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जम्मू-कश्मीर की अनकही कहानी

जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इस ऐतिहासिक तथ्य के बारे में दो राय हो नहीं सकतीं। अलगाववादियों ने जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करने की बहुत कोशिशें की हैं, लेकिन वे अपने नापाक इरादों में सफल नहीं हो पाए हैं। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में देशी-विदेशी लेखकों और इतिहासकारों ने अपने-अपने ढंग से काफी कुछ लिखा है, लेकिन इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ है, जो पूरी तरह से प्रकाश में नहीं आया है। इसी क्रम में राज्य के प्रमुख राजनीतिक दल ‘प्रजा परिषद्’ का वह ऐतिहासिक आन्दोलन भी है, जो इस राज्य से जुड़े अनेक मुद्दों को लेकर चलाया गया था। इनमें भारत का अविभाज्य अंग होने के बावजूद राज्य में बिना परमिट प्रवेश पर प्रतिबंध, अलग संविधान, अलग झंडा, अलग प्रधानमंत्री जैसे मुद्दे शामिल थे। सत्याग्रही इन मुद्दों का विरोध कर रहे थे। एक ही देश में दो संविधान, दो प्रधानमंत्री और अलग झंडा इन सत्याग्रहियों को मंजूर नहीं था। प्रजा परिषद् राज्य में भारतीय संविधान को पूर्ण रूप से जम्मू-कश्मीर में लागू करने की मांग कर रही थी। पूरा देश उनका समर्थन कर रहा था। प्रजा परिषद् का यह आन्दोलन पिछली शताब्दी के पांचवें दशक में चलाया गया था। आंदोलन का दमन करने के लिए उससे जुड़े हजारों सत्याग्रहियों को कारागार में ठूंस दिया गया था। पन्द्रह सत्याग्रही तो पुलिस की गोलियों से शहीद हो गए थे। भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसी आन्दोलन का समर्थन करते हुए जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए थे। श्रीनगर की जेल में उनकी रहस्मयमृत्यु हो गई थी। अनेक बड़े राष्ट्रीय नेताओं की मांग के बावजूद उनकी मृत्यु के रहस्य से पर्दा अब तक नहीं उठा है। पंजाब में जनसंघ के विभाग संगठन मंत्री तथा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के सचिव रहे कुलदीप चन्द अग्निहोत्री ने भूतकाल के गर्भ में पड़े प्रजा परिषद् के उसी ऐतिहासिक आन्दोलन के इतिहास को प्रकाश में लाने की कोशिश की है। अपनी पुस्तक – ‘जम्मू-कश्मीर की अनकही कहानी’ में उन्होंने उस आन्दोलन का वैज्ञानिक विश्लेषण किया है जिसे जाने-समझे बगैर राज्य के मनोविज्ञान को समझा नहीं जा सकता। पुस्तक की प्रस्तावना में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने उसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि यह जानना भी जरूरी है कि प्रजा परिषद् के आन्दोलन का आरम्भ जनसंघ के निर्माण से भी पहले उस राज्य में पं. प्रेमनाथ डोगरा के नेतृत्व में हुआ था। आडवाणी ने प्रस्तावना में उस वक्त का वर्णन भी किया है जब अटल बिहारी वाजपेयी के साथ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बिना परमिट कश्मीर गए थे और अमृतसर रेलवे स्टेशन पर 20 हजार से अधिक देशवासियों ने उनका शानदार स्वागत किया था। आडवाणी ने लिखा कि उन्हें उस दिन इस बात का अहसास नहीं था कि वह अन्तिम बार डॉ. मुखर्जी से मिल रहे हैं। पुस्तक में स्थान-स्थान पर दी गई संदर्भ सूचियां इसे प्रामाणिक बनाती हैं। पुस्तक की भाषा बहुत ही सरल और ग्राह्य है। इसलिए इसका विषय ऐतिहासिक होते हुए भी यह पठनीय और संग्रहणीय बन गई है।

हिमाचल प्रदेश में बालकनाथ स्नातकोत्तर विद्यालय के प्रधानाचार्य रहे दीनदयाल उपाध्याय महाविद्यालय के संस्थापक कुलदीपचन्द अग्निहोत्री ने बी.एस.सी, हिन्दी साहित्य और राजनीति विज्ञान में एम.ए. के साथ-साथ गांधी अध्ययन और तमिल व संस्कृत में डिप्लोमा करने के बाद पंजाब विश्वविद्यालय से आदिग्रंथ आचार्य की उपाधि प्राप्त की और पी.एच.डी की है। वह भारत-तिब्बत सहयोग मंच के अखिल भारतीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं और दो दर्जन से अधिक देशों की उन्होंने यात्रा की है। प्रस्तुत पुस्तक सहित उन्होंने 15 पुस्तकें लिखी हैं।

उदय इंडिया ब्यूरो

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