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बालिकाओं को शिक्षा, संस्कार और सहानुभूति जैसे मुद्दों पर आखिर कब तक चुप रहेगा देश?

मीडिया, विचारक और समाज के प्रमुख व्यक्ति शिक्षा के प्रयासों को आगे बढ़ा सकते हैं। एक गहन तंत्र ऐसा बने जिसके बाद महत्वपूर्ण नतीजे सामने आ सके। यहां यह कहना महत्व रखता है कि अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा महिला सशक्तिकरण के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक है। इस तरह का मानवीय प्रयास उन्हें उनका उचित स्थान दिलाता है।

बीसवीं सदी में महसूस किया गया कि सभी के लिए शिक्षा के वैश्विक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जल्द ही कदम उठाने होंगे। एक राष्ट्र होने के नाते जब हम प्रारंभिक शिक्षा के सभी के लिए समान अवसरों की बात करते हैं तो बहुत सी सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक बाधाओं से दो-चार होना पड़ता है, खासकर लड़कियों की शिक्षा को लेकर। देश के बहुत से हिस्सों में लड़कियों को पढ़ाने को लेकर कई तरह की वर्जनाएं हैं। आजादी के बाद जब संविधान के अनुसार सभी के लिए शिक्षा की नीति लागू करने की बात आई तो इन सभी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। देखा गया है कि दुनिया के किसी भी समाज में औरत जितनी ही शिक्षित है वह समाज उतना ही वह सभ्य और मानवीय है। भारत के सांस्कृतिक अतीत को देखें तो बहुत सी ऐसी महिलाएं हमें मिलेंगी जो शैक्षिक स्तर पर पीछे नहीं हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में महिलाओं को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। लेकिन समय के साथ साथ समाज में औरतों के लिए वर्जनाएं लगातार बढ़ती गईं। उन्हें घर तक सीमित रखा जाने लगा। आजादी के बाद भी लड़कियों को स्कूल भेजने में कई रुकावटें थीं लेकिन हमारे नेताओं और दूसरे प्रतिष्ठित व्यक्तियों के प्रयासों से इस दिशा में काफी कुछ प्रगति हो सकी। स्वामी विवेकानंद का कहना है कि ”भारत में दो ही बुराइयां हैं, एक तो महिलाओं का पीडऩ और दूसरे गरीबों का जातिगत आधार पर दलन… भारतीय महिलाओं की कई बड़ी समस्याएं हैं लेकिन कोई भी ऐसी नहीं है जिसे ‘शिक्षा’ नाम के जादूई शब्द से दूर न किया जा सके… महिलाओं को शिक्षित करो और उनके हाल पर छोड़ दो, वे खुद ही बताएंगी कि उनके लिए कौन से सुधार जरूरी हैं… जिस देश में वेदांत बताता है कि हर जीवित प्राणी में एक ही आत्मा है, वहां औरत और मर्द के बीच फर्क क्यों किया जाता है, यह समझना बहुत मुश्किल है। क्या आत्मा के बीच भी कोई यौन विभाजन है… औरत हो या मर्द, है तो वह आत्मा ही।’’

महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता से पहले देश का नेतृत्व करते हुए प्रारंभिक शिक्षा का एक प्रारूप विकसित किया था जिस पर डॉ. जाकिर हुसैन और दूसरे शिक्षाविदों ने आगे काम किया। गांधी चाहते थे कि आजादी मिलने के बाद भारत के हर गांव में स्कूल हों जहां लड़के और लड़की दोनों को शिक्षा मिल सके।

बात सिर्फ गांधीजी या विवेकानंद की ही नहीं है, बहुत से और ऐसे नाम हैं जिन्होंने महिला शिक्षा की दिशा में काम किया है। और बदलाव आए, वे भले ही काफी दुरूहताओं और पीड़ाओं के बाद आए हैं, महत्वपूर्ण तो है ही। आज भारत में माता-पिता यह समझ गए हैं कि लड़कों और लड़कियों के लिए शिक्षा हासिल करना कितना जरूरी है। वे स्कूल जा रही हैं। फिर भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में और रोजगार में लड़कियों की संख्या कम ही है। इसकी ये कुछ वजहें हैं:

