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सिर-आंखों पर केजरीवाल

सबसे पहले मैं उदय इंडिया के पाठकों को नए साल 2014 के लिए सुख, समृद्धि और बहुत सारी खुशियों की शुभकामनाएं देता हूं। अब, मैं दिल्ली के ताजा राजनीतिक घटनाक्रम की ओर आता हूं, जहां कई दिनों के राजनीतिक गतिरोध के बाद आम आदमी पार्टी ने सरकार का गठन किया है। अरविन्द केजरीवाल की जबर्दस्त विचार-मंथन वाली बैठकों के परिणामों से ऐसा लगता है कि नए राजनीतिक घटनाक्रम में यह पार्टी दिल्ली को शायद साफ कर सके। लम्बे अधिस्थगन के बाद अब लोग राजनीतिक गतिविधियों के आगे बढऩे का इंतजार कर रहे हैं। अनिच्छा के बावजूद दिल्ली में सरकार बनाने का निर्णय लेकर ‘आप’ ने शायद अच्छा ही किया है। अब लोग जान पाएंगे कि केजरीवाल अपने वादों को पूरा करने के लिए संसाधनों का उपयोग किस प्रकार करते हैं। वह शीघ्र ही महसूस करेंगे कि उन्होंने जो वादे किए, उनमें से अनेक आश्वासनों को धन की कमी और प्रशासनिक कारणों से पूरा करना कितना मुश्किल होगा। इसके लिए वित्तीय और कार्यवाहक मोर्चों पर उनके समक्ष कितनी बड़ी चुनौतियां हैं। इसके लिए, चुनौतियों को अमलीजामा पहनाने और राजनीतिक स्थायित्व के लिए ‘आप’ को तैयार हो जाना चाहिए। लेकिन कांग्रेस, जिसके समर्थन से सरकार बनी है, दोगले ढंग से व्यवहार कर रही है। पहले उसने ‘आप’ को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की थी, लेकिन बाद में कहने लगी कि वह केवल सशर्त समर्थन देगी। मेरा विश्वास है कि ‘आप’ की अब असली परीक्षा है। साथ ही, लोगों की भावनाएं हैं, जिन्होंने कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए ‘आप’ को वोट दिया। यहां कहने का मतलब यह है कि ‘आप’ ने कांग्रेस को भ्रष्ट करार दे कर अधिक वोट प्राप्त किए, और भाजपा पर अधिक ध्यान नहीं दिया। ‘आप’ जब प्रदर्शन कर रही थी, तब तत्कालीन शीला दीक्षित सरकार ने उस आन्दोलन को उखाडऩे का सब प्रकार का प्रयास किया। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। कांग्रेस और ‘आप’ ने सरकार का गठन करने के लिए हाथ मिला लिए हैं। ‘आप’ को बड़ी संख्या में ऐसे मतदाताओं ने भी वोट दिए, जो मानते थे कि केजरीवाल किसी भी कारण से किसी का भी समर्थन नहीं लेंगे। उनका विश्वास था कि सरकार का गठन करने के लिए उन्हें पूर्ण बहुमत मिलेगा। अगर उन्होंने घोषणा की होती कि वह किसी के समर्थन से सरकार का गठन करेंगे, तो लोगों ने सोचा होता कि सरकार के गठन के लिए ‘आप’ कांग्रेस का समर्थन भी ले सकती है। तब, वह ‘आप’ के लिए आत्मघाती होता। इसलिए, क्या यह दोगलापन नहीं है? ‘आप’ ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह वैकल्पिक राजनीति का प्रतिनिधित्व करती है। वह सैद्धान्तवादी है। न तो वह किसी का समर्थन करेगी और न ही वह कांग्रेस या भाजपा में से किसी का समर्थन लेगी। लेकिन ‘आप’ कैसे अब अपने बदलाव का औचित्य साबित कर सकेगी, जहां वह अपनी वैकल्पिक राजनीति से समझौता करती दिख रही है। जाहिर है, सिद्धान्तों से निर्देशित वैकल्पिक राजनीति में राजनीतिक अवसरवादिता के लिए कोई स्थान नहीं होता। क्या यह वैकल्पिक राजनीति की शुरूआत है, या फिर उसका अन्त है? कांग्रेस दिल्ली में अपने शासन के दौरान हुए विभिन्न घोटालों के खुलासों की कमजोरियों को प्रकाश में नहीं आने देना चाहती और ‘आप’ जब उनका भंडाफोड़ करने के लिए उसके पीछे पड़ेगी तो सरकार गिराने के बारे में कांग्रेस दो बार नहीं सोचेगी। तब वह दिल्ली में ‘आप’ के शासन का अंत होगा। तब क्या होगा?

