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आखिर में ‘आप’ की सरकार

अपने जन्म के केवल कुछ ही महीनों में दिल्ली में सरकार बना लेना एक राजनीतिक चमत्कार से कम नहीं। यह राजनीतिक चमत्कार उस वक्त और चकाचौंध कर देता है, जब ऐसी पार्टी के कर्णधारों में से कोई स्थापित राजनीतिक नेता न हो और न ही किसी की राजनीतिक पृष्ठभूमि हो। इस ऊंचाई तक पहुंचाने की ‘आप’ की मिसाइल में कई प्रकार के उत्प्रेरक हो सकते हैं।

दिल्ली की जनता को ‘आप’ ने नए साल का तोहफा दे ही दिया। आखिरकार दिल्ली को ‘आप’ की सरकार मिल ही गई। नहीं तो, दिल्ली में त्याग का ऐसा समन्दर लहरा रहा था, जैसे किसी को सत्ता से कोई मोह ही नहीं हो। ऐसा लग रहा था, जैसे चुनाव होने के बाद भी सत्ता की कुर्सी पर बैठाने के लिए दिल्ली तरस कर रह जाएगी। येन, केन, प्रकारेण सत्ता पर काबिज होने वाले नेता दिल्ली में जैसे दिखाई देने बंद हो गए थे। तीनों दलों में से किसी के पास बहुमत नहीं था। कांग्रेस तो खैर दहाई के आंकड़े को भी नहीं छू पाई थी। अन्य तीन राज्यों में अपनी पार्टी का परचम लहराने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रभाव में दिल्ली के मतदाता नहीं आए। भाजपा को बहुमत तो नहीं मिला, लेकिन दिल्ली विधानसभा में वह नम्बर वन पर जरूर आ गई। लेकिन उपराज्यपाल नजीब जंग ने जब मुख्यमंत्री पद के लिए उसके उम्मीदवार डॉ. हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का न्यौता दिया तो पार्टी के नेताओं को 2014 के आम चुनाव दिखाई देने लगे। वो तो भला हो कांग्रेस का, पता नहीं किन क्षणों में उसने ‘आप’ को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी। कांग्रेस को गलियाती विधानसभा में दूसरे नम्बर की सबसे बड़ी पार्टी बनी ‘आप’ ने किसी को समर्थन न देने और किसी से समर्थन न लेने के अपने अपने सैद्धान्तिक मुखौटे को ताक पर रख कर दिल्ली को नए साल का तोहफा देने का रास्ता निकाल लिया और काफी जद्दोजहद के बाद ‘आप’ ने आखिरकार सरकार का गठन करने का मूड बना लिया। चुनावों में नम्बर दो बन कर आई ‘आप’ ने नम्बर वन भाजपा को ठेंगा दिखा कर नम्बर तीन कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना ली।

भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन देने के लिए ‘आप’ ने उसी कांग्रेस से समर्थन लिया है, जिसे वह बेईमान बताते हुए सत्ता तक पहुंची है। यह गंभीर बहस का विषय हो सकता है कि बगैर मांगे यदि ‘आप’ को कांग्रेस का समर्थन मिला तो उसे समर्थन लेकर सरकार का गठन करना चाहिए था या नहीं। ऐसा भी तो हो सकता था कि कांग्रेस अपना समर्थन ‘आप’ के दरवाजे पर छोड़ आती और तब शायद ‘आप’ के लिए मुश्किलें कुछ ज्यादा हो जातीं। तब ‘आप’ को पता ही नहीं चलता कि कांग्रेस ने अपना समर्थन बगैर किसी शर्त के दिया है, या फिर समर्थन में कहीं कोई शर्त लगा दी है। सरकार बनाने से पहले ‘आप’ के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली में गली-गली घूम कर लोगों के दिलों को टटोलने की कोशिश की और उसे लगा कि दिल्ली की जनता ‘आप’ की ओर बड़ी ही आशा भरी नजरों से देख रही है। केजरीवाल भी अपने मन को पूरी तरह से पक्का कर (दिल्ली पर रहम खा कर) उसी रामलीला मैदान में मुख्यमंत्री पद की कुर्सी लेने के लिए तैयार हो गए, जहां अन्ना के जन-आन्दोलन के गर्भ से उनकी राजनीतिक पार्टी ‘आप’ का जन्म हुआ था। अपनी नवगठित कैबिनेट के सदस्यों के साथ केजरीवाल ने रामलीला मैदान में जिस गर्व के साथ उपराज्यपाल नजीब जंग से मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ ली, उससे लगा कि आम आदमी पार्टी (आप) शानदार जनादेश के बल पर वहां खड़ी है।

