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अनुच्छेद 370

अनुच्छेद- 370 के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण कारण यह बताया जाता है कि एक मुस्लिम बहुल राज्य को बनाए रखने में भारत सफल नहीं होगा। लेकिन यदि ऐसा है तो क्या ईसाई बहुल पूर्वोत्तर राज्यों और सिख बहुल पंजाब के लिए विशेष दर्जा देने की जरूरत नहीं है?

हाल ही में जम्मू में आयोजित रैली में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार देने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद-370 पर राष्ट्रीय बहस के लिए दिए गए सुझाव को लेकर राजनीतिक हलके में हड़कंप मचा है। खासकर, भाजपा विरोधी राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी वर्ग में गुस्सा है। उनका मानना है कि अनुच्छेद- 370 पर बहस की मांग के बहाने भाजपा राष्ट्रीय राजनीति में सांप्रदायिक तत्वों को शामिल कर, कश्मीरी अलगाववादियों और पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं को मजबूत करने का काम कर रही है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मोदी के इस सुझाव को दुर्भाग्यपूर्ण और अनावश्यक बताया। 4 दिसंबर को आयोजित मीडिया कॉन्क्लेव में एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को लेकर जनता में बहुत भ्रम है। उन्होंने दुख जताते हुए कहा – ‘यह कानून जम्मू-कश्मीर को अन्य राज्यों के साथ जोड़ता है और राज्य और शेष देश के बीच पुल का काम करता है।’

उमर अब्दुल्ला के पिता और केन्द्रीय मंत्री फारूख अब्दुल्ला ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा – ‘चाहे वह नरेन्द्र मोदी हों या कोई और, अनुच्छेद 370 कोई रद्द नहीं कर सकता। यह आज भी है और कल भी रहेगा।’ उन्होंने कहा – ‘लोगों को मूर्ख बनाने के लिए, नरेन्द्र मोदी अनुच्छेद- 370 जैसे मुद्दों पर बोलते हैं। यदि वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, तो उन्हें भारत को एकजुट करने के बारे में सोचना चाहिए, न कि विभाजन के बारे में।’

रैली में मोदी ने वास्तव में कहा क्या? मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने कहा कि भाजपा जम्मू-कश्मीर में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की दूरदर्शी पहल ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ के सिद्धांत को आगे ले जाएगी। उन्होंने कहा – ‘‘अनुच्छेद- 370 के अच्छे और बुरे कामों पर बहस होनी चाहिए, लेकिन क्या उमर अब्दुल्ला की बहन को भी वही अधिकार प्राप्त हैं, जो उन्हें प्राप्त हैं?’’ गौरतलब है कि उमर अब्दुल्ला की बहन ने राजस्थान के रहने वाले केन्द्रीय मंत्री सचिन पायलट से शादी की है। मोदी ने कहा – ‘‘राज्य में प्राकृतिक संसाधनों का विशाल भंडार होने के बावजूद, मुख्यमंत्री केन्द्र के सामने हाथ फैलाए रहते हैं, जिसके कारण राज्य में भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुंच गया है। अब समय आ गया है कि राज्य में एक ऐसा कानून हो जो राज्य में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाए, जो कि अनुच्छेद 370 के कारण संभव नहीं है। संविधान का अनुच्छेद- 370 जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देता है। भाजपा हमेशा इस अनुच्छेद को समाप्त करने के पक्ष में रही है।’’

मोदी के सुझाव पर ज्यादातर प्रतिक्रियाएं क्यों-कैसे और जम्मू-कश्मीर में पुरूषों के बराबर महिलाओं को संपत्ति के अधिकार के बीच उलझ कर रह गईं हैं। उमर ने मोदी की इस राय को तथ्यात्मक रूप से गलत कहा। प्रो. रेखा चौधरी के अनुसार – ‘‘इस मामले से अनुच्छेद- 370 का कोई लेना-देना नहीं है। यह राज्य के स्थायी निवासियों का मसला है। यह स्थानीय कानून 1927 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन महाराजा हरि सिंह द्वारा पास किया गया था। इस कानून के अनुसार, रोजगार और संपत्ति के अधिकार सहित कुछ निश्चित विषय राज्य के थे। महिलाओं के साथ भेदभाव बाद की घटना थी। महिलाओं के लिए स्थायी निवास प्रमाण-पत्र (1947 के बाद ‘राज्य का विषय’ शब्दावली का इस्तेमाल) सिर्फ उनकी शादी तक वैध था। वहां के स्थायी निवासी के साथ शादी करने के मामले में महिलाओं को स्थायी निवासी का प्रमाण पत्र दुबारा जारी किया जाता है। वैसी महिलाएं, जो राज्य के बाहर शादी करती हैं, उन्हें यह प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाता है। इस प्रशासनिक कार्रवाही को वहां के हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी और 2004 में हाईकोर्ट द्वारा दिया गया फैसला महिलाओं के पक्ष में रहा। वर्तमान कानूनी स्थिति में स्थायी निवासी प्रमाणपत्र देने के मामलों में महिलाओं और पुरूषों में कोई भेदभाव नहीं किया जाता। हालांकि यह भी सत्य है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में तत्कालीन पीडीपी सरकार ने महिलाओं को राज्य के बाहर शादी करने पर स्थायी निवासी के हाईकोर्ट के फैसले को दो बार बिल लाकर बदलने का भी प्रयास किया। जो भी हो, असेंबली और उसके बाहर भारी विरोध के कारण बिल को विधानसभा में नहीं लाया जा सका। आज महिलाएं राज्य से बाहर शादी करने के बावजूद, जम्मू-कश्मीर की स्थायी निवासी बनी रह सकती हैं।’’

यहां यह उल्लेखनीय है कि अकेली पीडीपी नहीं थी, जो हाईकोर्ट के फैसले को पलटना चाहती थी। अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस भी इस फैसले के खिलाफ थी। इस संदर्भ में मोदी के सुझाव के बाद उमर और उनकी पार्टी का श्रेणीबद्ध बयान यह साबित करता है कि उनकी पार्टी गलत थी और भविष्य में राज्य से बाहर विवाहित महिलाओं को संपत्ति के अधिकार को सुनिश्चित करने वाले हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं देगी। इसके बावजूद, तथ्य यह भी है कि राज्य में महिलाओं को संपत्ति अर्जित करने में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए – हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार, राज्य से बाहर विवाह करने के बावजूद महिलाएं संपत्ति अर्जित करने योग्य हैं, लेकिन उनके बच्चे महिला की पैतृक संपत्ति के वारिस नहीं हो सकते, क्योंकि वे जम्मू-कश्मीर के ‘स्थायी निवासी’ नहीं हैं।

