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यौन शिक्षा: शाश्वत संस्कृति को चुनौती

यौन शिक्षा मुक्त सेक्स की संस्कृति की स्थापना की दिशा में एक निर्णायक कदम है, क्योंकि शिक्षा में सेक्स को स्थान मिलते ही यह ‘मुक्त सेक्स’ हमारे सार्वजनिक आचार-विचार में वैधता और संस्थागत स्थान प्राप्त कर लेगा। इस सन्दर्भ में पश्चिम के अनुभव हमारे सामने है।

वर्तमान युग में भौतिकवाद और व्यक्तिवाद के अतिरेक के कारण एक ऐसी स्थिति विकसित हो रही है जिसमे प्रत्येक जड़ तथा चेतन पदार्थ बाजार का अंग बनता जा रहा है। इसके फलस्वरूप शिक्षा, स्वास्थ्य, मानव विशेषकर महिलाओं की गरिमा इत्यादि जैसे सभ्यता के मूलाधार भी बाजार में लाभ के अंग बन गये हैं, जो कि न केवल अनुचित है बल्कि हमारे जैसे देश के लिए विनाशक भी है। इससे एक ‘मुक्त सेक्स की संस्कृति’ (फ्री सेक्स कल्चर) को बढ़ावा मिल रहा है, जिसकी अभिव्यक्ति प्रचार के प्रत्येक माध्यम से हो रही है। इन सबके मिश्रित और परस्पर प्रभावों के कारण आज युवा पीढ़ी को सर्वाधिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। अर्जुन के संयम की शक्ति तथा विवेकानंद के ब्रह्मचर्य के ओज को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहने के स्थान पर, आज हमारा यौवन बॉलीवुड सितारों का अनुकरण कर रहा है। यह रूपांतरण प्रतिगामी तथा मानव की मूल प्रकृति के विरुद्ध है।

यौन शिक्षा इसी मुक्त सेक्स की संस्कृति की स्थापना की दिशा में एक निर्णायक कदम है, क्योंकि शिक्षा में सेक्स को स्थान मिलते ही यह ‘मुक्त सेक्स’ हमारे सार्वजनिक आचार-विचार में वैधता और संस्थागत स्थान प्राप्त कर लेगा। इस सन्दर्भ में पश्चिम के अनुभव हमारे सामने है।

हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक तथा धार्मिक मूल्य व आचार प्रणाली में ब्रह्मचर्य को ही सर्वोच्च उपलब्धि मानकर आध्यात्मिक उत्थान का मुख्य आधार माना गया है। चूंकि ब्रह्मचर्य का आदर्श सभी के लिए सरल नहीं है, अत: संयम व सदाचार के माध्यम से ‘काम’ को नियंत्रित करने का विकल्प अपनाया गया है। हमारे सांस्कृतिक मूल्य, धार्मिक आचार संहिता तथा सामाजिक व्यवस्था में ‘सेक्स’ को संयम से जोड़ा गया है तथा इसे भोग की वस्तु न मानकर मनुष्य का एक विशिष्ट कर्तव्य माना गया है, जिसमे केवल संतानोत्पति के लिए सेक्स को अनुमति दी गयी है। विवाह को इस कर्तव्य निर्वहन का साधन माना गया है तथा उसे एक स्थायी तथा अटूट संबंध के रूप में व्याख्यायित किया गया है।

