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दक्षिण में फिर से येदयुरप्पा का जादू

कर्नाटक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में आजकल ‘राजनीतिक विवशता व चुनावी व्यवहारिकता’ ने हलचल मचाई हुई है। इन्हीं दोनों शब्दों को येदयुरप्पा के भाजपा में पुन: सम्मिलित होने का भी आधार बताया जा रहा है। हालांकि, भाजपा का कोई भी नेता इस बात को सार्वजनिक तौर पर और मीडिया में कहने से बचता नजर आ रहा है। धारवाड़ से सांसद एवं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रह्लाद जोशी ने उदय इंडिया को बताया – ‘हम नहीं चाहते कि कांग्रेस-विरोधी वोट आपस में बंटे और कांग्रेस बिना कुछ किए ही जीत जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए हमने येदयुरप्पा को पार्टी में पुन: आने का निमंत्रण भेजा है।’

लेकिन ‘प्रायश्चितकर्ता की घर वापसी’ के इस पूरे अध्याय में एक बात साफ है कि इससे भाजपा के चुनावी अंकगणित में ईजाफा होगा। भाजपाई इस बात को मान कर चल रहे हैं कि पिछड़ा वर्ग (कु रूबा जाति) मुख्यमंत्री सिद्धरमैय्या को भारी बहुमत देगा, क्योंकि वे खुद करूबा जाति के हैं। अगर मुसलमान मोदी के कारण कांग्रेस को वोट देते हैं, तो फिर कांग्रेस मजबूत स्थिति में होगी। प्रदेश के सभी भाजपाई नेता इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि उनके लिए यह अनिवार्य है कि गणित के आधार पर लिंगायत समुदाय उन्हें भारी मात्रा में वोट दे और यह येदयुरप्पा के जरिए ही संभव है। अन्यथा उनके लिए जीत पाना बेहद मुश्किल है।

भाजपा में लगाए जा रहे कयासों के मुताबिक येदयुरप्पा की गैर-मौजूदगी में पार्टी चार से सात सीट ही जीत सकती है, जबकि येदयुरप्पा के साथ भाजपा को करीबन पंद्रह सीटों पर जीत हासिल हो सकती है। भाजपा के एक नेता ने कहा – ‘हालांकि मोदी की लहर का फर्क जरूर पड़ेगा, पर कांग्रेस-विरोधी वोटों के आपस में बंट जाने से भाजपा कि उम्मीदों पर रायता फैल सकता है। हम किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहते, खासतौर पर जब हर सीट और वोट कीमती है। हमें 272 से अधिक का जादूई आंकड़े को पार करना है।’


राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूती मिलेगी – रामचंद्र गौड़ा


भाजपा के वरिष्ठ नेता व कर्नाटक के पूर्व मंत्री रामचंद्र गौड़ा ने कहा है – ‘सन् 2014 के आम चुनाव, भारत वर्ष के पुनर्जागरण की मजबूत नींव रखने के लिहाज से एक अच्छा मौका है। यह काम बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। यह प्रकृति द्वारा रचा गया एक संयोग ही है कि नरेन्द्र मोदी राष्ट्रवादी ताकतों के भावी प्रधानमंत्री के रूप में उभर कर सामने आए हैं।’

पूर्व मुख्यमंत्री बी. एस. येदयुरप्पा के भाजपा में वापस आने और मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में मदद के बयान से गौड़ा काफी खुश हैं। अपनी खुशी जताते हुए गौड़ा कहते हैं – ‘यह एक ऐतिहासिक पल है। आने वाले आम चुनावों में राष्ट्रवादी ताकतों की जीत की तरफ पहला मजबूत कदम है।’

गौड़ा ने येदयुरप्पा को सिर्फ लिंगायत समुदाय का नेता मानने से साफ इंकार करते हुए कहा – ‘येदयुरप्पा को केवल एक समुदाय का नेता कहना गलत है। वह जनता जनार्दन के नेता हैं। उन्हें समाज के हर भाग और वर्ग से समर्थन मिला है। ऐसे में हमारा लिंगायत वोटों को जीतना स्वभाविक है। सबसे जरूरी बात है कि उनकी वापसी से कांग्रेस विरोधी वोटों का बंटवारा खत्म होगा। वर्ष 2013 में कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने इसी कारण से विजयश्री प्राप्त की थी। आंकड़े सारी कहानी बयान कर देते हैं।’