  • स्कूलों के लिए दूर जाना पड़ता है।
  • स्कूल में पीने के पानी की कमी और अलग गुसलखानों का न होना।
  • आर्थिक दबाव, माता-पिता का स्थानांतरण, जीवनयापन के साधनों का अस्थायित्व।
  • घर का काम, छोटे भाई-बहन की देखभाल, बालवाडिय़ों का न होना।
  • घर का असहयोगपूर्ण वातावरण।
  • स्कूलों का अनियमित कामकाज।
  • अध्यापिकाओं का न होना।
  • सरकारी स्कूलों का विश्वसनीय न होना।
  • बाल विवाह।
  • काम-काज की जगहों में काम में उनके योगदान की कदर न होना। कृषि कार्यों में उनका योगदान 55-56 प्रतिशत होता है फिर भी इसको अनदेखा की किया जाता है।
  • संस्थानों और काम की जगहों पर असुरक्षा और यौन प्रताडऩा का भय।
  • लड़की को पढ़ाने के बजाय शादी
  • पर उसके दहेज के लिए पैसे बचाने का आम चलन।
  • पारिवारिक कलह, घर का अनुपयुक्त वातावरण, मर्दों के पीने की आदत।
  • बढ़ावा देनेवाली सरकारी योजनाओं और व्यवस्थाओं की जानकारी न होना।

शिक्षा के मामले में पुरुषों और महिलाओं में समानता की दिशा में काफी उत्साहवद्र्धक संकेत मिल रहे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार महिलाओं में जहां शैक्षिकता का अनुपात 65.46 रहा है जबकि पुरुषों में यह 82.14 और कुल मिलाकर 74.04 है। उत्तर प्रदेश और बिहार में महिला शैक्षिकता की दर सिर्फ 59.3 और 53.3 है जो चिंता का विषय है। इन दोनों राज्यों में लड़कियों की स्कूलों में भर्ती के मामले में गिरावट देखने में आ रही है। आंकड़े बताते हैं कि 6 से 14 वर्ष आयुवर्ग के 92.14 लाख बच्चे अब भी स्कूल नहीं जाते। जिन स्कूलों में लड़कियों के गुसलखाने हैं वहां प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्तर पर लड़कियों के दाखिलों में वृद्धि देखी गई है। 15 साल तक के बच्चों में लड़कों के मुकाबले 1.8 करोड़ कम लड़कियां स्कूल जाती हैं। एक दशक पहले स्कूल जानेवाले बच्चों में 100 लड़कों की तुलना में 914 लड़कियां स्कूल जाती थीं। 1950-51 में स्कूल जाने वाली लड़कियों का प्रतिशत प्राइमरी में 28.1, अपर प्राइमरी में 16.1, और सेकेंडरी व सीनियर सेकेंडरी में 13.1 था। 2007-08 में ये आंकड़े क्रमश: 47.5, 45.8 ओर 43.4 रहे। दिलचस्प बात यह है कि आंकड़ों के अनुसार अध्यापिकाओं की संख्या में भी इस दौरान वृद्धि हुई है। शिक्षा के लिए जिला सूचना प्रणाली (डीआईएसई) के आंकड़ों के अनुसार देश भर में 10,75,407 स्कूलों में से 1.28 लाख स्कूलों में गुसलखाने ही नहीं हैं और 61,000 में पीने के पानी की व्यवस्था भी नहीं है। अधिकारियों का दावा है कि लड़कियों के लिए 84.68 प्रतिशत गुसलखाने का इस्तेमाल लायक है जबकि इनके मुकाबले लड़कों के सिर्फ 65.87 प्रतिशत गुसलखाने ही इस्तेमाल योग्य हैं। ये आंकड़े काफी बड़े लग सकते हैं। लेकिन एन.ई.यू.पी.ए के एक विश्लेषण के अनुसार ”कई स्कूलों में जहां गुसलखाने और पीने के पानी की व्यवस्था है, ये सुविधाएं न होने के बराबर है। आंध्र प्रदेश में 74.6 प्रतिशत स्कूलों में लड़कों के गुसलखाने हैं लेकिन इनमें से सिर्फ 21.57 प्रतिशत ही इस्तेमाल किए जा सकने लायक हैं।

