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लोकतंत्र का रास्ता

चीन न सिर्फ सड़कों का जाल फैला रहा है, बल्कि रेलवे लाईनों का भी लगातार विकास कर रहा है। दो महीना पहले बीजिंग ने घोषणा की थी कि वह तिब्बत रेलवे का प्रसार शिगास्ते तक करेगा। दक्षिणी शहर के नजदीक यारलुंग सांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदी पर पुल बनाने का काम सितंबर माह में पूरा हो गया था।

शिन्हुआ न्यूज एजेंसी से संबंधित चीनी वेबसाइट ‘चाईना तिब्बत ऑनलाईन’ ने हाल ही में घोषणा की है कि ‘तिब्बत में सड़कें लगभग दुगनी हो गई हैं’। वेबसाईट के अनुसार – ”2002 से 2012 के दौरान तिब्बत में सड़कों की लंबाई लगभग दुगनी होकर 35,583 किलोमीटर से 65,176 किलोमीटर हो गई है। इस दौरान तिब्बत में नई और पुनर्निर्मित सड़कों की लंबाई 39,157 किलोमीटर पहुंच गई है।’’

तिब्बत परिवहन विभाग के प्रमुख ताशी गैस्टो के अनुसार -”हाल के दशक में तिब्बत में 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर के भारी-भरकम निवेश से परिवहन का बहुत तेजी से विकास हुआ है, जिसमे 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश 2012 में हुआ।’’ उन्होंने आगे कहा – ”इन सड़कों की लंबाई में वृद्धि के अलावा, इनकी गुणवत्ता भी बढ़ाया गया है।’’ उन्होंने सच्चाई की तरफ इशारा करते हुए कहा – ”परिवहन आधारभूत संरचना में सुधार, स्थानीय आर्थिक विकास को बढ़ाने में मदद करेगा।’’ इस संदर्भ में भारत सिर्फ मध्य के इस साम्राज्यवादी देश से ईष्र्या कर सकता है। देश के रणनीतिक हितों की समझ रखने वाले (साथ ही साथ आम आदमी के हितों की बात करने वाले) नेताओं की चाह हमने छोड़ दी है।

चीन न सिर्फ सड़कों का जाल फैला रहा है, बल्कि रेलवे लाईनों का भी लगातार विकास कर रहा है। दो महीने पहले बीजिंग ने घोषणा की थी कि वह तिब्बत रेलवे का प्रसार शिगास्ते तक करेगा। दक्षिणी शहर के नजदीक यारलुंग सांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदी पर पुल बनाने का काम सितंबर माह में पूरा हो गया था। शिन्हुआ ने जोर देकर कहा – ”32 मीटर टी-शेप वाले बीम, जिसे यारलुंग सांगपो नदी पर बने ल्हासा-शिगास्ते के नं. 1 पुल पर धीरे से रखा गया था। इस रेलवे ट्रैक को बिछाने के लिए पहली बार यारलुंग सांगपो नदी के घाटों को चौड़ा किया गया।’’ हाल ही में अरूणाचल प्रदेश के अपने प्रवास के दौरान, अपने अरूणाचली मित्र द्वारा लगातार सुनता (ईष्र्यावश) आ रहा था – ”सड़क और आधारभूत संरचना के मामले में चीन हमसे बहुत आगे है।’’

हां, यह एक बुनियादी तथ्य है कि आधारभूत संरचना (सड़क, एयरपोर्ट, रेलवे आदि) भारतीय हिमालयी क्षेत्र की अपेक्षा तिब्बत में बहुत अधिक विकसित है। दूसरा उदाहरण, शिन्हुआ ने घोषणा की है कि नागचु राज्य में 4,700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित विश्व के सबसे ऊंचे पवन फार्म का संचालन शुरू हो चुका है। चीनी न्यूज एजेंसी के अनुसार, पहले चरण में लगे पांच टरबाईनों की कुल क्षमता 7.5 मेगावाट है। इस परियोजना के पूरा होने पर 49.5 मेगावाट की क्षमता की उत्पादन वाले कुल 33 विंड टरबाईन लगाए जाएंगे।

यह शानदार है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। चीन (खासकर तिब्बत) सामाजिक और लोकतांत्रिक मामले में काफी पिछड़ा हुआ है, खासकर प्रशासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में। क्या बीजिंग को इस ‘शांतिपूर्ण उदय’ को नजरअंदाज किए जाने का अहसास होता है?