केजरीवाल की सरकार का मूल्यांकन करने के लिए कयास लगाना बहुत जल्दबाजी होगी, लेकिन जिन हालात में सरकार के गठन के लिए उसे कांग्रेस का समर्थन मिला है, उससे केजरीवाल की अल्पमत की इस सरकार के दिनों को गिनना बहुत कठिन नहीं है। शपथ लेने से पहले ही सरकार की बैसाखी– कांग्रेस में समर्थन देने के लिए ही बहस शुरू हो गई थी। फिर कैबिनेट में शामिल किए जाने वालों की सूची से नाम कट जाने से ‘आप’ के एक विधायक ने जिस प्रकार के तेवर दिखाए, उससे साफ हो गया कि केजरीवाल बेशक पार्टी के संयोजक होकर और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद भी सुख-सुविधाओं को नकार रहे हों, लेकिन उनके सभी संगी-साथी तो उनकी तरह कोई संकल्प लेकर इस सार्वजनिक जीवन में नहीं आए हैं। सभी तो सन्तोषी नहीं हो सकते। इस सब के बावजूद ‘आप’ की सरकार कितने दिन चलेगी, इसका जवाब अभी समय के गर्भ में है। कांग्रेस इस सरकार को समर्थन देकर भी इसी उहापोह में है कि उसे ‘आप’ को समर्थन देना चाहिए था या नहीं। इस सरकार को गिराने से पहले कांग्रेस को दो बार सोचना पड़ेगा और सरकार की असमय मृत्यु रोकने के लिए ‘आप’ को कई बार विचार करना होगा।

भाजपा का एक वर्ग इसी पछतावे में है कि दिल्ली विधानसभा में नम्बर वन की पार्टी बन कर भी उसने सरकार का गठन क्यों नहीं किया। उसे सरकार का गठन करना चाहिए था, बेशक उस सरकार का हश्र कुछ भी होता। भाजपा के इस वर्ग का सरकार के गठन के लिए तर्क यही है कि 2014 के आम चुनावों में देश की राजधानी में उनकी सरकार होती तो सत्ता में होने का भाजपा को कुछ लाभ तो अवश्य मिलता। भाजपा हो या कांग्रेस, कुल मिला कर निगाहें सब की 2014 पर हैं। ‘आप’ ने भी 2014 में शानदार प्रदर्शन करने के मंसूबे बांधने शुरू कर दिए हैं। सपने देखने का अधिकार सब का है। ऐसे में यदि केजरीवाल लोकसभा में अपना प्रभाव कायम करने के सपने देखें तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है। दिल्ली में जन-आन्दोलन के दौरान ताने देने वालों को माकूल जवाब देने के लिए ‘आप’ की सरकार का गठन करने के सपने केजरीवाल ने देखे और उन्हें पूरा करने में वह जुटे, तभी तो दिल्ली में आज ‘आप’ की सरकार बन सकी है, बेशक उसकी अल्पायु ही क्यों न हो। दिल्ली में सरकार के गठन के बाद देश की राजधानी से किए वादों को पूरा करना केजरीवाल के लिए कितना कठिन होगा, यह तो दिल्ली की जनता से वादे करते हुए भी केजरीवाल को पता था। लेकिन इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि केजरीवाल को इस बात की उम्मीद कम ही रही होगी कि चुनावों के बाद अपने वादों को पूरा करने का उन्हें मौका मिलेगा। केजरीवाल के समक्ष फिलहाल दिल्ली की जनता को भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन देने के साथ ही हर परिवार को नि:शुल्क 700 लीटर पानी देने और बिजली की दरें आधी करने की मुख्य चुनौती रहेगी। केजरीवाल ने 15 दिन में जन-लोकपाल देने की घोषणा भी की है। यह सब आसान नहीं है, लेकिन लैपटॉप, रंगीन टीवी या मंगलसूत्र बांटने जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों और उत्तर प्रदेश की सरकारों की नौटंकी से तो बेहतर जरूर है।

साथ ही नेता को जनता से दूर करने वाले अनावश्यक सुरक्षा तन्त्र और सरकारी बंगले जैसे अनावश्यक खर्चे बढ़ाने वाली सुविधाओं को बड़ा-सा ‘नो’ कह कर केजरीवाल ने आज के भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र के कर्णधारों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत कर उन्हें दुविधा में डाल दिया है। यह घुप अंधेरे में एक दीए की रोशनी है, जिसे जनता के दुख-दर्द को देखने के लिए सार्वजनिक जीवन में रहने वालों को साथ ले कर चलना होगा।

