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अन्तरिक्ष में कामयाबी

अन्तरिक्ष कार्यक्रम में अनेक स्वर्णिम अध्याय लिखने के बावजूद जीएसएलवी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना इसरो का एक बड़ा लक्ष्य था। इसरो का मंगल पर यान भेजना एक बड़ी उपलब्धि जरूर थी, लेकिन जीएसएलवी विकसित करने का लक्ष्य उससे भी बड़ा माना जा रहा था।

भारत की करीब 20 साल की मेहनत आखिरकार रंग ले ही आई। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने वर्ष 2014 के आरम्भ में ही स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का कामयाब टेस्ट कर देश को नए साल का नायाब तोहफा दे दिया है। इसरो ने सिद्ध कर दिया है कि भारत किसी से कम नहीं है। मंगल और चन्द्रयान के सफल प्रक्षेपण जैसे स्वर्णिम अध्याय लिखने के बावजूद लंबे समय से भारत को स्वदेशी क्रायोजेनिक तकनीक में सफलता न मिल पाने का मलाल हो रहा था। पिछले ही साल इसरो ने मंगलयान का सफल प्रक्षेपण कर विश्व में अपनी धाक जमाई थी, लेकिन स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन विकसित करने का लक्ष्य जैसे कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। पांच जनवरी 2014 को भारत ने वह सफलता भी प्राप्त कर उन चुनिंदा देशों की सूची में अपना नाम दर्ज करा लिया, जिनके पास उपग्रह प्रक्षेपण के लिए अपनी क्रायोजेनिक तकनीक है। इसरो ने पांच जनवरी को दिन में 4 बज कर 18 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन अन्तरिक्ष केन्द्र से स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन से लैस जीएसएलवी-डी5 रॉकेट संचार उपग्रह जीसैट-14 अन्तरिक्ष में भेजा है। जीएसएलवी-डी5 अपने प्रक्षेपण के करीब 17 मिनट बाद सफलतापूर्वक अन्तरिक्ष में अपनी कक्षा में स्थापित हो गया। इसके लिए चार जनवरी 2014 को प्रात: 11 बज कर 18 मिनट पर उलटी गिनती शुरू की गई थी। भारत के अन्तरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास के पन्नों पर एक और शानदार अध्याय लिखने में इसरो को 20साल का लम्बा समय लग गया।

चन्द्रयान और मंगलयान जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं की सफलता के बाद आम आदमी के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि इसरो द्वारा जीएसएलवी डी-5 का कामयाब प्रक्षेपण किन मायनों में इतना महत्वपूर्ण है कि यह भारत के अन्तरिक्ष कार्यक्रमों में स्वर्णिम अध्याय का दर्जा प्राप्त कर ले।

इसे समझने के लिए यह ध्यान देना जरूरी होगा कि भारत को पीएसएलवी कार्यक्रम में उल्लेखनीय कामयाबी हासिल है। सस्ते और सबसे सफल स्पेस रॉकेट लॉन्चर पीएसएलवी पर इसरो का ही कॉपीराइट है। लेकिन पीएसएलवी इंजन कम शक्तिशाली होने से वह कम वजन का उपग्रह ही अन्तरिक्ष में स्थापित कर सकता है। ऐसे उपग्रहों की कार्यक्षमता भी कम होती है।