यहां केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर का मामला लिया जा सकता है। एक टीवी चैनल के साथ साक्षात्कार में सुनंदा ने कहा था – ‘‘मैं चाहती हूं कि इस अनुच्छेद का कोई पुनर्निरीक्षण करे। मैं इसे समाप्त करने के लिए नहीं कह रही हूं, लेकिन कृपा करके हमें हमारा घर वापस दे दिया जाए। मैं इस अनुच्छेद से लाभान्वित नहीं हूं। कश्मीरी पंडितों को इस अनुच्छेद से कोई लाभ नहीं हुआ और बहुत सारी मुस्लिम लड़कियों को इससे कोई फायदा नहीं हुआ।’’ अनुच्छेद -370 के बारे में पूछे जाने पर श्रीमती थरूर ने कहा – ‘‘मैं अच्छी तरह वाकिफ हूं कि इस प्रश्न का उत्तर देने पर मेरे पति नाराज होंगे, लेकिन मेरी अपनी भी आवाज है। मैं एक औरत हूं, मैं एक कश्मीरी हूं, एक गर्वान्वित कश्मीरी और ऐसा कहने के लिए मैं अपने पति से क्षमा चाहती हूं, क्योंकि वह जवाहरलाल नेहरू के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। लेकिन मैं यह नहीं समझ पा रही हूं कि यह कानून कब बनाया गया …………. कश्मीर के लिए ऐसा क्यों, हम ऐसा नहीं कर सकते।’’

श्रीमती थरूर ने उन समस्याओं का जिक्र किया, जो 2006-07 में घाटी में संपत्ति खरीदने के दौरान सामने आईं। साक्षात्कारकर्ता को उन्होंने बताया कि किस प्रकार उन्हें जमीन खरीदने की अनुमति, सिर्फ इसलिए नहीं दी गई, क्योंकि उन्होंने गैर-कश्मीरी से शादी की थी। उन्होंने यह भी बताया कि किस तरह उमर अब्दुल्ला ने उनकी मदद करने की कोशिश की, साथ ही उन्होंने सचेत किया कि उनका बेटा इस भूमि का वारिस नहीं बन सकेगा।

मोदी के आलोचक जो भी कहें, तथ्य यह है कि जम्मू-कश्मीर में कुछ ऐसे नियम और कानून हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अनुच्छेद- 370 के कारण शेष भारत के साथ मेल नहीं खातेे। संक्षेप में, अनुच्छेद- 370 जम्मू-कश्मीर के मामले में केन्द्र की वैधानिक शक्ति को सीमित करता है। संसद द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए विधान बनाने की सख्त सीमाएं हैं। इस राज्य के पास अपना संविधान और अपना झंडा है, जो किसी अन्य राज्य के पास नहीं है। यहां की विधानसभा की अवधि छह साल की है, जबकि शेष भारत में यह अवधि पांच साल की है। एक भारतीय नागरिक, जो जम्मू-कश्मीर का सामान्य निवासी है, वह यहां चुनाव नहीं लड़ सकता। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट को सिर्फ अपील सुनने का अधिकार है। वह राज्य के लिए संघीय न्यायालय नहीं है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट सिर्फ अपील पर सुनवाई कर सकता है। ये प्रावधान राज्य को बड़े पैमाने पर स्वायत्तता देते हैं।

अनुच्छेद- 370 यह निश्चित करता है कि रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषयों को छोड़कर, अन्य कानूनों को लागू करने के लिए भारतीय संसद को राज्य सरकार की सहमति की जरूरत होगी। इस तरह राज्य के निवासी, नागरिकता, संपत्ति के स्वामित्व और मौलिक अधिकारों के लिए शेष भारतीयों से अलग, जम्मू-कश्मीर के निवासी कई तरह के नियम और कानूनों के बंधन में जीते हैं। हालांकि कुछ इसी तरह की सुरक्षा के लिए हिमाचल प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश और नागालैंड को भी विशेष दर्जा प्राप्त है और अनुच्छेद 371 के तहत महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों के पिछड़े क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए भी इस तरह का प्रावधान है, ताकि उस क्षेत्र के लोगों के लिए रोजगार की संभावनाएं और शैक्षिक सुविधाएं मिलने के साथ-साथ वहां विकास को बढ़ावा दिया जा सके। लेकिन यहां अंतर इस बात का है कि संसद इन कानूनों में संशोधन कर सकती है, जबकि जम्मू-कश्मीर में वहां की विधानसभा की सहमति के बिना ऐसा कुछ नहीं किया जा सकता।

इस बात पर गौर करना जरूरी है कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद- 370 का समावेश पूरी तरह अस्थायी उपाय था, जो विशेष परिस्थितियों में समावेशित किया गया था। वैसी परिस्थितियां आज नहीं हैं। 24 अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी आक्रमण के कारण 26 अक्टूबर 1947 को तत्कालीन महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ ‘विलय-समझौता’ पर हस्ताक्षर किया। इस समझौते ने रक्षा, विदेश मामले और संचार से संबंधित सारा क्षेत्राधिकार भारत को दे दिया। इसके पीछे उद्देश्य, कश्मीर को पाकिस्तान से बचाना था। महाराजा और भारत सरकार के बीच यह साफ था कि जहां तक पूरी तरह एकीकरण का सवाल है, इसका अंतिम फैसला जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा लेगी और तब तक अनुच्छेद – 370 के तहत राज्य को विशेष अधिकार प्राप्त रहेगा।

