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सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक 2011 और 2013 एक तुलनात्मक विश्लेषण

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद द्वारा तैयार, सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा रोकथाम विधेयक 2011 और सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक 2013, दोनों ही अनिवार्य और मौलिक रूप से हिंदू विरोधी हैं और इन्हें धार्मिक और भाषायी आधार पर भारत के लोगों को एक बार फिर बांटने के लिए बनाया गया है। यह विधेयक हिंदू और गैर-हिंदुओं के बीच खाई को और चौड़ा करेगा और नौकरशाहों को सीमा पार के देश के दुश्मनों के षड्यंत्र में फंसने के कारण ग्लानित भी करेगा।

2011 के विधेयक की धारा 3(ई)में धार्मिक अल्पसंख्यकों, भाषायी अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को मिलाकर एक समूह का नाम दिया गया है। इस विधेयक की धारा 11 में यौन हिंसा, घृणास्पद प्रचार, संगठित सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा और भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत आने वाले 73 अन्य अपराधों को शामिल किया गया है। इस समूह के अंतर्गत आने वाले व्यक्तियों के खिलाफ, इनमें से किसी भी अपराध के लिए किसी हिंदू के पकड़े जाने पर कड़ी और त्वरित सजा का प्रावधान है। भारत के इतिहास में पहली बार, विभिन्न धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यक भारतीयों के लिए अलग-अलग कानून और सजा का प्रावधान यूपीए सरकार के प्रमुख सहयोगी दल कांग्रेस द्वारा तैयार विधेयक के माध्यम से किया गया है। 2011 में प्रस्तावित विधेयक में प्रयोग किए गए ‘समूह’ को हटाकर, 2013 के विधेयक में उसके लिए हर जगह ‘एक खास धर्म और भाषा वाले व्यक्तियों’ का प्रयोग किया गया है।

2013 के विधेयक की धारा 9 के अनुसार, धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यक के खिलाफ घृणास्पद प्रचार, संगठित सांप्रदायिक हिंसा और भारतीय दंड संहिता के तहत आने वाले 56 अन्य अपराध, सांप्रदायिक हिंसा के तहत अपराध माने जाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यही अपराध किसी अल्पसंख्यक द्वारा हिंदू के खिलाफ किए जाने पर आरोपी इस कानून के दायरे में नहीं आएगा। इस तरह, एक ही अपराध के लिए धर्म और भाषा के आधार पर दो तरह के कानूनों का प्रावधान कांग्रेस की सरकार ने किया है, जोकि पूरी तरह असंवैधानिक है।

2011 के विधेयक की धारा 3(के)और 2013 के विधेयक की धारा 3(आई) में इसे समान रूप से परिभाषित किया गया है और हिंदुओं को सांप्रदायिक हिंसा के दायरे से बाहर रखा गया है। इस तरह सिर्फ अल्पसंख्यक ही सांप्रदायिक हिंसा से पीडि़त होने का दावा कर सकते हैं, जबकि भारत में सांप्रदायिक हिंसा के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह तथ्य सामने आता है कि भारत में सांप्रदायिक हिंसा की शुरूआत ज्यादातर अल्पसंख्यकों द्वारा की जाती है, खासकर शुक्रवार के दिन। एक अल्पसंख्यक के रूप में व्यक्ति की पहचान की परिभाषा दोनों विधेयकों (धारा 4) में समान रूप से उल्लेखित है। दोनों विधेयकों (धारा 1(2)) में प्रावधान है कि यह कानून पूरे भारत में समान रूप से लागू होगा, सिवाय जम्मू- कश्मीर के, जहां हिंदू, सिख और ईसाई अल्पसंख्यक हैं।

2011 और 2013 के विधेयक की धारा 2 के अनुसार, विदेशों में रहने वाले भारतीय हिंदू, अगर किसी भी धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यक के खिलाफ कोई अपराध करते हैं, तो उनके खिलाफ सुनवाई भारतीय न्यायालयों में इसी कानून के तहत होगी।

2011 के विधेयक में राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर ‘नेशनल ऑथिरिटी फॉर कम्युनल हारमनी’ के गठन का प्रस्ताव है। लेकिन, इसप्राधिकरण का प्रमुख, प्रभुत्व और इस पर नियंत्रण धार्मिक अल्पसंख्यकों के हाथ में होगा। इस प्राधिकरण में हिंदू संख्या के आधार पर अल्पमत में रहेंगे। 2013 के प्रस्तावित विधेयक में इस प्राधिकरण के गठन का प्रस्ताव स्थगित कर दिया गया है, लेकिन उसके कार्यों को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव किया गया है। 2011 के प्रस्तावित विधेयक की धारा 38 और 2013 के विधेयक की धारा 33 निर्धारित करती है कि पीडि़त की पहचान या सूचना देने वाले व्यक्ति को हमेशा संरक्षित किया जाएगा। इस कानून के अनुसार, आरोपी हिंदू को कभी नहीं बताया जाएगा कि उसके खिलाफ किसने शिकायत की है। अब सवाल है कि शिकायतकर्ता या अभियोजन पक्ष के गवाह से, बचाव पक्ष का वकील कब और कैसे सवाल करेगा।

