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देवयानी की नौकरानी क्या अमेरिकी जासूस है?

जब ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (रॉ) के वरिष्ठ अधिकारी रविन्द्र सिंह को उनके परिवार सहित अमेरिकियों द्वारा आश्रय दिया गया था, तब भारत के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा था कि यह जासूसी के मुद्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि रविन्द्र सिंह अमेरिका के लिए इतने संवेदनशील ‘एसेट’ क्यों हैं। ताजा मामले में वही प्रश्न, एक बार फिर प्रासंगिक है। अमेरिका में पदस्थापित भारतीय उप महावाणिज्य दूत देवयानी खोबरागड़े की घरेलू नौकरानी संगीता रिचर्ड, अमेरिका के लिए इतनी महत्वपूर्ण है कि अमेरिका में देवयानी के साथ बदसलूकी से दो दिन पहले, उसके परिवार को भारत से निकाल कर अमेरिका पहुंचा दिया गया। तो, क्या अमेरिकी खुफिया एजेंसी द्वारा भारतीय राजनयिक मिशन की जानकारी जुटाने के लिए संगीता को नियुक्त किया गया था?

अमेरिकी अधिकारियों द्वारा संगीता रिचर्ड और उसके परिवार के सदस्यों को बचाने की दुस्साहसिक कार्रवाई यही बात कहती है। इस तरह का दुस्साहस प्रकट करता है कि संभवत: संगीता की नियुक्ति अमेरिका द्वारा की गई थी और खुफिया की भाषा में कहें तो उसे ‘संपत्ति’ के रूप में तब्दील कर दिया गया था। इस ‘एसेट्स’ को देवयानी द्वारा खोजकर बेनकाब कर दिया गया। यह एक तथ्य हो सकता है कि संभवत: देवयानी ने मजबूर होकर दिल्ली हाईकोर्ट की शरण ली, जिसके कारण अमेरिका में उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई से बचाने के लिए, कोर्ट ने संगीता के खिलाफ निषेधाज्ञा जारी की। अमेरिका के साउथ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ने आगे की कार्रवाई करते हुए देवयानी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया और देवयानी का पता लगाने के लिए अमेरिकी सरकार से अनुरोध किया। अचानक वीजा मिलना और संगीता के परिवार का अमेरिका पहुंचने का तात्पर्य है कि उस देश के अधिकारी अपनी ‘एसेट्स’ और उसके परिजन को बचाने के लिए स्थिति की पूरी निगरानी कर रहे थे। संगीता के परिजनों पर भारतीय न्यायालय की भौंहें टेढ़ी होने की आसन्न संभावना को देखते हुए अमेरिका ने इस तरह की आकस्मिक कार्रवाई की।

इससे यह स्पष्ट हो गया कि संगीता फरार नहीं हुई, बल्कि अमेरिका द्वारा उसे अपने सुरक्षा घेरे में लिया गया है। यह जरूर याद रखना चाहिए कि ऐसी ‘एसेट्स’ के खुलासा होने पर, जासूसी की रूपरेखा तैयार करने वाले शत्रु देश का यही रवैया होता है। इस रूपरेखा के बचाव का कोई भी मूल्य कम ही होता है। संभवत: देवयानी ने यही कीमत चुकाई है।

जिस तरीके से संगीता के पूरे परिवार ने भारत छोड़ा, यह बेहद सनसनीखेज राजनयिक घटना की बुनावट के बिना संभव नहीं है, जो नैतिकता की मुहर और उकसाव का विषय, दोनों है।

विश्व के किसी भी देश में राजनयिकों के साथ इस तरह की घटना दुर्लभ है। भारत में ही किसी देश के किसी भी स्तर के राजनयिक के साथ किसी भी दुर्घटना पर मामला श्रृंखलाबद्ध तरीके से प्रधानमंत्री तक पहुंचाया जाता है। सबसे पहले सिपाही घटना की जानकारी एसएचओ को देता है। एसएचओ सहायक आयुक्त को, सहायक आयुक्त उपायुक्त को, उपायुक्त पुलिस आयुक्त को, पुलिस आयुक्त गृह सचिव को और अंत में गृह सचिव प्रधानमंत्री को ऐसी घटना की जानकारी देता है। राजनयिक प्रतिरक्षा को ध्यान में रखकर यह कदम उठाया जाता है।

