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कुदरती चमत्कार : दिखा बर्फीले तेंदुए का जोड़ा

इस खूबसूरत पल को अधिक यादगार व हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो में संजोए रखने के लिए नर व मादा तेंदुए की तस्वीरें उद्यान में लगे कैमरों में कैद कर ली गई। नर तेंदुए की तस्वीरें 18 नवंबर की रात में और मादा तेंदुए की तस्वीरें 2 दिसंबर की सुबह खींची गईं।

जून 2013 में उत्तराखंड राज्य में भयानक हादसा हुआ, लेकिन साल का अंत पर्यटकों, उत्तराखंड सरकार और वन विभाग के लिए चमत्कार साबित हुआ। उत्तरकाशी स्थित गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान (जी.एन.पी.) में पहली बार दुर्लभ व विलुप्त प्रजाति के बर्फीले तेंदुए की जोड़ी देखी गई।

इस खूबसूरत पल को अधिक यादगार व हमेशा के लिए इतिहास के पन्नो में संजोए रखने के लिए नर व मादा तेंदुए की तस्वीरें उद्यान में लगे कैमरों में कैद कर ली गई। नर तेंदुए की तस्वीरें 18 नवंबर की रात में और मादा तेंदुए की तस्वीरें 2 दिसंबर की सुबह खींची गईं। गौरतलब है कि उद्यान में पिछले 3 सालों से भी ज्यादा समय से कुल 6 कैमरे लगे हुए हैं।

संसार में संकटग्रस्त जातियों की आई. यू.सी.एन. लाल सूची के दुर्लभ व विलुप्त प्रजातियों में शामिल बर्फीले तेंदुए मूलत: जमीन से 3000-4500 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। उत्तरकाशी जिले में हुए वल्र्ड वाईल्ड लाईफ फंड (डब्लयू. डब्लयू. एफ.) के सर्वे ‘उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश में बर्फीले तेंदुए का संरक्षण’ में बिल्ली के समान दिखने वाले जानवर का जिक्र था, जिसे पैंथरा उनसीया या तकनीकी भाषा में उनसीया उनसियल कहा जाता है। हालांकि, सर्वे में इस बात का जिक्र वहां के मूल निवासियों द्वारा देखे जाने के कारण किया गया था। इस बात का छाया रूपी कोई प्रमाण नहीं था कि उद्यान (जो तिब्बत सीमा से लगा हुआ है) में पैंथरा उनसीया ही है।

इस खोज के बारे में विस्तार से बताते हुए जी.एन.पी. के उपमहासचिव गोरखनाथ यादव ने कहा – ‘अतंत: हमें तस्वीर रूपी प्रमाण मिल गया है। गंगोत्री से गोमुख के बीच तकरीबन 10,500 फुट की ऊंचाई पर बर्फीले तेंदुए की जोड़ी सैर करती हुई उद्यान में लगे कैमरे में कैद हो गई है। सर्दियों में दुर्लभ बिल्लियां जब अपने शिकार के लिए कम ऊंचाई वाले स्थान पर आ जाती हैं तो उनके कैमरे में कैद होने के आसार बढ़ जाते हैं। ऊंचाई पर रहने वाली बिल्लियों के अपने प्रिय शिकार नीली भेड़ की तलाश में नीचे आने पर उन्हें कैमरे में कैद कर लेने का अनुभव बहुत शानदार और रोमांचक है। यह योजना बेहद लाभदायक सिद्ध हो रही है और इन (बर्फीले तेंदुए व नीली भेड़) की मौजूदगी की पुष्टी हो चुकी है, अब हम इनके संरक्षण में ध्यान दे रहे हैं।’

यादव आगे कहते हैं – ‘संरक्षण प्रक्रिया के तहत हम इनके निवास स्थान को बेहतर करेंगे। पहरेदारी नियमित कर दी जाएगी व घास वाले स्थानों को नष्ट होने से बचाने के लिए कदम उठाए जाएंगे। मृदा संरक्षण के उपाय जैसे बांध बनाने व भूस्खलन को रोकने आदि पर काम किया जाएगा। यह उद्यान करीब 2300 वर्ग कि. मी. में फैला हुआ है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 10,000 से 22,000 फुट है। 10 वर्ग कि. मी. की वृत्ताकार जगह में कोई मानव आवास नहीं है। इस नजरिए से यह उद्यान इन जीवों के लिए आदर्श स्थान है।’

बर्फीले तेंदुए को पहली बार देखे जाने के बाद से ही इसको हिमालय की ऊंची चोटियों की मुख्य प्रजाति होने का दर्जा मिल गया था। भारत के बिशकेक घोषणा-पत्र (बर्फीले तेंदुए के सरंक्षण) पर हस्ताक्षर के महीने भर में जी. एन. पी. आ गया था। गौरतलब है कि बर्फीले तेंदुए की संख्या बाघों की तुलना में काफी कम है। बर्फीले तेंदुए के संरक्षण वाले संसार में कुल 12 देशों- भारत, चीन, भूटान, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान, मंगोलिया, नेपाल, पाकिस्तान,रूस, तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान ने इस घोषणा पत्र को अपनाया है। रिपोर्ट के अनुसार, जंगली ईलाकों में करीब 7500 बर्फीले तेंदुए हैं। बिशकेक घोषणा पत्र के अंतर्गत उन 20 संरक्षण स्थानों को सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी, जहां 2020 तक 100 प्रजनन के काबिल व्यस्क होंगे। इसके साथ उन स्थानों पर, जहां ये प्रजातियां पायी जाती हैं, वहां निरंतर विकास किया जाएगा। एक अनुमान के मुताबिक भारत में हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, सिक्किम व अरूणाचल प्रदेश आदि स्थानों पर मौजूद तेंदुओं को मिलाकर कुल 200-500 बर्फीले तेंदुए हैं।

