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केजरीवाल की असली ख्वाहिश

केजरीवाल की असली ख्वाहिश

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी सरकार के साल भर पूरे करने वाले हैं। इस दौरान उन्होंने साबित किया है कि वे आज देश में सबसे चतुर, घाघ नेता हैं। वे अपने सभी मंसूबों में कामयाब होंगे या नहीं, यह अलग मामला है, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वे बड़े करीने से अपने दीर्घावधिक लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। केजरीवाल ने मीडिया की मदद से हमेशा सुर्खियों में बने रहने की कला में दूसरों को पीछे छोड़ दिया है। मुझे नहीं लगता कि आज आजाद भारत में कोई भी विरोधियों के खिलाफ गाली-गलौज और चरित्र हनन के मामले में केजरीवाल के आसपास भी फटक सकता है। सुर्खियां बटोरने के मामले में तो केजरीवाल का कोई सानी नहीं है। उनका सीधा-सा फंडा है कि खुद को पीडि़त बताओ और विरोधियों को अपुष्ट आरोपों के जरिए निशाने पर लो। केजरीवाल के लिए साख कोई मायने नहीं रखती। वे आज भले मुख्यमंत्री हों, लेकिन वे हमेशा आंदोलन के मूड में रहते हैं। और अच्छी मीडिया कवरेज की खातिर अपने आदर्शों और राजनैतिक एजेंडे को भी अदलने-बदलने में देर नहीं लगाते।

अगर आप केजरीवाल से जुड़ी हाल की खबरों पर गौर करें तो यह हकीकत शीशे की तरह साफ हो जाती है। बिलाशक, करीब 99 प्रतिशत मौकों पर वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर हमले करके सुर्खियों में आ जाते हैं। उन्होंने बेहद दुर्भाग्यपूर्ण दादरी कांड का भी दोहन कर लिया। कई दिनों तक उन्होंने भारी रकम अदा करके प्रसारण अधिकार खरीदे और ”आम आदमी’’ के नाम पर दादरी कांड के राजनीतिकरण के खिलाफ और सांप्रदायिक सदभाव बनाए रखने की अपील करते रहे। यह भी देखिए कि शीला दीक्षित ने अपने 15 साल के शासन में जन संपर्क के मद में 22 करोड़ रु. खर्च किए, जबकि केजरीवाल पिछले 11 महीने में ही 526 करोड़ रु. खर्च कर चुके हैं। इसका बड़ा हिस्सा लोकप्रिय रेडियो स्टेशनों और प्राइम टाइम टीवी चैनलों में केजरीवाल की छवि निखारने में खर्च किया गया।

कुछ ही लोगों को याद होगा कि अपने एनजीओ वाले दौर में उन्होंने एक प्रमुख कारोबार अखबार के साक्षात्कार में कहा था, ”भारत के अब तक के सबसे काबिल प्रधानमंत्री राजीव गांधी रहे हैं,’’ जो उनकी नजर में देश को सबसे बेहतर समझते थे। गांधी परिवार के प्रति उनके मन में सम्मान की बात बाद में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के उस खुलासे से भी जाहिर हो जाती है, कि केजरीवाल ने एक बार सोनिया गांधी से राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में शामिल करने के आग्रह के साथ चिट्ठी भी लिखी थी। यह अलग मुद्दा है कि सोनिया उन्हें शामिल नहीं कर पाईं। दिल्ली में यह भी कोई छुपा रहस्य नहीं है कि केजरीवाल दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित के अच्छे दोस्त हैं। लेकिन, देखिए कि कैसे उन्होंने कांग्रेस और दीक्षित परिवार को दगा दिया। वे शीला दीक्षित को हराकर ही मुख्यमंत्री बने।