दूसरी तरफ यौन शिक्षा, सेक्स को एक सामान्य भोग की वस्तु मानकर, मुक्त यौन संबंध को स्वीकृति देती है बशर्ते कि यह संबंध सुरक्षित साधनों के उपयोग के साथ बनाया जाए। इससे स्पष्ट है कि यौन शिक्षा, सेक्स के संबंध में हमारे आदर्शों, मूल्यों और आचरण को पूरी तरह से रूपांतरित कर देगी। इससे सामाजिक शुचिता के मापदंडों में मूलभूत बदलाव आ जाएगा एवं वर्तमान मापदंड पूरी तरह विनष्ट हो जाएगा और विवाह की संस्था अपने भौतिक-आध्यात्मिक कर्तव्य से हटकर केवल अल्पकालिक यौन-संतुष्टि का साधन बन जाएंगी। क्या भारत जैसे देश के लिए यह उचित होगा? क्या हम हमारी विवाह संस्था को समाप्त या विकृत कर देना चाहते हैं? क्या वास्तव में हमारे आदर्श, मूल्य तथा आचरण के मापदंड निरर्थक हो गये हैं कि उसे यौन शिक्षा देकर बदला ही जाना चाहिए? हमारी संस्कृति ने जो आदर्श व मूल्य स्थापित किए थे, वे आज सारी दुनिया में ‘मानवीय आदर्श’ और ‘मानवीय मूल्य’ के नाम से स्थापित हैं। क्या हम इन मूल्यों से स्वयं को दूर कर लेना चाहते हैं? यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘ना’ है तो यौन शिक्षा के विचार को ही पूर्ण रूप से नकार देना चाहिए।

किसी भी नयी अवधारणा या वस्तु को स्वीकार करने से पहले हमें उसके तीन आयामों पर अवश्य ही गहराई से विचार करना चाहिए। ये तीन आयाम है – उद्देश्य, स्वरूप और परिणाम। यौन शिक्षा के संबंध में इन तीन आयामों पर विचार करना प्रासंगिक ही नहीं बल्कि आवश्यक भी होगा।

यौन शिक्षा के उद्देश्य को व्याख्यायित करते हुए दिल्ली सरकार के यौन शिक्षा सम्बन्धी साहित्य में मुख्यत: तीन बातों पर बल दिया गया है – यौन-अंगों एवं यौन सम्बन्धी अन्य जानकारियां प्रदान करना, एच.आई.वी/एड्स की रोकथाम के लिए जागरूकता लाना तथा यौन शोषण को रोकना। इनसे निम्नलिखित प्रश्न उभरकर सामने आते हैं।

  • यौन संबंधी जानकारी तो पहले से ही हाईस्कूल की जीव विज्ञान की किताबों में दे जाती रही है और बच्चे उस किताब का अध्ययन भी करते हैं। ऐसी स्थिति में अलग से यौन सम्बन्धी जानकारी देने की क्या आवश्यकता है?
  • भारत में एच.आई.वी/एड्स की समस्या का कोई प्रामाणिक ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इस संबंध में पूर्व में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा दिये गये आंकड़ों को स्वयं भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री भी भ्रामक व सत्य से परे बता चुके हैं। हाल में ही नये सर्वेक्षण के साथ एच.आई.वी ग्रस्त व्यक्तियों की संख्या आधी हो गयी है। अत: हम एड्स के मामले में कोई ठोस निष्कर्ष निकालने में समर्थ नहीं है। इससे ऐसा लगता है कि एड्स की बीमारी एक समस्या कम तथा हौवा अधिक है। ऐसे हौवे को आधार बनाकर यौन शिक्षा देने का क्या औचित्य है?
  • मेरा मानना है कि एड्स का कारण सेक्स का अज्ञान नहीं बल्कि सेक्स का अतिरेक है। यदि एक-पति व्रत तथा एक-पत्नी व्रत के हमारे प्राचीन आदर्शों का प्रचार-प्रसार किया जाए तो निश्चित रूप से एड्स की समस्या का स्थायी समाधान मिल सकता है। जबकि सेक्स का ज्ञान देने से न तो एड्स की समस्या का समाधान होगा और न ही युवाओं में संयम का गुण विकसित होगा। ऐसे में यौन शिक्षा क्यों आरम्भ की जाए?
  • राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के अनुसार 1986 से लेकर 2006 तक भारत में एड्स से मरने वाले लोगों की संख्या 124995 है अर्थात प्रतिवर्ष लगभग 6250 व्यक्ति एड्स के कारण अकाल ही मृत्यु का शिकार होते हैं।
  • वर्तमान में दक्षिण अफ्रिका में एड्स की समस्या ने सर्वाधिक विकराल स्वरूप धारण किया हुआ है। दक्षिण अफ्रिका के राष्ट्रपति श्री थाओ अम्बेकी ने एड्स के रोग के वर्तमान में दिए जा रहे कारण तथा निदान की पद्धतियों पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। इस संबंध में अनेक स्थापित वैज्ञानिकों ने भी एड्स के प्रति वर्तमान मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाया है। इन वैज्ञानिकों में नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक भी शामिल हैं। यौन शिक्षा प्रदान करने की वर्तमान नीति भी एड्स के संबंध में इसी द्रष्टिकोण की देन है। अत: यह आवश्यक है कि पहले एड्स को लेकर व्याप्त शंका एवं प्रश्नों का समाधान ढुंढा जाए।
  • यौन शोषण का मुद्दा सेक्स के ज्ञान से नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण के मापदंडों से जुड़ा है। बालकों का यौन शोषण करने वाला व्यक्ति एक तरह से बीमार होता है, जिसके व्यक्तित्व में मनोवैज्ञानिक विकृति घर कर गयी होती है। ऐसे में यौन शिक्षा देकर भी उन्हें यौन शोषण से सुरक्षित नहीं कर सकते। इसके समाधान के लिए तो एक तरफ कानून-व्यवस्था को कुशल व प्रभावी बनाना होगा तथा दूसरी तरफ लोगों को नैतिक शिक्षा के द्वारा मानसिक रूप से सशक्त बनाना होगा ताकि वे इस तरह के आचार-विचार से स्वयं को दूर रखने में समर्थ बन सके।