गौरतलब है कि गौड़ा को दर्शनशास्त्र में भी काफी दिलचस्पी है। गौड़ा ने बयान दिया था – ‘सन् 2014 के आम चुनाव, भारत वर्ष के पुनर्जागरण की मजबूत नींव रखने के लिहाज से एक अच्छा मौका है।’ इसकी व्याख्या करने के लिए कहे जाने पर, जयप्रकाश नारायण के कथन को दोहराते हुए उन्होंने कहा – ‘हमारे ऋषियों-मुनियों और बुद्धिजीवियों ने कहा है कि वर्ष 2014 पूरी व संपूर्ण क्रांति स्थापित करने के लिए आदर्श समय है। भारतवर्ष के पुनर्जागरण व उसकी कायाकल्प करने का यह उचित समय है। यह काम केवल ऐसे लोग ही कर सकते हैं जो पूरी सच्चाई व निष्ठा से राष्ट्रवादी विचारों को मानते हों।’

गौड़ा आगे कहते हैं – ‘मोदी आज देश के विकास की जरूरत हैं। मोदी को समर्थन देने के लिए देश के सभी क्षेत्रों में लाखों युवा शांतिपूर्ण तरीके से लोगों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या भाजपा से जुड़े हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उन्हें देश के भविष्य की चिंता है। वे सभी देश के शुभचिंतक हैं। ऐसी स्थिति में संघ परिवार में जन्मे व बड़े हुए येदयुरप्पा इस राष्ट्रीय चेतना से किस प्रकार अपने आप को बाहर रख पाएंगे? इसलिए येदयुरप्पा का अपनी पार्टी को मोदी समर्थन में शामिल करना एक ऐतिहासिक कदम है। इस कदम से मैं बहुत प्रफुल्लित हूं।’

रामचंद्र गौड़ा और येदयुरप्पा के आपसी संबधों में कभी दरार नहीं आई। दोनों के संबंध तब भी उतने ही मधुर थे, जब येदयुरप्पा ने भाजपा से किनारा कर लिया था। ऐसा कहा जाता रहा है कि पांच बार विधायक रह चुके गौड़ा ने येदयुरप्पा को भाजपा में वापस लाए जाने में बड़ी भूमिका निभाई है। ऐसा करने के लिए उन्हें किसी नेता को खुश करने की या किसी व्यर्थ शोर-शराबे की जरूरत नहीं पड़ी। भाजपा के एक नेता ने कहा – ‘येदयुरप्पा और गौड़ा का मिश्रण पार्टी में प्रेरणा व आत्मविश्वास के स्रोत के समान है।’

(एस ए हेमंत कुमार)


लेकिन ‘येदयुरप्पा को वापस लाओ’ के सामूहिक स्वर में अगर किसी की कमी सबसे अधिक खल रही है तो वह है जनता में लोकप्रिय नेताओं की, जो मोदी लहर को वोटों में तब्दील कर सकें, जिसे राजनैतिक व चुनावी राजनीति का ज्ञान है। उससे यह तथ्य छुपा नहीं है कि जनता में पार्टी के प्रति लहर पैदा करना और उस लहर को वोटों में तब्दील करने के दो मुख्य कारक हैं। पहला, जनता में पार्टी का लोकप्रिय नेता हो और दूसरा मजबूत कार्यकर्ताओं का दल। लेकिन कर्नाटक भाजपा में इन दोनों की कमी साफ देखी जा सकती है। हालंाकि, येदयुरप्पा ने (जो कहीं न कहीं जनता में लोकप्रिय थे) भाजपा को छोड़ कर अपनी खुद की पार्टी के.जे.पी. बनाई, लेकिन कार्यकर्ताओं का दल मई 2013 में पार्टी की भारी हार से हतोत्साहित ही रहा। इस हार के प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा सभी 111 क्षेत्रों में चुनाव पूर्व जमा राशि तक हार गई, जिसके कारण उसे 28 में से कुल 14 लोकसभा सीटें ही मिलीं।


मोदी मंत्र को कामयाब करूंगा’’ – बी. एस. येदयुरप्पा


लिंगायत समुदाय के अनुयायी येदयुरप्पा ने कहा है – ‘राजनीति, कार्यक्रम व योजनाओं के नजरिए से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार का प्रदर्शन बहुत अच्छा था, लेकिन एक-दो लोगों के बुरे व्यवहार की वजह से पार्टी की विश्वसनीयता और छवि को नुकसान पहुंचता है। साथ ही गलत, निराधार एवं राजनीति प्रेरित भ्रष्टाचार के आरोपों ने भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।’