भले ही गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान में इसे पहली बार देखा गया हो, परंतु उत्तराखंड में बर्फीले तेंदुए या आम भाषा में थरूवा, हिम बाघ या बर्फानी चीता का देखा जाना कोई नई बात नहीं है। इस जंगली बिल्ली का सबसे पहला तस्वीररूपी प्रमाण 10 अप्रैल 2011 को देहरादून स्थित वाईल्ड लाईफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया और नन्दा देवी जीवमंडल के मलारी क्षेत्र के प्रदेश जंगल विभाग की टीम ने प्रस्तुत किया था।

यूनेस्को के मानव एंव जीवमंडल कार्यक्रम – 2004 में जीवमंडल घोषित किए गए नंदादेवी जीवमंडल में नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान में जगह-जगह करीब 15 कैमरे लगे हुए हैं। उसी वर्ष हिमालय स्थित चमोली में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल के पास फक्र्या गांव में एक और बर्फीले तेंदुए को देखा गया था।


गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान (जी.एन.पी.) में बर्फीले तेंदुए के जोड़े के पाए जाने से खुश वाईल्ड लाईफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया भारत सरकार के साथ मिलकर जानवरों के मल-मूत्र के डी. एन. ए. की जांच करेगी। वरिष्ठ वैज्ञानिक और देहरादून स्थित वाईल्ड लाईफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया में विशेषज्ञ डॉ. सत्याकुमार ने कहा – ‘उद्यान में और अधिक कैमरों की व्यवस्था के अतिरिक्त, हम डी. एन. ए. नमूनों की जांच से पता लगाने की कोशिश करेंगे कि उद्यान में या आसपास और कितने बर्फीले तेंदुए हैं। ऐसा करने से हमें इनके संरक्षण और सुरक्षा में मदद मिलेगी।’ हालांकि, प्रोजेक्ट शुरू होने में साल भर का समय लगेगा और इसके पहले चरण की शुरूआत नन्दा देवी जीवमंडल से होगी।


तस्वीर रूपी प्रमाण से पहले बर्फीले तेंदुए की उपस्थिति को कार्निवोर साइन सर्वेज से निरीक्षण किया जाता रहा था। इस प्रणाली के अंतर्गत उसके कदमों के निशान और उसके द्वारा खाए जानवरों के अवशेष से उसकी उपस्थिति का अंदाजा लगाया जाता है। इसके अलावा नन्दा देवी जीवमंडल, गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान व गोविंद राष्ट्रीय उद्यान के अधिकारियों व इलाके के लोगों द्वाराबर्फीले तेंदुए को देखे जाने की खबरों को भी तरजीह दी जाती रही है।

विशेषज्ञों की शोध के अनुसार मलारी लपथल, बद्रीनाथ माना, नंदा देवी, फूलों की घाटी का ऊपरी भाग, गंगोत्री स्थित निलौंग घाटी, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और रूद्रप्रयाग के कुछ हिस्से जैसे हिमालय के पार के क्षेत्रों को बर्फीले तेंदुए के आवास स्थान के रूप में जाना जाता है।

बर्फीले तेंदुए की हड्डियों व चमड़ी की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारी कीमत है। इसके लिए इन पर अवैध शिकार का खतरा बना रहता है। इसे हिमालयी परितंत्र में मांसाहारी पशुओं की श्रेणी में रखा जाता है।

वर्ष 2006 में भारत सरकार ने देश के पांच हिमालयी श्रेणी राज्यों (हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, सिक्किम व अरूणाचल प्रदेश) में प्रोजेक्ट बर्फीले तेंदुए को प्रोजेक्ट टाईगर के साथ आरम्भ किया था। गौरतलब है कि इन जगहों पर इसके देखे जाने के प्रमाण मिले थे। वाईल्डलाईफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एस. सत्याकुमार ने गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान में इसे देखे जाने की घटना को किसी जादू से कम नहीं बताया। डॉ. एस. सत्याकुमार नन्दा देवी जीवमंडल के शोध व ईलाकों के कर्मचारियों को कैमरे में जीव हलचल को कैद करने का प्रशिक्षण देते हैं। उन्होंने कहा – ‘यह बहुत अच्छी बात है कि आखिरकार हमें जी. एन. पी. में बर्फीले तेंदुए के होने के तस्वीररूपी प्रमाण मिल गए हैं। अब जब हमारे पास बर्फीले तेंदुए के होने के पुख्ता प्रमाण हैं, हम इनकी सुरक्षा और इनके शांतिपूर्ण जीवन के लिए जरूरी कदम उठाएंगे।’

बर्फीले तेंदुए का चीन से राज्य में आगमन की तरफ इशारा करते हुए डॉ. सत्याकुमार ने कहा – ‘हम स्पष्ट रूप से नहीं कह सकते, पर ऐसा संभव है कि यह सीमा पार से राज्य में आया हो। उत्तर-पूर्व दिशा में यह उद्यान तिब्बत सीमा से लगा हुआ है। हालांकि, सीमा को ठीक प्रकार से चिह्नित नहीं किया हुआ है, फिर भी ऐसी संभावना है कि यह सीमा पार से राज्य में आया हो। वैसे भी भारत में बर्फ के प्रदेश काफी कम हैं, जो इन के लिए आदर्श आवास होते हैं। इन्हें लंबी यात्रा करने वाले जीवों में शुमार किया जाता है, जो एक निश्चित समय में काफी दूरी तय कर लेते हैं। लेकिन, अगर हम इनके लिए सुरक्षित आवास देने में कामयाब होते हैं तो उद्यान के लिए यह एक उपलब्धि होगी।’

रमन अहूजा

 

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