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल की पत्रिका ‘स्टडी टाईम्स’ ने हाल ही में परिचर्चा आयोजित की थी कि चीन में लगातार हो रहे सामाजिक संघर्ष को कैसे सुलझाया जाए। बहुत सारे लोगों का मानना था कि आने वाले वर्षों में चीन के लिए यह सबसे बड़ी समस्या होगी।

पार्टी स्कूल ने सामाजिक संघर्ष को छह रूपों में वर्गीकृत करते हुए, इसके लिए आय में असमानता, अव्यवहारिक नीतियां, बढ़ती सामाजिक चिंता, इंटरनेट पर उचित प्रशासनिक नियंत्रण की कमी, सरकारी शक्ति का दुरूपयोग और अधूरे सुधार को प्रमुख कारण माना था।

क्षेत्रीय महत्वकांक्षाओं (तिब्बत और झिंझियांग में) को ध्यान में रखते हुए, लेखक संघर्ष का उल्लेख करना उचित नहीं समझता, लेकिन अन्य संघर्षों के समाधान के लिए वह कुछ सुझावों को पेश करता है। ये सुझाव हैं : सामाजिक नीतियों को बढ़ाने के लिए लोगों पर अधिक भरोसा करना, एक व्यापक सामाजिक प्रबंधन प्रणाली की स्थापना, सामाजिक अपेक्षाओं द्वारा एक व्यापक ‘मनोसामाजिक हस्तक्षेप तंत्र’ का विस्तार और आधुनिक तकनीक द्वारा इंटरनेट प्रशासन में सुधार।

आज कम्युनिस्ट पार्टी लोगों पर भरोसा करती है और इंटरनेट प्रशासन में सुधार भी। हालांकि इसका साफ मतलब है कि आधुनिक तकनीक द्वारा लोगों की बातचीत, सोच, सपने, महत्वकांक्षाओं पर निगरानी रखी जाए।

भारत प्रशासन के मामले में चीन से दशकों आगे है। चीन महाशक्तिहोने का दिखावा करता है, लेकिन मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के घोषणा-पत्र के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है। इस घोषणा-पत्र में कहा गया है – ”सभी मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुए हैं और गरिमा एवं अधिकार में बराबर हैं……. और बिना किसी जाति, धर्म, भाषा, रंग, लिंग, संपत्ति, जन्म, राष्ट्रीयता या सामाजिक मूल और राजनैतिक या किसी अन्य भेदभाव के घोषणा-पत्र में वर्णित सभी अधिकारों और स्वतंत्रता का प्रत्येक व्यक्तिहकदार है।’’

अपने नागरिकों की निगरानी करने के लिए आखिर चीन सरकार को नई तकनीक की क्यों जरूरत है? क्या वह अपनी पसंद का कोई राजनीतिक विचार नहीं रख सकते? क्या हान उईग्उर या तिब्बती चीनियों के बराबर हैं? उदाहरण के लिए, 1950 में तथाकथित मुक्ति के समय से तिब्बत और झिंझियांग में कितने गैर-हान व्यक्तिपार्टी के महासचिव पद पर तैनात हुए हैं, तो इसका उत्तर है –

ऌशून्य। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी में अल्पसंख्यक समुदाय के कितने वरिष्ठ अधिकारी हैं, तो इसका भी उत्तर है – शून्य। सूची बहुत लंबी है।

नेल्सन मंडेला के अंतिम संस्कार के वक्त शिन्हुआ की हेडलाईन थी – ‘मंडेला और माओ ने समान सोच को साझा किया।’ इसमें दक्षिण अफ्रीका के राजदूत द्वारा चीन को कही गई कुछ बातों को इंगित किया गया था। हालांकि मंडेला को मिला शांति नोबल पुरस्कार, राष्ट्रीय पुनर्मिलन का प्रतीक और देश को लोकतंत्र की तरफ ले जाने का पुरस्कार था, जबकि माओ का तानाशाही रवैया कुख्यात ‘महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति’ की तरफ लेकर गया और इसके पहले ‘ग्रेट लिप फॉरवर्ड’ की तरफ, जो पूरे चीन में अकाल और भूखमरी के लिए उत्तरदायी था। ताजा शैक्षिक अनुमान के अनुसार, माओ की इन गलतियों के कारण लगभग 45 मिलियन (4.5 करोड़) लोगों की मौत हुई थी।

