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बदले-बदले मेरे (आप) सरकार नजर आते हैं …

केजरीवाल विश्वासमत प्राप्त करने से पूर्व ही चुनावी वादे पूरे करने में जुट गये, जिसका उन्हें कोई नैतिक अधिकार नहीं था। दो दिन पूर्व उन्होंने स्वयं ही कहा कि उनके पास केवल 48 घंटे बचे हैं और उनकी सरकार रहे या चली जाये इसकी उन्हे परवाह नहीं है, पर वह अपने बिजली और पानी के दो वादे पूरे करना चाहते है।

ब्रिटेन में कोई लिखित संविधान नहीं है। वेस्टमिनिस्टर पद्धति पर चल रहा राजशाही संसदीय लोकतन्त्र अपनी महान् परंपराओं तथा उदाहरणों व पूर्वनियमों के मजबूत स्तंभों पर कई सदियों से बराबर खड़ा है। ब्रिटिश लोग कानून, अपनी उच्च परंपराओं व उदाहरणों का अनुपालन कर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं। हमारे देश में भी वेस्टमिनिस्टर पद्धति पर आधारित संसदीय लोकतन्त्र है, लेकिन हम अपनी उत्कृष्टम उदाहरणों व परंपराओं की हत्या करने में ही अपनी शूरवीरता समझते हैं। हम अपने संविधान की कसम तो खाते हैं, पर हमारे शासक दल संविधान के प्रावधानों को अपने संकीर्ण राजनीतिक व चुनावी स्वार्थों की पूर्ति के लिए उन में नकेल डालने के लिए हर कदम उठाने को सदा तत्पर रहते हैं। इस प्रक्रिया में राष्ट्रहित की अवहेलना हो जाती है।

भारत के चुनावी क्षितिज पर राजनीति के कई नौसिखियों की आम आदमी पार्टी (आप) उभरी है। केवल एक वर्ष के अंतराल में उसने जनमानस की नब्ज को पहचाना और 125 वर्ष पुरानी कांग्रेस को दिल्ली में धराशायी कर दिया। आप के नेता अरविन्द केजरीवाल ने तो कांग्रेस की तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकी शीला दीक्षित को 25 हजार से अधिक मतों से परास्त कर दिया। भारत के चुनावी इतिहास में अपने आप में यह एक नई घटना है। भाजपा-अकाली गठबंधन 32 सीटों के साथ सब से बड़ी पार्टी के रूप में अवश्य उभरी, पर उसके पास पूर्ण बहुमत के लिए चार सीटों की कमी रह गई। विधायकों के क्रय-विक्रय का बाजार गर्म करने के बजाए सरकार न बनाने का निर्णय ले लिया। सत्ताधारी कांग्रेस को मात्र 8 सीटें मिलीं। एक स्थान जनता दल (यू) को मिला और एक निर्दलीय के खाते गया।

चुनाव परिणाम निकलने से एक दिन पूर्व अरविन्द केजरीवाल ने अपने वचन को और भी पुख्ता बनाने के लिए अपने बच्चों तक की कसम खा डाली कि वह न तो भाजपा, न ही कांग्रेस को समर्थन देंगे और न लेंगे। (ईश्वर उनके बच्चों की रक्षा करे।) शुरू-शुरू में तो ऐसा लगा कि शायद दिल्ली वालों को खंडित जनादेश की सजा भुगतनी पड़ेगी और प्रतिनिधि सरकार के स्थान पर राष्ट्रपति शासन ही झेलना पड़़ेगा। यही कारण था कि शीला दीक्षित के त्यागपत्र देने के बाद 15 दिन तक दिल्ली में कोई प्रतिनिधि सरकार नहीं रही, क्योंकि परंपरा के अनुसार उप राज्यपाल ने त्याग-पत्र स्वीकार करते समय उन्हें वैकल्पिक सरकार बन जाने तक पद पर बने रहने को कहा।

