम्मीदवार लक्ष्मण सिंह द्वारा उस क्षेत्र में अच्छा-खासा काम करना है और आज कल लोग पोजीशन पर नहीं, बल्कि जो उनके लिए काम करें, उन्हें ही वोट देते हैं। कारण जो भी हो, पर सुषमा को मोदी की लहर का कोई फायदा मिलने वाला नहीं है। मोदी की वहां जाने कि सम्भावना भी नहीं है, क्योंकि सुषमा शुरू से उनका विरोध कर रही है। उनके पोस्टर्स में भी आडवाणी, वाजपेयी और शिवराज सिंह चौहान ही दिखते हैं। सुषमा अपने भाषणों में मोदी का नाम भी नहीं लेती।

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