यह सब कुछ उन्होंने इंडिया अगेंस्ट करप्शन नामक आंदोलन के जरिए भ्रष्टाचार से लडऩे के नाम पर किया। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे का मन मोह लिया, बल्कि देश के कुछ बेहद कुशाग्र बुद्धिजीवी नौजवानों को भी अपनी ओर आकर्षित किया। लेकिन अन्ना की इच्छा के उलट उन्होंने राजनैतिक दल का गठन किया। फिर, सत्ता में आते ही उन्होंने फौरन पार्टी के सह-संस्थापकों प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसों को निकाल बाहर किया। यही नहीं, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेडऩे वाले केजरीवाल ने पिछले साल बिहार में लालू यादव की पार्टी के लिए प्रचार किया, जो भ्रष्टाचार में सजा पाए और छह साल तक चुनाव लडऩे के अयोग्य ठहराए गए देश के पहले बड़े नेता हैं। केजरीवाल जाति और धर्म की राजनीति के खिलाफ लडऩे का दावा भी करते हैं, लेकिन हाल में वे जातिवाद या सांप्रदायिक मामलों के भी ‘सेक्युलर’ होने की बात करने लगे हैं। सरकारी नौकरियों में जाति आधारित आरक्षण का समर्थन और मुसलमानों के फैलाए तनाव पर उनकी चुप्पी पर गौर करें।

आखिर केजरीवाल का लंबे समय का लक्ष्य है क्या? आइए, पहले हाल की कुछ घटनाओं को देखें। केजरीवाल कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हर चुनाव में हराना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हर मौके पर बदनाम करना जरूरी है। केजरीवाल मोदी के खिलाफ अपनी ”नफरत की राजनीति’’ को आगे बढ़ाने के लिए देश के हर तनाव वाले स्थान पर पहुंच जाते हैं। वे हैदराबाद में एक छात्र की खुदकुशी के मामले को राजनैतिक रंग देने वहां पहुंच गए। पंजाब में कथित तौर पर धर्मग्रंथ को अपवित्र करने वाली की घटना से भड़की हिंसा की आग में राजनैतिक रोटी सेंकने पहुंच गए। उसे ”दुखद’’ बताते हुए केजरीवाल ने कहा कि यह पंजाब को अशांत करने के लिए ”जानबूझकर की गई घटना’’ है। उसके बाद वे राज्य में शांति की वापसी की प्रार्थना करने स्वर्ण मंदिर में मत्था टेक आए। वे फरीदकोट में पुलिस की गोली से मारे गए दो सिख परिवारों से भी मिले।

केजरीवाल ने पाकिस्तान में दशक भर से फंसी गूंगी-बहरी लड़की गीता के भारत में लौटने पर उससे मिलने की भी पूरी कोशिश की। हालांकि गीता दिल्ली की नहीं है और उसकी वापसी का श्रेय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है। इसलिए गीता की स्वराज और मोदी से भेंट जायज थी। लेकिन, केजरीवाल भी सुर्खियां लूटने पहुंच गए।

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, मैंने सोशल मीडिया में केजरीवाल का एक कार्टून देखा। इसमें दिखाया गया है कि कैसे एक हाथ से केजरीवाल पाकिस्तानी गायक गुलाम अली को अपने आम आदमी पार्टी (आप) के कार्यकर्ताओं की सुरक्षा में दिल्ली में कंसर्ट करने का न्यौता दिया, लेकिन दूसरे हाथ से राष्ट्रीय राजधानी में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को रोकने में नाकामी के लिए दिल्ली पुलिस और इसके बहाने नरेंद्र मोद को कोसा। दरअसल, पिछले साल दो किशोरों के एक बच्ची के साथ बलात्कार की घटना के बाद केजरीवाल ने धमकी दी कि वे तब तक मोदी की नींद हराम कर देंगे, जब तक वे दिल्ली पुलिस को सीधे अपने नियंत्रण में नहीं लेते। दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। उन्होंने पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) के आंदोलनरत छात्रों से कहा कि वे अपना कैंपस दिल्ली में ले आएं।

कार्टून में एक बात तो मार्के की थी। अगर ‘आप’ के कार्यकर्ता विदेशी मेहमानों को सुरक्षा देने में सक्षम हैं, तो उन्हें शहर में कम-से-कम भीड़ भरी जगहों पर महिलाओं को सुरक्षा देने से कौन रोक रहा है? यह दिल्ली पुलिस के निकम्मेपन को उजागर करने का भी बेहतर तरीका होगा। इसके बदले 2014 फरवरी में विधानसभा चुनावों में अप्रत्याशित जनादेश हासिल करने के बाद केजरीवाल उन्हीं मामलों के लिए ज्यादा सुर्खियां बटोर रहे हैं, जो उनके अधीन नहीं है। वे अपने अधीन मामलों पर ज्यादा तबज्जो नहीं दे रहे हैं।

