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शीशों का एक मसीहा पांच से पांच सौ करोड़ तक

सुभाष त्यागी अपनी पत्नी शशि त्यागी के साथ। सुभाष त्यागी के संघर्ष का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि लगभग तीन दशक पहले अपनी पत्नी शशि त्यागी की दोनों किडनियां खराब हो जाने और आज तक कम से कम सप्ताह में तीन बार डायलेसिस कराने जैसी समस्याओं से जूझने के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य की ओर बढऩे की गति में सदा सन्तुलन बनाए रखा।

आस्कर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली फिल्म ‘स्लमडॉग करोड़पति’ के पात्र जमाल की तरह गरीबी के अभिशाप को झेलने की सुभाष त्यागी के लिए कोई मजबूरी नहीं थी। परन्तु कुछ कर गुजरने की इच्छाशक्ति उन्हें मुज्जफरनगर जिले के उनके गांव घिस्सु खेड़ा से चकाचौंध करने वाली मायानगरी दिल्ली में ले आई थी। पलकों पर झिलमिलाते सपनों को साकार करने के लिए उस वक्त सुभाष त्यागी की जेब में पूंजी के नाम पर मात्र पांच रूपए थे। इस महानगर में रोटी खाने के लिए उन्हें पहला काम नई दिल्ली नगर पालिका में शहर का गटर साफ करने का मिला था, जिसे उन्होंने सिरे से नकारते हुए जीवन में कुछ अनुकरणीय करने का फैसला लिया था। उनका मानना था कि यदि इस मायानगरी के गटर ही साफ करने होंगे, तो गांव में अपनेे खेतों में हल चलाना क्या बुरा है….और फिर शुरू हुआ जीवन के संघर्षों का लंबा सिलसिला। ढाई दशक में पांच (रूपए) से पांच करोड़ (रूपए) का गोल्ड प्लस ग्लासेज का साम्राज्य खड़ा करने वाले सपनों के इस शिल्पी ने सफलता के शिखर पर खड़े हर शख्स में अपना प्रतिबिम्ब देखा है। यहां तक कि जीवन की अति गंभीर कठिनाइयों और दुनिया की ठोकरें भी सुभाष त्यागी के फौलादी इरादों को नहीं तोड़ सकीं। सपने देखना, हकीकत के सांचे में ढाल कर सपनों को मूर्त रूप देना और उनका आनन्द लेना ही सपनों के इस अद्भुत शिल्पी का जुनून बना।

सुभाष त्यागी के संघर्षों की इस दास्तां- “शीशों का एक मसीहा” का लोकार्पण करने वाले उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और आंध्रप्रदेश के पूर्व राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी का “ये थक कर बैठ जाएं राह में, मुमकिन नहीं होता। इनके जैसे दीवानों का कोई मोहसिन नहीं होता।। थकान अपनी अमावस को मिटा लेता है चन्दा। मगर सूरज के रूकने का तो कोई दिन नहीं होता।।” सुभाष त्यागी जैसे लोग ही अनुकरणीय उदाहरण पेश कर समाज को दिशा देते हैं। कितना ही बड़ा और असाध्य लक्ष्य क्यों न हो, व्यक्ति का जुनून, संघर्ष और काम करने के प्रति समर्पणपूर्ण लगन उसे उसके लक्ष्य तक ले जाती है। ‘शीशों का एक मसीहा-पांच से पांच करोड़ तक’ में इन्हीं सुभाष त्यागी के संघर्षों को पठनीय दास्तां है।

पुस्तक का शीर्षक फैज अहमद फैज की नज्म “शीशों का मसीहा” से साभार लिया गया, जो इस पुस्तक के मुख्य पात्र सुभाष त्यागी के जीवन को पूरी तरह चरितार्थ करता है। पुस्तक पढऩे के बाद वरिष्ठ लेखक अशोक गुप्ता की बेबाक टिप्पणी थी-”सुभाष त्यागी ने फर्श से उठकर सफलता की अट्टालिका छूने का संघर्ष झेला है। उनकी शुरूआत कांच से हुई थी और अब तक कांच के ही बने हुए हैं…पारदर्शी, कठोर और सुन्दर।”

पुस्तक की भाषा अत्यन्त सरल, प्ररेणादायक और आम पाठक के दिलो-दिमाग में उतरने वाली है। पुस्तक का संदेश है कि सुभाष त्यागी की तरह यदि स्वयं के लिए कठोर अनुशासन गढ़ कर आगे बढ़ा जाए, तो जीवन में कुछ भी हांसिल करना मुश्किल नहीं हैं।                 (ब्यूरो)

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