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खतरनाक लोकलुभावनवाद

भारतीय अर्थव्यवस्था पर अब फिर काले बादल घिरने लगे हैं। लगता है जैसे इस वर्ष अप्रैल-मई में होने वाले आम चुनावों की धमक सुनकर नई दिल्ली में राजनैतिक नेतृत्व मतदाताओं को ललचाने के लिए ‘लोक-लुभावनवाद’ से घिर गया है। लागू की जा रही रहस्यपूर्ण सूक्ष्म नीतियों से घिरी सरकार द्वारा की जा रही खैरात की बरसातों से, पहले से संकट में फंसे सरकारी खजाने से राजस्व घाटे पर और अधिक विस्फोट होने का खतरा मंडराने लगा है। इससे आर्थिक मंदी का दौर अधिक लंबा खिंचने की आशंका है जिससे कॉर्पोरेट जगत की आय में लंबे समय तक कटाव पैदा हो सकता है। मुझे समझ नहीं आता कि ‘लोकलुभावन’ शब्द का जन्म कैसे हुआ, लेकिन भारतीय राजनैतिक अर्थव्यवस्था पर गहन अध्ययन करने वाले प्रेक्षक के तौर पर मैं जानता हूं कि ‘लोकलुभावनवाद’ ने देश में एक दिलचस्प यात्रा तय की है। देश की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों ने अब इसे अच्छी राजनीति के आवश्यक हिस्से के रूप में प्रतिस्थापित कर लिया है, जबकि ‘पश्चिम ही सर्वश्रेष्ठ’ का राग अलापने वाले बुद्धिजीवियों के वर्ग ने 1990 के आरम्भ में उदारीकरण के समय इसे अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक करार दिया था। लेकिन, अब इसके नए समर्थकों में ‘आप’ के अरविन्द केजरीवाल भी जुड़ गए हैं। उनकी राजनीति प्रभावशाली ‘लोकलुभावन’ संवेगों से चलती है। यद्यपि ‘आप’ की पानी और बिजली के लिए सब्सिडी देने की घोषणा तीखी आलोचनाओं की चपेट में आ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे राजस्व संसाधनों को भारी धक्का पहुंचेगा। इसलिए ‘आप’ किस हद तक लोकलुभावन तरीकों में शरण लेगा, यह समय बताएगा। इस देश में गरीबी से जुड़े अधिसंख्य सर्वे अपना लक्ष्य खो चुके हैं। इन सर्वेक्षणों के लिए अपनाए गए तरीके, अधिसंख्य मामलों में सामान्य मापदंड नहीं हैं, जिनके परिणाम गरीबी की विभिन्न परिभाषाओं में हैं। इसके लिए कोई जमीनी संदर्भ नहीं है। 881 स्लम्स में किए गए एक सर्वे के मुताबिक, नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) का अनुमान है कि 88 लाख परिवार स्लम्स में रहते हैं। यह परिदृश्य 2011 की जनसंख्या से मेल नहीं खाता। 2011 की जनसंख्या के अनुसार स्लम्स में लगभग 1 करोड़ 39 लाख परिवार अपनी जिन्दगी गुजार रहे हैं। इस रिपोर्ट से भ्रम फैलता है। आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय (एमएचयूपीए) ने तीन साल पहले विभिन्न अनुमानों का अध्ययन करने के बाद अनुमान लगाया था कि वर्ष 2011 तक स्लम्स में रहने वाले लोगों की संख्या 9 करोड़ 30 लाख (एक करोड़ 98 लाख परिवार) पहुंच जाएगी। इसलिए, इन तीन अनुमानों में से कौन सा आकलन सही है? गलत अनुमान लगाने से गलत आंकड़े और गलत सूचना मिलेगी। अन्तत: इससे गलत नीतियां तैयार होंगी। गलत क्रियान्वयन होगा। परिणामस्वरूप जमीनी स्तर पर सेवाएं और आधारभूत सुविधाएं देने में हमेशा दुविधा बनी रहेगी। इन आंकड़ों पर आधारित इस प्रकार की नीतियां सामाजिक खतरे पैदा करेंगी और समाज को नुकसान पहुंचाएंगी। इसलिए, एक प्रणाली होनी चाहिए जिसमें इस प्रकार के रिकॉर्ड तैयार करने में अधिकतम शुद्धता रखी जा सके। जिससे देश के लोगों के लिए अधिक सही रिकॉर्ड तैयार किए जा सके, न कि मुफ्त खैरात बांटी जाए।