ये सभी आंकड़े बताते हैं कि व्यावहारिक स्तर पर लड़के और लड़की के बीच समानता की कमी पाठ्यक्रम निर्धारकों और पाठ्य पुस्तक लेखकों के लिए एक संदेश है। एक सभ्य समाज में माना जाता है कि लड़के के पैदा होने पर जिनती खुशी मनाई जाती है, लड़की के पैदा होने पर भी उतनी ही मनाई जानी चाहिए। आज भी बहुत से इलाके ऐसे हैं जहां सदियों से लड़की के पैदा होने कोई खुशी नहीं होती क्योंकि लड़का तो उनके लिए कमाकर लाएगा, उनकी परंपरा को आगे बढ़ाएगा। लड़कियों के पैदा होने से पहले ही गर्भ में मार देने की घटनाएं उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और महाराष्ट्र में काफी संख्या में होती हैं। पंजाब और हरियाणा में यह ज्यादा होता है। बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में लड़कियां बचपन में मर जाती हैं। यह चिता की बात है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ सेवाएं अपर्याप्त तो हैं ही, वहां तक पहुंचना भी दुश्कर होता है। गरीब वर्ग के लोगों में बालिका के जन्म के दो वर्ष के भीतर ही मृत्यु ज्यादा देखने को मिलती है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि शिक्षित और संपन्न घरों में भी लड़कियों की गर्भ में ही मृत्यु में वृद्धि हो रही है। पंजाब इस मामले में आगे है।

बालिका को स्कूल ले जाने और उच्च व व्यावसायिक शिक्षा की ओर आकृष्ट करने में विकास की बड़ी भूमिका है। महिला सशक्तिकरण के राष्ट्रीय मिशन के प्रवर्तन ने नई उम्मीदें जगाई हैं। इस मिशन की गतिविधियां महिलाओं को आर्थिक उन्नति की दिशा में प्रवृश्र करना, महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को खत्म करना और ऐसे कार्यक्रम चलाना है जिससे महिलाओं का राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सशक्तिकरण हो सके। उनके सशक्तिकरण के ये सभी कार्यक्रमों का आधार यही है कि शिक्षा उन तक पहुंच सके।

शिक्षा को इस तरह का होना चाहिए कि उसमें लड़के या लड़की के बीच किसी तरह का भेद न आए। एन.सी.ई.आर.टी. और कोठारी आयोग की रिपोर्ट ने इस दिशा में काफी काम किया है। 1978, 1988, 2000, और 2004 में पाट्यक्रम में हुए बदलावों में इस चीज का बहुत खयाल रखा गया है और इन्हीं के अनुसार पाट्यपुस्तकें तैयार की गई हैं। उनके लेखकों के सामने स्पष्ट कर दिया गया है कि उनके सामने कितना महत्वपूर्ण काम है और उन्हें ‘शहरी मध्यवर्ग वाले पूर्वाग्रह’ से बाहर निकलकर काम करना होगा। समाज और सरकारी तंत्र में भी इसके प्रति संवेदना जगानी होगी। एक भ्रष्ट, असंवेदनशील, कल्पनाशक्ति विहीन शासन शैली में कई तरह के बदलाव आने जरूरी हैं ताकि बदलाव आ सकें। हालत यह है कि एक अच्छी शिक्षित महिला को भी घर और काम की जगह और आते-जाते भी हिंसा का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों ने महिला सशक्तिकरण के लिए चार महत्वपूर्ण आयामों पर काम किए जाने की जरूरत बताई है: संज्ञानात्मक अर्जन, मनोवैज्ञानिक शक्ति, आर्थिक सुरक्षा और राजनीतिक प्रोत्साहन। 16 दिसंबर 1912 को घटी विकल त्रासदी से 13 सितंबर 2013 को इस पर निर्णय आने वाले दिन के बीच दिल्ली में ही हजारों बलात्कार हुए हैं। किसी भी सम्य समाज के लिए यह शर्मनाक और घिनौना व्यवहार है। समाज का हर घटक और शासन प्रणाली को अपनी जिम्मेवारी का एहसास हो गया है और जरूरत है कि वह जल्द ही कोई कदम उठाएं।