2011 के प्रस्तावित विधेयक की धारा 40 और 2013 के विधेयक की धारा 34बी कहती है कि राष्ट्रीय प्राधिकरण या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने दिए गए बयान का इस्तेमाल दिवानी या आपराधिक मामलों में उस व्यक्ति के खिलाफ नहीं होगा। इस तरह यह विधेयक अल्पसंख्यकों को हिंदुओं के खिलाफ कोई भी आरोप लगाने के लिए प्रोत्साहित करता है, जो हिंदुओं और गैर-हिंदुओं के बीच खाई को और चौड़ा करेगा।

2011 के प्रस्तावित विधेयक की प्रस्तावित धारा 56 और 2013 के विधेयक की धारा 40 के तहत, इस विधेयक के अंतर्गत आने वाला हर अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होगा। इसका अर्थ यह हुआ कि इस कानून के तहत गिरफ्तार किए गए हिंदुओं को कुछ सप्ताह या महीने बाद जमानत सिर्फ न्यायालय से ही मिल सकती है।

2011 के प्रस्तावित विधेयक की धारा 126 कहता है कि सांप्रदायिक हिंसा के इन अपराधों का अभियोजन और सुनाई गई सजा, किसी भी सीमा निर्धारण का विषय नहीं होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो मुस्लिम या कोई भी अल्पसंख्यक, सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित किसी भी केस को दुबारा खुलवा सकते हैं, लेकिन ये केस 1947 के बाद के होंगे, न कि इसकी शुरूआत मोहम्मद बिन कासिम द्वारा भारत पर किए गए पहले मुस्लिम आक्रमण से होगा। सीमाओं की गैर-प्रायोज्यता का यह प्रावधान अनुभाग 9ई2 के जरिए 2013 के विधेयक में भी बरकरार रखा गया है।

2011 के प्रस्तावित विधेयक की धारा 76(2) के तहत पीडि़त व्यक्ति विशेष सरकारी वकील को बदलने की मांग कर सकता है। धारा 83(6) के अंतर्गत सरकार द्वारा बनाए पैनल में से किसी भी वकील को सरकारी खर्चे पर अपने लिए नियुक्त करने का आग्रह कर सकता है। ये सारे प्रावधान 2013 के प्रस्तावित विधेयक की धारा 54(2) और 60(6) में बरकरार रखे गए हैं। हिंदुओं को आपराधिक मामलों में ये सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी।

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, पीडि़त व्यक्ति को मामले की वर्तमान स्थिति के बारे में सरकारी वकील और पुलिस द्वारा सूचनाएं उपलब्ध कराई जाएंगी और पीडि़त को यह अधिकार होगा कि किसी भी गवाह से संबंधित दस्तावेज या जानकारी से जुड़े कागजात मांगने के लिए कोर्ट के माध्यम से किसी भी पक्ष को समन भेजवा सकता है। यह प्रावधान 2011 के प्रस्तावित विधेयक की धारा 83 और 2013 के विधेयक की धारा 60 में उल्लेखित है। किसी भी आपराधिक मामले में हिंदुओं को ये सुविधाएं प्राप्त नहीं होंगी।

2011 के प्रस्तावित विधेयक की धारा 70, 71 और 72 के तहत आरोपी हिंदू स्वभाविक रूप से आरोपों का दोषी माना जाएगा, जब तक कि वह न्यायालय से दोषमुक्त न हो जाए। यह प्रावधान 2013 के विधेयक में नहीं दिखा। इससे यह पता चलता है कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में 2011 में कानून का मसौदा तैयार करने वाला दल, 2013 का मसौदा तैयार करने वाले दल की अपेक्षा ज्यादा हिंदू विरोधी था।

2011 के प्रस्तावित विधेयक की धारा 3(एफ) में इस बात का प्रावधान है कि कोई भी अल्पसंख्यक किसी भी हिंदू पर यह झूठा आरोप लगाकर उसे जेल भेजवा सकता है कि उसने अल्पसंख्यक होने के नाते उसके साथ व्यवसाय करने, नौकरी देने या मकान-दुकान या गोदाम किराए पर देने से मना कर दिया। यह प्रावधान 2013 के विधेयक में अनुभाग 3(एफ) में शब्दत: शामिल है। दोनों ही प्रस्तावित विधेयक नौकरशाही का मनोबल गिराने वाले और निश्चित समय में निर्णय लेने में रूकावट पैदा करने वाले हैं।

मोहम्मद अली जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने हमेशा अनुसूचित जाति के लोगों को हिंदू समाज से अलग करने की कोशिश की और मुस्लिम एवं अनुसूचित जाति के हिंदुओं को मिलाकर अन्य हिंदुओं के खिलाफ राजनीतिक मंच तैयार करने की कोशिश की। जिन्ना के इस प्रयास का महात्मा गांधी ने पुरजोर विरोध किया और ‘पूना पैक्ट’ के जरिए वह इसमें सफल भी रहे। लेकिन, 2011 के प्रस्तावित विधेयक की धारा 3(ई) के जरिए, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और मुस्लिमों को जोडऩे की जिन्ना की नीति को उन लोगों द्वारा पूरा किया जा रहा है, जो महात्मा गांधी की राजनीतिक विरासत पर अपना दावा करते हैं। 2013 के विधेयक में इस गठजोड़ को स्थगित कर दिया गया है।

2013 में प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा एवं रोकथाम विधेयक पूरी तरह से मुसलमानों के पक्ष में झुका हुआ है। जबकि 2011 में सोनिया गांधी द्वारा तैयार मसौदा पूरी तरह हिंदू विरोधी था।

ओ. पी. गुप्ता

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