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस.येदयुरप्पा ने उदय इंडिया के विशेष संवाददाता एस.ए.हेमंत कुमार के साथ बंगलूरू में विशेष साक्षात्कार के दौरान कहा – ‘लाखों-करोड़ों भारतीय आज नरेन्द्र मोदी जी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। उन्हें पूरी उम्मीद है कि मोदी जी अव्यवस्थित प्रणाली व अराजकता को खत्म कर देश में शांति व प्रगति स्थापित करेंगे। इतिहास ने एक बार फिर हमें यह अवसर प्रदान किया है कि हम एक नया एवं सुरक्षित भविष्य तैयार करें। मैं इस अवसर को खोना नहीं चाहता और देश भर में चल रहे सांप्रदायिक ताकतों की जीत के राष्ट्रीय यज्ञ में पूरी श्रद्धा से शामिल होना चाहता हूं। यही वजह है कि मैंने भाजपा में दोबारा शामिल होने का फैसला किया है।’

उदय इंडिया से अपनी 55 मिनट की बात के लिए येदयुरप्पा ने अपनी प्रात:काल टहलने के रोज के रास्ते (विधान सौधा से भारतीय विज्ञान संस्थान) को बदला और खुले दिल से स्पष्ट व अनुशासित बात की। उन्होंने कहा – ‘भाजपा में दोबारा शामिल होने के लिए मेरी कोई शर्त नहीं है। मैं बस इतना चाहता हूं कि मेरे समर्थकों का सम्मान किया जाए, न कि उनका अपमान किया जाए। मुझे किसी पद की दरकार नहीं है। मैं पूरे प्रदेश का दौरा करना चाहता हूं, जिसके लिए मेरे दो लक्ष्य हैं। पहला कैडर को प्रेरित करना और दूसरा मोदी जी की अध्यक्षता वाली भाजपा के प्रति लोगों की राय को पार्टी के साथ मिलाना।’ कर्नाटक जनता पार्टी (के.जे.पी.) के मुखिया ने कहा – ‘मैं इन दोनों लक्ष्यों को अपने जीवन की सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखता हूं और इन्हें पूरा करने की पूरी कोशिश करूंगा।’ प्रदेश दौरे (जिसका उन्हें खासा शौक भी है) की बात करते हुए वह आत्मविश्वास से परिपूर्ण थे। उनके व्यक्तित्व में ढृढ़ संकल्प साफ देखा जा सकता था। कर्नाटक की राजनीति में उनके आलोचक व समर्थक कहा करते हैं कि जैसे उनके पैरों में तो पहिए लगे हैं। यह सही भी है।

येदयुरप्पा ने भाजपा के नेताओं द्वारा पार्टी में दोबारा शामिल होने के निमंत्रण पर फैसला लिया कि वह अपनी पार्टी के.जे.पी. का भाजपा में विलय करेंगे। विधिवत तौर पर उन्हें भाजपा के नेताओं द्वारा शुक्रवार को पार्टी में दोबारा शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया था। लिंगायत अनुयायी के भाजपा से जाने पर पार्टी को मई 2013 के चुनावों में भारी नुकसान हुआ था। भाजपा 122 सीटों से सिर्फ 40 पर आ गई थी। खुद येदू की के.जे.पी. ने 6 सीटें व 10 फीसदी वोट हासिल किए थे।

येदयुरप्पा का कहना था – ‘जो हो गया उसको भुलाते हुए मैंने अतीत से उचित सीख प्राप्त की है। कभी विचारधारा को लेकर भाजपा से मेरी दूरियां नहीं थी। मेरी परेशानी थी कि मेरे अपने कुछ मित्रों व सहयोगियों ने मुझे बुरी तरह निराश किया था। इसी वजह से मुझे घर (भाजपा) छोड़ कर जाना पड़ा। अब समय आ गया है कि मैं दोबारा इस महान परिवार का हिस्सा बनूं। ईश्वर ने मुझे इतनी शक्ति दी है कि मैं यह समझ सकूं कि जो बीत गई, सो बात गई। अब, मैं अपनी ऊर्जा और ध्यान सिर्फ भाजपा को लोकसभा में ज्यादा से ज्यादा सीटें दिलाने में लगाना चाहता हूं।’