अब, मैं कांग्रेस पर आता हूं, जो हाल के राज्य विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पिट गई है। वह अब आम चुनावों से पूर्व मुफ्त खैरात घोषित कर फिर से खड़ा होने की कोशिश करेगी। कांग्रेस मुफ्त दवाएं बांटने, कृषकों को फार्म-ऋण देने, सभी धर्मों के लोगों को मुफ्त तीर्थ कराने आदि जैसे नए लोकलुभावन प्रस्तावों की वकालत करेगी। निश्चित रूप से इसका आर्थिक व्यवस्था पर भारी प्रतिकूल असर पड़ेगा। लेकिन जोड़तोड़ करने वाले पार्टी के कर्ताधर्ता वास्तविक प्रभाव को छिपाने के लिए बजट के आंकड़ों के साथ खेल कर सकते हैं। लेकिन उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि लोकलुभावन कदम चुनावों में आशातीत परिणाम नहीं लाते। राजस्थान में हुए हाल के चुनाव परिणाम इसके साक्षी हैं, जहां पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की लोकलुभावन कोशिशों के बावजूद उन्हें बुरी तरह से हार का मुंह देखना पड़ा है। मेरा विचार है कि दिल्ली और राजस्थान के चुनावों ने सिद्ध कर दिया है कि वे दिन अब लद गए जब लोग कांग्रेस के लिए वोट किया करते थे। अब तो हर तरह की खैरात बांटे जाने के बाद भी लोग कांग्रेस पार्टी के लिए वोट देने के लिए तैयार दिखाई नहीं देते। हमने देखा है कि कांग्रेस सब को यह बताकर योजनाएं लाई कि इससे खेल बदल जाएगा, लेकिन कांग्रेस आज कहां है? इसलिए मैं इस बात से सहमत हूं कि 2014 के चुनावों से पूर्व कांग्रेस को ‘लोक-लुभावनवाद’ से निराश होना पड़ेगा। पिछले दस सालों में यूपीए ने हजारों करोड़ रूपए की सब्सिडी डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस, मिट्टी के तेल आदि पर दी है। इसके बदले यदि उसने यह राशि तेल अन्वेषण पर खर्च की होती, तो अब तक हम तेल के मामले में आत्म-निर्भर हो चुके होते और रूपए की विनिमय दर 40 रूपए प्रति डॉलर होती। तब लोग खुद को अधिक सुरक्षित महसूस करते। यह विचार प्रधानमंत्री के मस्तिष्क में क्यों नहीं आया, जिन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी की है? ढांचागत जैसे उत्पादन के क्षेत्र में निवेश की कीमत पर इस प्रकार के मुफ्त भोजन बांटना और सार्वजनिक धन का दुरूपयोग करना विकास के मार्ग पर अग्रसर देश को कई दशक पीछे धकेल देगा। मुझे चिन्ता इस बात की है कि चुनावों के दौरान गलत प्रकार की नीतियां, यानी की एक प्रकार की ‘लोकलुभावन नीतियों’ को लागू करना दीर्घावधि के आर्थिक विकास पर कुठाराघात होगा। इससे सरकार की बैलेंसशीट पर भी दबाव पड़ेगा। इस पृष्ठभूमि में मेरी प्रार्थना है कि भगवान लोगों को सद्बुद्धि प्रदान करे!

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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