कुछ इतिहासकार यह तर्क देते हैं कि महाराजा भारत के साथ बिना शर्त विलय कर सकते थे, लेकिन नेहरू की वजह से ऐसा नहीं हो सका। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री नेहरू सारी शक्ति भारत सरकार की बजाय शेख अब्दुल्ला को हस्तांतरित करना चाहते थे। यह शेख अब्दुल्ला का आग्रह था कि पूर्ण विलय का अंतिम फैसला राज्य की संविधान सभा ही लेगी। विलय के समझौते के निष्पादन के बाद, जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा ने 17 नवंबर 1956 को एक नया संविधान अपनाया, लागू किया और जम्मू और कश्मीर के लोगों को दिया, जिसे जम्मू-कश्मीर का संविधान कहा गया। इस नए संविधान की प्रस्तावना में कहा गया कि ‘जम्मू-कश्मीर भारतीय संघ का अभिन्न हिस्सा है और रहेगा।’

इतिहासकार सूर्यकृष्ण पिल्लई ने सही तर्क दिया है – ‘‘जम्मू-कश्मीर की जनता की तरफ से संविधान सभा द्वारा यह कहने के बाद कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, संविधान में अनुच्छेद- 370 को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं था। मामला यहीं खत्म हो जाता और केन्द्र को सिर्फ यही काम करना था और आज भी करना है कि वह राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद- 370 को खत्म करने और जम्मू-कश्मीर के लिए संविधान को भंग करने के लिए संविधान में संशोधन करे।’’ पिल्लई आगे कहते हैं – ‘‘लेकिन दुर्भाग्य से नेहरू सरकार घाटी में मुस्लिम तुष्टिकरण की अप्रिय और मूर्ख नीति में व्यस्त रही और इसके कारण एक गैर-मुद्दे को मुद्दा बनाने की भयंकर भूल हुई। यह भी सत्य है कि उस समय भी पाकिस्तान और भारत में विध्वंसकारी शक्तियां सक्रिय थीं, लेकिन सशस्त्र बल के जरिए उन्हें काबू में करने से नेहरू को किसने रोका था, जो उनके हाथ में थीं। नेहरू ने एक के बाद एक भयंकर भूल की। यहां तक की आज भी केन्द्र, दुश्मन के खिलाफ उसी कायराना और सुलह-वार्ता वाली नीति को अपना रहा है।’’

अनुच्छेद- 370 के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण कारण यह बताया जाता है कि एक मुस्लिम बहुल राज्य को बनाए रखने में भारत सफल नहीं होगा। लेकिन यदि ऐसा है तो क्या ईसाई बहुल पूर्वोत्तर राज्यों और सिख बहुल पंजाब के लिए विशेष दर्जा देने की जरूरत नहीं है? सवाल धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का भी नहीं है, जैसा कि अनुच्छेद- 370 को खत्म करने की बात पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ लोग परिभाषित करते हैं। वास्तव में, भारतीय संविधान की भावना और सामग्री के विपरीत जम्मू-कश्मीर के संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ (समाजवाद भी) का कोई जिक्र नहीं है। यह भी जाना-माना तथ्य है कि पिछले कुछ सालों से जम्मू-कश्मीर के गैर-मुस्लिम समुदाय किस तरह त्रस्त हैं। आज कश्मीर की वास्तविक समस्या राज्य में इस्लामीकरण है, जिसके कारण कश्मीर समस्या का समाधान निकालना लगभग असंभव हो गया है। एक इस्लामिक कश्मीर का भारत से कभी भी कुछ लेना-देना नहीं होगा, चाहे अनुच्छेद- 370 रहे या न रहे।

इन वर्षों में कश्मीर, बांग्लादेशी विद्वान अबु ताहिर सलाहुद्दीन अहमद के तीन सिद्धांतों – भारतीयता, कश्मीरियत और इस्लामियत का गवाह रहा है। भारतीयता कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों या केन्द्र सरकार जैसी संघीय शक्तियों द्वारा प्रचारित किया गया है। बहरहाल, राज्य में कश्मीरियत और मुस्लिम होने के शाही विश्वास के बीच टकराव है।

कश्मीरी, कश्मीरियत की एक शाखा है, जो भारतीयता के साथ सह-अस्तित्व में है। भारतीयता बिना दूसरे समुदाय को नुकसान पहुंचाए समाज के सभी वर्गों की समावेशी या सम्मिलित पहचान है। इसमें आश्चर्य नहीं है कि मुस्लिम बहुल होने के बावजूद घाटी में हाल तक गो-मांस खाने वाले लगभग नहीं के बराबर थे। कुछ विद्वान अब यह कहने लगे हैं कि घाटी में कश्मीरियत की व्याख्या को लेकर हिंदू (खासकर कश्मीरी पंडित) और मुसलमानों के बीच हमेशा विभेद रहा है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि इस अवधारणा ने सह-अस्तित्व को बढ़ाया है। अधिसंख्य कश्मीरी मुसलमानों को हिंदुओं या बौद्धों से कोई समस्या नहीं है। इस के पीछे मुख्य कारण यह था कि अधिसंख्य कश्मीरी मुसलमान सूफीवाद या कहें ‘ऋषि दर्शन’ में विश्वास करते थे, जो संतों और धर्मस्थलों की पूजा में विश्वास करता था। इसके पीछे यह तर्क माना जाता है कि भारतीय उप-महाद्वीप में ज्यादातर मुसलमान हिंदू से धर्मांतरण कर मुसलमान बने हैं।

इसके विपरीत, घाटी में इस्लामीयत ने हमेशा विशेष अवधारणाओं की वकालत की। वहाबी और अहले-हदीस से प्रोत्साहित यह सिद्धांत कुरान और हदीस पर आधारित है, जो संतों और धर्मस्थलों की पूजा का विरोध करता है। यह परंपरा और सिद्धांत, कश्मीर में अल्पमत, लेकिन हमेशा मौजूद रहे हैं। मुस्लिम लीग और कश्मीर जमात जैसे संगठनों की नीतियों के पीछे यही सिद्धांत या परंपरा रही है।

यह कहने की जरूरत नहीं है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जैसे तथाकथित मध्यममार्गी तत्वों सहित लगभग सभी अलगाववादी और आतंकवादी, इस्लामीयत की पाठशाला से संबंध रखते हैं। उन्हें भारत से कुछ लेना-देना नहीं है। तुष्टिकरण की कोई भी सीमा उन्हें भारत में रहने के लिए प्रभावित नहीं कर सकती। वे ‘मुसलमानों का कश्मीर’ के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं और उनका स्पष्ट मानना है कि वे हिंदू बहुल भारत के साथ नहीं रह सकते। इन सभी बातों के मद्देनजर, अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिलने वाले विशेष राज्य के दर्जे ने कश्मीर राज्य को भारत के करीब लाने की जगह इस अंतर को और बढ़ा दिया है।

राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत वैद्यराज कहते हैं – ‘‘अनुच्छेद 370 राज्य के लोगों के लिए भी लाभकारी नहीं है। जनप्रतिनिधित्व कानून राज्य में लागू नहीं होता। राज्य के परिसीमिन का अधिकार भी केन्द्र के पास नहीं है। जम्मू की जनसंख्या, क्षेत्रफल और मतदाताओं की संख्या कश्मीर से ज्यादा है, लेकिन कश्मीर में विधानसभा की 47 सीटें हैं और जम्मू में सिर्फ 37 सीटें। यदि जम्मू का उचित परिसीमिन किया जाए तो वहां विधानसभा की 48-50 सीटें और कश्मीर में 35-36 सीटें होनी चाहिए। राज्य में पिछड़ा वर्ग का कोई रिकॉर्ड नहीं है। राज्य में मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू नहीं किया गया है, जिसके कारण पिछड़े वर्ग के लोगों को कई क्षेत्रों में आरक्षण नहीं मिल सका। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे वंचित वर्गों का 1991 तक राज्य में कोई आरक्षण नहीं था। 1991 में इन्हें रोजगार और शिक्षा में आरक्षण देने के बावजूद, राज्य की विधानसभा और राजनीति में इनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। यह आश्चर्य की बात है कि इस मुद्दे पर दलित और बहुजन समाज के नेता चुप्पी साधे हैं।’’


अनुच्छेद 370 के परिणाम


  1. अन्य राज्यों के साथ संबंध-विच्छेद नीति का प्रसार

संबंध-विच्छेद और अलगाववाद की जहरीली प्रवृति को उन लोगों द्वारा मजबूत किया जा रहा है, जिनके द्वारा भारतीय संविधान में अभिशप्त अनुच्छेद 370 को जोड़ा गया और बाद में इसे नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और पंजाब तक फैलाया गया।

 

  1. क्षेत्रवाद और प्रांतीयता

अनुच्छेद 370 क्षेत्रवाद, प्रांतीयता, संकीर्णता और अंधकारवाद को बढ़ावा दे रहा है। इसने भारत में क्षेत्रीय टकराव और विवाद को बढ़ाया है।

 

  1. स्थायी रूप से बसने के मौलिक अधिकार से वंचित

हमारे संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (ई)(जी) द्वारा प्राप्त मौलिक अधिकार के तहत भारतीय नागरिक देश के किसी भी हिस्से में स्थायी रूप से बसने, कोई भी पेशा या व्यवसाय अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन अनुच्छेद 370 भारतीय नागरिकों को जम्मू और कश्मीर में स्थायी रूप से बसने से वंचित करता है। क्या यह अजीब भेदभाव नहीं है कि जम्मू और कश्मीर के नागरिक भारत के किसी भी राज्य में बस सकते हैं, लेकिन भारतीय नागरिक भेदभावपूर्ण अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू और कश्मीर में नहीं बस सकते? यहां तक कि स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू और कश्मीर में अपनी पैतृक संपत्ति के मामले का समाधान नहीं कर सके थे। शेख अब्दुल्ला की नेतृत्व वाली सरकार द्वारा जारी परमिट के बिना भारत का कोई भी नागरिक जम्मू और कश्मीर नहीं जा सकता था। भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राज्य सरकार के परमिट सिस्टम को चुनौती देते हुए बिना परमिट के जम्मू और कश्मीर की सीमा में प्रवेश किया। उन्होंने नेहरू सरकार से विभाजनकारी अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की मांग की, जो क्षेत्रवाद का जहर फैला रहा था। परिणामस्वरूप 11 मई 1953 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और श्रीनगर के गेस्ट हाउस में कैद कर दिया गया। 23 जून 1953 को पुलिस कस्टडी में श्रीनगर के अस्पताल में संदेहास्पद स्थिति में डॉ. मुखर्जी का निधन हो गया। गैर-आधिकारिक जांच में चिकिसत्कीय हत्या की तरफ इशारा किया गया। इस तरह जनसंघ के संस्थापक डॉ. मुखर्जी ने अनुच्छेद 370 की समाप्ती के लिए खुद को बलिदान कर दिया।

 

  1. संपत्ति खरीदने के मौलिक अधिकार का हनन

अनुच्छेद 370 के कारण कोई भी भारतीय नागरिक जम्मू और कश्मीर में अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता, लेकिन जम्मू और कश्मीर का नागरिक भारत के किसी भी राज्य में संपत्ति खरीद सकता है।

 

  1. वोट देने के अधिकार का हनन

अनुच्छेद 370 के कारण भारत का कोई भी नागरिक जम्मू और कश्मीर का नागरिक नहीं बन सकता। इस कारण उन्हें राज्य की विधानसभा, नगरपालिका चुनाव और पंचायत चुनावों में वोट देने के अधिकार से वंचित होना पड़ता है।

 

  1. नौकरी से वंचित

अनुच्छेद 370 के कारण कोई भी भारतीय नागरिक जम्मू और कश्मीर राज्य में नौकरी नहीं पा सकता। यहां सभी नौकरियां राज्य के नागरिकों के लिए सुरक्षित हैं।

  1. राज्य की महिलाओं के लिए हानिकारक

अनुच्छेद 370 उन महिलाओं के लिए काफी हानिकारक है, जो राज्य में जन्मीं और पली-बढ़ी हैं। यदि राज्य की स्थायी निवासी कोई महिला, किसी दूसरे राज्य के निवासी से शादी कर लेती है, तो उस स्थिति में महिला को राज्य में स्थित अपनी संपत्ति से हाथ धोना पड़ेगा। यहां तक कि अपने पैतृक संपत्ति से भी उसे वंचित होना पड़ेगा। जम्मू और कश्मीर राज्य में महिलाओं को जारी किया जाने वाला निवास प्रमाण पत्र सिर्फ उसकी शादी तक मान्य होता है। शादी के बाद उन्हें दुबारा स्थायी निवास प्रमाण पत्र हासिल करना पड़ता है।