आध्यात्मिक उन्नति के लिए मानव, मानवता और शिक्षा


बुनियादी शिक्षा के प्रचार और प्रसार द्वारा उसके उद्देश्य को यदि प्रभावी ढंग से हासिल कर लिया गया होता और धार्मिक विभिन्नता की इन सच्चाईयों को लोगों द्वारा स्वीकार कर लिया गया होता, तो यह धरती मानव निवास और सभ्यता के विकास के लिए ज्यादा शांतिपूर्ण और एकजुट होती। पृथ्वी पर मनुष्यों के शांतिपूर्ण निवास की परिकल्पना, जो न सिर्फ धार्मिक विविधता, बल्कि असंख्य अन्य विविधताओं को बताने वाली सार्वभौमिक शिक्षा हो, उसके अलावा और कोई दूसरी बेहतरीन रणनीति नहीं है। मनुष्य लंबे समय से ऐसे पूर्वाग्रहों से जूझता आ रहा है, जो ऐसे शक्तिशाली और संसाधनपूर्ण लोगों द्वारा बनाए गए थे, जिनकी नजर में ‘तुच्छ’ समझे जाने वाले लोग गुलाम बनाने के काबिल हैं।

जाति प्रथा ने सदियों से असंख्य लोगों को उनकी गरिमा को अपमानित कर, प्राकृतिक रूप से मिले उनके अधिकारों से वंचित किया है। रंगभेद और गुलामी का प्रचलन उन लोगों की कृतियां थीं, जो निहित स्वार्थों और अपने विशेषाधिकार के लिए संयुक्त रूप से आगे आए। जाहिर है, इसका मतलब था दूसरे की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विरासत को हड़प कर उन्हें अभावग्रस्त बनाकर दोयम दर्जे के मनुष्य की जिंदगी जीने को मजबूर करना। ‘रूट्स’ शीर्षक से उपन्यास के रूप में प्रकाशित ऑर्थर हीली के प्रसिद्ध शोध-पत्र में शानदार ढंग से यह बताया गया है कि कैसे मनुष्य एक अमानवीय कानून बनाता है और बिना किसी दुविधा और पश्चाताप के इसे लागू करता है।

मानव विकास की आगे बढ़ती यात्रा विचलन और सजा से आगे बढ़ चुकी है और इसने स्वयं की प्रगति की गति को भी चुन लिया है। मानवीय सरलता की खामी युक्त हलचल और इस अतिविषम तंत्र से आने वाले लोग, पृथ्वी पर मानवता के लिए घृणित परंपराओं और प्रथाओं की समाप्ति और उसमें सुधार के प्रयास के प्रति पूरी तरह आश्वस्त हैं। एक अब्राहम लिंकन पैदा होता है, वह अपने उद्देश्यों को प्राप्त करता है, दुनिया की अंतरात्मा को झकझोरता है और मारा जाता है। एक मोहनदास करमचंद गांधी गुजरात में पैदा होता है, इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त करता है और अपने जीवकोपर्जन के लिए दक्षिण अफ्रीका चला जाता है। एक विशेष रंग की चमड़ी होने के कारण, उसे बार-बार अपमानित होना पड़ता है। व्यक्ति की महानता उसके दृष्टिकोण में निहित होती है। पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर रेल की प्रथम श्रेणी की बोगी से बाहर फेंका जाना, न सिर्फ उनका व्यक्तिगत अपमान था, बल्कि सभी काली चमड़ीवाले व्यक्तियों का अपमान था। यह सिर्फ दक्षिण अफ्रीका या अफ्रीका तक सीमित न होकर, वैश्विक स्तर पर था।

यह मामला भारत के सर्वोच्च स्तर के ज्ञान, बुद्धिमत्ता और अध्यात्मिकता के सार का समावेशन था : ‘सभी मनुष्यों की शाश्वत एकता।’ एक व्यक्तिगत अपमान को वैसे लोगों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ एक लंबे संघर्ष में बदलने का प्रयास था, जिनकी कोई गलती नहीं थी। दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद, गांधी ने भारत में सदियों से एक साथ रहते आए अछूतों के साथ नीच और अपमानजनक बर्तावपूर्ण स्थिति को महसूस किया। उन्होंने अपनी नैतिकता के साथ इसके खिलाफ एक लंबे संघर्ष की शुरूआत की। वे भाग्यशाली थे कि उनके इस उद्देश्य के लिए कई दिग्गजों का ईमानदार और गंाभीर्य साथ मिला। इन लोगों ने गांधी को अटूट सहयोग दिया। उन्होंने सभी मनुष्यों की समानता, जाति प्रथा के खिलाफ लगातार संघर्ष, सांप्रदायिक सौहाद्र्र के प्रयास के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया, ताकि आने वाली पीढिय़ों के लिए सौहाद्र्रपूर्ण माहौल का मार्ग प्रशस्त हो सके। बदले में उन्हें सीने पर गोली मिली। यह दूसरी कहानी है कि वह कार्य कितना कठिन था, जिसे पूरा करने की प्रक्रिया में वह डूबे हुए थे। आज भी उनका सिद्धांत लाखों लोगों का प्रेरणास्रोत है।

मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने भी उसी दर्द का अनुभव किया, जो गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में महसूस किया था। काले, नीग्रो लोगों के लिए अलग बसें, अलग कैफे उस देश में थे, जो आज युवाओं के सपनों को पूरा करने के वाले देश के रूप में प्रसिद्ध है और वह देश है – संयुक्त राज्य अमेरिका। मार्टिन आश्वस्त थे कि भारत के महात्मा गांधी द्वारा दिखाया गया रास्ता, इन अमानवीय और अस्वीकार्य प्रथाओं से अकेले अमेरिका को बचा सकेगा। यह उनका दृढ़विश्वास ही था, जिसने अमेरिका के अपमानित और वंचितों को मुखर बनाया और दुनिया भर के लोगों को बताया कि ‘हम कामयाब होंगे’। उन्होंने पूर्वाग्रह से ग्रस्त रंगभेद को अंजाम देने वाले लोगों को अपने साथियों के साथ किए जाने वाले पाप से बचाया और इस प्रक्रिया ने लाखों काले रंग के व्यक्तियों को मानवीय गरिमा का उपहार दिया।

आज अमेरिका में एक काला व्यक्ति, बराक ओबामा राष्ट्रपति बनता है, ऐसा मार्टिन लूथर किंग जूनियर के उदय से पहले अकल्पनीय था। हालांकि मार्टिन का भाग्य भी उनके नैतिक संरक्षक महात्मा गांधी से जुदा नहीं था। बहुत दूर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद मिटाने के उस अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए नेल्सन मंडेला का उदय हुआ, जिसे मोहनदास करमचंद गांधी ने अपने दक्षिण अफ्रीकी प्रवास के दौरान शुरू किया था। कल्पना कीजिए उस तीन दशकों के बारे में, जब शत्रुतापूर्ण और क्रूर सरकार ने उन्हें जेल में बंद कर उनके साथ दुश्मन नंबर-1 का व्यवहार किया। फिर भी उन्होंने अपने सिद्धांतों में साहस, नैतिकता और विश्वास को बनाए रखा। यह मानवीय आत्मा को अपरिहार्य और अदम्य शक्तियुक्त बनाए रखने का दूसरा महान उदाहरण है।