अपने जन्म के केवल कुछ ही महीनों में दिल्ली में सरकार बना लेना एक राजनीतिक चमत्कार से कम नहीं। यह राजनीतिक चमत्कार उस वक्त और चकाचौंध कर देता है, जब ऐसी पार्टी के कर्णधारों में से कोई स्थापित राजनीतिक नेता न हो और न ही किसी की राजनीतिक पृष्ठभूमि हो। इस ऊंचाई तक पहुंचाने की ‘आप’ की मिसाइल में कई प्रकार के उत्प्रेरक हो सकते हैं, लेकिन उनमें असली ऊर्जा आम आदमी की दुखती रग से निकला गुस्सा हो सकता है। अब जबकि आम चुनावों की धमक बढ़ती जा रही है, सभी राजनीतिक दल उस चुम्बक को खोज रहे हैं, जो देश के मतदाता की उंगली को अपने चुनाव चिन्ह वाले बटन पर रखवा सके। कांग्रेस और भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों में आत्ममंथन चल रहा है। 2014 के चुनावी महासंग्राम का शंख बजाने के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग पूरी तैयारी में है। राजनीतिक दल चुनावी शतरंजी बिसात पर अपनी गोटियां बिछाने में जुटे हैं। ऐसे में ‘आप’ की रणनीति से कोई गाफिल नहीं रहना चाहेगा। सभी दल एक बार रूक कर ‘आप’ की रणनीति पर गौर करने के लिए बाध्य हैं। खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी, जिसने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस महासंग्राम में अपना सेनापति बना कर, अपने लगभग सभी पत्ते खोल दिए हैं। 2014 के इस महासंग्राम का सेमीफाइनल जिन राज्यों में हुआ, वहां लोकसभा की 72 सीटें हैं और उसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का शानदार प्रदर्शन उसके लिए बहुत ही उत्साहजनक रहा है, लेकिन फिर भी उस प्रदर्शन में कुछ कसर रह गई। इसी कसर में भाजपा की जगह ‘आप’ ने दिल्ली की सत्ता पर कब्जा कर लिया। यह सेमीफाइनल भाजपा ने प्रधानमंत्री पद के अपने उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा था और उसी क्रम में माना जा रहा था कि यदि 15 साल से काबिज कांग्रेस को हरा कर नरेन्द्र मोदी दिल्ली में भाजपा को सत्ता दिलाने में कामयाब रहे, तो यह उनके लिए देश की सत्ता मिलने के स्पष्ट संकेत होंगे। हालांकि इस सोच के पीछे कोई तार्किक वजह दिखाई नहीं देती, केवल इसके कि यदि भाजपा दिल्ली में सरकार बनाती, तो दिल्ली में उसकी वापसी 15 साल तक जमी कांग्रेस को अपदस्थ करके होती। यह एक ऐसा संकेत होता, जो नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का मानक बन सकता था। लेकिन भाजपा ने छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में तो शानदार वापसी के साथ राजस्थान में कांग्रेस को अपदस्थ किया, लेकिन दिल्ली में जनता ने उसे बहुमत देने में कुछ कंजूसी कर डाली। लेकिन फिर भी वह 31 सीटों के साथ विधानसभा में नम्बर वन की पार्टी है। नम्बर वन हो कर भी उपराज्यपाल नजीब जंग का सरकार बनाने का निमंत्रण ठुकरा कर डॉ. हर्षवर्धन ने हाथ आई मुख्यमंत्री की कुर्सी वापस कर दी, लेकिन केजरीवाल ने चुनौतियों भरा कांटों का ताज पहन लिया है। राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि केजरीवाल दिल्ली को अपनी मंजिल बना कर यहीं रूक जाते हैं, या फिर इसे मील का पत्थर बना कर आगे की मंजिल की ओर बढ़ते हैं। यदि दिल्ली विधानसभा चुनावों की तरह वह लोकसभा चुनावों में कुछ चमत्कार कर पाए तो शायद वह किंग न भी बन पाएं, लेकिन किंगमेकर तो बन ही सकते हैं। वैसे देवेगौड़ा, गुजराल, चन्द्रशेखर आदि के उदाहरण भी सामने हैं।

श्रीकान्त शर्मा

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