 

  1. शादी के बाद कश्मीरी महिलाएं नामांकन और नौकरी से वंचित

जम्मू और कश्मीर में जन्मी और पली-बढ़ी या स्थायी निवासी कोई भी महिला अगर राज्य के बाहर किसी भारतीय नागरिक से शादी करती है, तो ऐसी स्थिति में उसे न ही राज्य में नौकरी मिल सकती है और न ही भारत सरकार से वित्तीय सहायता प्राप्त किसी भी मेडिकल, इंजिनियरिंग और एग्रीकल्चरल कॉलेज में वह नामांकन करा सकती है।

  1. हिंदुओं पर जुल्म : सुप्रीम कोर्ट असहाय

हमारी पवित्र मातृभूमि के अपवित्र विभाजन के कारण, पश्चिमी पाकिस्तान के हिंदू अपनी पैतृक भूमि छोडऩे को विवश हो गए। कुछ हजार हिंदू परिवारों ने जम्मू और कश्मीर में आश्रय लिया। आज उनके प्रवास के 55 साल बीत चुके हैं, लेकिन अनुच्छेद 370 के कारण उनके नाती-पोतों को भी राज्य की नागरिकता इस आधार पर नहीं दी जा रही है कि राज्य के बाहर के लोगों को स्थायी निवासी नहीं बनाया जा सकता। परिणामस्वरूप, दुर्भाग्यशाली हिंदू आज तक अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हैं। वे अपना मकान बनाने के लिए राज्य में जमीन नहीं खरीद सकते। उनके नाम राज्य के विधानसभा चुनाव के लिए नामांकित नहीं हो सकते। इस तरह वे राज्य की मतदान प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकते। वे सरकारी और अल्प-सरकारी संस्थानों में नौकरी प्राप्त नहीं कर सकते। राज्य सरकार द्वारा उन्हें ऋण नहीं दिया जा सकता। अपना व्यवसाय करने के लिए राज्य सरकार से उन्हें लाइसेंस नहीं मिलता। उनके बच्चे केन्द्र सरकार द्वारा अनुदानित मेडिकल और इंजिनियरिंग कॉलेजों में नामांकन नहीं करा सकते। इस तरह देश के इस अविभाज्य राज्य में उनकी स्थिति द्वितीय श्रेणी के नागरिक की है। दूसरा कोई विकल्प नहीं देखकर, इन दुर्भाग्यशाली लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। विडंबना यह है कि उत्पीडऩ के इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने महसूस किया, लेकिन अनुच्छेद 370 की वजह से उन्हें कोई राहत नहीं दे सका। यह एक मर्मभेदी कहानी है कि उन्हें न्याय देने के बजाय, अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में पेचीदा संवैधानिक स्थिति के कारण उन प्रवासी हिंदुओं को न्याय देने में अपनी असमर्थता जाहिर की।

 

  1. कश्मीर की सीमाओं में परिवर्तन करने में असमर्थता

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत बिल पर हस्ताक्षर करने से पहले राष्ट्रपति के संबंधित राज्य के ऑथिरिटी से बात करने के बाद, संसद को किसी भी राज्य की सीमा में फेरबदल करने का अधिकार है। लेकिन अनुच्छेद 370 के कारण, संसद को जम्मू और कश्मीर की सीमा को बदलने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने से पहले उसे जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा से अनुमति की जरूरत होगी। यह बात इस तरफ इशारा करती है कि कश्मीर की संविधान सभा संसद से भी बड़ी है। अगर पंडित नेहरू ने राज्य के लिए अनुच्छेद 370 का प्रावधान नहीं किया होता, तो भारतीय संसद कश्मीर को कई भागों में विभाजित कर उसमें उसके नजदीकी क्षेत्रों को जोड़ सकती थी। कश्मीर समस्या का एक ही समाधान है, वह है अनुच्छेद 370 को समाप्त कर कश्मीर को विभाजित कर उससे सटे क्षेत्रों को इस तरह जोड़ा जाय कि मुसलमान अपना बहुमत खो दें और हिंदू आसपास के हिंदू बहुल क्षेत्रों में स्थायी रूप से बस जाएं। मुस्लिम जनसंख्या का सुनियोजित और सुव्यवस्थित तरीके से फैलाव कर और हिंदू जनसंख्या को बसा कर कश्मीर समस्या जैसी बुराई का स्थायी इलाज किया जा सकता है।

  1. हिंदी की स्वीकार्यता नहीं

हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में भारतीय गणराज्य के निर्णय को अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू और कश्मीर में लागू नहीं किया जा सकता। विधानसभा अध्यक्ष की पूर्व अनुमति के बिना विधानसभा का कोई भी सदस्य हिंदी में नहीं बोल सकता।

  1. राज्य में सीबीआई नहीं

अनुच्छेद 370 की अभिशप्त बाधा के कारण, जम्मू और कश्मीर में सीबीआई को काम करने की अनुमति नहीं है। इस कारण बहुत सारे कश्मीरी नेता और उनके साथियों का पाकिस्तानी षड्यंत्रकारियों और घुसपैठियों के साथ सांठ-गांठ का खुलासा नहीं हो सकता। इससे भारत में सत्तासीन नेताओं तक पाकिस्तानी एजेंट और जासूसों के साथ साझेदारी की रिपोर्ट नहीं पहुंच पाती।

(अरूण शौरी द्वारा लिखित ‘अ सेक्यूलर एजेंडा’ और कन्हैयालाल एम. तलरेजा द्वारा लिखित ‘होरेंडस कन्सिक्वेंसेज ऑफ आर्टिकल 370’ पर आधारित)

 


वैद्यराज वैध बिंदुओं के आधार पर कहते हैं – ‘‘पश्चिम बंगाल से 16 गुणा और बिहार से 12 गुणा ज्यादा प्रति व्यक्तिअनुदान जम्मू-कश्मीर को देने की कोई तुक नहीं है। कश्मीर घाटी में वित्तीय संसाधनों का आवंटन 65-69 प्रतिशत है, जबकि जम्मू-लद्दाख क्षेत्र को मिलाकर इसका आवंटन 31-35 प्रतिशत है। जम्मू-कश्मीर को लगातार विशेष रोजगार पैकेज और प्रधानमंत्री पैकेज मिलता है, लेकिन इसकी कोई जवाबदेही नहीं है। न ही इसकी सार्वजनिक सूचना दी जाती है और न ही जम्मू-कश्मीर आरटीआई के तहत इसकी सूचना उपलब्ध कराई जाती है।’’