भाजपा ने येदयुरप्पा के मुख्यमंत्री शासन में वर्ष 2009 में 19 सीटें जीती थीं। हालांकि, वर्ष 2011 उपचुनाव में उुडुपी चिकमंगलुर निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा भारी मतों के अंतर से चुनाव हार गई थी और सदानंद गौड़ा ( जिन्होंने येदयुरप्पा की जगह मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी) को कुर्सी खाली करनी पड़ी थी। कांग्रेस ने एक आसान जीत हासिल की। इस जीत ने न केवल उनका हौंसला बुलंद किया, बल्कि कांग्रेस को वापसी की राह पर भी लाने में मदद की।

क्या भाजपा की हार से येदयुरप्पा ने यह साबित किया कि वह पार्टी के लिए कितने अनिवार्य हैं? इसका तपाक से जवाब देते हुए येदयुरप्पा ने कहा – ‘कोई भी अनिवार्य नहीं होता। भारत मां के पास इतनी शक्ति है कि वह बड़े से बड़े साहसी व चरित्रवान व्यक्ति को गलत काम या धारणा के लिए बाहर कर सकती है। मैंने भाजपा का साथ इसलिए छोड़ा था, क्योंकि मुझे बहुत चोट पहुंची थी व दर्द हुआ था। मेरे अपने कुछ मित्र व सहयोगी उस वक्त मेरे साथ नहीं थे, जिस वक्त मुझे उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। खैर, यह सब इतिहास है और मैंने सब भुला दिया है।’

समय ने सिद्ध कर दिया है कि राजनीति केवल अंकगणित नहीं, अपितु आपसी तालमेल भी है। जब तक दो लोगों के बीच तालमेल ठीक नहीं होगा, तब तक अपने लक्ष्य तक पहुंचना कठिन है। तो येदयुरप्पा कैसे इस चुनौती से पार पाएंगे? येदयुरप्पा इस पर कहते हैं – ‘मैं अपने समर्थकों की कठिनाइयों से पूरी तरह वाकिफ हूं, जिनका उन्हें भाजपा में सामना करना पड़ सकता है। मैं अपने लिए परेशान नहीं हूं, क्योंकि मैंने किसी पद के लिए इच्छा नहीं जताई है। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से मेरी यही गुजारिश है कि मेरे समर्थकों का अपमान ना किया जाए या उन्हें पटाया न जाए, चाहे उन्हे कोई पद दिया जाए या नहीं। अपमानजनक व अविश्वास वाले माहौल में काम करना बेहद कठिन है। मुझे उम्मीद है कि ऐसी स्थिति नहीं आएगी और पार्टी के वरिष्ठ नेता स्थिति को सही करने व व्यवस्थित काम के प्रति विचारवान हैं।’

हालांकि, येदयुरप्पा अपनी बात पर स्थिर हैं कि वह अपने लिए या अपने समर्थकों के लिए किसी पद की मांग नहीं करेंगे, लेकिन ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा इस लिंगायत अनुयायी को चुनावी अभियान कमेटी का अध्यक्ष बना सकती है। इसके साथ साथ येदयुरप्पा की लिंगायत प्रभावित प्रदेश जैसे उत्तरी कर्नाटक और हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्रों से उम्मीदवार चुनने में मदद ली जाएगी।

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार से अपने मतभेदों पर येदयुरप्पा ने कहा – ‘जब मंैने कहा कि जो बीत गई, सो बात गई और जो भी हुआ, वह इतिहास है, का मतलब इसमें सब कुछ और सभी लोग शामिल हैं। मुझे किसी व्यक्ति विशेष के लिए सफाई देने की जरूरत नहीं है। मतभेद सार्वजनिक जीवन का अंग भर हैं। मैंने निश्चय किया है कि मैं पूर्व कटुता भुलाकर एकता एवं क्षमता पर अपना ध्यान केंद्रित करूंगा।’ उन्होंने आगे कहा – ‘जब मोदी जी ने लाखों देशवासियों को देश की एकता के लिए काम करने के लिए प्रेरित कर दिया है, तो कौन नहीं चाहेगा कि वह भाजपा या संघ परिवार से जुड़े। इसलिए मेरा मानना है कि हमें अपने आपसी मतभेदों और दूसरों पर हावी होने की आदत को छोड़ कर आगे बढऩा चाहिए। मेरे मन में किसी के लिए किसी प्रकार की कोई गलत चाह नहीं है। मैं एक जमीनी कार्यकर्ता के रूप में काम करूंगा और उसी प्रकार का आचरण प्रस्तुत करूंगा।’