मानवीयता के ह्रास के अन्य उदाहरण भी हैं। इतिहास हिटलर और मुसोलिनी के उदय को नजरअंदाज नहीं कर सकता, जिन्होंने लाखों लोगों पर अनगिनत आपराधिक सितम ढाए। हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराकर पुरूषों, महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों पर की गई अकल्पनीय क्रूरता को भी मानवता कभी भूला नहीं सकती। एक जोसफ स्टालिन था, जिसने अपने ‘संयुक्त सोवियत समाजवादी गणराज्य’ में लाखों लोगों का कत्लेआम किया और दुनिया मूकदर्शक बनकर देखती रही। यही नहीं, आम आदमी के कष्टों को दूर करने की बात कहने वाले भारत सहित दुनिया भर के वामपंथियों का वह हीरो था। चीन में माओत्से तुंग को अपनी प्रभु सत्ता कायम करने के लिए लाखों लोगों का कत्लेआम करने में कोई झिझक नहीं हुई। और आश्चर्यजनक रूप से, माओ और स्टालिन दोनों ही आज भी आदरणीय और प्रशंसनीय हैं। वियतनाम की लड़ाई एक और उदाहरण है, जब विश्व के सबसे विकसित देश अमेरिका ने आम नागरिकों पर नेपाम बम से हमला किया था। यही देश रसायनिक हथियार के आरोप में सीरिया पर आक्रमण करने को तैयार बैठा है। इसके पहले जनसंहार के हथियार रखने के आरोप में अमेरिका इराक को ध्वस्त कर चुका है। हालांकि सद्दाम हुसैन, जिसने स्वयं अपने देशवासियों का कत्लेआम किया, उसकी हत्या के बाद भी उन हथियारों का पता नहीं चल सका। विश्व में आज जितनी हिंसा प्रचलित है, उतनी पहले कभी नहीं थी। बढ़ते आपसी अविश्वास, धार्मिक कट्टरता और कट्टरपंथ इसे संबल दे रहे हैं। इसने आज वैश्विक स्तर पर वृहद और अकल्पनीय सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। इससे हथियारों के ज्यादा से ज्यादा उत्पादन और बिक्री को बढ़ावा मिल रहा है। आज भी मनुष्य ऐसे माहौल बनाने से नहीं झिझकता, जो व्यापक नरसंहार के हथियारों की बिक्री को बढ़ाता है। प्रति वर्ष शांति के लिए नोबेल पुरस्कार दिया जाता है। आतंकवादी घटनाओं में मरने वाले लोगों की संख्या प्रति वर्ष बढ़ रही है। जाहिर है कि चतुर और दुष्टतापूर्ण प्रयासों के कारण संवेदनशील, प्रबुद्ध, सहानुभूतिक और सैद्धांतिक प्रयासों में भारी गिरावट आई है। इस मोर्चे पर व्यवहार में परिवर्तन की आवश्यकता है, जो मुख्यत: सही शिक्षा से ही संभव है।

आज 21वीं शताब्दी में समय की मांग है कि सही शिक्षा की रूपरेखा को तैयार और चित्रित किया जाए, जो सही आचरण और सही ज्ञान को परिभाषित कर सके। इन दोनों लक्षणों का उचित रूप में अर्जन ही सही आस्था है। धार्मिकता का मूलतत्व अध्यात्मिकता की अनुभूति पर टिका है। यह बदलाव की प्राप्ति की मुख्य चाबी है, जिसकी कमी से हिंसा, युद्ध, हत्या और दमन जैसी स्थितियां सामने आती हैं। तो आईए, उस शिक्षा की सामग्री और प्रक्रिया को खोजने का प्रयास करते हैं, जो हर व्यक्ति को अध्यात्मिकता का ज्ञान देते हुए मानवीय मूल्य आधारित जीवन जीने की सीख दे।

                                (जेएसआर)


राजनीति और दृष्टिकोण का आविर्भाव

भारतीय संविधान में इस व्यवस्था को लेकर कई धाराएं हैं जिनमें मर्द और औरत में बराबरी की बात पर जोर दिया गया है। धारा 14,15,15(3), 16 और 21(ए) विशेष रूप से बराबरी और शिक्षा के संदर्भ में प्रासंगिक हैं।

धारा 14. कानून के समक्ष समानता: भारतीय सीमा के भीतर किसी भी कानून के अनुपालन में राज्य किसी भी व्यक्ति को समानता के अधिकार से वंचित नहीं कर सकेगा।

धारा 15. धर्म, वर्ण, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।

लड़कियों और महिलाओं पर आधारित सिफारिशों के लिए भारत सरकार ने समय समय पर कई समितियां गठित की हैं, कई विशेषज्ञों को इस काम पर लगाया है। 1959 में दुर्गाबाई देशमुख की अध्यक्षता में गठित महिला शिक्षा राष्ट्रीय समिति सिफारिश की थी कि व्यावसायिक शिक्षा और सामान्य शिक्षा में लड़कों के साथ साथ लड़कियों बराबरी के आधार पर शामिल किया जाए ताकि वे ‘घर और बाहर अपने काम के लिए पूरी तरह तैयार’ हो सकें।

महत्वाकांक्षी ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड में प्राइमरी स्तर के हर स्कूल के लिए साजो-सामान और अध्यापकों के मामले में सहायता देने का कार्यक्रम था जिसमें अध्यापिकाओं की नियुक्ति पर भी जोर दिया गया। ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड की तरह सर्वशिक्षा अभियान में भी पचास प्रतिशत अधपिकाओं को रखे जाने पर जोर दिया गया है। कारण वही है: बहुत से माता-पिता अपनी बेटियों को ऐसे स्कूलों में नहीं भेजते जिनमें सिर्फ अध्यापक हों, अध्यापिकाएं न हों। दूसरी बात यह भी है कि अध्यापिकाएं ज्यादा संवेदनशील होती हैं और बच्चों का बेहतर खयाल रखती हैं।