दो टन से अधिक वजन वाले रॉकेट को अन्तरिक्ष में पंहुचाने के लिए क्रायोजेनिक इंजन से लैस रॉकेट की जरूरत होती है। चन्द्रयान और मंगलयान का वजन भी इसी रेंज में है। इसीलिए अन्तरिक्ष कार्यक्रम में अनेक स्वर्णिम अध्याय लिखने के बावजूद जीएसएलवी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना इसरो का एक बड़ा लक्ष्य था। इसरो का मंगल पर यान भेजना एक बड़ी उपलब्धि जरूर थी, लेकिन जीएसएलवी विकसित करने का लक्ष्य उससे भी बड़ा था। चन्द्रमा और मंगल पर वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए भारत को अधिक से अधिक शक्तिशाली जीएसएलवी की जरूरत है। टीवी चैनलों के ट्रांसपॉन्डर लगाने, मौसम की जानकारी देने या जासूसी करने जैसे लक्ष्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले उपग्रहों का वजन दो टन के आसपास होता है। उन्हें छोडऩे के लिए भारी विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। भारत ने 1990 में क्रायोजेनिक इंजन बनाने की शुरूआत की थी। उसे उम्मीद थी कि तकनीकी ब्लूप्रिंट सोवियत संघ से हासिल हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अमेरिकी दबाव में कोई भी देश भारत को यह तकनीक देने के लिए राजी नहीं हुआ। तब से अब तक कई सारी असफलताओं से भारतीय वैज्ञानिकों का हौंसला पस्त होने लगा था। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने की कई कोशिशें नाकाम हो जाने से भारतीय वैज्ञानिकों का धैर्य चुकने लगा था। भारत क्रायोजेनिक तकनीक विकसित करने वाला दुनिया का छठा देश बन गया है। यह तकनीक अब तक केवल अमेरिका, रूस, जापान, चीन और फ्रांस के पास ही थी। भारत ने भी इस क्लब की सदस्यता प्राप्त कर ली है। पिछले 20 सालों में किसी भी देश द्वारा क्रायोजेनिक तकनीक विकसित कर पाने में सफलता हासिल न कर सकने के कारण भारत के लिए यह उपलब्धि काफी विशेष है।

स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन विकसित कर लेने से भारत अब दो टन से अधिक भारी उपग्रह आधे से भी कम खर्च में खुद प्रक्षेपित करने के अतिरिक्तअन्य देशों के बड़े उपग्रहों को भी प्रक्षेपित कर सकेगा। संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए भारत को अब तक भारी राशि का भुगतान करना पड़ता था। इसरो के चेयरमैन के. राधाकृष्णन के मुताबिक 3.5 टन के संचार उपग्रह के प्रक्षेपण में भारत को पांच सौ करोड़ रूपए का भुगतान करना होता है। लेकिन अब स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन से उपग्रह प्रक्षेपण उससे आधी लागत 220 करोड़ रूपए में हो सकेगा। इस प्रकार कम लागत में ही संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण से भारत की भारी बचत होगी।

इस सफलता से इसरो के वैज्ञानिकों के हौंसले आसमान छूने लगे हैं, जिससे चन्द्रयान-2 मिशन का काम और तेजी से चलेगा। इसरो ने वर्ष 2016 में चन्द्रयान-2 के प्रक्षेपण की योजना तैयार की है। चन्द्रयान-2 के प्रक्षेपण के लिए भारी उपग्रह ले जाने वाले जीएसएलवी तृतीय यान को विकसित करने का काम भी इसरो के वैज्ञानिकों ने शुरू कर दिया है।

जीएसएलवी डी-5 से अन्तरिक्ष में भेजा गया जीसैट-14 उपग्रह भारत का 23वां संचार उपग्रह और पांचवां जीसैट-14 उपग्रह है। इससे पहले जीएसएलवी से 2001, 2002, 2004 और 2007 में जीसैट-14 प्रक्षेपित किए जा चुके हैं। पांच जनवरी को अन्तरिक्ष में भेजा गया 1982 किलोग्राम वजन का उपग्रह वहां पहले से ही मौजूद नौ अन्य उपग्रहों के साथ काम करेगा। इस जीसैट-14 उपग्रह से पूरे भारत में संचार सुविधाएं और बेहतर होंगी।

अन्तरिक्ष विज्ञान कार्यक्रमों में लगभग सभी देश भारी राशि खर्च करते हैं। इस क्षेत्र में विभिन्न देशों द्वारा आगे निकलने की होड़ की वजह से अन्तरिक्ष विज्ञान ने काफी तरक्की की है। इसी क्रम में भारत के चन्द्र एवं मंगल मिशन जैसे कार्यक्रमों के लिए स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के विकास को शामिल किया जा सकता है, जो अन्तर्राष्ट्रीय जगत में भारत का सिक्का जमाने के लिए भी आवश्यक है। अब तक उपग्रहों के प्रक्षेपण में विदेशी सहायता भारत के अन्तरिक्ष कार्यक्रम की तरक्की की राह में एक बड़ी रूकावट थी, जो इस सफलता के बाद दूर हो गई है। जीएसएलवी का यह परीक्षण ऐसी उपलब्धि है जिसका महत्व भारत के अन्तरिक्ष कार्यक्रम के लिए अति महत्वपूर्ण है। अब भारत को अपने इनसेट जैसे उपग्रहों को अन्तरिक्ष में स्थापित करने के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होगी।

 श्रीकान्त शर्मा

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