उनके ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और उनकी वजह से भाजपा द्वारा कांग्रेस पर लगाए आरोपों पर क्या फर्क पडेगा? इस सवाल के जवाब में येदयुरप्पा बोले – ‘केवल आरोपों से किसी को भी खलनायक साबित नहीं किया जा सकता। वैसे भी मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, जब लोकायुक्त की गैर-कानूनी खनन वाली रिपोर्ट में गलत तरीके से मेरा नाम से आया था। लेकिन उस रिपोर्ट को कर्नाटक उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। इसका सीधा अर्थ है कि लोकायुक्त की रिपोर्ट व आरोपों में कोई वास्तविकता नहीं थी। कुछ अन्य मामलों में भी मुझे राहत मिली है। इसलिए भ्रष्टाचार वाले मुद्दे से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’

चलते-चलते येदयुरप्पा ने कहा – ‘गलत, निराधार एवं राजनीति से प्रेरित भ्रष्टाचार के आरोपों ने भाजपा सरकार की छवि को हानि पहुंचाई है। पार्टी के कुछ मित्रों का व्यवहार, पार्टी की मर्यादा व विचारधारा के विपरीत था। इससे हमारे समर्थकों को बुरा लगा। लेकिन यह सब आने वाले कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा। लेकिन, राजनीति, कार्यक्रम व योजनाओं के नजरिए से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार का प्रदर्शन बहुत अच्छा था। इसी के मद्देनजर अतीत में हुई गलतियों से सबक सीख कर मैं सुधार के मार्ग पर अग्रसर हूं।’

(एस ए हेमंत कुमार)


प्रदेश नेतृत्व में इस कटु सच्चाई व ठोस तथ्य के चलते, पहले जो लोग येदयुरप्पा की वापसी को लेकर हिचकिचा रहे थे, उन्होंने भी बाद में पार्टी में लोकप्रिय नेता की मौजूदगी की अहमियत को समझा। भाजपा के वरिष्ठ नेता रामचंद्र गौड़ा ने कहा – ‘सन् 1983 के विधानसभा चुनावों के दौरान कर्नाटक में कांग्रेस विरोधी लहर थी, लेकिन भाजपा को मात्र 18 सीटें ही मिली थी, जबकि जनता पार्टी ने 89 सीटें जीतीं थी। इसका मुख्य कारण भाजपा में लोकप्रिय नेता की गैर-मौजूदगी और कार्यकर्ताओं के मजबूत दल का न होना था। भाजपा ने दक्षिण कन्नड़, मैसूर, हुबली के कुछ हिस्से, शिमोगा आदि तमाम जगहों पर, जहां कार्यकर्ताओं का मजबूत दल था, जीत हासिल की थी। बाकि जगहों पर जनता पार्टी ने जीत हासिल की, क्योंकि उनके पास रामकृष्ण हेगड़े, एच.डी. देवेगौड़ा, एस.आर. बोम्मई आदि लोकप्रिय नेता थे। पूरे प्रदेश में पार्टी की इकाइयां भी थीं। मैंने भाजपा के केन्द्र और प्रदेश नेतृत्व में येदयुरप्पा की वापसी के लिए कई प्रयास किए। मुझे खुशी है कि वे अतीत को भुलाकर, नए सिरे से, मोदी जी को प्रधानमंत्री बनाने के लक्ष्य में पार्टी के साथ हैं।’

पूर्व मंत्री और मौजूदा विधायक रामचंद्र गौड़ा आशान्वित होकर कहते हैं – ‘मोदी-लहर व येदयुरप्पा की वापसी के चलते भाजपा 22 सीटें जीतेगी। मैं जनता जनार्दन की नब्ज से वाकिफ हूं। भाजपा के कार्यकर्ताओं में उत्साह और प्रेरणा का सृजन हो चुका है। वे येदयुरप्पा की वापसी से पूरे जोश में हैं। भाजपा में उनकी (येदयुरप्पा) वापसी समाज के सभी वर्गों के लिए उचित संदेश देगी।’

बंगलुरू से एस ए हेमंत कुमार

 

 

 

 

 

 

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