उच्च शिक्षा में महिलाओं के मामले में कई महिला अध्ययन विभाग गठित किए गए हैं, सर्वेक्षण आयोजित किए गए हैं ताकि महिलाओं के मामले को बेहतर ढंग से समझा जा सके। हर पंचवर्षीय योजना में महिला शिक्षा विकास के संदर्भ में प्रमुख स्थान दिया जाता रहा है। इस संदर्भ में 2005 में सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ एजुकेशन की महिला शिक्षा समिति का गठन किया गया। इसने शिफारिश की है कि: 18 साल तक की लड़कियों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा दी जाए और जोर देकर कहा कि लड़कियों की पढ़ाई में किसी भी तरह का खर्चा उनसे न लिया जाए। यह शिफारिश भी की गई कि प्रत्येक शिक्षा संस्थान में अध्यापिकाओं और सेविकाओं की नियुक्ति समुचित कार्य सुविधाओं के साथ की जाए, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में यह बहुत जरूरी है।

आंकड़े बताते हैं कि शिक्षित लड़कों और लड़कियों का प्रतिशत काफी बढ़ा है। इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि लड़कों और लड़कियों के आंकड़ों में अंतर कम-ज्यादा होता रहा है, 2011 में यह सबसे कम है। लेकिन अब भी यह 16.68 के काफी ऊंचे स्तर पर है।

मात्र प्रारंभिक शिक्षा या उच्च शिक्षा हासिल कर लेने का मतलब यह नहीं है कि इस पुरुष प्रधान दुनिया में महिलाओं के लिए भी बराबरी के मौके होंगे। जब तक एक ओर हमारा समाज और समुदाय की सोच और दूसरी तरफ मर्द में बदलाव नहीं आता तब तक महिलाओं का सशक्तिकरण होने में संदेह है।

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा

शिक्षा से मनुष्य में दूसरी चीजों के साथ साथ समस्याओं को हल करने की कुशलता मिलती है। इसकी जरूरत महिलाओं को ज्यादा है क्योंकि जब वह घर की सुरक्षित चारदीवारी से बाहर निकलती हैं तो उन्हें बहुत सहयोगपूर्ण वातावरण नहीं मिलता। वर्ष 1912-13 में भारतीय मीडिया लड़कियों और महिलाओं के विरुद्ध बड़ी संख्या में भयावह हिंसा के मामले सामने लाया है। इस पर किसी भी समाज को शर्मिंदा होना चाहिए।

इस हिंसा का सबसे बदतरीन रूप है यौन हिंसा। ज.एस. वर्मा समिति की रिपोर्ट आने के बाद और ऐसे अपराधों से निपटने के लिए भारतीय दंड विधान में किए गए परिवर्तनों से भी इन अपराधों में कमी नहीं आई है। यौन हिंसा के संदर्भ में शहरीकरण, काम पाने के लिए दूसरी जगहों पर जाना और अकेलेपन की अनदेखी नहीं की जा सकती। यौन हिंसा के मामलों में अगर पीडि़त और उसका परिवार साहस दिखाकर शिकायत करने के लिए आए तो काफी फर्क पड़ सकता है। कई बार तो लड़कियां अपने ही हितचिंतकों, पारिवारिक मित्रों संबंधियों और परिचितों के हाथों ही पीडि़त होती हैं। स्कूलों और कॉलेजों में महिलाओं के प्रति यौन अपराधों और हिंसा के मामलों को देखने के लिए विशेष समितियां गठित की जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा बनाम राजस्थान सरकार केस (1997) में काफी विस्तार से बताया है कि काम की किन जगहों पर महिलाओं के साथ यौन प्रताडऩा के अपराध हो सकते हैं। फैसले में जोर देकर कहा गया है कि कामकाजी महिला को सम्मान के साथ और यौन प्रताडऩा से सुरक्षित वातावरण में सम्मान के साथ काम करने का अधिकर है।

 

