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एक आम नागरिक का गुस्सा है ‘आप’

‘आप’ एक आम नागरिक का गुस्सा है, जो अपनी संपूर्ण भीषणता के साथ दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस पर फट पड़ा। यह पहाड़ पर फटने वाले बादल जैसा था, जिसने कांग्रेस और भाजपा दोनों के होश उड़ा दिए।

दिल्ली अब ‘आप’ की है। वही दिल्ली को चलाएगी। पर जानना जरूरी है कि ये ‘आप’ क्या है? एक वैकल्पिक राजनीतिक सोच से उपजा आन्दोलन या फिर क्या यह सिर्फ एक परिस्थितिजन्य आक्रोश है? और हां, तो क्या यह परिस्थितिजन्य आक्रोश एक राजनीतिक चिंतन और दर्शन में तब्दील हो सकता है? क्या है उसका आर्थिक चिन्तन? क्या इसमें कहीं कोई व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण है? खोजने की कोशिश की। थोड़ा नजदीक जाने पर देखा कि फिलहाल तो यह गठजोड़ है जिसमें कुछ समाजवादी हैं, कुछ सेकुलरवादी हैं तो कुछ फ्री थिंकर्स और कुछ शुभेच्छु नागरिक हैं। यह जरूर कहा जा सकता है कि देश के कई दल शुरू में इसी तरह परिस्थितिजन्य जमावड़े से पैदा हुए हैं, तो शायद ‘आप’ भी आगे जाकर एक राजनीतिक सोच में तब्दील हो जाए। पर, आज तो यह एक समूह और जमावड़ा ही लगता है। तो सवाल है कि इस जमावड़े को दिल्ली में इतना समर्थन क्यों मिला?

दरअसल, ‘आप’ एक आम नागरिक का गुस्सा है, जो अपनी संपूर्ण भीषणता के साथ दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस पर फट पड़ा। यह पहाड़ पर फटने वाले बादल जैसा था, जिसने कांग्रेस और भाजपा दोनों के होश उड़ा दिए। कांग्रेस और भाजपा के लिए सोचने की बात है कि आम आदमी में यह गुस्सा क्यों है। देखा जाए तो पिछले कुछ समय से आम आदमी छटपटा रहा है- यह कहने के लिए कि मेरी बात सुनो! उसकी बेबसी, कुछ न कर पाने की सिथति को स्थापित राजनीतिक दलों और तन्त्र ने उसकी बेचारगी मान लिया था। ‘ये क्या कर सकता है’ ऐसा सोच लिया था। मगर सूचना के इस युग में अपनी इस बेचारगी वाली छवि को तोडऩे के लिए आम नागरिक बुरी तरह परेशान था। ‘आप’ ने उसे ऐसा करने का मौका दिया। ‘आप’ की यह एक बड़ी सफलता है। साथ ही कांग्रेस और भाजपा की यह बड़ी विफलता है। कांग्रेस को जनता ने भ्रष्टाचार का दोषी मानकर दंड दिया। भाजपा की विफलता इसमें है कि दिल्लीवासियों ने उसे विकल्प नहीं बनाया। उसकी विश्वसनीयता के लिए यह बड़ी चुनौती है।

ऐसा हुआ क्यों? पहली बात कि स्थापित राजनीतिक दल अब मठों की तरह हो गए हैं, जहां आम आदमी का प्रवेश तकरीबन वर्जित है। बिना पहचान और रेफरेंस के कोई वहां घुस नहीं सकता। इन मठों में लोकतंत्र नहीं है। जो जहां बैठा है, वहीं बैठा है। नेताओं के चेले चपाटे, सगे सम्बंधी, चंदा देने वाले, नौकरशाह, सेलिब्रिटीज, सम्पन्न व्यापारी, उद्योगपति बस ये ही इन मठों में घुस सकते हैं और वहां इन्हीं की तूती वहां बोलती है। आम हिन्दुस्तानी वहां घुसने की सोच भी नहीं सकता – चुनाव का टिकट पाने की तो कल्पना ही संभव नहीं!

दूसरे, राजनीतिक व्यावहारिकता के नाम पर चुनाव जीतने के लिए स्थापित राजनीतिक पार्टियां हर तरह का धतधर्म करने लगी हैं। जीत जरूरी है, चाहे इसके लिए शराब बांटनी पड़े या फिर पैसे देने पड़ें, वे सब करते है। शुचिता, ईमानदारी और सिद्धांतों की राजनीति को चुनाव लडऩे और जीतने की मजबूरी के नाम पर ताक पर रख दिया गया है। अपनी दो रोटियों की जुगाड़ में लगा आम आदमी जब सुनता है कि ए राजा ने तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री करूनानिधि की पत्नी को सिर्फ भेंट के तौर पर 500 करोड़ रूपए दिए, तो उसे अजीब-सी कसमसाहट और वितृष्णा होती है। नीरा राडिया टेपों की बातचीत जब वह सुनता है तो उसकी कसमसाहट भारी

गुस्से में तब्दील हो जाती है। राडिया टेपों ने आम हिन्दुस्तानी को बताया कि भ्रष्टाचार एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सामान्य चलन है। यह मान लिया गया है कि राजनीति करनी है, तो पैसा चाहिए फिर वह किसी भी तरीके से क्यों न आए।

आम नागरिक को ले देकर मीडिया पर भरोसा था, मगर राडिया टेपों ने उन मीडिया कर्मियों की कलई खोल दी, जो मीडिया में शुचिता और ऊंचे मानकों की दुहाई देते थे। ऐसा लगा कि भंडा फोडऩे वालों का ही भंडा फूट गया। आम नागरिक का एक और भ्रम इससे टूट गया। कोयला घोटाले में जिस तरह पत्रकार बिचौलिए का काम करते हुए नजर आए, जिस तरह से तहलका के तरूण तेजपाल और शोमा चौधरी के कारनामे जग जाहिर हुए, उसने आम हिन्दुस्तानी को बुरी तरह हिला दिया। वह करे, तो किस पर भरोसा करे?

इससे आज आम हिन्दुस्तानी बेतरह गुस्सा है। उसे गुस्सा है, चारों और फैले भ्रष्टाचार पर, राजनीतिक दलों पर, मीडिया पर, अफसरशाही पर, व्यापारी वर्ग पर कुल मिला कर पूरे के पूरे तंत्र पर। आम नागरिक को लग रहा है कि सब सिर्फ उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसलिए दिल्ली में उसका गुस्सा बादलों की तरह फट पड़ा। कहर बरपा दिया उसने कांग्रेस पर।

मगर ध्यान देने की बात है कि गुस्सा आदमी का स्थायी भाव नहीं है। कोई भी लगातार गुस्से में नहीं रह सकता। हर समय बादल फटे तो तबाही मच जाएगी। रोज बादल फटना भी खतरनाक है। इस गुस्से का अगर सही इस्तेमाल नहीं हुआ, तो वह घोर निराशा में बदल जाएगा।

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