इससे स्पष्ट हो जाता है कि यौन शिक्षा का उद्देश्य व्यापक, सकारात्मक, सार्थक और दूरदर्शितापूर्ण नहीं है। इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिस कार्य के उद्देश्य की सार्थकता न हो, उस कार्य को आरम्भ करना ही निरर्थक है।

यौन शिक्षा के परिणामों का परिदृश्य भी मन को घनघोर अंधकार की ओर ले जाने वाला है। भारत का भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवेश विश्व के अन्य देशों से पूरी तरह विशिष्ट है तथा इस परिवेश में यौन शिक्षा को लागू करना गंभीर समस्याएं खड़ी कर सकता है। भारत एक गर्म जलवायु वाला देश है जहां यौन सम्बन्धी मामलों में पश्चिम की अपेक्षा अधिक त्वरित ढंग से उत्तेजना फैलती है। इस तरह के भौगोलिक परिवेश में स्कूल के भीतर यौन विषयों पर विचार-विमर्श किशोरों में उत्तेजना के भाव को बढ़ाएगा, जिसके फलस्वरूप न केवल व्यभिचार बढ़ेगा, बल्कि कई प्रकार की सामाजिक-पारिवारिक और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं उठ खड़ी हो सकती हैं। इस तरह के परिवेश में एक तरफ तो किशोरों के बीच बड़े पैमाने पर यौन संबंध स्थापित होंगे तथा दूसरी तरफ यौन-शोषण में भी वृहत् स्तर पर वृद्धि होगी।

किशोरावस्था में यौन संबंध स्थापित होने से किशोरों विशेषकर किशोरियों के स्वास्थ्य पर भयंकर नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे। वस्तुत: इन्हीं नकारात्मक प्रभावों को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने महिलाओं के विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष रखी है। एक तरफ भारत सरकार स्वस्थ और समृद्ध वैवाहिक-पारिवारिक जीवन के लिए कानून के माध्यम से समाज से बाल विवाह को समाप्त करने के लिए प्रयासशील है तथा दूसरी तरफ सरकार ही यौन शिक्षा देकर यौन सक्रियता को प्रोत्साहित कर रही है। इन विरोधाभासी नीतियों का कोई सकारात्मक व अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हो सकता।