यद्यपि दक्षिण अफ्रीका के राजदूत द्वारा कहे गए वास्तविक शब्द अज्ञात हैं, फिर भी एक रंगभेद विरोधी नेता की तुलना माओ से कैसे की जा सकती है, जिसने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाईना कहे जाने वाले देश के आधे से अधिक क्षेत्र के बराबर क्षेत्र को उपनिवेश बनाया और 10 लाख से अधिक चीनी और तिब्बती लोगों को मौत के घाट उतार दिया।

हाल के वर्षों में चीन के दबाव में दक्षिण अफ्रीका ने तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा को दुबारा वीजा देने से इंकार कर दिया, जिसके कारण वह मंडेला के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके। उसी समय ग्लोबल टाईम्स, चीन के शांति नोबल पुरस्कार विजेता लियू झियाबाओ की तुलना नेल्सन मंडेला से करता है। ‘दि साउथ चाईना मॉर्निंग पोस्ट’ ने लिखा – ”पिछले सप्ताह मंडेला की मौत के बाद कुछ पश्चिमी टिप्पणीकार और चीन की सोशल मीडिया के उपयोगकर्ताओं ने लियू जैसे अपने असंतुष्टों को दरकिनार कर, पूर्व-दक्षिण अफ्रीकी नेता की प्रशंसा करने पर बीजिंग की आलोचना की।’’

कुछ टिप्पणीकारों ने नोबल शांति पुरस्कार के इन दो विजेताओं के बीच समानता बताई, जो अपनी राजनीतिक सक्रियता के लिए जेल में रहे। लेकिन, ग्लोबल टाईम्स ने इन तुलनाओं को खारिज करते हुए कहा कि पश्चिमी देश लियू का इस्तेमाल चीन की न्यायिक संप्रभुता को बदनाम करने और उसके मानवाधिकार के रिकॉर्ड पर धब्बा लगाने के लिए कर रहे हैं। अपने संपादकीय में ग्लोबल टाईम्स ने मंडेला को संघर्ष, सहिष्णुता और मतभेदों को पाटने वाले व्यक्ति के रूप में उल्लेखित किया, जबकि लियू को ‘चीनी अधिकारियों का सामना करने वाले और चीन की मुख्यधारा के समाज द्वारा बहिष्कृत किया गया एक चीनी कैदी’ कहा।

हालांकि चीन ने मंडेला और दलाई लामा के बीच बैठकों को रोकने के लिए अपनी पूरी कोशिश की। शांति नोबल पुरस्कार इन दो विजेताओं ने 1996 में मुलाकात की थी। इस मुलाकात में दलाई लामा ने कहा था – ”मैं प्राय: असाधारण और विशेष लोगों, अध्यात्मिक नेताओं, राजपरिवार के लोगों, नोबेल पुरस्कार विजेताओं, राष्ट्राध्यक्षों, वल्र्ड आईकॉन से मिलता रहता हूं। ज्यादातर मामलों में, इन व्यक्तियों के आसपास महानता का बनाया गया माहौल अतिश्योक्तिपूर्ण होता है। हर बार मैं इन व्यक्तियों से मिलता हूं, तो पाता हूं कि इनका व्यक्तित्व उतना बड़ा नहीं है, जितनी इनकी प्रसिद्धि। नेल्सन मंडेला से मुलाकात के दौरान, मैंने महसूस किया कि विश्व में उनकी सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा है। इस समय पृथ्वी पर उनसे महान जीवित कोई व्यक्ति नहीं है। सिर्फ उनके मामले में मैंने महसूस किया कि वही ऐसे व्यक्ति हैं, जो अपनी प्रसिद्धि से भी ऊंचे हैं।’’

चीन में सड़कें और रेलवे लाईन बहुत अच्छी हैं और इसके लिए चीन की तारीफ की जानी चाहिए। लेकिन, यदि चीन एक दिन महाशक्ति बनता है तो उसके लिए लोकतंत्र की सड़क (ट्रेन क्यों नहीं), न्याय और समानता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। इस मामले में यह मध्य साम्राज्यवादी देश दूर, बहुत दूर है और उसके नए नेतृत्व के पास उसका कोई समाधान नहीं है। बीजिंग चीन में महान् होने का वातावरण तैयार करना पसंद करता है, लेकिन भावी पीढ़ी चीन को एक देश के रूप में याद करेगी, जहां स्वतंत्रता की तरफ कोई भी सड़क नहीं जाती।

क्लाउड अर्पी

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