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फारूख शेख शानदार अदाकार, उम्दा इंसान

फिल्म इंडस्ट्री में अब ऐसे लोग कम ही रह गए हैं। इसलिए फारुख का जाना एक बहुत बेहतरीन कलाकार का जाना तो है ही, मगर उससे भी ज्यादा एक बहुत ही नेक इंसान का जाना है।

मुस्कुराता हुआ चेहरा, मद्धिम आवाज और नटखट आखें– हर पात्र में जान डाल देने वाली मासूम अदाकारी। एक अलग ही स्टाइल था फारुख शेख का। उनकी अदाकारी में कहीं शोर नहीं था। खामोश अदाकारी, मगर बेहद जानदार दिल को छूने वाला अभिनय। ऐसे थे फारुख शेख। मगर वो जितने बड़े कलाकार थे, उससे कहीं बेहतर इंसान भी थे। विनम्र और मददगार। बिना किसी हेतु, प्रयोजन या प्रचार के कैसे मदद की जाती है, कोई उनसे सीख सकता था। एक वाकया मुझे याद आता है, जिसका चश्मदीद में खुद रहा।

बात 1995 की है। मैं उन दिनों एक इलैक्ट्रानिक चैनल में साप्ताहिक करेंट अफेअर्स कार्यक्रम बनाकर प्रस्तुत करता था। यह कार्यक्रम दिल्ली में ही बनता था। किसी सिलसिले में मुंबई की एक पार्टी में मेरा जाना हुआ। मुंबई की फिल्मी दुनिया से मेरा कोई खास परिचय नहीं था। मैं किसी को जानता भी नहीं था। इसलिए पार्टी में एक कोने में खड़ा हुआ था। फारुखशेख भी उस पार्टी में थे। अचानक किसी ने उनसे मेरा परिचय करवाया। वह उस समय के बड़े कलाकार थे। मैंने कहा– ‘साहब, इन्हें कौन नहीं जानता। हम तो लंबे समय से इनके मुरीद हैं।’

इस पर फारुख शेख ने कहा– ‘मुरीद तो हम आपके हैं। आपके प्रोग्राम हम देखते हैं।’

मैंने कल्पना नहीं की थी कि इतना बड़ा अभिनेता मेरा कार्यक्रम को देखता होगा। उन्होंने बातों ही बातों में मेरे कार्यक्रम के कई एपिसोड्स का जिक्र किया। लेकिन उनकी एक बात ने मुझे चौंका दिया।

उन्होंने कहा कि– ‘लगता है आप हमसे नाराज हैं, उमेश भाई। इसीलिए आपने हमारे खत का जवाब नहीं दिया।’ मुझे ध्यान आया कि इस मुलाकात से कुछ समय पहले मुंबई से एक पत्र आया था। हाथ से लिखा हुआ खत था और लेटरहेड किसी फारुख शेख का था। यह पत्र इसलिए भी याद था क्योंकि काले स्याही वाले पेन से लिखी गई इस चिठ्ठी में अक्षरों की बनावट बहुत सुंदर थी। इनसाईट के लिए उन दिनों दर्शकों की काफी चिट्ठियां आती थीं। हर चिठ्ठी का जवाब दे भी नहीं पाते थे। मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि खत उन फारुख शेख का होगा, जो फिल्मी दुनिया की इतनी बड़ी शख्शियत और इतना बड़े नाम हैं?

हुआ यूं था कि ‘दिल की बीमारियों’ पर किए अपने कार्यक्रम के एक एपिसोड में मैंने बताया था कि दिल का ऑपरेशन करवाना कितना महंगा है। किस तरह से इसका खर्च उठाना आम हिन्दुस्तानी के बस से बाहर है। इतने पैसों का इंतजाम करना उसके लिए संभव ही नहीं। इसमें एक मरीज का केस भी उठाया गया था। मरीज एक 16-17 साल की लड़की थी, जिसका इलाज दिल का ऑपरेशन ही था। इस ऑपरेशन के लिए लगभग साढ़े तीन लाख रूपये की जरूरत थी। 1995 में यह बहुत बड़ी रकम थी। उस लड़की का इंटरव्यू मुझे आज तक याद है। मैंने एक सवाल किया था कि अगर पैसों का इंतजाम नहीं हुआ, तो क्या होगा? उस लड़की ने बड़ी मासूमियत के साथ कहा था– ‘तो क्या हुआ मर जाऊंगी।’ उसका यह वाक्य दिल को छू गया था। इससे यह एपिसोड बहुत मर्मस्पर्शी भी बन गया था।

खैर, हम फारुख शेख की उस चिठ्ठी का जिक्र कर रहे थे, जिसे मैं पहचान नहीं पाया था। उस चिठ्ठी में उन्होंने उस लड़की के इलाज के लिए पूरे पैसे देने का प्रस्ताव किया था। दर्शकों की एक और चिठ्ठी           समझकर हमने उसे नजरंदाज कर दिया था।

उस रात मुंबई की मुलाकात में फारुख शेख ने उस लड़की की स्थिति हमसे पूछी। हमने उन्हें अस्पताल और डाक्टरों का पता और नंबर दिए। उस बातचीत के बाद फारुख शेख ने उस लड़की के इलाज का पूरा खर्च उठाया और उसका इलाज पूरा करवाया। नब्बे के दशक में बिना किसी पहचान, मतलब और प्रचार के इतने पैसे ऐसी किसी अनजान लड़की के इलाज पर खर्च करना, जो उनके मजहब की भी न हो, यह कोई बहुत बड़े दिल वाला इंसान ही कर सकता था। फारुख शेख चाहते तो इसका प्रचार भी कर सकते थे, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। कितने लोग ऐसा कर सकते हैं?

उनके अभिनय से भी खूबसूरत था, उनका यह व्यक्तित्व। फिल्म इंडस्ट्री में अब ऐसे लोग कम ही रह गए हैं। इसलिए फारुख का जाना एक बहुत बेहतरीन कलाकार का जाना तो है ही, मगर उससे भी ज्यादा एक बहुत ही नेक इंसान का जाना है। दूसरे के दुख को अपना मान कर उसे दूर करने की ईमानदार कोशिश करने वाले ऐसे इंसान बिरले ही होते हैं। फारुख शेख को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि!

उमेश उपाध्याय

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