वर्णगत भेदों की व्याख्या

कुछ ही समय पहले तक वर्णगत भेदों की बात को स्वीकार किया जाता था। मानव सभ्यता के विकास में वर्णगत श्रेष्ठता और हीनता के विश्वासों को लेकर कई लड़ाइयां लड़ी गई हैं। अस्पश्र्यता, गुलामी और भेदभाव में विश्वास किया जाता रहा है। आज भी गुलामी, भेदभाव और जातिगत विभेदों के उन्मूलन के बाद भी किसी न किसी स्तर पर आज भी ये मौजूद हैं। औरत और मर्द के बीच का फर्क भी साफ दिखाई देता है। प्रजनन कार्यों में जो अंतर है वह दैहिक अंतर है। मर्द की दुनिया का तर्क है: ”पुरुष श्रेष्ठ यौनरूप है क्योंकि वह औरत के मुकाबले शारीरिक रूप से और बौद्धिक रूप से भी श्रेष्ठ है। दूसरी ओर औरत कमजोर यौनरूप है। शारीरिक रूप से और बौद्धिक स्तर पर पुरुष से हीन है लेकिन ज्यादा प्यार देने वाली है, ज्यादा विनम्र है, वह रचनाशीलता में ज्यादा विश्वास रखती है, वह चीजों को सुरक्षित रखने में विश्वास रखती है उन्हें बदलने में नहीं, वह घर को बनाती है।

20वीं सदी के उत्तराद्र्ध में लड़कियों और महिलाओं के लिए अपनी क्षमता दिखाने के लिए कई रास्ते खुले हैं। आज भी कुछ ऐसे देश हैं जहां महिलाओं को ड्राइविंग लाइसेंस नहीं दिए जाते। 14 साल की मलाला युसुफजई पर हत्या की नीयत से हमला होता है लेकिन किस्मत से वह बच गई और आज वह पूरी दुनिया के सामने एक आदर्श है। जी हां, ज्यादातर पुरुष समझ चुके हैं कि उन्हें औरत को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए ताकि एक संवेदी और शांतिपूर्ण विश्व बन सके।

पिछले कुछ सालों से गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ रहा है। अपने परिवारों के साथ शहरों में आनेवाले हजारों हजार शहरी मजदूर देखे जा सकते हैं। वे एक मुश्किल जीवन जीते हैं, ठेकेदार उन्हें बहुत कम तनख्वाह देता है, उनके लिए किसी तरह की कल्याणकारी योजनाएं नहीं है। इनमें से ज्यादातर का निजी स्कूलों पर विश्वास नहीं है क्योंकि ये उनकी पहुंच से बाहर हैं। शहरी झोपड़पट्टियों में रहनेवालों के लिए बालवाडिय़ों, स्वास्थ्य सेवाओं, मजदूरों के बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए परिवहन व्यवस्था जैसी किसी तरह की सुविधाएं ठेकेदार नहीं देता। इनमें भी लड़कों के मुकाबले लड़कियों के लिए स्कूल जाना कहीं ज्यादा मुश्किल है।

शिक्षा के जरिए सशक्तिकरण की रणनीतियां

हाल की का 14 वर्षीय मलाला युसुफजई का उदाहरण हमारे सामने है जिसे इसलिए गोली मार दी गई क्योंकि वह स्कूल जा रही थी और दूसरी लड़कियों से भी स्कूल जाने के लिए कह रही थी। यह उदाहरण शिक्षा के द्वारा लड़कियों के सशक्तिकरण के बारे में बहुत कुछ कह देता है। आज वह पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है। शैक्षिक नीतियां इस तरह बनाई जानी चाहिए कि वे लड़कियों और महिलाओं को उन्हें अपनी ताकत और व्यक्तित्व को पहचानने में मदद कर सके, अपने सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक अधिकारों को जानने में भी मदद कर सके।

मीडिया, विचारक और समाज के प्रमुख व्यक्ति शिक्षा के इन प्रयासों को आगे बढ़ा सकते हैं। एक गहन तंत्र ऐसा बने जिसके बाद महत्वपूर्ण नतीजे सामने आ सके।

इस बात को फिर दोहराया जा सकता है कि अच्छी गुणवत्तावाली शिक्षा महिला सशक्तिकरण के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है और प्रत्येक मानवीय प्रयास में उन्हें उनका उचित स्थान दिलाता है।

       जे. एस.राजपूत

   (लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)

 

 

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