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चुनाव हुआ मोदीमय

मैं उदय इंडिया के सभी पाठकों और संरक्षकों को भगवान राम के जन्म दिवस (राम नवमी) पर पत्रिका के सफलतापूर्वक दूसरे वर्ष में प्रवेश की हार्दिक बधाई देता हूं। हिंदू नव वर्ष की शुरूआत के साथ ही देश भर में नवरात्र उत्सव के आध्यात्मिक वातावरण से पूरा देश सराबोर है। उदय इंडिया परिवार का हमेशा से पाठकों के प्रति सच को बेबाकी से प्रस्तुत करने की चुनौती रही है, जिसमें उदय इंडिया सफल रही है। कठिनाईयों एवं चुनौतियों के सागर में उदय इंडिया की नाव पाठकों के सहयोग से निरंतर तैर रही है। उदय इंडिया का अंग्रेजी संस्करण निरंतर आगे बढ़ते हुए अपने पांचवें वर्ष का उत्सव मना रहा है। इस असीम सहयोग से मैं बेहद प्रसन्न हूं और भविष्य में भी इसी सहयोग की कामना करता हूं। आज का युग तकनीक का है और इसे जानते

हुए हम बहुत जल्दी उदय इंडिया का डिजिटल संस्करण (जो राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, विदेश मामले, अध्यात्म की जानकारी देगा) को प्रस्तुत करने जा रहे हैं।

मतदान केन्द्रों पर जैसे ही पहला बटन दबने को था, नरेन्द्र मोदी ने जादुई आंकड़े 272 प्लस के लक्ष्य को बढ़ा कर 300 प्लस कर दिया। ‘आप एनडीए को 300 प्लस दें, मैं आपको वह सब दूंगा, जो कुछ आप मुझसे चाहते हैं।’ भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार निश्चित रूप से अधिक की आकांक्षा कर रहे हैं। वह ‘लघु ही दीर्घ है’ के दर्शन का अनुसरण नहीं कर रहे, किन्तु वह इसे सरल बना रहे हैं कि अधिक की आकांक्षा के लिए अधिक संख्या की जरूरत है।

अगले दौर की मोदी केन्द्रित चर्चा में ‘ये दिल मांगे मोर’ तत्काल तैयार मसाला बन गया है। उनका क्या अर्थ है? क्यों वह लक्ष्य के आंकड़े को ऊंचा बढ़ा रहे हैं? क्या वह असुरक्षित महसूस कर रहे हैं या वह पहले से अधिक आत्मविश्वास से भर गए हैं? क्या वह अधिक सीटों से गठबंधन को अप्रासंगिक बनाना चाहते हैं? क्या वह इन चुनावों को अधिक व्यक्तित्व केन्द्रित नहीं बना रहे हैं? इस प्रकार के सवाल और तर्क काल्पनिक प्रश्रों के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। इन्हीं सवालों की चर्चाओं पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बहुत अधिक समय लग रहा है। टनों अखबारी कागज और सैकड़ों-हजारों लीटर स्कॉच, रम, देसी पऊवा, कॉफी, चाय, नींबू-पानी खर्च हो रहा है। आप जैसे चाहें, वैसा करें। उन्हें प्यार करें, उनसे घृणा करें, लेकिन उन पर चर्चा करें। मोदी की सफलता इसी में है। दिल्ली में श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में शुद्ध मोदीनॉमिक्स से शुरू करके, उनके आलोचक चाहे कितना भी झूठ कहें, और उनके विरोधी कितना भी चिल्लाएं, उनकी परवाह किए बगैर, विकास के गुजरात मॉडल को गैर-गुजरातियों के लिए उपयुक्त ठहराना और लौहपुरूष को नेहरू के खिलाफ खड़ा करना, इतिहास में, जो अब तक गांधी-नेहरू परिवार के निर्देशों पर तैयार होता रहा, संशोधन किए जाने की मांग करना, ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के लिए खड़ा होना और अंत में पूरी वंशवाद की राजनीति पर एक शब्द ‘शहजादा’ प्रयोग कर वह एजेंडा सेट कर देते हैं।

आजाद भारत के इतिहास में, गांधी-नेहरू को छोड़कर, कोई भी नेता देश के एक कोने से दूसरे कोने तक घर-घर उस तरह से नहीं पहुंचा, जैसे कि मोदी पहुंचे हैं। मोदी की पार्टी, भाजपा की पूरे पूर्व, उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत (कर्नाटक को छोड़कर) में पर्याप्त मौजूदगी तक नहीं है, लेकिन वह अपना नाम फैलाने में सफल हुए। यह अलग बात है कि वह वोटों में तब्दील हो या न हो, या विपरीत ध्रुवीकरण बना दे।