इस आधार पर मेरा सबसे मुख्य बिंदु है कि क्या अनुच्छेद- 370 भारत सरकार द्वारा खत्म हो सकता है? जैसा कि पहले ही इंगित किया जा चुका है कि अनुच्छेद- 370 उसी वक्त खत्म हो गया था, जब 1950 में जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा ने इसे खत्म कर दिया था। पिल्लई के अनुसार – ‘‘भारतीय संविधान के भाग में निहित अनुच्छेद- 370 अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान था, जो अनुच्छेद 368 में संशोधन के बाद उसी अनुच्छेद के खंड (3) द्वारा राष्ट्रपति की शक्ति की स्थिति में व्यर्थ हो जाता है।’’ जब 26 अक्टूबर 1947 को विलय-समझौते का निष्पादन हुआ और जम्मू-कश्मीर की जनता की तरफ से राज्य की संविधान सभा ने 17 नवंबर 1956 को इसे अंतिम माना, तभी अनुच्छेद- 370 का मुद्दा हमेशा के लिए खत्म हो गया था। पिल्लई कहते हैं – ‘‘खत्म मामले को एक बार फिर विवादास्पद मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है? भारतीय संविधान के अनुच्छेद- 370 का खंड (3) साफ कहता है कि अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों के जरिए अगर राष्ट्रपति चाहें तो सार्वजनिक सूचना द्वारा कुछ अपवादों और संशोधनों के साथ, उस दिन से, जो उन्होंने निश्चित किया है, इस अनुच्छेद को समाप्त कर सकते हैं।’’


जम्मू रैली में अनुच्छेद 370 के बारे में मोदी ने क्या कहा?


“हमारी पार्टी अटल बिहारी वाजपेयी की इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत वाले सिद्धांत की पहल को आगे ले जाएगी।

अनुच्छेद 370 के अच्छे और बुरे परिणामों पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन क्या उमर अब्दुल्ला की बहन को वही अधिकार प्राप्त हैं, जो उन्हें हैं?

प्राकृतिक संसाधनों का विशाल भंडार होने के बावजूद, मुख्यमंत्री केन्द्र के आगे हाथ फैलाए रहते हैं। जम्मू-कश्मीर में भ्रष्टाचार अपने चरम पर पहुंच गया है। राज्य में भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए कानून होना चाहिए या नहीं? केन्द्र कानून बनाता है, लेकिन अनुच्छेद 370 की वजह से इसे राज्य में लागू नहीं किया जा सकता।

संविधान का अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता है। भाजपा ने इसे खत्म करने की हमेशा वकालत की है।”



370 जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंध


(1) इस संविधान में किसी भी प्रावधान के होते हुए भी, –

(क) अनुच्छेद 238 के उपबंध जम्मू-कश्मीर, राज्य के संबंध में लागू नहीं होंगे;

(ख) उक्त राज्य के लिए विधि बनाने की संसद की शक्ति, –

(l) संघ सूची और समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित होगी, जिन्हें राष्ट्रपति, उस राज्य की सरकार से परामर्श करके, उन विषयों के तत्स्थानी विषय घोषित कर दें, जो भारत डोमिनियन में उस राज्य के अधिमिलन को शासित करने वाले अधिमिलन पत्र में ऐसे विषयों के रूप में विनिर्दिष्ट हैं, जिनके संबंध में डोमिनियन विधान-मंडल उस राज्य के लिए विधि बना सकता है; और

(ll) उक्त सूचियों के उन अन्य विषयों तक सीमित होगी जो राष्ट्रपति, उस राज्य की सरकार की सहमति से, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे।

स्पष्टीकरण – इस अनुच्छेद के प्रायोजनों के लिए, उस राज्य की सरकार से वह व्यक्ति अभिप्रेरित है, जिसे राष्ट्रपति से, जम्मू-कश्मीर के महाराजा की 5 मार्च, 1948 की उद्घोषणा के अधीन तत्समय पदस्थ मंत्री -परिषद की सलाह पर कार्य करने वाले जम्मू-कश्मीर के महाराजा के रूप में तत्समय मान्यता प्राप्त थी;

(ग) अनुच्छेद 1 और इस अनुच्छेद के उपबंध उस राज्य के संबंध में लागू होंगे;

(घ) इस संविधान के ऐसे अन्य उपबंध ऐसे अपवादों और उपांतरणों के अधीन रहते हुए, जो राष्ट्रपति आदेश (46) द्वारा विनिर्दिष्ट करें, उस राज्य के संबंध में लागू होंगे :

परंतु ऐसा कोई आदेश जो उपखंड (ख) के पैरा (i) में निर्दिष्ट राज्य के अधिमिलन पत्र में विनिर्दिष्ट विषयों से संबंधित है, उस राज्य की सरकार से परामर्श करके ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं :

परंतु यह और कि ऐसा कोई आदेश जो अंतिम पूर्ववर्ती परंतुक में निर्दिष्ट विषयों से भिन्न विषयों से संबंधित है, उस सरकार की सहमति से ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं।

इस अनुच्छेद द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति ने जम्मू और कश्मीर राज्य की संविधान सभा की सिफारिश पर यह घोषणा की कि 17 नवंबर, 1952 से उक्त अनुच्छेद 370 इस उपांतरण के साथ प्रवर्तनीय होगा कि उसके खंड (1) में स्पष्टीकरण के स्थान पर निम्नलिखित स्पष्टीकरण रख दिया गया है।

स्पष्टीकरण : इस अनुच्छेद के उद्देश्यों के लिए राज्य की सरकार का अर्थ ऐसे व्यक्ति से होगा, जिसे राज्य की विधानसभा की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के तौर पर मान्यता दी गई है और जो कार्यालय में मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम कर रहा है।