देवयानी मामले में एक राजनयिक को हथकड़ी लगाना और उसे निर्वस्त्र कर तलाशी लेना स्वाभाविक कानूनी पक्ष नहीं, बल्कि जान-बूझ कर उकसाने का मसला है। इस पर भारत नाराज भी हुआ और भड़का भी। इससे अमेरिका ने उच्च राजनैतिक जमीन और अमेरिकी खुफिया एजेंसी की ‘एसेट्स’ (संगीता और उसके परिजन) ने सहानुभूति और विश्वसनीयता हासिल की। एक बेहद उम्दा पटकथा लिखी गई। अमेरिका द्वारा ‘हाई-मोरल ग्राउंड’ पाने का यह बेहद घृणास्पद प्रयास है। भारत में न्यायालय के रूख की अपेक्षा नैतिकता का आधार देवयानी के पक्ष में ज्यादा है। अगर यह सिर्फ मजदूरी का मामला होता तो अमेरिका वह रूख नहीं अपनाता, जो उसने अपनाया है। इस मामले में जासूसी का कोण ज्यादा मजबूत दिख रहा है।

नैतिकता और अमेरिकी कूटनीति हमेशा से एक-दूसरे के विरोधाभासी रहे हैं। यदि अमेरिका दूसरे देशों के कानूनों और संवेदनशीलता के प्रति इतना ही चिंतित होता, तो उसने डेविड हेडली को भारत प्रत्यार्पित किया होता। यदि मजदूरी की असमानता को लेकर वह इतना ही संवेदनशील था, तो अन्य देशों से कॉल सेंटर की नौकरी को आउटसोर्स नहीं करता। इतने कम वेतन में भारतीय युवा रात-रात भर जाग कर इन कॉल सेंटरों में काम करते हैं, ताकि अमेरिका दिन में अपना कदम आगे बढ़ा सके।

भारत की प्रबुद्ध जनता उस घाघ चाल को अच्छी तरह समझ चुकी है, जिसके तहत अमेरिकी नीति-नियंता किसी देश को अस्थिर करने का एजेंडा बनाते हैं, ताकि अमेरिका अपने आर्थिक और सामरिक एजेंडे को आगे बढ़ा सके। इसकी शुरूआत ‘लोकतंत्र की तरफ बढऩे’ की अवधारणा से शुरू हुई। इसके बाद ‘मानवाधिकार’ का जामा पहनाया गया। उसके बाद भारत जैसे कई देशों को बताया गया कि वे ‘एड्स बम’ के शिखर पर बैठे हैं। अब इस सूची में ‘आधुनिक दास’ की अवधारणा है। इस विषय को पश्चिमी देशों के टेलिविजन पर खूब प्रसारित किया जा रहा है। सवाल है कि यदि भारत की 50 प्रतिशत आबादी आधुनिक दास है, तो शेष लोगों को किसने बंधक बनाया है। भारतीय आबादी के बीच कील पैबस्त करने का यह एक चालाक यंत्र है। दुनिया भर में धारणा बैठाने के लिए यह एक दुष्प्रचार है कि भारत सहित ज्यादातर देश निरंकुश, क्रूर और असभ्य हैं।

दास के संबंध में एक दूसरा मसला है कि अमेरिका के राष्ट्रपिता, जॉर्ज वाशिंगटन ने अपनी जिस संपत्ति की वसीयत पत्नी के नाम की थी, उसमें कई ‘दास’ भी शामिल थे।

इस आलेख में देवयानी की निजी जिंदगी और राजनयिक हंगामे को न्यायोचित ठहराने के लिए मजदूरी पर विस्तृत चर्चा नहीं की गई है। फिर भी, यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि डिप्टी काउंसेल जनरल और संगीता रिचर्ड के बीच किया गया अनुबंध और व्यवस्था, मानकों के अनुसार प्रशंसनीय है और कोई भी व्यक्ति, जो इस पर प्रश्न खड़ा करता है, वह किसी बहकावे के तहत काम कर रहा है।

‘आधुनिक दास’ की अवधारणा को प्रतिपादित कर, उसे दुष्प्रचारित करने के लिए अमेरिका ने संगीता रिचर्ड नाम के इसी यंत्र का प्रयोग किया है। यही भारतीय समाज में असंतोष का कारण है। इस नीलामी में बहुत सारे भारतवंशी अमेरिकियों द्वारा सहयोग किया जा रहा है, जो अपनाई हुई पितृभूमि के थोड़े से इशारे पर अपनी मातृभूमि पर दोष मढऩे में ज्यादा आनंद महसूस करते हैं। ’आधुनिक दास’ की वही अवधारणा, दूसरे रूप में आज एक नवजात राजनीतिक दल द्वारा अपनाया जा रहा है, जो अमेरिका से बड़े पैमाने पर दान प्राप्त करती है। माओवादियों, चर्च और जेहादियों के अलावा यह अमेरिका को एक नया राजनैतिक उत्तोलन प्रदान करता है।

इस लेखक ने खतरा उठाते हुए, इन सारी बातों पर जोर दिया है कि देवयानी का मुद्दा, अपने जासूसी तंत्र को बचाने के लिए एक लिबास में रूप में प्रयोग किया गया है।

आर. एस. एन. सिंह

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