2014 के चुनाव मोदी के बारे में हैं। मोदी के इर्द-गिर्द के हालात पर, चाहे पक्ष में या विरोध में, ये एक प्रकार से जनमत संग्रह हैं। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हताशा में भर कर जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी से अनुरोध किया है कि ‘धर्मनिरपेक्ष वोट’ विभाजित नहीं होने चाहिए। और उन्होंने राजनीति में ‘धर्मनिरपेक्षता बचाने और उसकी सुरक्षा करने’ के लिए प्रवेश किया है। धर्मनिरपेक्षता की दलदल पर खतरा लगातार तीसरी बार काम आए या न आए, लेकिन अब लगता है कि अड़ाने के लिए कांग्रेस के पास केवल यही अड़ंगा बचा है, जो कि किसी प्रकार से मोदी के रथ में लगाने की कोशिश हो सकती है। मनमोहन सिंह सरकार में दूसरे स्थान के प्रमुख ए.के. एंटनी वाम दलों से अपील कर रहे हैं कि सांप्रदायिक भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए अपने पुराने झगड़ों को दफन कर दें।

यह पहली बार है कि एनडीए के घटक दलों (कम से कम जो अभी हैं) के अतिरिक्त, पूरे राजनीतिक परिदृश्य कांग्रेस नीत प्रथम मोर्चा उखड़ा हुआ है, तीसरा मोर्चा, मुश्किल से दिखता है, ममता का संघीय मोर्चा बिखरा हुआ है, सभी मोदी को रोकने के एक सूत्री लक्ष्य के साथ वोट मांग रहे हैं। विकास आइकॉन बने हिन्दुत्व पोस्टर बॉय का चमकना असाधारण प्रक्रिया रही है और उस क्रम में वह एक असाधारण व्यक्तित्व बन गए हैं।

अन्तर बनाने का समय। बदलाव का समय। मोदी का वक्त है। यह भाजपा के प्रचार की मुख्य पंक्ति है। यद्यपि इसे सरकार बदलने, मनमोहन सिंह को हटाने और 7 रेसकोर्स रोड के नए आवासी के तौर पर नरेन्द्र मोदी को प्रवेश कराने, कांग्रेस के बहिर्गमन और देश की सत्ता में भाजपा की पुनर्बहाली के लिए उछाला गया था। यह 1996 और 1998 का आम आदमी के मुंह पर चढ़े नारे -‘अब की बारी अटल बिहारी’ की निरन्तरता थी। लेकिन अब यह अधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि फोकस में जो व्यक्ति है, वह बदलाव मांग रहा है। उसके और उसकी पार्टी के लिए जिसके अनेक अर्थ हैं।

उस वक्त से जब भाजपा 2004 में सत्ता से बाहर हुई है, संगठन में पीढिय़ों का बदलाव आ चुका है। आर.एस.एस. ने उसमें उत्प्रेरक की भूमिका निभाई है। टिकटों के वितरण की प्रक्रिया में, खासतौर पर बुजुर्गों के मामलों में अंदरूनी मंथन में देखा गया है कि एक स्तर पर यह वाजपेयी-आडवाणी युग का अंत और मोदी-राजनाथ युग का उदय है। अन्य स्तर पर माना जा रहा है कि 16मई को परिणाम आने के बाद मोदी सत्ता में आते हैं तो उसका अर्थ भाजपा की अपनी वाजपेयी सरकार से नीतिगत परिवर्तन होना होगा।

यह केवल अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी के तरीकों और व्यक्तित्व में अन्तर के बारे में नहीं है, बल्कि यह प्रमुख रणनीति निर्माणकर्ताओं, वाजपेयी के साथ रहे बड़े चार मंत्रियों की अनुपस्थिति और मोदी की नई टीम के बारे में है। मोटे तौर पर नीति-निर्धारण और मूल सत्ता का निर्देशन नार्थ एवं साउथ ब्लॉक, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, वित्तमंत्री, विदेशमंत्री और रक्षामंत्री करते हैं।

पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी अपने उसी पद के लिए दौड़ से बाहर हैं। पूर्व रक्षामंत्री और एन.डी.ए. के संयोजक जॉर्ज फर्नांडीज शारीरिक रूप से चलने-फिरने में असमर्थ हैं और राजनीति से बाहर हैं। पूर्व वित्तमंत्री जसवन्त सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। पूर्व विदेश मंत्री यशवन्त सिन्हा ने अपने बेटे जयन्त को राजनीति में आगे लाने के लिए खुद को चुनावी राजनीति से अलग कर लिया है और परिणामस्वरूप अगली सरकार में मंत्री बनने की संभावनाओं के रास्ते बंद कर दिए हैं। निपुण रणनीतिज्ञ प्रमोद महाजन, जो शीर्ष नेताओं के बीच सक्रिय रहते थे, अब इस संसार में नहीं हैं।

नरेन्द्र मोदी का सत्ता में आने का वास्तविक अर्थ है – ‘बदलाव’। इसकी व्याख्या कोई किसी भी ढंग से कर सकता है – ‘नई सोच, नई उम्मीद’ या ‘हर हर मोदी, घर घर मोदी’। उन्होंने राजनीतिक चर्चाओं के लिए बहुत ही सांसारिक शब्द दिया है – ‘विकास’। हिन्दुत्व, तो उनके व्यक्तित्व का ही हिस्सा है, जिसे उन्हें ओढऩ की जरूरत नहीं है। बाकी काम उनके विरोधी स्वयं कर देंगे।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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