(2) यदि खंड (1) के उपखंड (ख) के पैरा (i) में या उस खंड के उपखंड (घ) के दूसरे परंतुक में निर्दिष्ट उस राज्य की सरकार की सहमति, उस राज्य का संविधान बनाने के प्रयोजन के लिए संविधान सभा के बुलाए जाने से पहले दी जाए, तो उसे ऐसी संविधान सभा के समक्ष ऐसे विनिश्चय के लिए रखा जाएगा जो वह उस पर करे।

(3) इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा घोषणा कर सकेगा कि यह अनुच्छेद प्रवर्तन में नहीं रहेगा या ऐसे अपवादों और उपांतरणों सहित ही और ऐसी तारीख से, प्रवर्तन में रहेगा, जो वह विनिर्दिष्ट करे:

परंतु राष्ट्रपति द्वारा ऐसी अधिसूचना निकाले जाने से पहले खंड (2) में निर्दिष्ट उस राज्य की संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक होगी।

(4) इस अनुच्छेद द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति ने जम्मू और कश्मीर राज्य की संविधान सभा की सिफारिश पर यह घोषणा की कि 17 नवंबर, 1952 से उक्त अनुच्छेद 370 इस उपांतरण के साथ प्रवर्तनीय होगा कि उसके खंड (1) में स्पष्टीकरण के स्थान पर निम्नलिखित स्पष्टीकरण रख दिया गया है, अर्थात –

”स्पष्टीकरण – इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए राज्य की सरकार से वह व्यक्ति अभिप्रेरित है जिसे राज्य की विधानसभा की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने राज्य की तत्समय पदारूढ़ मंत्रि-परिषद की सलाह पर कार्य करने वाले जम्मू-कश्मीर के सदर-ए-रियासत के रूप में मान्यता प्रदान की हो।”


मिंट समाचार पत्र के संपादक (व्यूज) सिद्धार्थ सिंह के अनुसार – ‘‘मई 1954 में अनुच्छेद- 370 के तहत राष्ट्रपति ने जम्मू-कश्मीर के लिए संविधान में प्रावधानों को बढ़ाने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया था। इनमें एक अनुच्छेद- 368 भी था, जो संविधान में संशोधन की अनुमति देता है। इसके माध्यम से जम्मू-कश्मीर में प्रायोज्यता को सीमित किया गया। यह अनुच्छेद 370 हटाने में एक बड़ी बाधा है।’’

‘‘एक बार फिर, यह संदेहास्पद व्याख्या है। यह मात्र कार्यकारी आदेश है, जो जम्मू-कश्मीर में लागू होता है और यह संवैधानिक संशोधन नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि संविधान में क्या निहित है और क्या संशोधन हो सकता है। हालांकि संसद द्वारा संशोधन की सीमाएं हैं। इसके अतिरिक्त, मूल विशेषताओं के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने संसद के ऊपर कुछ सीमाएं निश्चित की हैं। संविधान की मूल विशेषता (उदाहरण के लिए, गणराज्य का धर्मनिरपेक्ष स्वभाव और शक्ति का बंटवारा) में कोई बदलाव नहीं हो सकता। अस्थायी प्रावधान अनुच्छेद- 370 के पास मूल विशेषताएं नहीं हैं और इसे खत्म करने में कोई बाधा नहीं है।’’


नुच्छेद 370 और धर्मनिरपेक्षता


जम्मू में नरेन्द्र मोदी के भाषण पर उमर अब्दुल्ला को प्रतिक्रिया देनी पड़ी। काफी लम्बे समय बाद देश में अनुच्छेद 370 पर गंभीरता से बहस छिड़ी है। इससे पहले हुई बहसों में, पूरी सूचना के अभाव के कारण अनुच्छेद 370 को धर्मनिरपेक्ष बनाम गैर-धर्मनिरपेक्ष बहस से जोड़ा गया। अनुच्छेद 370 का धर्मनिरपेक्षता से कुछ लेना-देना नहीं है। इस विषय पर जो कुछ मैंने अध्ययन किया, उससे यह दिलचस्प पहलू सामने आया कि किस तरह अनुच्छेद 370 भारतीय नागरिकों के खिलाफ दमन और भेदभाव का जरिया बन सकता है।

अनुच्छेद 370 एक विशेष प्रावधान है, जिसे जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में बनाया गया था। यह एक अस्थायी प्रावधान है। यह केन्द्र और राज्य के बीच अधिकार के बंटवारे से संबंधित है। जम्मू-कश्मीर के संबंध में केन्द्र की शक्तियां कम हैं। अधिकतर अधिकार राज्य विधानमंडल के पास है। यदि कोई अधिकार केन्द्र से राज्य को हस्तांतरित करना पड़े, तो इसके लिए राज्य की सहमति जरुरी होगी।

अनुच्छेद 370 में कहा गया है :

370- जम्मू-कश्मीर राज्य के संदर्भ में अस्थायी प्रावधान

(1) संविधान के बाकी प्रावधान जो भी हों,

(ए)अनुच्छेद 238 के प्रावधान जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में लागू नहीं होंगे;

(बी) राज्य के लिए कानून बनाने का संसद का अधिकार सीमित है –

(l) संघसूची और समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित होगी, जिन्हें राष्ट्रपति उस राज्य सरकार से सलाह कर, उन विषयों के अनुरुप घोषित कर दें, जो भारत डोमिनियन में उस राज्य के विलय को शासित करने वाले विषयों के रुप में विनिर्दिष्ट हैं, जिनके संबंध में डोमिनिकन विधानमंडल उस राज्य के लिए कानून बना सकता है; और

(ll) उक्त सूचियों के उन अन्य विषयों तक सीमित होंगी, जो राष्ट्रपति उस राज्य की सरकार की सहमति से आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करें।

व्याख्या : इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए, उस राज्य सरकार की सरकार से उस व्यक्ति से अभिप्राय है जिसे राष्ट्रपति से 5 मार्च 1948 को जारी की गई जम्मू-कश्मीर के महाराजा की उद्घोषणा के अधीन उस समय पदस्थ मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करने वाले जम्मू-कश्मीर के महाराजा के रुप में मान्यता मिली।

(सी) अनुच्छेद 1 और इस अनुच्छेद के प्रावधान उस राज्य के संबंध में लागू होंगे;