काफी माथा-पच्ची व तोल-मोल के बाद कांग्रेस ने अपने 8 विधायकों का आप सरकार को बाहर से ‘बिना शर्त’ समर्थन देने का निर्णय कर लिया। इस प्रकार आप और कांग्रेस दोनों ही अपने शत्रु के साथ चुनावी परिणयसूत्र में बन्ध गए। यह भारतीय चुनाव प्रणाली का ही करिश्मा है कि जिस कांग्रेस को जनता ने चुनाव में धूल चटाई, वही सत्ताधारी दल का दाहिना हाथ बन बैठा और उसे सरकारी घोड़ा-गाड़ी व आवास छोड़ कर सत्ता के सभी सुख प्राप्त हो गए, जो किसी जनादेश प्राप्त दल को होते हैं। अब केजरीवाल सरकार कांग्रेस की बैसाखी पर निर्भर है और बिना जवाबदेही ही सत्ता का सुख भोग रही है।

क्या विडम्बना है कि केजरीवाल जिस ‘भ्रष्ट’ कांग्रेस के मन्त्रियों को सत्ता में आने पर चार ही दिन में जेल में फेंक देने की धौंस दिखाते थे, उन्हों ने अपनी ‘ईमानदार’ सरकार बनाने व बचाने के लिए उसी कांग्रेस का दामन थाम लिया। अंतत: 23 दिसंबर को केजरीवाल के ‘आप’ मन्त्रिमण्डल ने शपथ ली। उप राज्यपाल ने उन्हें 3 जनवरी तक अपना बहुमत साबित करने का समय दिया। राजनीतिक लेन-देन की इस सारी प्रक्रिया में बहुत सी उच्च परम्पराएं व उत्कृष्टम उदाहरण मिट्टी में मिल गए।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद अब तक यही परम्परा रही है कि चुनावों के बाद राज्यपाल या राष्ट्रपति वरिष्ठतम विधायक या सांसद को नव-निर्वाचित सदस्यों को शपथ देने के लिए अस्थाई अध्यक्ष मनोनीत करते हैं, चाहे वह किसी भी दल का हो। उप राज्यपाल ने पहले एक भाजपा विधायक को मनोनीत किया, पर उसने असमर्थता व्यक्त कर दी। फिर उन्होंने जेडीयू के विधायक को चुना, पर उसने भी ऐसा ही किया। उप राज्यापाल को अन्तत: कांग्रेस के एक विधायक को ही अस्थाई रूप से कार्यकारी अध्यक्ष बनाना पड़ा।

परंपरा यही रही है कि विधायकों की शपथ ग्रहण प्रक्रिया पूरी हो जाने पर अस्थाई अध्यक्ष ही नियमित अध्यक्ष का चुनाव करवाता है, जिसके उपरान्त राज्यपाल नव-निर्वाचित सदन को संबोधित करते हैं और नई सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का बखान करते हैं। उसके बाद ही विश्वास मत समेत कोई विधायी कार्य किया जाता है। यही प्रक्रिया 1996 में लोकसभा में अपनाई गई थी, जब अटल बिहारी वाजपेयी को विश्वास मत प्राप्त करना था और सरकार 13 दिन बाद ही गिर गई थी। पर इन सभी परंपराओं को दिल्ली में तिलांजलि दे दी गई।

केजरीवाल विश्वास प्राप्त करने से पूर्व ही चुनावी वादे पूरे करने में जुट गए, जिसका उन्हें कोई नैतिक अधिकार नहीं था। दो दिन पूर्व उन्होंने स्वयं ही कहा कि उनके पास केवल 48 घंटे बचे हैं और उनकी सरकार रहे या चली जाए इसकी उन्हे परवाह नहीं है, पर वह अपने बिजली और पानी के दो वादे पूरे करना चाहते है। यह उनकी राजनीतिक चाल थी। ऐसा कर वह यदि विश्वास मत प्राप्त करने में विफल भी हो जाते, तो भी आने वाली सरकार के हाथ बंध जाते, क्योंकि यदि वह उनके निर्णय को लागू न करती तो लाभ पाने वाली जनता के आगे बुरा बनती और केजरीवाल छाती ठोंक कर कहते कि देखो, हमने तो कर दिया था। पर प्रश्न तो यह उठता है कि जिस सरकार ने जब तक विश्वास मत प्राप्त नहीं किया, क्या उसे नीतिगत निर्णय लेने का नैतिक अधिकार था? सिद्धांत यह है कि सदन में विश्वास मत का प्रस्ताव मुख्यमंत्री रखते हैं और चर्चा का उत्तर भी वही देते हैं, जिसके बाद मतदान होता है। लेकिन इस बार इस परंपरा को भी दरकिनार कर दिया गया। प्रस्ताव स्वयं मुख्यमंत्री ने नहीं रखा। इसे रखा उनके सहयोगी मनीष सिसोदिया ने और उत्तर दिया स्वयं मुख्यमंत्री केजरीवाल ने और उसके अनुमोदन का प्रस्ताव किया।

