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जो तटस्थ थे, इतिहास लिखेगा उनकी भी अपराध कथा

‘राष्ट्र चिंतन’ को एक साल हो गया। जो साल गया, वह कई मायनों में अद्भुत था। इसमें जो हुआ उसके पदचिह्न आने वाली कई पीढिय़ों तक स्मृति पटल पर रहेंगे। इस दौरान हमने समाज के जीवन के हर उस पहलू को छूने की कोशिश की, जो आम हिन्दुस्तानी पर असर डालता है। क्रिकेट से लेकर राजनीति, अर्थतन्त्र से लेकर सिनेमा और शिक्षा से लेकर नक्सलवाद/आतंकवाद – सब हमारे जीवन को स्पर्श करते रहे हैं। ‘राष्ट्र चिंतन’ में अपने लेखों में हमने उन सबको समेटने की कोशिश की। उन पर अपने दृष्टिकोण से लिखने की कोशिश की।

हम ‘राष्ट्र चिंतन’ की तटस्थता का दावा नहीं करते, क्योंकि जीवन के दुर्धर्ष समर में किनारे बैठ सिर्फ नजारे लेने की कोई जगह नहीं होती। आप भीष्म नहीं हो सकते। द्रौपदी की तरह राष्ट्र के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा हो, तो आप ‘पितामह’ की तरह खोखली निष्ठाओं की आड़ नहीं ले सकते। इसलिए अपनी चुनी हुई कर्मभूमि में अपना दायित्व निभाना आपका धर्म है। उससे आप भाग नहीं सकते। एक नागरिक की जिम्मेदारी है कि देश के सामने आने वाले मुद्दों पर वह गहराई से अध्ययन करे, मनन करे, चिंतन करे और फिर बिल्कुल बेबाकी से उसको सामने रखे। बेबाकीपन से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

यहां कई बार संतुलन का सवाल आता है, मगर हमारा मानना है कि तथष्टता और संतुलन, सच के सामने बौने होते हैं। हां, सच लोक कल्याण के लिए हो, यह जरूरी है। मगर सच की व्याख्या करते हुए हवा के रुख और सिर्फ लोकरुचि की चिंता नहीं की जा सकती। वहां आवश्यक है कि आप राष्ट्र के दूरगामी हितों पर नजर डालें। अगर आपने ऐसा नहीं किया तो यह अपने धर्म से भागना होगा। आज की चुनौतियों की चर्चा करें, तो सारी समस्याओं को तीन मुख्य बिन्दुओं में समेटा जा सकता है। आज तीन मूलभूत मुद्दे देश और समाज के सामने हैं। वे हैं, पहला सुरक्षा, दूसरा विकास और तीसरा पर्यावरण का संरक्षण।

देश की सुरक्षा पर गहरे संकट हैं। ये संकट बाहरी और आंतरिक दोनों हैं। जंगलों में अपनी पैठ बना चुका नक्सलवाद अब शहरी ठिकानों की तलाश में है। वह शहरों में अपनी विश्वसनीयता और साख बनाने के उपक्रम खोज रहा है। सीमा पार से प्रेरित आतंकवाद भी एक बड़ा खतरा है। सीमा पार से चीन और पाकिस्तान हमारे लिए लगातार बने रहने वाले सिरदर्द हैं। ऐसे में हमारी नौसेना में एक के बाद एक होने वाले हादसे किसी षड्यंत्र का आभास देते हैं। इसी तरह, हमारे कई रक्षा वैज्ञानिकों की एक के बाद एक अचानक मौत भी परेशानी का एक बड़ा सबब है। थल सेना में भी ऊपर के स्तर पर लगातार खिचखिच रही है। कभी सेनाध्यक्ष की उम्र का विवाद और कभी सेना की तथाकथित तैनाती की लीक हुई खबरें। इन सबके बीच ऐसा लगा कि कोई ध्यान देने वाला ही नहीं है। नेतृत्व का नितांत अभाव। कुल मिलाकर देश की सुरक्षा के प्रति गंभीरता की कमी है। यह एक बड़ी समस्या है, क्योंकि असुरक्षित राष्ट्र कुछ भी नहीं कर सकता।

