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नौका डूबी: समाज की इच्छाओं-टकराहटों के बीच की टकराहट

युग-दृष्टा लेखक-कविवर रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने भारतीय समाज को अपने समय से जोडऩे की कोशिश की है। इसी कारण उनकी लेखनी में समाज में मौजूद कमियों को उजागर करने और समाज को उचित दिशा दिखाने के प्रयास स्पष्ट रूप से लक्षित रहे हैं। उनकी रचना संसार के उल्लेखनीय उपन्यास ”नौका डूबी’’ में कमला, रमेश, डॉ. नलिनाक्ष, हेमनलिनी के माध्यम से व्यक्ति की मनाव्याकुलता के रहस्य उद्घाटित हुए हैं। उपन्यास में रवीन्द्र नाथ ठाकुर की लेखनी के माध्यम से व्यक्ति के अन्तर्लोक और समाज की इच्छाओं-आस्थाओं के मध्य होने वाली टकराहट से उत्पन्न त्रासद जीवन-दशाओं की अभिव्यक्ति पाठक के दिल पर अपनी छाप छोड़ती है।

उपन्यास का नायक रमेश कोलकाता में रहता है और उसके पड़ोस में रहने वाले परिवार की कन्या हेमनलिनी से उसका प्रेम प्रसंग चलता है। हेमनलिनी उसके बचपन के मित्र योगेन्द्र की बहन है। उनके संबंधों के त्रिकोण का एक कोना अक्षय है जिसके अन्तर्मन में भी कहीं हेमनलिनी बैठी है। रमेश और हेमनलिनी का विवाह तय हो चुका है, लेकिन विवाह से पूर्व ही रमेश के पिता उसे अन्य कन्या से विवाह के लिए गांव ले जाते हैं। उसके विरोध के बावजूद विवाह हो जाता है लेकिन लौटते हुए रमेश को छोड़ कर सभी बराती एक दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त वह कन्या लापता हो जाती है, जिसके साथ रमेश का विवाह होता है और उसी दुर्घटना का शिकार हुई अन्य बारात की वधु को रमेश अपनी पत्नी समझ कर ले आता है। लेकिन बाद में उसे अपनी भूल का पता चलता है तो एक भद्र पुरूष की भांति वह उस वधु के पति की तलाश भी करता है। बेहद उलझे हुए घटनाक्रम के इस जाल को लेखक बहुत ही सहजता से सुलझाता चलता है।


नौका डूबी

लेखक : रवीन्द्रनाथ ठाकुर

प्रकाशक : राजकमल

मूल्य: 450 रु.,

पृष्ठ: 252


उपन्यास से पाठक को बांग्ला समाज के रीति रिवाजों, रहन-सहन और तत्कालीन आचार व्यवहार की झलक भी मिलती है। तेजी से घूमते घटनाचक्र से पाठक बंधा रहता है। नियती में बंधे रमेश और कमला से उसकी सहानुभूति भी होती है। रमेश के कार्यकलापों से वह अपनी उम्र से अधिक समझदार बालक लगता है।

‘गोरा’ की रचना से पूर्व रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने भारत के जिस प्रकार के समाज की कल्पना की थी, और समाज में जिस प्रकार के चिन्तन-परिवर्तन का वह रूप देख रहे थे, उसका स्वरूप इस उपन्यास में साफ झलकता है। ‘नौका डूबी’ को अच्छी तरह समझने के लिए उसमें निहित विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक प्रयोगों को भी ठीक से समझने की जरूरत है। उपन्यास में समग्र समाज के भीतरी व्यवहारों को स्थान मिला है।

उपन्यास का अनुवाद भारतीय स्वाधीनता प्राप्ति के उद्देश्य से तत्कालीन पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) में गठित क्रांतिकारी संस्था, ‘अनुशीलन-समिति’ के संस्थापक सदस्य स्नेहमय दत्त और समिति की क्रांन्तिकारी सदस्य मुकुलरानी दत्त की पुत्री जयश्री दत्त ने किया है। अर्थव्यवस्था में उच्च शिक्षा प्राप्त जयश्री दत्त अपने विश्वविद्यालयी जीवन में अर्थशास्त्र की कक्षा से अधिक बांग्ला-साहित्य की कक्षाओं में बैठती थीं, जिससे उन्हें परिवार से मिले साहित्यिक संस्कारों को मांजने-संवारने का मौका मिला। इससे साफ है कि जयश्री दत्त का इस उपन्यास के अनुवाद कार्य में प्रामाणिकता और मूल की यथासंभव रक्षा की होगी।

                (उदय इंडिया ब्यूरो)

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