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केजरीवाल ने कांग्रेस से छीना ‘गांधीवाद’

केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की शुरूआत को कांग्रेस और भाजपा ने बहुत हलके में लिया था। यहां तक कि जन लोकपाल के पुरोधा अण्णा हजारे भी केजरीवाल के उत्साह और ऊर्जा को नहीं समझ सके। शायद वे इस सोच में रहे कि यह पार्टी शक्तिशाली नहीं बनेगी और उन्होंने अपने आप को ‘आप’ के समर्थन से पूरी तरह परे रखा। यह समझ से बाहर है कि एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए दोनों लोग साथ मिलकर लड़े और दोनों व्यक्तियों में सामंजस्य नहीं रह सका।

आजादी से पहले कांग्रेस पार्टी ने भी राजनीतिक पदों को हासिल करना, आजादी की लडाई का एक हिस्सा बनाया था। यहां तक कि पंडित जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद नगरपालिका का चुनाव लड़कर उसके अध्यक्ष बने। फिर उन्होंने पालिका के सभी विद्यालयों में ‘सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा’ प्रतिदिन गाना आवश्यक कर दिया था। केजरीवाल ने राजनैतिक रास्ते से सरकारी शक्ति प्राप्त कर लोगों के हितों की बेहतर तरीके से देखभाल करना आवश्यक समझा। यह निश्चय ही सामयिक है।

आश्चर्य है कि कांग्रेस पार्टी के बड़बोले नेतागण ‘आप’ को छोटी चींटी ही मानते रहे। यहां तक कि पार्टी के कुछ राष्ट्रीय नेताओं ने केजरीवाल का मजाक भी बनाया। ये लोग अभी भी भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को गैर-महत्वपूर्ण और हवाई नेता बताकर 10 जनपथ में नंबर बटोरने में लगे हैं। ये लोग सत्य से क्यों परे रहना चाहते हैं, जबकि मोदी की शक्ति का अंदाजा मध्य प्रदेश और राजस्थान में औंधे मुंह गिरी कांग्रेस को हो जाना चाहिए।

केजरीवाल की सोच स्पष्ट है और यह गांधीवादी विचारधारा से निकली है, जिसका बुनियादी ख्याल है कि सरकार का प्रत्येक निर्णय, इस दृष्टि से किया जाना चाहिए कि वह गरीब से गरीब आदमी के हित में है या नहीं। आखिरी आदमी के आंसू पोंछने की नियत, सरकार के निर्णयों में दिखाई देनी चाहिए।

महात्मा गांधी ने मंत्रियों और राज्यपालों के लिए उनकी जीवन-शैली और कार्य-प्रणाली के लिए एक नुस्खा लिखा था, जिस पर कांग्रेस वक्त के साथ-साथ चलना भूल गई पर केजरीवाल ने उसे अपना एजेंडा बना लिया।

गांधीजी ने कहा था कि सत्ताधारी लोग, जहां तक हो देश में बने कपड़े पहनें। उन्हें बड़े-बड़े बंगलों और गाडिय़ों के उपयोग से मना किया था। छुआछूत, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार से दूर रहकर साधारण जीवन व्यतीत करने को कहा। सारे व्यक्तिगत कार्य खुद करते हुए सुरक्षाकर्मियों को लेने से मना किया था, पर हुआ यह कि सभी सत्ताधारी नेता बड़े बंगले और गाडिय़ों के लिए लड़ते हैं। यहां तक कि चुनाव हार जाने के बाद वे बंगले खाली नहीं करते हैं। वे अपनी पहचान सुरक्षा सैनिकों की टुकडिय़ां लेकर चलने में ही समझते हैं।

केजरीवाल ने बड़े बंगले में जाने से, गाड़ी पर लालबत्ती लगाने से मना कर, गांधीजी के बताए रास्ते को अपनाया है। आखिर राजधानियों में चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए एक स्थायी निवास ही काफी है, उन्हें तो सत्र की समाप्ति पर और वैसे भी अधिकांशत: अपने क्षेत्र में रहकर जनसमस्याओं को सुनना है और निवारण करना होता है। सुरक्षा की आवश्यकता लोक-प्रतिनिधियों को नहीं होती है, यह गांधीजी ने कहा था औरकेजरीवाल ने उस पर अमल किया।

कांग्रेस बरसों-बरस सरकार चलाते-चलाते स्वराज के मायने भूल गई। शायद इसलिए कि उसमें घिसे-पिटे अधिकांश राजवाड़ों का सत्ताधारियों के रूप में फिर पुनर्वास हो गया। बची-खुची कसर विदेशी संस्कृति के फरमावदार और उससे प्रभावित लोगों ने कांग्रेस के शीर्षस्थ नेतृत्व के आसपास घेरा बनाकर पूरी कर दी।

स्वराज की बात एक बार, मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को याद आई, तब उन्होंने – ‘आप की सरकार, आप के द्वार’ का नारा दिया था। सरकार तो आम आदमी के द्वार नहीं पहुंच पाई और सरकारी बाबु और मंझोले नेताओं ने उनके द्वार जाकर उन्हें लूट लिया। नतीजन तुरंत बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को ऐतिहासिक पराजय का मुंह देखना पड़ा। केजरीवाल की सरकार का आशय वही है, जो गांधी ने कहा था कि आजादी के बाद हमें पटवारी (लेखपाल) और इंस्पेक्टरराज से आम लोगों को बचाना होगा। केजरीवाल इसमें कहां तक सफल होंगे, यह तो वक्त ही बताएगा।

केजरीवाल ने अपनी पुस्तक ‘स्वराज’ में पंचायतीराज और मोहल्ला समितियों की बात कही है। इन्हें हर निर्णय में भागीदार बनाने को भी कहा है। यह कुछ हद तक सही है। आज ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और दूसरे चुने हुए प्रतिनिधि जिलाधिकरी के मातहत ही काम करते हैं। उनके छोटे-छोटे निर्णयों की समीक्षा तक परगनाधीश किया करते हैं। जब तक पंचायत को अपने अधिकार नहीं मिलेंगे, पंचायतीराज का कोई मतलब नहीं। हर स्तर पर इन्हें लालफीताशाही के पंजों की जकड़ से मुक्त कराया जाना, एक अच्छी शुरूआत होगी।

लेकिन यह याद रखना होगा कि हिंदुस्तान का प्रजातंत्र न तो बहुत परिपक्व है और न ही सदियों पुराना। साथ ही अशिक्षा का भारी अभिशाप इसके साथ जुड़ा हुआ है। ऐसे में सभी निर्णय रायशुमारी पर छोड़ देना भी खतरे से खाली नहीं होगा।

केजरीवाल की सोच में गांधीवादी झलक है। वह कुछ करने के लिए दृढ़ और उतावले दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में देश की सबसे बड़ी सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस को स्वार्थवश बोलने वाले अपने नेताओं की बात सुनें बिना केजरीवाल को समर्थन देना चाहिए।

डॉ. विजय खैरा

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