यौन संबंधों के बढऩे से यौन-स्वच्छंदता की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। पश्चिमी देशों के अनुभव यह बतलाते है कि यौन संबंधों के संदर्भ में स्वच्छंद वातावरण समूह सेक्स, समलैंगिक सेक्स,अप्राकृतिक सेक्स जैसी विकृतियों को जन्म देता है और इन प्रवृतियों की वृद्धि-दर भी अत्यधिक तेज होती है। ऐसी दशा में बहुत कम समय में ही युवा वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इन प्रवृत्तियों में लिप्त हो जाता है। भारतीय समाज इन प्रवृतियों को आत्मसात करने और इसे स्वाभाविक मानने के लिए कतई तैयार नहीं है और भारत सरकार को भारतीय समाज की व्यवस्था को ध्यान में रखकर नीतियां बनानी चाहिए न कि अंतरराष्ट्रीय दबावों और प्रवृत्तियों के आधार पर।

परिवर्तनों की तीव्रता के बावजूद आज भी भारतीय समाज का ढांचा परिवार, विशेषकर संयुक्त परिवार पर आधारित है। संपूर्ण विश्व में भारत ही एक मात्र ऐसा देश है जहां परिवार की संस्था बनी हुई है। यह परिवार संस्था हमारे लिए न केवल लाभदायी है बल्कि हमारी गौरवपूर्ण ऐतिहासिक विरासत की एक बहुमूल्य धरोहर भी है। इस संस्था को बचाये रखना तथा इसे और अधिक सशक्त बनाना हमारा कर्तव्य भी है और आवश्यकता भी है। परंतु यौन शिक्षा के विनाशकारी प्रभाव पडेंग़े, क्योंकि यह शिक्षा व्यक्तिवादी और अति-भौतिकवादी वातावरण एवं द्रष्टिकोण के विकास को सुनिश्चित करेगी। इससे विवाह संस्था, दूसरों के सुख के लिए स्वयं त्याग करने की भावना और माता-पिता की सेवा को सर्वोच्च कर्तव्य मानने की भावना का पतन हो जाएगा। विवाह संस्था तथा इन पारिवारिक भावनाओं के पतन परिवार, व्यक्ति को सुरक्षा, सदाचार और समृद्धि का वातावरण प्रदान करता है। यदि परिवार ही नहीं होगा तो फिर असुरक्षा एवं भटकाव का माहौल विकसित होने में देर नहीं लगेगी। इतिहास गवाह है कि दुनिया के अधिकांश युद्ध असुरक्षा-बोध के फलस्वरूप हुए हैं। आतंकवाद और अन्य प्रकार की हिंसा ने भारत में वैसे ही असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है, ऐसे में यदि परिवार संस्था टूटेगी तो क्या दशा स्थापित होगी यह सहज ही समझा जा सकता है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने यौन शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षक की योग्यता के बारे में कहा था कि यौन शिक्षा वही प्रदान कर सकता है जिसने अपनी इन्द्रियों पर विजय/नियंत्रण प्राप्त कर लिया हो। क्या भारत सरकार के पास ऐसे शिक्षक हैं? क्या भारत सरकार ने शिक्षकों के लिए कोई ऐसा प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तैयार किया है, जिससे शिक्षक को अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करने में सफलता मिल गयी हो? क्या गांधीजी द्वारा बतलाई गयी इस योग्यता के परीक्षण का कोई मापदंड भारत सरकार के पास है? इस तरह की योग्यता वाले शिक्षक आज हमारे पास अपवाद रूप में ही मौजूद हैं। ऐसे योग्यता के अभाव में यदि यौन शिक्षा प्रदान की जाएगी तो इसके निम्नलिखित दुष्परिणाम सामने आयेंगे –

