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सन्यास एवं सामाजिक कल्याण

प्रत्येक महाविद्यालय के छात्रावास में किसी साधु या संन्यासी को रहने के लिए आमंत्रित करना चाहिए। उन्हें छात्रों को प्रतिदिन नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा तथा ध्यान एवं उपासना का व्यवहारिक प्रशिक्षण देना चाहिए। साथ ही भगवद्गीता, भागवत, रामायण एवं उपनिषदों की भी शिक्षा देनी चाहिए। तभी वे उत्तम चरित्र का निर्माण कर सकेंगे। वर्तमान समय में विद्यार्थियों की स्थिति शोचनीय है। ईश्वर एवं शास्त्रों में उनका तनिक भी विश्वास नहीं रह गया है। वे अधार्मिक हो गए हैं। शिक्षण-संस्थानों के प्रधानाचार्यों का यह कर्तव्य है कि वे नई पीढ़ी को आध्यात्मिक विकास का अवसर प्रदान करें। यह संन्यासी-प्रशिक्षकों के निकट सान्निध्य द्वारा ही संभव है।

किसी साधु या संन्यासी को जेलों में भी कम-से-कम सप्ताह में एक बार आमंत्रित किया जाना चाहिए। वे वहां प्रार्थना, कीर्तन तथा नैतिक शिक्षा द्वारा कैदियों में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास कर सकते हैं। लोग मुख्यत: अज्ञान के कारण ही अपराध करते हैं। यदि समुचित शिक्षा द्वारा इस अज्ञान केा दूर कर दिया जाए, तो न कोई अपराध होगा और न ही जेल रहेंगे। धरती पर स्वर्ग स्थापित हो जाएगा। सभी संबद्ध लोगों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

यदि किसी संन्यासी के समीप अस्पाल हो, तो उसे प्रतिदिन वहां जाकर रोगियों का उत्साह बढ़ाने का अवसर मिलना चाहिए। उसे उनकी रोगमुक्ति हेतु प्रार्थना करनी चाहिए तथा उनके बीच सामूहिक कीर्तन एवं ध्यान का आयोजन करना चाहिए। उसे रोगियों को बताना चाहिए कि उनके अंदर स्थित आत्मा सदा अमर और रोगमुक्त है।

आध्यात्मिक उत्थान आज के युग की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यदि उपर्युक्त सुझावों को कार्यान्वित किया जाए, तो संभव है। आज भी नि:स्वार्थ सेवा करने वाले सुशिक्षित संन्यासी समूहों की कमी नहीं है। इस कार्य हेतु वे एकांतवास का त्यागकर व्यस्त जगत में आ सकते हैं। संसार को केवल ऐसे उदात्त संन्यासी समूहों के योगदान के महत्त्व को समझना है।

स्वामी सत्यानंद

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