यदि मैं कहूं कि आम आदमी पार्टी (आप) नई नहीं है, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पश्चिम बंगाल ने वास्तव में भिन्न नाम से ‘आप’ स्टाइल शासन 34 सालों तक देखा है। नुस्खा वही था – यानी कांग्रेस सरकार के खिलाफ गुस्सा, बिजली के लिए झूठे वादे, बड़े शहर में रोजगार के लिए संघर्ष करती खानाबदोश जनता के लिए भोजन और पानी और जाहिर तौर पर भ्रष्टाचार दूर करने का एजेंडा। इस पृष्ठभूमि में मुझे इसकी आर्थिक नीतियों पर गंभीर शंका है। बिजली की दरों को घटा कर आधा करने, और प्रतिदिन प्रत्येक परिवार को 700 लीटर मुफ्त पानी उपलब्ध कराना बहुत ही महत्वाकांक्षी लक्ष्य है। हालांकि जबतक आर्थिक मूल्य मॉडलों में भारी बदलाव न किए जाएं, तब तक इस प्रकार के वादे पूरे किए जा सकने में संदेह ही है। मोटे तौर पर, जो भी आर्थिक घोषणाएं की गई हैं, उनसे विभिन्न सब्सिडी में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरियों के संकेत मिलते हैं, जिन्हें राज्य का बजट मुश्किल से सह पाएगा। यह गंभीर चिन्ता का विषय रहेगा। अन्तिम निर्णय पर पंहुचने से पहले हमें अतिरिक्त तथ्यों का इंतजार करने की जरूरत है। दिल्ली के लिए शानदार ढंग से बनाए गए ‘आप’ के लोकलुभावन घोषणापत्र के निर्माताओं के बारे में अनुमान है कि वे लुटियन की दिल्ली की स्वयंभू धर्मनिरपेक्ष ब्रिगेड का हिस्से हैं। वे उत्पादन की बजाय वितरण पर जोर देते हैं। स्थायित्व के बजाय तुरन्तता पर उनका जोर है। विविधता के स्थान पर स्वल्पव्ययिता पर उनका बल होता है। वास्तव में एक आदर्श पर्यवेक्षक के लिए ‘आप’ एक ऐसी राजनीतिक पार्टी लगती है जिस पर आम आदमी का दबाव नहीं है। मुझे लगता है कि केजरीवाल भारतीय राजनीति में हुई सब प्रकार की गलतियों के प्रतीक हैं। ऐसा तब कहा जाएगा जब आप मानें कि भारतीय राजनीति में मूर्खता, वंशवादी उत्तराधिकार, सार्वजनिक भ्रष्टाचार, पागल लोकलुभावनवाद, भौंडी गुटबाजी, जबरदस्त चमचेबाजी, खुलेआम बेईमानी, चरम स्वार्थ, संकीर्ण दृष्टिकोण और अन्य घृणोत्पादक लक्षण कूट-कूट कर भरे हैं। ‘आप’ और उसके नेतृत्व के लिए मेरी मुख्य चिन्ता है कि वह अपने ऐजेंडे से संबंधित रहे। केजरीवाल की सोच उनकी सोच से बहुत अलग नहीं है जिनके खिलाफ वह लड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। लोगों को किए गए उन्हीं वादों, मतलब प्रतिदिन के दुखों से मुक्ति दिलाने के वादों पर जब एक बार सत्ता मिली है, तब ‘आप’ को लालची सरकार के नियन्त्रण से लोगों के हित पूरे करने होंगे। इसलिए अरविन्द केजरीवाल की होनहार पार्टी पर एक गहरी नजर डालने के बाद उसे एक ऐसा कार्यकर्ता परिभाषित किया जा सकता है जो जमीनी सच्चाईयों को नहीं जानता है। राजनीतिक दृष्टिकोण से यह भी चर्चा का विषय है कि आम आदमी पार्टी, नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने में रोड़ा अटकाने की तैयारी कर रही है, लेकिन यह अभी देखना बाकी है कि इसमें वह कितनी सक्षम हो पाएगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में ‘आप’ 100 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर लडऩे की तैयारी कर चुकी है। उल्लेखनीय बात यह है कि ‘आप’ की लोकसभा का हर प्रत्याशी शिक्षित, बुद्धिजीवी एवं जमीन से जुड़ा होगा। आर्थिक दृष्टिकोण से भी ‘आप’ के पास बाहर से लेकर भारत के अंदर तक पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध है। दिल्ली में सरकार बनाने के बाद अब अरविंद केजरीवाल दिल्ली के आसपास के राज्यों को लोकसभा चुनाव की दृष्टि से बहुत गंभीरता से लेंगे। भले ही कांग्रेस गांधीवाद को छोड़ चुकी है, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने गांधीजी की राह पर चलने का वादा जनता के सामने किया है।

अब इस बदलते माहौल में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पूरी तरह से ध्वस्त नजर आते हैं। चार राज्यों में चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने कहा है – ”हमें आम आदमी पार्टी से कुछ सीखना है।’’ आखिर क्या हो गया है कांग्रेस को? इतने पुराने राजनीतिक दल होने के बावजूद भी आज कांग्रेस ‘गांधी-नीति’ छोड़ कर, कल पैदा हुई आम आदमी पार्टी का अनुसरण करना चाहती है! इससे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की अक्षमता उजागर होती है। राजनीति में अपराधीकरण से लेकर शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार तक, हर जगह कांग्रेस का मुखौटा उतर चुका है। अब ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने मान लिया है कि मोदी के सामने वह 2014 का चुनाव हार चुकी है। कांग्रेस 2014 की रणनीति बनानी छोड़कर, सरकारी मशीनरी द्वारा भाजपा को सिर्फ रोकने का उपाय ढूंढ रही है।

इस परिप्रेक्ष्य में, भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती होगी कि वो आगामी लोकसभा चुनावों के लिए टिकट वितरण में पूरी तरह से साफ-सुथरा तरीका अपनाए, अन्यथा ‘सब जाणता मानुष’ भाजपा के 272+ सीटों के सपने पर विराम लगा सकता है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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