केजरीवाल इतने नासमझ तो नहीं हैं कि यह नहीं समझें कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है और यह केंद्र शासित प्रदेश है, भले यहां एक निर्वाचित मुख्यमंत्री है। यही व्यवस्था पांडिचेरी में भी है। लेकिन, उनके लिए मुद्दा सिर्फ अफसरशाही का या कानूनी नहीं है। इसके गंभीर राजनैतिक पहलू हैं। दरअसल यह शुद्ध राजनैतिक ही है। इसलिए केजरीवाला मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही जिस बात पर जोर दे रहे है, उसमें एक सोची-समझी रणनीति दिखती है। उनकी दिलचस्पी मुख्यमंत्री के नाते अपने काम में नहीं है। वे अपने मौजूदा पद का इस्तेमाल इस तरह करना चाहते हैं, ताकि लोग उन्हें देश के अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखें। उनका अंतिम लक्ष्य दिल्ली पर मुख्यमंत्री के तरह नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री की तरह राज करने का है।

हममें से कितने लोग चुनावों के दौरान जारी किए गए केजरीवाल के 70 सूत्री एजेंडे पर अमल को लेकर सोचने को मजबूर हुए हैं? स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, सड़कें और साफ-सफाई के मामले में क्या प्रगति हुई है? ये मामले सीधे दिल्ली सरकार से जुड़े हैं। लोकपाल बिल का क्या हुआ? क्या सर्वाधिक बाजारों में मुफ्त वाई-फाई है? उन्होंने बिजली और पानी पर सब्सिडी देने का अपना वादा जरूर निभाया है और ये देश में सबसे सस्ते दर में मिल रही हैं। उन्होंने दिल्ली के विधायकों को सबसे ज्यादा वेतन-भत्ता (राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी अधिक) का प्रस्ताव किया है। वे 3.2 लाख वेतन और भत्ते पाएंगे। यह 440 प्रतिशत की वृद्धि भी कम लग रही है और ‘आप’ के पदाधिकारी ज्यादा की मांग कर रहे हैं।

केजरीवाल ने दिल्ली मेट्रो को अधिक ट्रेनों के लिए भी लिखा है, भले योजना मुनासिब न हो। लेकिन, उन्होंने मेट्रो को आश्वस्त किया है कि उसके घाटे की भरपाई दिल्ली सरकार करेगी।

लेकिन, यह पैसा आएगा कहां से? मेरा अंदाजा है कि इन दिनों केजरीवाल अफसरशाही (पुलिस समेत) पर पूरे नियंत्रण के लिए मोदी से लड़ रहे हैं, कल वे केंद्र से अधिक अनुदान की मांग करेंगे, ताकि वे लोगों को खैरात बांट सकें। और उसके बाद वे दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग के साथ सड़कों पर उग्र आंदोलन करने उतर जाएंगे। फिर, इस प्रक्रिया में इतनी अराजकता फैल जाएगी कि केजरीवाल मनाने लगेंगे कि मोदी सरकार उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटा दे। केजरीवाल सरकार के पैसा न जारी करने से वेतन भुगतान के बिना निगमकर्मियों की हड़ताल को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। आखिरकार अगर केजरीवाल सरकार को केंद्र बर्खास्त कर देता है, तो वे शहादत का जामा पहन कर देश में गैर-भाजपा दलों के बीच सबसे ऊंचा स्थान हासिल कर लेंगे। केजरीवाल की असली ख्वाहिश अगले लोकसभा चुनावों में मोदी के मुख्य विकल्प के रूप में उभरने की है।

तब मामला नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी का नहीं होगा, न ही मोदी बनाम नीतीश कुमार होगा। मामला नरेंद्र मोदी बनाम अरविंद केजरीवाल का होगा। और यही दिल्ली के मुख्यमंत्री का आखिरी लक्ष्य है।

प्रकाश नंदा

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