(डी) इस संविधान के अन्य प्रावधान अपवादों और तब्दिलियों के साथ उस राज्य के विषय के संबंध में लागू होंगे, जैसा कि राष्ट्रपति आदेश द्वारा विशिष्ट निर्देश दे सकते हैं :

प्रोवाईडिड फर्दर दैट नो सच ऑर्डर विच रिलेट्स टू मैटर्स अदर दैन दोज रेफर्ड टू इन द लास्ट प्रिसिडिंग प्रोविजो शैल बी इश्यूड एक्सैप्ट विद द कनकरेन्स ऑफ दैट गवर्नमेंट।

बशर्ते, राज्य सरकार के साथ सलाह को छोड़कर, ऐसा कोई भी आदेश जारी नहीं किया जाए, जिसका उपखंड (ख) के पैरा (1) में उल्लिखित राज्य के विलय में विशेष रुप से वर्णन किया गया हो :

भारत के राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के आधार पर एक आदेश (कानून नहीं) के जरिए अनुच्छेद- 35ए के प्रावधानों को अधिसूचित किया हो। अनुच्छेद- 35ए के प्रावधान इस प्रकार हैं :

35ए- संविधान में जो कुछ लिखा है, उसके बावजूद, जम्मू-कश्मीर राज्य में वर्तमान में और बाद में लागू कोई भी कानून राज्य विधानमंडल ने नहीं बनाया।

(ए) लोगों के वर्गों को परिभाषित करना, जो जम्मू-कश्मीर राज्य के स्थायी निवासी हैं, या हो सकते हैं, अथवा

(बी) इस तरह के स्थायी निवासियों को कोई भी विशेषाधिकार और सुविधाएं देना, अथवा अन्य लोगों पर प्रतिबंध लागू करना :

(l) राज्य सरकार के अंतर्गत रोजगार

(ll) राज्य में अचल संपत्ति का अधिग्रहण

(lll) राज्य में बसना अथवा

(lV) छात्रवृत्ति का अधिकार और ऐसी अन्य सहायता, जो राज्य सरकार प्रदान कर सकती है,

उसे इस आधार पर निरस्त किया जा सकता है कि यह असंगत है, अथवा इस हिस्से के किसी प्रावधानों द्वारा भारत के अन्य नागरिकों को दिए गए किसी भी तरह के अधिकारों को कम करती है।

     लिहाजा भारत के नागरिकों को राज्य की नागरिकता का दर्जा नहीं दिया गया। राज्य की नागरिकताऔर स्थायी निवासीमुहावरों का इस्तेमाल बदल-बदल कर किया जा रहा है। 1947 में हजारों लोगों ने पलायन किया, जो लोग भारत के अन्य भागों में बसे, उन्हें सभी संवैधानिक गारंटी मिली हुई हैं। वह उन सभी मौलिक अधिकारों के हकदार हैं, जो संविधान के अंतर्गत नागरिकों को मिले हुए हैं। जो दुर्भाग्यशाली लोग जम्मू-कश्मीर में जाकर बस गए, उन्हें भी भारत की नागरिकता दी गई। वे लोकसभा चुनावों में भी हिस्सा ले सकते हैं। वे भारत में कहीं भी संपत्ति खरीद सकते हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद-6 के अंतर्गत उन्हें राज्य की नागरिकता नहीं दी गई। भारत का नागरिक होने के बावजूद उनके साथ भेदभाव किया गया है। वे राज्य विधानसभा, नगर निगम अथवा पंचायतों के चुनाव में मतदान नहीं कर सकते अथवा चुनाव नहीं लड़ सकते। उन्हें राज्य में नौकरियां नहीं मिलतीं। वे राज्य में संपत्ति नहीं ले सकते। राज्य की नागरिकता के रुप में उनके बच्चे कॉलेजों में दाखिले के हकदार नहीं हैं। उनमें से प्रतिभाशाली बच्चों को छात्रवृत्ति अथवा राज्य से किसी तरह की अन्य सहायता नहीं मिल सकती।

                इसका असर यह होगा कि मौलिक अधिकारों से असंगत कानून इन व्यक्तियों की हैसियत से वैध होंगे। भारत के ये नागरिक अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, नस्ल अथवा जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव रोकने), अनुच्छेद 16 (जनता को रोजगार और आरक्षण के मामलों में अवसर की समानता), बोलने की आजादी के अधिकार सहित अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और आजादी के अधिकार का संरक्षण करने के हकदार नहीं है। अनुच्छेद 25 के अंतर्गत उन्हें धर्म को अपनाने और उसके प्रचार की आजादी का हक नहीं है। उन्हें अनुच्छेद 29 और 30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने का अधिकार नहीं है। अनुच्छेद 35ए के प्रभाव से राज्य की नागरिकता प्राप्त न करने वाले जम्मू-कश्मीर में रह रहे भारत के नागरिकों को ये संरक्षण प्राप्त नहीं हैं। राज्य के बाहर विवाह करने वाली बेटियां पैतृक सम्पत्ति पाने का अधिकार खो देंगी, के संबंध में 2002 से पहले की स्थिति भारत के नागरिकों, भारत के नागरिकों और राज्य की नागरिकता न पाने वालों के बीच भेदभाव के अधिकार पर आधारित है, जो अनुच्छेद 35ए देता है।

क्या अनुच्छेद 35ए जैसे प्रावधान जो अनुच्छेद 370 के कारण अस्तित्व में हैं, उनका किसी सभ्य समाज में कोई स्थान है? यह भारत के नागरिकों के खिलाफ दमन है। यह भेदभावपूर्ण और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। अनुच्छेद 35ए को 1954 में शामिल किया गया। यह संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है। मुझे आश्चर्य होगा, अगर इसकी संवैधानिक वैधता को किसी समय चुनौती मिले।

 अरुण जेटली


अनुच्छेद- 370 को फारूख अब्दुल्ला द्वारा स्थायी मानना गलत है। इसे खत्म करना केन्द्र सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर है। लेकिन इस मामले में वह सही हो सकते हैं कि किसी भी सरकार में, चाहे वह नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली ही क्यों न हो, इसे खत्म करने का साहस नहीं हो सकता।

प्रकाश नंद

 

 

 

 

 

 

 

 лобановский александр игоревич харьковЯндекс.Метрика

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