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आत्म दीपो भव:

आत्म दीपो भव:

By उपाली अपराजिता रथ

जीवन के इस राह पर हर आदमी भटका हुआ है, हमेशा सही और गलत चुनने में पूरी जिन्दगी बिता देते है। इस सफर को सरल बनाने के लिए अगर कोई एक उपाय है तो वह है अपने अंदर का ज्ञान और सही ज्ञान हमें सिर्फ शास्त्र ही दे सकता है। हमारा शास्त्र हमें स्वयं से अवगत कराता है। किसी भी कठिनाई का हल हमारे शास्त्रों के अंदर ढ़ूढऩे से मिल जाता है। उसमें जीवन का सरलतापूर्वक विश्लेषण किया गया है। किसी के व्यक्तित्व का आधार उसका शास्त्रीय ज्ञान ही हैं।

हिन्दू धर्म शास्त्र दो प्रकार के हैं, आगम शास्त्र और निगम शास्त्र। आगम शास्त्र के अंदर समस्त पुराण आता है। पुराणों में साधारण मनुष्य बोधगम्य होकर ज्ञान की परिपक्वता को प्राप्त करता है। हम पुराणों को  कहानी के रूप मे पढ़कर उससे मिले संदेशों को जीवन के आचार-विचार में उतार सकते हैं। दूसरा शास्त्र, निगम शास्त्र है। इसके अंतर्गत समस्त वेद आते हैं। हिन्दू धर्म का अस्तित्व कहा जाए तो व्यतिक्रम नहीं होगा, लेकिन वह केवल ऋषि-मुनि तथा ज्ञानी विज्ञानी के अंदर सीमित हो जाता है। वेदों को समझना साधारण मानव के लिए कठिन हो जाता है। अभ्यास द्वारा इस कठिनाई को दूर किया जा सकता है। नियमित शास्त्र पाठन के द्वारा धीरे-धीरे कठिन से कठिन बातें भी समझ में आ जाती हैं।

रामायण, महाभारत तथा भागवत, यह सभी एक से बढ़कर एक ज्ञान के भंडार हैं। रामायण का हर चरित्र अपने आप में एक उदाहरण है। हर चरित्र से हमें अनेक बातें सीखने को मिलती हैं। हम श्रीराम को परमात्मा मान लेते हैं तो सीताजी को जीवात्मा। जीवात्मा अगर एकनिष्ठ परमात्मा के ध्यान में रहे तो स्वयं परमात्मा अनेक कठिनाई का सामना करके मनुष्य के राक्षसी प्रवृत्तियों अथवा कुस्वभाव से मुक्त कर सकते हैं।

महाभारत का हर एक पन्ना ज्ञानवर्धक है। इस कलयुग में अनेक कठिनाईयों का सामना करने के बावजूद मनुष्य खुद को विसादमुक्त कर सकता है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिए हैं, वह समस्त मानवजाति के लिए मूल्यवान उपहार है। उसी तरह भक्ति और प्रेम के द्वारा कैसे ईश्वर प्राप्ति की जा सकती है, हम भागवत के माध्यम से जान सकते हैं।

ईश्वर कृपा पाने के लिए जीवन को चार सोपान के जरिये लेना पड़ता है। पहला आत्म कृपा, दूसरा शास्त्र कृपा, तीसरा गुरू कृपा और चौथा ईश्वर कृपा, जो कि न केवल अंतिम बल्कि परम सत्य भी है। इसलिए हर इंसान के नित्य जीवन में शास्त्र ज्ञान अपने अंदर अपनाना चाहिए। एक अच्छा व्यक्ति विकसित होने के लिए मूल सुदृढ़ होना बहुत जरूरी है।

विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पूज्यते।।Что такое Апдейтtranslation service

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