  • शिक्षक या शिक्षिका स्वयं किशोरी या किशोर के यौन शोषण में सक्रिय हो जायेंगे, क्योंकि वे भोले-भाले छात्रों को आसानी से विश्वास में ले सकते हैं। पश्चिमी देशों में इस तरह के शोषण के अनेकानेक किस्से सामने आये हैं। ऐसे में यह पूरी आशंका है कि भारत के स्कूलों में ही ‘निठारी-कांड’ घटित होने लगे।
  • पश्चिमी देशों में इस तरह का शोषण करने वाले शिक्षक-शिक्षिका को कड़ी सजाएं देने व्यवस्था की गयी है। यदि एक शिक्षक भी यौन-शोषण के मामले में स्वयं को गलत तरीके से निर्दोष सिद्ध करने में सफल हो गया तो अन्य शिक्षकों के लिए यह एक तरह का प्रोत्साहन हो जाएगा। हम जानते हैं कि हमारे देश में अपराध-वृद्धि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कारण भारत में कानून लागू करने सम्बन्धी अकुशलता और धीमी गति ही है।
  • छात्र-छात्राओं के व्यवहार पर शिक्षकों का व्यवहार निर्णायक प्रभाव डालता है। ऐसे में यदि कोई एक शिक्षक भी यौन शोषण में लिप्त पाया गया तो सभी छात्र-छात्राओं के जीवन व उनके व्यवहार पर कितना घातक दुष्प्रभाव पड़ेगा?
  • शिक्षक के ऐसे दुव्र्यवहार का सर्वाधिक घातक प्रभाव महिला-शिक्षा पर पड़ेगा क्योंकि एक बार स्कूल अथवा शिक्षक की विश्वसनीयता समाप्त होने के बाद एक भारतीय माता-पिता अपनी पुत्री को अनपढ़ रखना तो पसंद करेंगे पर ऐसी स्कूल में भेजना पसंद नहीं करेंगे।
  • गुरु-शिष्य की भारत की अनमोल परंपरा का पूरी तरह से पतन हो जाएगा। गुरु के प्रति शिष्य में रहे आदर-भाव का पतन हो जाएगा। इससे स्कूल का वातावरण मन्दिर के स्थान पर भोग-केन्द्र जैसा बन जाएगा।

यू.एस.ए., कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान तथा यूरोपीय देशों में कई सालों से यौन शिक्षा दी जा रही है और इन देशों में आज निम्नलिखित प्रवृत्तियां अनियंत्रित दिशा में तीव्र गति से बढ़ रही हैं।

किशोरावस्था में गर्भधारण

स्कूली शिक्षा के दौरान ही गर्भधारण की समस्या से लगभग ये सभी देश पीडि़त हैं। ब्रिटेन में तो यह आलम है कि स्कूल के भीतर ही नर्स तथा गर्भपात केन्द्र खोलने पड़े हैं। ब्रिटेन तथा अमरीका में 10 वर्ष, 11 वर्ष की आयु में बालिकाएं गर्भधारण कर रही हैं। यदि भारत में भी इसी तरह की समस्या उठ खड़ी हुई तो विवाह-पूर्व का यह गर्भधारण किशोरी व उसके परिवार के लिए सामाजिक बहिष्कार और अलग-अलग प्रकृति की भयंकर सामाजिक तनाव का कारण बन सकते हैं।

अप्राकृतिक यौन संबंध

इन देशो में यौन शिक्षा प्रदान किए जाने से ‘मुक्त सेक्स की संस्कृति’ विकसित हुई है, जिसके फलस्वरूप वहां यौन-स्वच्छंदता का माहौल विकसित हुआ है। इसके कारण वहां अप्राकृतिक सेक्स-समलैंगिक सेक्स, मुख-मैथुन, समूह सेक्स की प्रवृत्ति को अत्यधिक बढ़ावा मिला है। इन प्रवृत्तियों में अत्यधिक वृद्धि के कारण कई देशों ने अपने यहां समलैंगिक संबंध को वैधानिक मान्यता प्रदान कर दी है।

