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जीवन ही मृत्यु का कारण है…

 

नदी पर बने पुल पर खड़े शिष्य ने अपने गुरू से कहा – ‘गुरूवर, देखिए पुल के नीचे का जल कितनी तेजी से बह रहा है।’ गुरू ने जवाब दिया – ‘हे शिष्य, केवल पुल के नीचे का जल ही नहीं, प्रत्युत यह पुल भी बह रहा है। पुल के साथ-साथ हम भी बह रहे हैं, नदी बह रही है… और इस दुनिया की सारी चीजें बह रही हैं।’ गुरु की इन बातों को सुनकर शिष्य दुविधा में पड़ गया। जिज्ञाशावश शिष्य ने गुरू से पूछ लिया – ‘गुरूवर, पुल पर तो हम खड़े हैं, पुल कहां बह रहा है? आपकी बात का अर्थ क्या है?’

गुरू ने कहा – ‘देखो, इस पुल के निर्माण के वक्त से यह पुल लम्हा-दर-लम्हा पुराना होता जा रहा है। एक वक्त आएगा जब नदी की बहती हुई जलधारा भी सूख जाएगी… और मनुष्य का क्या, आज है कल नहीं। अभी है, पल भर के बाद नहीं। आखिर सब कुछ बहता जा रहा है या नहीं?’

गुरूकी बातों से शिष्य के ज्ञान-चक्षु खुल गए। वास्तव में हम पल-पल जी नहीं रहे होते, प्रत्युत मर रहे होते हैं। वक्त किसी के लिए ठहरता नहीं। वक्त की गति में इंसान की जीवन-लीला के अवसान का संदेश छिपा होता है। यह जीवन तिल-तिल कर जर-जर होता जाता है। मनुष्य को हर गुजरते लम्हे की अहमियत को शिद्दत से महसूस करते हुए आत्मज्ञान तथा साधना से परमेश्वर की प्राप्ति में खुद को समर्पित कर देना चाहिए।

विश्वस्वरूप रथ

जिन्दगी एक खेल की तरह होती है, जिसमें हमें एक मौका मिलता है। अगर हम वह मौका गंवा दें तो हमें लगता है कि हमने जिन्दगी हार दी, ….पर नहीं, हम अपनी पहचान को वापस ला सकते हैं।

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