विपक्षी भाजपा तथा सहयोगी कांग्रेस ने कई बातें उठाईं, कमियां जताईं व आप के अपने वादों की याद दिलाई। भाजपा ने प्रशांत भूषण की कश्मीर पर टिप्पाणी की बात उठाई। कांग्रेस पर केजरीवाल द्वारा लगाए आरोपों की याद दिलाई। कांग्रेस ने कहा कि उनका समर्थन तब तक जारी रहेगा जब तक कि सरकार आम आदमी के हित में काम करती रहेगी। पर यह पहली बार हुआ कि किसी मुख्यमंत्री ने अपने समापन भाषण में कोई उत्तर या स्पष्टीकरण देना तो दूर, किसी बात का जिक्र तक नहीं किया। ‘एक चुप, सौ सुख’ की कहावत को ही उन्होंने चरितार्थ किया।

केजरीवाल भूल गए कि चुनाव परिणाम के पूर्व कांग्रेस को वह भ्रष्टतम बताते थे और कहते थे कि ज्यों ही उनकी सरकार शपथ लेगी कांग्रेस के बहुत सारे मंत्री जेल की सलाखों के अन्दर होंगे। केजरीवाल ने घोषणा की थी कि 8 दिसम्बर को चुनाव परिणाम निकलेंगे और 29 दिसंबर को रामलीला मैदान में लोकपाल बिल पास किया जाएगा। हां, अब उन्होंने इसे 15 दिन के अन्दर पास करने का इरादा जताया है। उन्होंने यह भी घोषणा की है कि भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, चाहे वह कांग्रेस का हो या भाजपा का या उन्हीं की पार्टी का। पर इस में नया क्या है? कांग्रेस भी तो अब तक यही सब कुछ कहती आई है।

केजरीवाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित व अन्य कांग्रेसी नेताओं के विरूद्ध भ्रष्टाचार व धांधलियों के बेबाक आरोप मढ़कर खूब वाह-वाही लूटी। अपने आपको ‘ईमानदार’ और श्रीमती दीक्षित को ‘भ्रष्ट’ बताया और इस संदेश के पोस्टर आटो-रिक्शा के पीछे लगा कर प्रचारित किए। अब वह विपक्ष को चुनौती दे रहे हैं कि वह भ्रष्टाचार के ठोस सबूत प्रस्तुत करें और वह सख्त कार्यवाई करेंगे। तो क्या अब तक केजरीवाल जो आरोप लगाते रहे वे झूठे थे, जिस पर सत्ता में आने के बाद उन पर कार्रवाई नहीं कर रहे हैं?

यह सारा घटनाक्रम 1989 के वी.पी. सिंह के व्यवहार की याद दिलाता है। उन्होंने भी तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के विरूद्ध उठे बोफोर्स घूस कांड को पूरा भुनाया। अपने चुनावी भाषणों के दौरान वह अपनी जेब से एक कागज निकाल कर लहराते थे और कहते थे कि जिन-जिन व्यक्तियों ने घूस खाई है, इसमें उनका पूरा ब्यौरा है। चुनाव उपरांत जब वह स्वयं प्रधानमंत्री बने तो वह उसी बोफोर्स को ही भूल बैठे, जिसने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाया था। वह कागज का टुकड़ा भी गायब हो गया।

केजरीवाल के मामले में भी अब तो वी.पी. सिंह का ही इतिहास एक बार फिर दोहराया जाता लगता है और याद आते हैं हिन्दी फिल्म के बोल— ‘बदले-बदले (आप) सरकार नजर आते हैं, घर की…।’

अम्बा चरण वशिष्ठ

                (लेखक दिल्ली स्थित राजनीतिक समीक्षक हैं)

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