परिवार संस्था और विवाह संस्था का पतन

इन देशों में इस तरह की संस्थाएं अब नाम मात्र की रह गयी हैं, जिससे वहां पर कई प्रकार की मनोवैज्ञानिक समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। व्यक्ति का अकेलापन सामाजिक तनाव का कारण बन रहा है। भारत में अभी भी इस तरह की समस्या अत्यंत न्यून है और मानसिक स्वास्थ्य अपेक्षाकृत बेहतर दशा में है। भारत में लगभग सभी मनोचिकित्सक यौन शिक्षा का समर्थन कर रहे हैं। विकसित देशों के इस अनुभव को जानने के बाद यह सहजता से समझा जा सकता है कि भारतीय मनोचिकित्सक क्यों यौन शिक्षा का समर्थन कर रहे हैं।

किशोरावस्था विद्या प्राप्ति तथा तपस्या की अवस्था है। आज के संदर्भ में कहा जाय तो यह अवस्था करियर(भविष्य) के निर्माण की है। परंतु विकसित देशों में यौन शिक्षा के कारण किशोरों का ध्यान करियर से हटकर भोग-विलासिता की और केन्द्रित हो गया है। कुछ वर्ष पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा था – ”आप अध्ययन में ध्यान दीजिए अन्यथा भारत जैसे देशों के युवा आपके अवसरों को प्राप्त कर लेंगे।’’ इसका तात्पर्य यह है कि वहां युवा पीढ़ी भटकाव का शिकार हो रही है। मुझे तो यह आशंका भी हो रही है कि एड्स के नाम पर यौन शिक्षा शुरु करने का अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का आग्रह कहीं भारतीय युवा प्रतिभा को बरबादी की ओर ले जाना तो नहीं है?

विकसित देशों के उपरोक्त अनुभवों से स्पष्ट है कि यदि भारत में भी यौन शिक्षा लागू की गयी तो यहां पर भी मुक्त सेक्स की संस्कृति को संस्थागत तथा वैध रूप हासिल हो जाएगा। इससे कई प्रकार की सामाजिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक समस्याएं खड़ी होंगी। भारत में कानून एवं व्यवस्था लागू करने वाली प्रशासनिक मशीनरी वैसे भी अपर्याप्त, अकुशल और असमर्थ सिद्ध हो रही है।

मेरा मानना है कि मुक्त सेक्स की संस्कृति की भारत में स्थापना का आरम्भ लगभग 1970 के दशक में हुआ तथा 1990 के दशक से इसकी तीव्रता, गहनता और व्यापकता में तेज गति से वृद्धि हो रही है। आज तो हमारी यह मनोदशा बन चुकी है कि जब हम बाजार को मुक्त बना रहे हैं, जब हम सीमाओं को मुक्त कर रहें हैं, तब भारत में सेक्स को क्यों न मुक्त किया जाए? यह शिक्षा पवित्रता, मर्यादा और सदाचार पर आधारित हमारी संस्कृति को विकृति का शिकार बना देगी। यह हमारी शाश्वत संस्कृति की वेदना है जो मेरे माध्यम से अभिव्यक्त हो रही है।

हमारे सांस्कृतिक दर्शन में यह बात लिखी है कि निर्वस्त्र को अलंकार धारण करने का अधिकार नहीं है। हमारी जीवन प्रणाली में नैतिकता ही वस्त्र है तथा आध्यात्मिकता अलंकार है। यौन शिक्षा तो हमारे जीवन से वस्त्र रूपी नैतिकता का चीरहरण कर देगी। ऐसे में फिर आध्यात्मिकता के अलंकार का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। यदि भारत सरकार यौन शिक्षा को रोककर हमारे युवाओं के जीवन में वस्त्र (नैतिकता) की उपलब्धता बनाये रखनी है।

आचार्य विजयरत्न सुंदरसूरि

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