कुछ साल पहले जब भी भारत की चर्चा होती थी, तो कुछ शब्द उनमें आम रहते थे। जैसे कि विश्व शक्ति का स्वप्न, सॉफ्टवेयर शक्ति, विकास दर, चीन से होड़, विश्व की आर्थिक ताकत इत्यादि। लेकिन पिछले कोई चार साल में चर्चा के विषय बदल गए। अब बात होती है तो कुछ शब्द लगातार दोहराए जाते हैं। वे हैं – मंदी, बेरोजगारी, रुपए का गिरता मूल्य, भ्रष्टाचार, घोटाले आदि। आशा का माहौल क्यों आज निराशा में बदल गया? क्यों देश की ज्यादातर यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों में अब प्लेस्मेंट नहीं हो रहे हैं? क्यों हमारे नौजवान और युवतियां इंजीनियरिंग और एमबीए जैसे कोर्स करने के बाद सिर्फ आठ दस हजार की तेल साबुन बेचने की नौकरियां ही पा रहे हैं? नए कारखाने लग नहीं रहे, पुराने बंद हो रहे हैं। देश के व्यवसायी बाहर भाग रहे हैं। देश को विकास चाहिए। यह बड़ा जरूरी हो गया है कि देश में विकास का उपयुक्त वातावरण बने, ताकि यहां कि उद्यमिता फले-फूले। पिछले एक साल में यह वातावरण और खराब हुआ है।

तीसरा मुद्दा हमारे भविष्य और हमारे बच्चों से जुड़ा है। यह है विकास के साथ पर्यावरण की चिंता। फिलहाल इस तरफ समाज का ध्यान नहीं है। देश के किसी भी नए विकसित शहर में चले जाइए, वातावरण को आप प्रदूषित ही पाएंगे। आपको यह शिकायत भी मिलेगी कि यह और खराब होता जा रहा है। बच्चे बीमार हो रहे हैं। मौसम के चक्र गड़बड़ा गए हैं। नियम कायदे बने हैं, मगर हर जगह वह सिर्फ फाइलों की शान ही बने हुए हैं। पर्यावरण पर सम्मेलन, एनजीओ की एक बड़ी बारात – सब कुछ है, मगर कुछ भी नहीं हो रहा। इस स्तम्भ में हमने बार-बार लिखा है कि कुछ भ्रष्ट अफसरों-नेताओं-व्यावसायियों की तिकड़ी पूरे राष्ट्र की सेहत के साथ खिलवाड़ में लगी हुई है। इसके लिए नीतियों का सख्त पालन जरूरी है।

समाज में निराशाजनक परिस्थितियों के कारण जबरदस्त गुस्सा है। गुस्सा एक हथियार भी है बन सकता है और एक गंभीर बीमारी भी। यह हथियार तब होता है, जब आपको यह अपनी परिस्थिति बदलने के लिए प्रेरित करता है। आप में जोश और उत्साह भरता है। इससे गति मिलती है। मगर जब कोई इस गुस्से का इस्तेमाल ऐसी कुछ परिस्थितियों के निर्माण के लिए करने लगे, जिससे अराजकता पैदा हो जाए, तो हालात खतरनाक हो सकते हैं। कुछ ऐसी ही परिस्थितियों का निर्माण करने की कोशिश देश में हो रही है। जंगल में पनपे हिंसक माओवाद के पौधे को अब शहर में रोपने की तैयारी की जा रही है। बदलाव का सपना लेकर उठा एक आंदोलन उसका औजार बन गया है। इसलिए अब आप चुप नहीं रह सकते, क्योंकि ‘जो तटस्थ थे, इतिहास लिखेगा उनकी भी अपराध कथा’।

उमेश उपाध्याय

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